Sarasvati Puja in Mithila Tradition

Sarasvati
मैथिल साम्प्रदायिक सरस्वती पूजा-विधिः

संपादक पं. भवनाथ झा

[जे दीक्षा नेने छथि ओएह टा एहि विधिसँ पूजा करबाक अधिकारी छथि। ई पूजा विधि म.म. रुद्रधरक वर्षकृत्य आ पं. रमाकान्त ठाकुरक पौरोहित्यकर्मसारक आधार पर मैथिलीमे पूजानिर्देश कए बनाओल गेल अछि।]

पूर्व दिन निरामिष एकभुक्त कए प्रतिमा आदि पूजा-सामग्रीक संकलन करी।

पूजाक दिन अपन नित्यकर्म कए (सूर्यादिपंचदेवताक आ विष्णुक पूजा कए) कुश, तिल आ जल लए-

ॐ तत्सत् ॐ विष्णुः विष्णुः।

 संकल्प- ॐ अद्य माघे मकरार्के शुक्लपक्षे पञ्चम्यां तिथौ अमुकगोत्रस्य-अमुकशर्मणः सदारापत्यस्य अतुलविभूतिपुत्रपौत्रादिसद्विद्या- लाभपूर्वकसरस्वतीप्रीतिकामो लक्ष्म्याद्यङ्गदेवतापूजनपूर्वकसरस्वतीपूजन महङ्करिष्ये।।

प्रतिमा मे, घटक जलमे, शालग्राममे, फोटोमे अथवा आइनामे सरस्वती कें स्नान कराए।

सां एहि मन्त्र सँ मूर्तिमे आँखिक स्पर्श कए, आँखि दए तीन बेरि प्राणायाम करी।

मूर्तिक हृदय पर दहिना हाथ दए वामा हाथ सँ कच्छप-मुद्रा बनाए एहि मन्त्र सँ ध्यान करी। (एकर तात्पर्य जे कच्छप मुद्रा मे दहिना हाथ सँ पहिने स्पर्श केलाक बाद नीचाँ सँ वामा हाथ लगाए कच्छप मुद्रा बनाबी जाहिसँ दहिना हाथ ऊपर रहए।)

ॐ तरुण-शकलमिन्दोर्बिभ्रती शुभ्रक्रान्तिः।

कुचभर-नमिताङ्गी सन्निषण्णा सिताब्जे।

निजकर-कमलोद्यल्लेखनीपुस्तकश्रीः।

सकलविभवसिद्ध्यै पातु वाग्देवता नः।।

ध्यान कए प्राण-प्रतिष्ठा करी।

तेकुशा हाथ मे लए नीचाँ लिखल मन्त्र पढी।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या इह प्राणाः।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या इह प्राणाः।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या इह स्थितिः।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः इह श्री सरस्वतीदेव्याः सर्वेन्द्रियाणि।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या वाङ्मनः चक्षुः श्रोत्रघ्राणप्राणा इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।

ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमन्तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमन्दधातु विश्वेदेवास इह मादयन्तामोम् प्रतिष्ठ।। ॐ सरस्वतीदेवि! इहागच्छ इह सुप्रतिष्ठिता भव।।

ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च। 

अस्यै देवत्वसंख्यायै स्वाहा।।

देवीक हृदय पर हाथ धेने सां ई मूलमन्त्र तीन बेरि जप कए, देवीक शरीरक अङ्गन्यास आ करन्यास कए,

ऐँ एहि बीज सँ संनिरोधनी मुद्रा देखाबी आ सां एहि मूलमन्त्रसँ पुष्पाञ्जलि दी।

 कलश स्थापना

तखनि आसन पर बैसि कलश स्थापित करी। जल छीटि, बीचमे पूजा करी।

आवाहन- अक्षत लए, ॐ कलशाधारशक्ते इहागच्छ इह तिष्ठ।

जल- एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ कलशाधारशक्तये नमः।

श्रीखण्ड चानन- इदमनुलेपनं कलशाधारशक्तये नमः।

रक्तचानन- इदं रक्तचन्दनम् कलशाधारशक्तये नमः।

रोली- इदं कुङ्कुमं कलशाधारशक्तये नमः।

सिन्दूर- इदं सिन्दूरं कलशाधारशक्तये नमः।

अक्षत- इदमक्षतं कलशाधारशक्तये नमः।

फूल- एतानि पुष्पाणि कलशाधारशक्तये नमः।

नैवेद्य- एतानि नानाविधनैवेद्यानि कलशाधारशक्तये नमः।

आचमन- इदमाचमनीयं कलशाधारशक्तये नमः।

पुष्पाञ्जलि- एष पुष्पाञ्जलिः कलशाधारशक्तये नमः।

भूमिक स्पर्श कए,

ॐ भूरसि भूमिरसि अदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री।

पृथिवीं यच्छ पृथिवीं ह पृथ्वीं मा हिंसीः।

गायक गोबरसँ निपबाक मन्त्र- 

ॐ मानस्तोके तनये मानऽआयुषि मानो गोषु मानोऽअश्वेषुरीरिषः।

मानोव्वीरान् रुद्रभामिनोव्वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे।

