Lalgachi by Amalendu Shekhar Pathak

Book review 

मैथिलीमे साहित्य अकादमीक बालसाहित्यक पुरस्कारक लेल चयनित उपन्यासक मादे पढलाक बाद एकटा पाठकक रूपमे पहिल प्रतिक्रिया। -भवनाथ झा (दिनांक 21 जुलाई, 2017)

 

 

 

श्री अमलेन्दुशेखर पाठकजीक लालगाछी उपन्यास भेटल। ओकरा पढलाक बाद नीक लागल। किशोर अमोल एकर चरितनायक थिकाह जे गर्मीक छुट्टी बितएबाक लेल अपन गाम आएल छथि। हुनका संग किशोर-मित्र सभ सेहो छथिन्ह। ई सभ मीलि कए अपन गाममे अन्तरराष्ट्रीय घुसपैठक पर्दाफास करैत छथि आ अपन गामकें उजरबासँ बचा लैत छथि। हिनक गाम भारतवर्षक प्रतीक थीक तँ लालगाछी मिथिलाक प्रतीक। लालगाछीक भूमिकें खरीदि ओहिठामसँ आतंकवादी गतिविधि चलएबाक अन्तरराष्ट्रीय मनसूबाके ओ किशोरदल मटियामेट कए दैत अछि तकरे खिस्सा थीक लालगाछी। 

गामक कातमे सुखाएल धारक पुलक तर देने मटिकोरा बनाए लालगाछीक तरमे बंकर बनाओल जा चुकल अछि, जाहिमे आतंकवादी सभ अपन अड्डा बना नेने अछि, अवैध सामानक आबाजाही आरम्भ भए गेल छैक। गामक धियापुत्ताक अपहरण कए एतए बंधुआ बनाए ओकरासँ अवैध धंधा कराओल जा रहल अछि। मादक पदार्थक तस्करी आरम्भ भए गेल छैक। एहि बंकरक एकटा मुँह लालगाछीमे एकटा गाछक धोधरिमे अछि, जाहि देने आतंकवादी सभ बाघ, चीता, भालू, भूत-परेत आदिक वेष धरि गामक लोक कें डरा रहल अछि, जाहिसँ गामक लोक लालगाछी आ ओकर चारूकातक जमीन बेचि लेथि आ ओहि भू-भागसँ आतंकवादी गतिविधि सेहो चलाओल जा सकए। एहि षड्यंत्रमे एकटा स्थानीय नेता सेहो संलिप्त छथि। 

लालगाछी आलोक कें बड़ प्रिय छैक, किएक तँ ओ ओकर बाबाक लगाओल थीक। एकटा गाछ तँ देवता जकाँ प्रणम्य सेहो भए गेल छैक। आलोककें अपन गामसँ सिनेह छैक। ओ ओकरा उजडय नहिं देमए चाहैत अछि। गामो दिव्य छैक, ओतए जातिक कोनो मोल नै, केवल परस्पर स्नेह प्रधान छै। भुल्ला पाडा बेटा जकाँ स्नेहपात्र अछि। आलोकक दलमे सभ जातिक लोक छै, सभमे परस्पर स्नेह छैक। एहि प्रतीकात्मक बाल उपन्यासमे मिथिलाक बाटें भारतकें विखण्डित करबाक अंतरराष्ट्रीय प्रयास कें विफल केनिहार आलोक अन्तमे प्रधानमन्त्री द्वारा सम्मानित होइत अछि।

उपन्यासक बीचमे समरकैंपक आयोजन आ विभिन्न पर्यटन स्थल पर घुमबाक कथा, मिथिलाक गौरब-गाथाक वर्णन उपन्यासक गतिकें अवरुद्ध करैत अछि। ओना एहि प्रकारक आनुषंगिक कथा उपन्यासक लेल कोनो अनुचित नै, मुदा एतेक छोट कलेवरमे ओ आनुषंगिक कथा आ वर्णन शिथिलता अनैत अछि। यद्यपि ओकर समावेशक प्रयोजन महान् अछि मुदा शिल्पक दृष्टिसँ ठूसल मसाला बुझाएल। संगहि, सभटा अंशक लेल शीर्षक देब कोनो आवश्यक नै छल। नव-नव शीर्षक पाठक कें पहिलुक अंशक स्मृतिसँ भटका दैत छैक जे औपन्यासिकताक बाधक तत्त्व थीक।

उपन्यासमे ठेंठ मैथिलीक शब्दसभक प्रयोग भेल अछि। बहुत रास नव-नव शब्द सेहो आएल अछि। बेगूसरायक वाक्य-योजनाकें मैथिलीक रूपमे समावेश करब बेसी नीक लागल। बेगूसरायक अतिरिक्त पूर्णिया आ हाजीपुरक खाँटी मैथिलीकें सेहो स्थान दितथि तँ आर नीक रहैत। मोटामोटी उपन्यास रुचिकर छैक। एकर उद्देश्य महान् अछि। ई किशोर पाठकक मनमे अपन मिथिला आ भारतक प्रति सम्मानक भाव एवं ओकरा लेल किछु करबाक उत्साह जगबैत अछि। लेखक कें धन्यवाद।

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