Brahmi Publication

Mithila, History, Literature and Art

Ganga-worship

मिथिला के धर्मशास्त्रीय-ग्रन्थों में गंगा

-भवनाथ झा

Ganga Worship

गंगा भारत की नदियों में श्रेष्ठ मानी गयी है। ऋग्वैदिक काल से आजतक इसकी महिमा गायी जाती रही है। यहाँ तक कहा गया है कि गंगा के जल को स्पर्श करनेवाली वायु के स्पर्श से भी सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। धर्मशास्त्र की परम्परा में भी गंगाजल को अत्यन्त पवित्र मानकर उसे सदापुण्या कहा गया है।

बिहार में गंगा की महिमा पर अनेक धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ पृथक् रूप से लिखे गये हैं, जिनमें गणपति कृत गंगाभक्तितरङ्गिणी, विश्वास देवी कृत गंगावाक्यावली एवं वर्द्धमान कृत गंगाकृत्यविवेक महत्त्वपूर्ण हैं। इनके अतिरिक्त धर्मशास्त्री वाचस्पति (15वीं शती) ने अपने ग्रन्थ तीर्थचिन्तामणि में लगभग एक चौथाई भाग में केवल गंगा की महिमा के प्रसंग में विभिन्न पुराणों एवं स्मृति-ग्रन्थों से प्रमाणों का संकलन किया है। ये सभी धर्मशास्त्री मिथिला के हैं।

इनमें विश्वास देवी कृत गंगावाक्यावली ग्रन्थ उपलब्ध है, सम्भवतः शेष ग्रन्थ पाण्डुलिपि के रूप में सुरक्षित है। मिथिला के ओइनवारवंशीय राजा पद्मसिंह (15वीं शती) की पत्नी विश्वास देवी के इस ग्रन्थ का संशोधन महाकवि विद्यापति ने किया है, जैसा कि इसके अंतिम शेलोक में स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार इस ग्रन्थ की श्रेष्ठता और प्रामाणिकता स्वाभाविक रूप से जानी जा सकती है।

इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में विश्वास देवी ने गंगा का स्मरण, कीर्तन, यात्रा, श्रवण, शरणागति, दर्शन, नमस्कार, स्पर्श, तट-श्राद्ध, गंगाक्षेत्र माहात्म्य, गंगा में पैठना, गंगा-स्नान, गंगाजल से आचमन आदि सभी कर्मों की विस्तृत व्याख्या कर स्मृति एवं पुराणों से उनके अशेष फल का विवेचन किया है। उन्होंने आगे गंगा-स्मरण का माहात्म्य इन शब्दों में लिखा हैः

गच्छँस्तिष्ठन् स्वपन् जाग्रद् ध्यायन् भुञ्जन् श्वसन् वदन्।

 यः स्मरेत् सततं गंगां सोपि मुच्येत बन्धनात्।

अर्थात् चलते, बैठते, सोते, जागते, ध्यान करते, खाते, साँस लेते और बोलते हुए जो हमेशा गंगा का स्मरण करे वह भी बंधनों से मुक्त हो जाये।

गंगा शब्द का उच्चारण भी परम पुण्य का कार्य हैः

दर्शनात् स्पर्शनात् पानात् तथा गंगेति कीर्तनात्।

स्मरणादेव गङ्गायाः सद्यः पापात् प्रमुच्यते।

दर्शन करने से, गंगाजल का स्पर्श करने से, पीने से और गंगा-गंगा कीर्तन करने से या केवल स्मरण करने से ही तुरत वह व्यक्ति पाप से मुक्त हो जाता है।

          इस प्रकार के वचन इस धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ में गंगा की महिमा में संकलित किये गये हैं। शास्त्रकारों ने एक व्यवस्था दी है कि गंगा के जल में अन्य जल को मिश्रित करना पाप है, अर्थात् गंगाजल को दूषित करना पाप का कारण माना गया है। इसके विपरीत यदि सामान्य जल में थोड़ा-सा भी गंगाजल मिला दिया जाए तो वह सम्पूर्ण जल पवित्र हो जाता है। गंगाजल को परमौषधि कहा गया है- औषधं जाह्नवीतोयं वैद्यो नारायणो हरिः।

