Spiritual significance of the Diwali

दीपावली का माहात्म्य

-भवनाथ झा

दीपावली सम्पूर्ण भारतवर्ष में श्रद्धा एवं विश्वास के साथ मनाया जानेवाला प्रमुख पर्व है । इस दिन के साथ कई कथाएँ एवं ऐतिहासिक घटनाएं जुडी हुई है ।

रामोपासना से सम्बन्ध

कहा गया है कि इसी दिन श्रीराम चौदह वर्षों के बाद अयोध्या लौटे थे ।


जैन परम्परा में दीपावली

जैन परम्परा के अनुसार इसी दिन भगवान महावीर का निर्वाण पावापुरी में हुआ था । इसकी स्मृति में इस दिन नव-वर्षारम्भ माना गया है । गुजरात में भी संस्कृतिक रूप ने यह दिन वर्षारम्भ के रुप में मनाया जाता है ।


नये वर्ष का आरम्भ

व्यवसाय-जगत् में भी दीपावली के दिन ने नवीन वित्तीय वर्ष प्रारम्भ करने की परम्परा आज भी विद्यमान है ।


सिख परम्परा में 

सिख परम्परा में भी दीपावली पूरी श्रद्धा के साथ धूम-धाम से मनायी जाती है । परम्परानुसार गुरु हरिगोबिन्द सिंह का मुगल बादशाह जहागीर ने ग्वालियर के दुर्ग में नजरवंद का लिया था, क्रिन्तु सूफी सन्त मियां मीर के उपदेश के प्रभाव से जहाँगीर ने गुरु हरिगोबिद सिह के साथ बंदी बनाये गये सभी अन्य राजाओं का भी छोड़ देने पर महमत हो गया । इसके लिए बादशाह ने एक प्रक्रिया अपनायी कि जो राजा गुरुजी के अंगरखे का कोई भी भाग पकड़ लेंगे, इन्हें मुक्त कर दिया जायेगा। इस दिन गुरु ने 52 कलगियों वाला अंगरखा पाना। इतने वंदी गुरु का अंगरखा पकड़कर मुक्त होकर किले से वाहरं आ गये और दीपावली के दिन अमृतसर पहुँचे। लोगों के हर्षोल्लास की भीमा नहीं रही। दोगुने उत्साह से हरिमन्दिर में दीपावली का पर्व मनाया गया। इस घटना के बात सिख परम्परा में दीपावली के इस प्रकाश-पर्व में सोने में भी सुगन्धि आ गयी।


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