Archeological remains in Lohna Village

लोहना गाँव के पुरातात्त्विक अवशेष

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– भवनाथ झा

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लोहना गाँव झंझारपुर प्रखण्ड अंचल में अवस्थित एक विशाल गाँव है। यह उत्तर बिहार में मुजप्फरपुर-फारविसगंज राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 57 पर दरभंगा से 40 कि.मी. पूर्व अवस्थित है। इस गाँव के उत्तर में हटाढ रुपौली, जमुथरि, कथना, रैमा, हैंठी बाली आदि गाँव हैं, पूर्वमे नरुआर, सर्वसीमा, दक्षिण में उजान तथा पश्चिम मे, सरिसब, लालगंज, खडरख आदि गाँव हैं।

पंजी में भी लोहना सकराढी एक शाखा है, जिसमें मूलग्राम के रूप में लोहना का उल्लेख है। इससे 13-14वीं शती में इस गाँव का अस्तित्व पता चलता है।

लखनदेई नदी इस गाँव को दो भागों में विभक्त करती है। जनश्रुति है कि इसके पूर्व 1100 बीघा तथा पश्चिम मे 1100 बीघा इसका क्षेत्रफल है। इस गाँव के उत्तर दो नदियाँ मिलती हैं। एक नदी पश्चिम से बहकर आती है जो बिहनगर के पास नवधार कमला से निकलती है। यहीं नवधार कमला उत्तर में कोइलख गाँव के पश्चिम में बहती है। इस प्रकार कमला नदी की एक शाखा के रूपमें निकल कर नाहर, रैमा, कथना रुपौली एवं हटाढ गाँव होती हुई आती है। दूसरी नदी पूर्व से होकर आती है जो वर्तमान सलेमपुर के पास खेतों से निकल कर भराम, मेंहथ, जमुथरि आदि गाँवों से बहती हुई लोहना के उत्तर पचम्मर चौर में दोनों मिल जाती हैं। इनमें पूर्व की ओर से आनेवाली धारा परम्परानुसार लखनदेई की धारा है, जिसके पश्चिमी तट पर जमुथरि गाँव में पूर्वमध्यकाल का गौरीशंकर स्थान एक विशाल डीह पर अवस्थित है। पश्चिंम से आनेवाली धारा का जीर्णोद्धार 1954-55 में किया गया है, जिसके अभिलेखों में इसे लखनदेई बाहा कहा गया है। दोनों नदियों के मिलनस्थल के बाद नदी की चौडाई अधिक हो जाती है। यही लखनदेई उजान गाँव से पश्चिम होकर बहती हुई दक्षिण में बौहरबा नामक स्थान पर फिर कमला नदी से मिल जाती है।

लखनदेई के इस मिलन स्थल के ठीक पूर्व सुखलाराही नामक एक टोला है, जो पूरा एक डीह पर अवस्थित है। स्थानीय भाषा मैथिली में ‘राही’ एवं ‘रहिका’ ये दोनों शब्द ‘डीह’ या ‘टीला’ (mound) के लिए प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार “सुखला राही” का तात्पर्य ऐसे डीह से है, जो हमेशा सूखा रहे। यह इस डीह की अधिक ऊँचाई का संकेत करता है।

इस सुखलाराही के दक्षिणमें गोसांई पोखर नामक एक विशाल प्राचीन तालाब है, जिसके उत्तर-पश्चिंम कोने पर भी कई डीह अवस्थित हैं, जिन पर लोगों ने घर बना लिया है, फिर भी आसपास मिट्टी के ठीकरे मिलते हैं। इसी तालाब के दक्षिण-पश्चिंम कोनो पर मधुसूदन स्थान है, जहाँ ऊँचे डीह के अवशेष हैं।

पचम्मर चौर वस्तुतः अतीत के पञ्चाम्र नामक किसी गाँव का संकेत कर रहा है। आम्र शब्द से अनेक गाँव के नाम मिथिला क्षेत्र में उपलब्ध होते हैं, जैसे हरिताम्र- हरिअम्म जो हरिअम्मए मूल के लोगों का मूलग्राम है। पञ्चाम्र शब्द संस्कृत का रूढ शब्द है-