          धर्मशास्त्री वाचस्पति ने गंगा की मूर्ति बनाकर उऩकी पूजा का भी उल्लेख किया है। ऐसा पिरतीत होता है कि उनके काल में गंगा की मूर्तिपूजा भी प्रचलित थी। गुप्तकाल में मन्दिरों के चौखट पर हमें गंगा और यमुना की मूर्तियाँ मिलतीं है, जिनमें गंगा को मकरवाहिनी एवं यमुना को कच्छपवाहिनी का रूप दिया गया है। किन्तु यहाँ वाचस्पति ने भविष्य-पुराण से उद्धृत करते हुए गंगा की मूर्ति का जो वर्णन किया है, सके अनुसार गंगा की चार भुजाएँ होनी चाहिए, जिनमें एक हाथ में रत्नों से भरा घडा, दूसरे हाथ में शफेद कमल, तीसरा हाम वरदान मुद्रा में और चौथा हाथ अभय-मुद्रा में रहना चाहिए। गंगा के वस्त्र श्वेत हों, सम्पूर्ण शरीर अनेक प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित हो तथा ऊपर चँवर डुलाया जाता रहा हो। आगे यस स्थल पर कहा गया है कि गंगा के जल के मध्य में इस प्रकार के रूप का ध्यान कर सभी प्रकार से उनकी पूजा करनी चाहिए।

धर्मशास्त्री वाचस्पति ने तीर्थचिन्तामणि में गंगा की महिमा का वर्णन करने के उपरान्त बिहार प्रान्त में स्थित गंगा के तीर्थों का भी वर्णन किया है। उन्होंने महाभारत का वचन उद्धृत कर पश्चिम से पूर्व की ओर बढते हुए, तीर्थों का नाम लेकर उसका वर्णन किया है।

सबसे पहले सरयू के साथ जहाँ गंगा का संगम होता है उसे महाभारत में वेणीबाह्य (वेणीराज्य) तीर्थ कहा गया है। इसकी महिमा का बखान करते हुए कहा गया है कि यहाँ दो बहनें आपसे में स्नेहपूर्वक मिल रहीं है। भगवान् विष्णु के दाहिने पैर से निकलती हुई गंगा एवं वायें पैर से निकली हुई सरयू जो कि मानस से निकली हैं, दोनों का मिलन यहाँ पर हो रहा है। यहाँ भगवान् शिव एवं भगवान् विष्णु की आराधना करने से शिव-स्वरूप एवं विष्णु-स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है साथ हीं, पाँच अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है। वाचस्पति ने इस वेणीबाह्य तीर्थ का दूसरा नाम दर्दरी भी कहा है। नारद-पुराण में इस क्षेत्र का नाम वेणीराज्य है। वस्तुतः वाचस्पति के ग्रन्थ में भी वेणीराज्य ही होना जाहिए, किन्तु मिथिलाक्षर की पाण्डुलिपि से सम्पादन के क्रम में राज्य को बाह्य के रूप में पढने में भ्रम हुआ होगा।

          इसके आगे गाण्डक तीर्थ है जहाँ गण्डकी नदी के साथ गंगा का संगम होता है। यहाँ स्नान करने से हजार गाय के दान करने का फल मिलता है। वर्तमान में यह स्थान हाजीपुर एवं सोनपुर है, जो हरिहरक्षेत्र के नाम से ख्यात है।

          इसके आगे रामतीर्थ का उल्लेख हुआ है, जहाँ वैकुण्ठा नाम की नदी का संगम माना गया है। वर्तमान में वैकठपुर से इसकी संगति जोडी जा सकती है, जहाँ प्राचीन काल में वैकुण्ठा नाम की नदी का संगम रहा होगा। वैकुण्ठापुर से वैकठपुर नाम पडना भाषाविज्ञान की दृष्टि से असम्भव नहीं। आनन्द रामायण में भी इस स्थान को भगवान् श्रीराम से जोडते हुए कहा गया है कि तीर्थयात्रा के क्रम में वे जनकपुर से वैकुण्ठपुर आये थे और फिर वहीं लौट गये थे।

