Doorvakshat Mantra

दूर्वाक्षतक मन्त्र

मन्त्र

आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्। आ राष्ट्रे राजन्य: शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्। दोग्ध्री धेनु: वोढाऽनड्वान् आशु: सप्ति: पुरन्ध्रिर्योषा जिष्णू रथेष्ठा: सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्। निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधय: पच्यन्तां योगक्षेमो न: कल्पताम् ।।

मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः।

शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।।

दीर्घायुर्भव 3 बेर।

विवाहिताकें- सौभाग्यवती भव 3 बेर।

अर्थ

 ( हे ईश्वर! हमर राष्ट्रमे ब्राह्मण ब्रह्मक तेज धारण कए उत्पन्न होथि। हमर राष्ट्रमे शूर, बाणसँ निशाना लगएबामे कुशल, महारथी क्षत्रिय उत्पन्न होथि । यजमानक गाय दूधारू होअए, बरद बहन्तू हुअए, घोड़ा खूब तेज चलए । नारी सुशील आ सर्वगुण सम्पन्न हुअए । रथपर चढनिहार योद्धा, जयशील, पराक्रमी होथि युवक गण सभामे बैसए योग्य (सभ्य) होथि आ यजमान पुत्र वीर होथि । हमर राष्ट्रमे आवश्यकतानुसार समय-समय पर मेघ वर्षा करए। वनस्पति फल-फूल सँ लदि कए परिपक्व हुअए आ हमरालोकनिक योगक्षेम उत्तम रीतिसँ होइत रहए ।

मन्त्रक ई अर्थ सिद्ध होए, मनोरथ पूर्ण हो। शत्रुलोकनिक बुद्धि भ्रष्ट हो आ अहाँक मित्र लोकनिक उन्नति हो। ( यजुर्वेद, अध्याय २२, मंत्र २२, )

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