अमन्ति रसानि प्राप्नुवन्तीति। अमगत्यादिषु+”अमितम्योर्दीर्धश्च।” उणा० २। १६। अवलम्बः रक् दीर्घश्चोपधायाः इति आम्रा वृक्षाः। पञ्चानाम् आम्राणामश्वत्थादिवृक्षाणां समाहारः।

वैदिक परम्परा में पञ्चाम्र वृक्षों का रोपण अनन्त फलदायी होता है।

“अश्वत्थमेकं पिचुमर्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश पुष्पजातीः।
द्वे द्वे तथा दाडिममातुलङ्गे पञ्चाम्रवापी नरकं न याति॥” इति वराहपुराणम्॥
अपि च।
“अश्वत्थ एकः पिचुमर्द एको द्वौ चम्पकौ त्रीणि च केशराणि।
सप्ताथ ताला नव नारिकेलाः पञ्चम्ररोपी नरकं न याति॥” इति तिथितत्त्वम्॥

अर्थात् पीपल का एक वृक्ष, नीम का एक वृक्ष, वट का एक वृक्ष, चम्पा के दो वृक्ष, केसर के तीन वृक्ष, ताड के सात वृक्ष तथा नारियल के नौ वृक्ष जो लगाता है वह नरक नहीं जाता है। सम्भावना है कि इस गाँव के बसने के समय किसी ने इन्हीं वृक्षों को वैदिक परम्परानुसार लगाकर वास आरम्भ किया हो जिससे अतीत के इस गाँव का नाम पञ्चाम्र पड़ा जो गाँव किसी कारणवश उजड़ गया। वह स्थान आज पचम्मर के नाम ख्यात है।

इस प्रकार लोहना गाँव में हम लखनदेई के किनारे प्राचीन सभ्यता के अवशेष पाते हैं, इनमें प्रमुख इस प्रकार हैं-

जालपा डीह-

A view of Jalpa Dih from western slope
A view of Jalpa Dih from western slope

यह एक पुराना डीह है। नदी से लगभग 100 मीटर पश्चिम में उत्तर से दक्षिण अनेक छोटे-छोटे टीलों का यह समूह है। उत्तर से दक्षिण इसकी लंबाई लगभग 300 मीटर है, इसके बाद लोगों ने इसी शृंखला में अपना घर बना लिया है। ग्रामीण बताते हैं कि आजसे लगभग 60 वर्ष पूर्व यह 15 फीट के लगभग ऊँचा था, किन्तु वर्तमान में नदी की ओर से इसकी ऊँचाई 10 फीट के लगभग बची है। पश्चिम की ओर से इसकी ढाल वहुत दूर तक तालाब के किनारे तक गयी है। उत्तर एवं पूर्व दिशामे दीवाल की तरह यह टीला खडा है। ग्रामीण कभी कभार हल चलाकर अरहर की खेती के लिए इसका उपयोग कर लेते हैं। फलतः मृद्भाण्ड के टुकडे जो मेड पर संकलित कर गये वे पश्चिमी ढाल पर एकत्र बिखरे पडें हैं। इनमें पालिशदार उत्तरी  कृष्ण मृद्भाण्ड (NBPW)(?), रक्त-कृष्ण मृद्भाण्ड (RBW), धूसर मृद्भाण्ड( Gray ware) भी मिलते हैं।

Potteries from Jalpa Dih, Lohna (Recto)
Potteries from Jalpa Dih, Lohna (Recto)
Potteries from Jalpa Dih, Lohna (Verso)
Potteries from Jalpa Dih, Lohna (Verso)

परम्परा इसके अन्दर मन्दिर के होने का संकेत करती है, अतः इसके प्रति लोगों की आस्था है।