          इसके आगे सोमतीर्थ का उल्लेख हुआ है, जहाँ मुद्गल ऋषि का आश्रम बतलाया गया है। यह मुंगेर का तीर्थ है। मुंगेर नामकरण के पीछे मुद्गल ऋषि का नाम अनेक स्थानों पर आया है। यहाँ कहा गया है कि मुद्गल ऋषि शिव की उपासना कर उनके गण के रूप में प्रतिष्ठित हो गये।

          इससे आगे चम्पक नामक तीर्थ का उल्लेख हुआ है, जहाँ गंगा उत्तरवाहिनी कही गयी हैं। यह भागलपुर के आसपास का तीर्थ है। प्राचीन काल में इसे चम्पा कहा जाता था जिसका उल्लेख ह्वेन्त्सांग ने भी किया है। इस चम्पक तीर्थ को बनारस के मणिकर्णिका घाट का समान पुण्यवाला माना गया है।

इसके आगे कलस नामक तीर्थ का उल्लेख हुआ है, जहाँ महामुनि अगस्त्य ने भगवान् शिव की आराधना कर ऋषि की पदवी पायी थी।

          इसके आगे सोमद्वीप तीर्थ है, जो काशी के समान ही पुण्य देनेवाला है। यहीं पर चन्द्रमा ने भगवान् शिव की आराधना कर उनके मस्तक पर स्थान पाया था।

          इसके बाद महर्षि विश्वामित्र की बहन कौशिकी- कोशी नदी गंगा के साथ मिलती है, वहाँ स्नान करने से मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग में प्रिय अतिथि के समान स्वागत होता है।

          इससे पूर्व में जह्नुह्रद नामक तीर्थ है, जहाँ स्नान करने से आगे इक्कीस पीढी तक की सन्तान परम्परा तर जाती है। इससे अधिक इस क्षेत्र की महिमा का और क्या बखान किया जाये। वाचस्पति ने एकशाखा नामक नगर को इस जह्नुतीर्थ के साथ संगति बैठायी है। वर्तमान में यह स्थान कहाँ पर है यह कहा नहीं जा सकता है।

इसके आगे गंगा सागर के संगम तक महाभारत के उक्त उद्धरण में अदिति तीर्थ, शिलोच्चय, इन्द्राणीतीर्थ, आम्रातक तीर्थ, प्रद्युम्नतीर्थ, दक्षिणप्रयाग (मुक्तवेणी, सप्तग्राम) इन तीर्थों का उल्लेख हुआ है, जो वर्तमान वंगाल में प्रतीत होते है।

          धर्मशास्त्री वाचस्पति ने इन सभी तीर्थों में गंगास्नान करने करने के लिए संकल्पवाक्यों का भी उल्लेख इस तीर्थचिन्तामणि में किया है। चूँकि इन सभी विवरणों के उन्होंने 15वीं शती में महाभारत के श्लोकों को उद्धृत किया है अतः ऐतिहासिक दृष्टि से भी इन स्थानों की महिमा, इन स्थानों पर गंगा की विशेष महिमा मानी जा सकती है।

वर्तमान में यद्यपि यह विवरण महाभारत में उपलब्ध नहीं है। अन्वेषण करने पर हमें यह अंश नारद पुराण के उत्तरार्द्ध में चालीसवें अध्याय में मिला। वहाँ पर यह वर्णन मोहिनी-वसु-संवाद के रूप में वर्णित है। नारद-पुराण के इसी अध्याय में गंगा दशहरा की महिमा का बखान इन शब्दों में किया गया हैः-

ज्येष्ठे मासि क्षितिसुतदिने शुक्लपक्षे दशम्यां

हस्ते शैलादवतरदसौ जाह्नवी मर्त्यलोकम् ।।

पापान्यस्यां हरति हि तिथौ सा दशैषाद्यगंगा

पुण्यं दद्यादपि शतगुणं वाजिमेधक्रतोश्च ।।२१ ।।

अर्थात् जेठ मास में मंगलवार के दिन शुक्लपक्ष में दशमी तिथि को हस्त नक्षत्र में गंगा हिमालय से उतर कर मर्त्यलोक आयीं थीं। इस दिन  गंगा दस प्रकार के पापों का नाश करती है और अश्वमेध यज्ञ से भी सौ गुना पुण्य देती हैं।

जय गंगे।

 

 

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