Brahmi Publication

Mithila, History, Literature and Art

Relevance of Ayachi Mihsra of Sarisab Village in Mithila

अयाचीक प्रासंगिकता

भवनाथ झा

15म शताब्दीक अयाची आइ प्रासंगिक भए गेल छथि। हुनक गाम सरिसब पाही मे हुनक प्रतिमा स्थापित भए रहल अछि। सोदरपुर सरिसब मूलक अयाची अपन मनस्विताक कारणें प्रसिद्ध भेलाह जे हुनक वास्तविक नाम भवनाथ मिश्र अप्रसिद्ध भए गेल आ ओ समाजमे अयाची बनि गेलाह।

आइ कहल जाइत अछि जे ओ निर्धन छलाह, हुनका मात्र छोट-छिन वासडीह टा छलनि। इतिहास कहैए जे हुनक पूर्वज ततेक सम्पन्न रहथि जे पोखरि खुनाओल। हुनका की पैतृक सम्पत्तिमे हिस्सा नै भेटल? की हुनका निर्धन देखाएब आवश्यक? अथवा की मनस्विताक तीव्रताक लेल निर्धनता एकटा तत्त्व थीक?

हम अयाचीकें एकटा दोसर चश्मासँ देखैत छी। हुनक कालमे पण्डितलोकनि राजाक आश्रय पबैत रहथि। जे स्वयं नहियों जाथि हुनको ताकि ताकि राजा खोरिस दए सम्पन्न बनबैत रहथि। ग्रामदान पाएब पण्डितलोकनिक स्वभाव भए गेल छल। ग्राम भेटैत देरी, ओकर लगान वसूली एकटा काज भए जाइत रहनि। रौदी-दाही रहलाक बादो जनतासँ लगान वसूल करब पण्डितक काज नै छल, क्षत्रियक काज छल। सत्ता भेटबाक मादकता पण्डितलोकनिक शास्त्रक चिन्तन-मनन कें प्रभावित कए दैत छल। शासकीय प्रश्रय आ सत्ताक सुखमे भसियाइत पण्डित समाजक अधःपतनक ओ साक्षी रहथि। ओ देखने रहथि जे केना पण्डितलोकनि राजाक द्वारा धन पाबि हुनक स्तुतिमे त्वमर्कस्त्वं सोमः मे लागि जाइत छथि। आ ब्राह्मण रहितो क्षत्रिय अथवा वैश्य बनि जाइत छथि। ततबे किएक? कखनहुँ तँ शूद्र धरि। राजाक गुलामी धरि करबासँ विरत नहिं होइत रहथि। राजा-रानीक नाम पर रचना करब की थिक?

मुदा भवनाथ मिश्र ई स्वीकार नै कएल, तें अयाची भेलाह। मानसिक दासतासँ उन्मुक्त रहि केवल शास्त्र-चिन्तनमे लीन रहलाह।

आ तैं जखनि राजाक द्वारा शंकर मिश्रकें सोनाक असर्फी भेटल तँ एकोटा ओ अपन घरमे नै रखलनि। राजाक धन गरीबक खून चूसि जमा कएल गेल अछि, ओकर उपभोग पाप थीक तें हुनका लग ओकरा स्वीकार करबाक कोनो प्रश्ने नै छल। ओहि धनकें ओ अपन घरोमे रहए देमऽ नै चाहैत रहथि।

आइ जखनि कि राज्याश्रय पाबि कतोक लोक करोडक करोड अपन घरमे नुकाए लैत छथि, मा गृधः कस्यस्विद् धनम् के भावक हत्या करबाक लेल हरदम उतारू रहैत छथि, सत्ताक सुख लेल पतनक सीमा पार कए लेबक लेल आतुर रहैत छथि ओहि कालमे अयाचीक प्रासंगिकता मोन पडैए।

यैह कारण छल जे जखनि हुनक पुत्र शंकर मिश्र पढि-लीखि विद्वान् भेलाह आ आने पण्डित जकाँ राज्याश्रय पओलनि तँ पिताक सिद्धान्त के ठेस पहुँचलनि आ ओ विरक्त भए गेलाह।

अयाचीक कथा मनस्वीक गाथा थीक, राज्याश्रय पाबि धन आ सत्ताक लोलुप व्यक्ति पर कसगर चोट थीक। तँ आउ, अयाचीक बहानासँ मा गृधः कस्यस्विद्धनम् के वैदिक ध्वज फहराबी।  

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