कुछ दिन पूर्व प्राप्त रुद्रयामलसारोद्धार के एक अंश में लोहिनी पीठ का उल्लेख मिला है। वहाँ इसका वर्णन इस प्रकार है-

अधुना संप्रवक्ष्यामि लोहिनीपीठमुत्तमम्।

रक्तवर्णा ललज्जिह्वा यत्र देवी विराजते।।32।।

पुरा कृतयुगे कश्चिद् सिद्धो योगी बभूव ह।

जालन्धरो महान् साधुः देव्याराधनतत्परः।।33।।

अब मैं उत्तम लोहिनी पीठ का वर्णन करता हूँ। यहाँ लाल वर्ण वाली देवी विराजमान हैं, जिनकी जिह्वा लपलपाती रहती है। प्राचीन काल में देवी के आराधक जालन्धर नामक महान् साधु थे।

गत्वासामरावत्यां नगर्यां तत्र संस्थितः।

लक्ष्मणायाः पूर्वतटे स्थापयामास चाश्रमम्।।34।।

वीरेश्वरस्य देवस्य वायव्ये विमले तटे।

देवीं ज्वालामुखीं तत्र समाराध्य प्रयत्नतः।।35।।

चीनाचारेण यानेन लोहिनीं रक्तवर्णिकाम्।

शिवं कन्येश्वरं तत्र स्थापयामास मन्दिरे।।36।।

प्रसादं प्राप्य देवस्य देव्याश्च कृतक्रियः।

जनदुःखौघनाशार्थं प्रयत्नं कृतवान् कृती।।37।।

अद्यापि तत्र मठिका राजते बहुपुण्यदा।

सिंहे पद्मासना देवी लोहिनी नाम विश्रुता।।38।।

सिन्दूरालिप्तसर्वाङ्गी पूजिता सर्वकामदा।

तत्पार्श्वे नागकुण्डल्यां मातृकाचक्रसंस्थितः।।

गौर्या सह महादेवो राजते कन्यकेश्वरः।।39।।

वे अमरावती नगरी में जाकर वहाँ रहने लगे और उन्होंने लक्ष्मणा के पूर्व तट पर वीरेश्वर देव के पश्चिम-उत्तर कोण में निर्मल तट पर आश्रम बनाया। वहाँ चीनाचार की विधि से लाल वर्णवाली ज्वालामुखी लोहिनी देवी की आराधना की। वहीं मन्दिर में उन्होंने कन्यकेश्वर शिव की स्थापना की। महादेव एवं देवी की कृपा प्राप्त कर उसने लोगों के दुःखों के निवारण के लिए यत्न किया। आज भी बहुत पुण्य देनेवाला उनका मठ वहाँ विराजमान है। वहाँ सिह के ऊपर पद्मासन में बैठी हुई लोहिनी नामक देवी विख्यात हैं। सिन्दूर के लिपे हुए अंगोंवाली देवी पूजित होने पर सभी कामनाओं की पूर्ति करतीं हैं। वहाँ बगल में नागकुण्डली पर गौरी के साथ कन्यकेश्वर महादेव विराजते हैं।

इस उल्लेख के अनुसार यह पूरा क्षेत्र किसी काल में अमरावती के नामसे प्रसिद्ध था। यहाँ बौद्ध महायान का एक केन्द्र था, जिस मठमे ज्वालामुखी देवी एवं कन्यकेश्वर शिव की स्थापना की गयी थी। वर्तमानमें यहाँ मधुसूदन स्थान में एक शिव मन्दिर के अवशेष भी उपलब्ध हैं। एक अभिलेखयुक्त कन्यकेश्वर शिव वर्तमान में गौरीशंकर मन्दिर मे स्थापित है, जो मन्दिर निर्माण के समय जमीन के ऊपर रखा हुआ मिला था। यह संभावना है कि लोहना के आसपास से यह शिवलिंग प्राप्त हुआ हो और अतीत में गौरीशंकर स्थान में लोगों ने ले जाकर रख दिया हो।

