Dhanteras, the Dhanvantari Jayanti

Dhanvantari Jayanti

धनतेरस का वास्तविक स्वरूप

आधुनिक बाजारवाद के कारण धन्वन्तरि त्रयोदशी को धनतेरस से जोडकर उसे सामानों की खरीद-बिक्री का दिन बना दिया गया है। जबकि पुराणों के अनुसार वह दिन अमृत कलश के साथ भगवान् धन्वन्तरि की उत्पत्ति का दिन है। इस दिन लोग, विशेष रूप से वैद्य भगवान् धन्वन्तरि की उपासना करते हैं और उनकी कृपा से सभी लोगों के स्वस्थ रहने की प्रार्थना करते हैं।

तिजौरी की पूजा करने का उल्लेख

19वीं शती के अन्त में गुजरात मे इस पर्व का सम्बन्ध व्यापारियों से भी देखा जाता है। उस काल में व्यापारीगण अपनी तिजौरी की पूजा करते थे तथा धन की देवी की पूजा करते थे तथा धन की कमी न होने की प्रार्थना करते थे-

Dhana Terasa And Kali Chaoodasa.

Twenty days after Dasara is Diwa’li. It commences on the 12th of the dark part of the month. That day is Vagha Barasa or Guru Dwddashi. The day after Barasa is Dhan Teras or Dhan Trayodashi, when the merchant brings together his hoards into one room, and after gloating over the heap, offers prayers to it, sprinkles it with red ochre, and kneeling, requests the presiding deity not to take unto her wings. The deity presiding over wealth is Lakshmi. Then comes Kali Chaoodasa or Narlca Ghaturdashi, observed in honour of Vishnu’s victory over Narakasura. The most effective illumination is on this or the following day. The housewife gets up early in the morning, sets a lamp burning in each nook and corner of the house, rubs herself and children, and even her lord, with ointment, and performs hot-water ablutions. The hotter the liquid the greater the efficacy of the prayer following. No little urchin in the bouse can escape a good smothering bath, and happy he whose skin does not peel off under the operation. The mistress of the house then performs drti with a lamp in a brass plate in her hand, and receives various presents. (Gujarát and the Gujarátis: Pictures of Men and Manners Taken from Life By Behramji Merwanji Malabari, Calcutta, 2nd edition, 1884. p. 344

लेकिन आज स्थिति यह हो गयी है कि पूजा-पाठ पर से लोग हँटकर केवल भौतिक फायदे की बात देखने लगे हैं।


अमृत की उत्पत्ति-

समुद्रमन्थन की कथा के अनुसार भगवान् धन्वन्तरि इसी दिन अमृत-कलश के साथ उत्पन्न हुए थे-

अथोदधेर्मथ्यमानात्काश्यपैरमृतार्थिभिः।
उदतिष्ठन्महाराज पुरुषः परमाद्भुतः।।३२।।

अमृत की चाहत रखनेवाले देवों और दैत्यों को द्वारा आगे मथे जाने पर समुद्र से परम अद्भुत पुरुष की उत्पत्ति हुई।

दीर्घपीवरदोर्दण्डः कम्बुग्रीवोऽरुणेक्षणः।

श्यामलस्तरुणः स्रग्वी सर्वाभरणभूषितः।।३३।।

उनकी बड़ी-बड़ी स्थूल भुजाएँ थीं, गला शंख के समान सुन्दर था तथा उनकी आँखें लाल थीं। माला एवं सभी आभूषणों को धारण किये हुए वे साँवले रंग के युवा पुरुष थे।

पीतवासा महोरस्कः सुमृष्टमणिकुण्डलः।

स्निग्धकुञ्चितकेशान्त सुभगः सिंहविक्रमः।।३४।।

उनके वस्त्र पीले थे, चौडी छाती, अच्छी तरह से तराशे गये मणि सहित कुण्डल उनके कानों में थे। कोमल एवं घुघराले बाल थे जो सुन्दर दीख रहे थे। उऩका पराक्रम सिंह के समान था।

अमृतापूर्णकलसं बिभ्रद्वलयभूषितः।

स वै भगवतः साक्षाद्विष्णोरंशांशसम्भवः।। ३५।।

अमृत से भरा हुआ घड़ा लिये हुए तथा कंगन पहने हुए वे साक्षात् भगवान् विष्णु के अंश के रूप में उत्पन्न हुए थे।

धन्वन्तरिरिति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक्।

तमालोक्यासुराः सर्वे कलसं चामृताभृतम्।।३६।।

लिप्सन्तः सर्ववस्तूनि कलसं तरसाहरन्। (भागवत- 8.8)

उनका नाम धन्वन्तरि था जो आयुर्वेद के द्रष्टा, ऋग्वेद, एवं यजुर्वेद के ज्ञाता थे। उन्हें तथा अमृत भरे हुए कलश को देखकर सभी दैत्यों ने  सारी वस्तुए पाने की इच्छा से उस कलश को झपट लिया।

भगवत पुराण के उपर्युक्त मन्त्र से प्रणाम करें।

धनतेरस के दिन अमृतीकरण प्रयोग>>

2 thoughts on “Dhanteras, the Dhanvantari Jayanti”

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