Suryastavaraja

श्रीसूर्यस्तवराज

(मिथिलामे घरे-घरे एकर पाठ होइत छल। हमरा मोन अछि जे अपन गामक पोखरिमे जहिया बच्चामे नहएबाक लेल पिताक संग जाइत रही तँ गामक कतेको लोक नहा कए प्रतिदिन एकर पाठ खूब जोर-जोरसँ करैत रहथि। हुनकालोकनिक मुँहसँ सुनल ई स्तोत्र आइयो धरि हमरा कंठस्थ अछि। लहेरियासरायक विद्यापति प्रेस सँ एकर प्रकाशन “गोसाँञिक नाओं” नामसँ तिरहुतामे भेल छल।) This is the Maithili language of Mithila in North Bihar

वसिष्ठ उवाच

स्तुवंस्तत्र ततः साम्बः कृशो धमनि सन्ततः।

राजन्नामसहस्रेण सहस्रांशुं दिवाकरम्।।

खिद्यमानं तु तं दृष्ट्वा सूर्यः कृष्णात्मजं तदा।

स्वप्ने तु दर्शनं दत्वा पुनर्वचनमब्रवीत्।।

सूर्य उवाच

साम्ब साम्ब महाबाहो शृणु जाम्ववतीसुत।

अलं नाम सहस्रेण पठस्वेमं स्तवं शुभम्।।

यानि नामानि गुह्यानि पवित्राणि शुभानि च

तानि ते कीर्त्तयिष्यामि श्रुत्वा वत्सावधारय।।

ॐ विकर्त्तनो विवस्वांश्च मार्त्तण्डो भास्करो रविः

लोकप्रकाशकः श्रीमांल्लोकचक्षुर्ग्रहेश्वरः।।

लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्त्ता हर्त्ता तमिस्रहा

तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः।।

गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।

एकविंशतिरित्येष स्तव इष्टः मदा मम।।

शरीरारोग्यदश्चैव धनवृद्धियशस्करः।

स्तवराज इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः।।

य एतेन महाबाहो द्वे सन्ध्ये स्तपनोदये।

स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।।

कायिकं वाचिकं चापि मानसं यच्च दुष्कृतम्।

तत्सर्वमेकजाप्येन प्रणश्यति ममाग्रतः।।

एष जाप्यश्च होमश्च संध्योपासनमेव च।

वलिमंत्रोऽर्धमंत्रश्च धूपमंत्रस्तथैव च।।

अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाते प्रदक्षिणे।

पूजितोऽयं महामत्रः सर्वव्याधिहरः शुभः।।

एवमुक्त्वा तु भगवान्भास्करो जगदीश्वरः।

आमंत्र्य कृष्णतनयं तत्रैवान्तरधीयत।।

साम्बोऽपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनम्

पूतात्मा नीरुजः श्रीमांस्तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान्।।

इत्यार्षे श्रीसाम्बपुराणे रोगापनयने श्रीसूर्यस्य स्तवराजः समाप्तः।।

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