उक्त मिथिलातीर्थविधिः में इसके बाद गौरीशंकर एवं छन्नमस्ता स्थान का भी वर्णन आया है।

गौरीशंकरस्तस्मात् कौवेरे लक्ष्मणा तटे।

मातृकाचक्रवेद्यां स जम्बूकाननसंस्थितः।।40।।

इस स्थान से उत्तर दिशा में जम्बू (जामुन) के वन में लक्ष्मणा के तट पर मातृचक्र की वेदी पर गौरीशंकर विराजमान हैं।

याम्ये तु लोहिनीदेव्याः लक्ष्मणायास्तटे वने।

छिन्नमस्ता भगवती पूजितासुरमर्दिनी।।41।।

उद्यानं तत्र विततं देव्या पालितं महत्।

वनदुर्गा भगवती प्रतीच्यां गहने वने।।42।।

लोहिनी देवी से दक्षिण दिशा में लक्ष्मणा के तट पर वन में असुरमर्दिनी छिन्नमस्ता देवी पूजित हैं। वहाँ उनका विशाल उद्यान है जो देवी द्वारा पालित है वहाँ से पश्चिम दिशा में वन दुर्गा देवी हैं।

इससे स्पष्ट प्रतीत होता है लोहना गाँवमें कहीं विशाल बौद्ध साधना का केन्द्र रहा होगा। जालपा डीह उसका एक अवशेष हो सकता है। वहाँ उत्तर एवं पूर्व की ओर से उत्खनन करने की आवश्यकता है।

मधुसूदन थान

यह स्थान लखनदेई नदी की प्राचीन धारा के पूर्वी तट पर अवस्थित एक पुराने टीले पर है। वर्तमान में यहाँ एक नीम का पेड़ है। यह स्थान मकसूदन बाबा के थान के नाम से प्रख्यात है। पिछले वर्ष लोहना पंचायत (उत्तर) के मुखिया श्री अशोक कुमार झा उर्फ लड्डूजी के प्रयास से इस स्थान पर ऊँचा चबूतरा बना कर लोहा का रेलिंग डाल दिया गया है। साथ ही, बगल से प्राप्त एक अन्य अवशेष भी वहाँ संरक्षित कर दिया गया है।

Status till 2016 A.D.

इसके पूरब में एक तालाब विशाल तालाब है। इस तालाब के पश्चिम-दक्षिण कोण पर यह स्थान है। इसी तालाब के पूर्वी छोर पर वर्तमान में भैरवस्थान थाना का मुख्यालय अवस्थित है। विख्यात विदेश्वर मन्दिर से यह स्थान लगभग 500 मीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम कोण में है।

यहाँ बलुई पत्थर के पाँच अवशेष जमीन पर पड़े हुए हैं, जिनमें से एक शिवलिंग के रूप में चिह्नित किया गया है।

Fragments of Shiva temple at Madhusudan Sthan, Lohna
  • अर्घा जल-प्रणाली  (39”X9-10”X5”),
  • मन्दिर की छत (14”X17”),
  • आमलक (ऊँचाई- 9” परिधि- 22”),
  • सम्पूर्ण शिवलिंग (लम्बाई 16” की तीनों मेखला और शिवमेखला की परिधि 31”)  
  • एक अन्य शिवलिंग (लम्बाई 21”)

शिवलिंग के अर्घा से जल निकासी की प्रणाली, इसे शिवसूत्र कहा जाता है।

2016 ई. में चबूतरा बनाने के क्रम में इसी स्थान पर एक आमलक भी मिला है-

शिवमन्दिर का आमलक

इससे स्पष्ट होता है कि यह नागर शैली का शिवलिंग है, जिसमें सबसे नीचे चौकोर है, इसके ऊपर अष्टफलक है तथा सबसे ऊपर गोलाकार है। तीनों मेखला की लम्बाई 16 ईंच है। इस प्रकार 48 ईंच लम्बा एवं 10 ईंच व्यास का यह एक शिवलिंग है, जिसका ऊपर का भाग सपाट है। ऊपर के हिस्से में कुछ अंश खण्डित है।

इस प्रकार का शिवलिंग गुप्तकाल में बनाने की परम्परा थी, जिसका विवरण वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में दिया है कि तीनों सूत्रों की लम्बाई समान होनी चाहिए।

टी. गोपीनाथ राव ने अपनी पुस्तक Elements of Hindu Iconography में इस प्रकार के शिवलिंग का विस्तृत विवेचन किया है।

विभिन्न प्रकार के शिवलिंग की संरचना

लगभग आठवीं शती के बाद के जो शिवलिंग उपलब्ध होते हैं, उनमें तीनों मेखलाओं में अन्तर है। विष्णु-मेखला तथा ब्रह्म-मेखला छोटी होती गयी है। यहाँ तीनों मेखला समान ऊँचाई की है, अतः इसे 7वीं शती के पूर्व का माना जाना चाहिए।

शिवलिंग के इस स्वरूप के अनुसार इसकी स्थापना के समय ब्रह्म-मेखला एवं विष्णु मेखला भूमि के अन्दर रखी जाती है। शिवमेखला में शिवसूत्र-मेखला का भाग जलधरी (अर्घा) के अन्दर रहता है। इस शिवलिंग में यह अंश स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। इसकी मोटाई के बराबर मोटाई का शिलापट्ट अर्घा के रूप में रहा होगा। इसकी शैली से प्रतीत होता है कि यहाँ नागर शैली का चौकोर अर्घा रहा होगा। इस प्रकार का चौकोर अर्घा बिहार में गुप्तकाल एवं उत्तर गुप्तकाल में पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। यहाँ उदाहरण के लिए भभूआ के मुण्डेश्वरी मन्दिर परिसर का यह खण्डित अर्घा देखा जा सकता है।

इस प्रकार इस शिवमन्दिर में विशाल शिवलिंग का अस्तित्व स्पष्ट होता है।

यहाँ चित्र संख्या 3 में जो शिलापट्ट दिखाया गया है, वह मन्दिर के शिखर की छत है। इसकी लंबाई-चौडाई से स्पष्ट है कि यहाँ नागर शैली का मन्दिर था। इस शैली में मन्दिर का शिखर का आयाम चारों ओर से घटता जाता है और सबसे ऊपर में आमलक के नीचे एक छोटी-सी सपाट पट्टिका छत के रूप में लगा दी जाती है। इस छोटी छत के अन्दर का अलंकृत भाग यहाँ आज भी उपलब्ध है।  

वर्तमान में स्थानीय लोगों द्वारा इसकी वास्तविक पहचान न होने के कारण इसे किसी पहलवान का सोंटा मान लिया गया गया है।

इसी लोहना गाँव के मैथिली एवं हिन्दी के साहित्यकार श्री शैलेन्द्र आनन्द ने सूचना दी कि यहाँ अवस्थित तालाब गोसाईं पोखरि के नाम से विख्यात है। परम्परा है कि आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व विश्वेश्वर झा नामक व्यक्ति इस गाँव में आये थे, जिन्होंने अनेक मन्दिरों, कूपों और तालाबों का निर्माण कराया था। उन्हें लोग “चिलका गोसांई” कहा करते थे अतः इस तालाब का नाम भी गोसाँई पोखरि पड गया। यहाँ के अवशेषों के सम्बन्ध में धारणा है कि यह हनुमानजी का सोंटा है, जिससे गाँव की रक्षा होती रही है, तथा जल प्रणाली को लोग कमला माई का धार कहते रहे हैं। मधुसूदन, मकसूदन बाबा के बारे में लोगों में बहुत आस्था है।

भुइयाँ थान

इस गाँव के पूर्वी भाग में भुइयाँ थान प्रसिद्ध है। भुइयाँ कृषक एवं पशुपालकों के लोक देवता हैं। इसके सम्बन्ध मे अधिक जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है। लेकिन लोहना गाँव का एक विशाल टोला भुईंया थान के नाम से प्रसिद्ध है।

दक्षिणी भाग में स्थित अवशेष

राजमार्ग के दक्षिण लखनदेई के दोनों तटों पर मलिच्छा पुल (सकरी झंझारपुर रेलखण्ड पर बना पुल) तक ऊँचे टीलों की शृखला देखने को मिलती है। लखनदेई के पूर्वी तट पर पश्चिम से पूर्व की ओर अनेक प्राचीन टीले हैं, जिनमें सबसे पूर्वी टीले पर वर्तमानमे विदेश्वर स्थान है। इन्हीं में लखनदेई के ठीक पूर्व में एक टीला मुसहरनी डीह कहा जाता है। इसी के ठीक सामने पश्चिम में मिट्टी खुदाई के क्रम में कुछ कुएँ मिले हैं, जिनमें सूचनानुसार अपेक्षाकृत अधिक लम्बाई एवं चौडाई की ईंटें पायी गयी हैं। इस स्थान पर बृहत् स्तर पर खुदाई की आवश्यकता है। यहाँ से कर्णाटकाल के महल अथवा मन्दिर के अवशेष मिलने की संभावना है।

सूचनानुसार यहाँ अतीत में सोने के सिक्के भी मिले थे। इसी स्थान से दुर्गा की एक प्रतिमा (23”X10”)  मिली है, जिन्हें वर्तमान में रमेश्वरलता संस्कृत महाविद्यालय के परिसर में स्थापित दुर्गा मन्दिर के गर्भगृह में दीवाल के सहारे संरक्षित रखा गया है।

Durga Idol from Lohna

लगभग दो वर्ष पूर्व इसी स्थान पर मिट्टी काटने के क्रम में सद्योजात की एक खण्डित प्रतिमा (19”X9”)  मिली है।

Sadyojat with child from Lohna

इसमें बाल रूप गणेश की आकृति विशेष है जो अन्य स्थानों से प्राप्त सद्योजात में नहीं मिलते। इसे भी उक्त मन्दिर के प्रांगण में स्थित एक वृक्ष के सहारे रख दिया गया था। हमलोगों के आग्रह पर मन्दिर के पुजारी ने इसे संरक्षित करने के लिए कपडै में लपेट कर मन्दिर में रखने की व्यवस्था की है। इसे संग्रहालय में रखने की नितान्त आवश्यकता है। मूर्ति खण्डित होने के कारण मन्दिर के पुजारी को इसमें कोई रुचि नहीं है।

इस प्रकार लोहना ग्राम पुरातात्त्विक अवशेषों से भरा पडा है। इसके सेंरक्षण एवं अन्वेषण-उत्खनन की अपेक्षा है।

अग्रेतर शोध की आवश्यकता-

  • भुइयाँ थान का अन्वेषण। क्या उसका सम्बन्ध किसी महायानी सिद्ध से है?
  • पंजी में लोहना गाँव के वासियों का इतिहास
  • लोहना गाँव के अन्य प्रमुख विद्वानों, एवं कवियों का संक्षिप्त परिचय
  • गाँव में रहनेवाले सभी जातियों के पूर्वजों की यथासम्भव वंशावली।
  • अन्य दर्शनीय स्थल।
  • ग्रामीण स्तर पर मनाये जानेवाले प्रमुख त्योहार।
  • गाँव में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधि पर प्रकाश।
  • गोविन्द दास भी लोहना गाँव के माने जाते हैं। इस पर ठोस ऐतिहासिक अन्वेषण
  • रमेश्वरलता संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना के काल के शिलालेख का अन्वेषण। वर्तमान में यह भवन खण्डहर हो चुका है।

3 thoughts on “Archeological remains in Lohna Village”

  1. बडड् सुन्दर जानकारी। लोहना विश्वविद्यालयक इतिहासक सेहो आवश्यकता छैक।

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