गंगाजल छिटबाक मन्त्र-

वेद्या वेदिः समाप्यते बर्हिषा बर्हि इन्द्रियम्।

यूपेन यूपऽआप्यते प्रणीतोऽअग्निरग्निना।।

एकर बाद एहि पर पिठारसँ अष्टदल कमल बनाबी। कमलक बीच मे धान अथवा जौ राखी, तकर मन्त्र- धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।

खाली कलश रखबाक मन्त्र- ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्वन्दवः पुनुरूर्जा नि वर्तस्व सा नः सहस्त्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशाताद्रयिः।

कलश पर दही आ अक्षतक लेप करी। तकर मन्त्र-  ॐ दधिक्राव्णोऽअकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखाकरत्प्रण आयूंषि तारिषत्।

लोटासँ कलश में जल भरबाक मन्त्र- ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भ सज्र्जनीस्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद।

पंचरत्न- ॐसरत्नानि दाशुषे अरातिसहिता भगो भाग्यन्य तत्र मीमहे।

सप्तमृत्तिका- ॐ उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना। नमस्ते सर्वदेवानां प्रभुवारिणि सुव्रते।

सर्वौषधी- ॐ या ओषधीः पूर्व्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।

मनैनु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च।

श्रीखण्ड चानन-

ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।

ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्नये श्रियम्।

सुपारी-

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।

बृहस्पति प्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वं हसः।।

पंचपल्लव अथवा केवल आमक पल्लव-

ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मानयति कश्चनः।

ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकाम् काम्पीलवासिनीम्।

दूबि-

ॐ काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।

एवानो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च।

गंगाजल-

ॐ इमम्मे वरुण श्रुधीहवमदद्या च मृडय त्वामवस्युराचके।

गंगाद्याः सरितः सर्वाः समुद्राश्च सरांसि च।

सर्वे समुद्राः सरितः सरांसि दलदायकाः।

आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः।।

ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः, ता नऽऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे।

ॐ यो वः शिवतमो रसः, तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः।

ॐ तस्माऽअरंगमामवो, यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जन यथा च नः।

पानक पात- ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा। ॐव्यानाय स्वाहा।

पाइ- ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।

नारिकेर- ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पति प्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वं हसः।

वस्त्र- ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः।

कलशक कात अरवा चाउर भरल ढकना राखी- ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।

ओहि धान पर दीप राखी- ॐ अग्निर्ज्योतिः ज्योतिरग्निः स्वाहा। सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा। अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा। सूर्यो वर्चो ज्योतिः वर्चः स्वाहा। ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।

दही आ अक्षत लए कलशक स्पर्श करैत- ॐ मनोजूतिर्जुषता माज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह मादयन्तामों प्रतिष्ठ। कलशस्थितगणेशादिदेवता इह सुप्रतिष्ठिता भवन्तु।

ॐ कलशस्थितगणेशादिदेवताभ्यो नमः एहि मन्त्रसँ कलश पर पूजा करी।

इति कलशस्थापन विधि।

कलश स्थापित कए विघ्नापसारण करी। भूमि पर वामा पयरक एंडी तीन पटकि कए दए, तीन बेरि ताली बजाए, आँखि गुड़ाड़ि कए चारूकात देखि, ॐ फट् एहि मन्त्रसँ तीन बेरि ताली बजा कए दसो दिशा मे चुटकी बजाबी।

चानन आ फूलसँ हाथ कें शोधित कए नाराच मुद्रासँ ओकरा ईशानकोण में फेंकि आसन पर बैसी-

ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्माे देवता आसनोपवेशने विनियोगः।।

ॐपृथ्वि त्वया धृता लोकाः देवि त्वं विष्णुना धृता।

त्वं च धारय मां नित्यं पवित्रं कुरु चासनम्।।

ॐ आधारशक्तिकमलासनाय नमः।

एहि तरहें आसनक पूजा कए

ॐ अस्त्राय फट् ई मन्त्र पढ़ैत पूर्व अथवा उत्तरमुख बैसि

वाम भागमे- ॐ गुरुभ्यो नमः।

दहिन भागमे- ॐ गणेशाय नमः।

सोझाँमे- ॐ सरस्वत्यै नमः। एहि मन्त्रसँ एक एक फूल राखी।

तकर बाद ऋष्यादिन्यास करी-

बिचला तीन आँगुरसँ माथक स्पर्श करी- ॐ ब्रह्मणे ऋषये नमः।

बिचला तीन आँगुरसँ  मुखक स्पर्श करी- ॐ गायत्रीच्छन्दसे नमः।

बिचला तीन आँगुरसँ  हृदयक स्पर्श करी- ॐ ऐं सरस्वतीदेवतायै नमः।

तकर बाद ऐं एहि बीजमन्त्रसँ तीन बेरि प्राणायाम कए कराङ्गन्यास करी। यथा-

आं हृदयाय नमः।। बिचला तीन आँगुरसँ  हृदयक स्पर्श करी

ईं शिरसे स्वाहा। बिचला तीन आँगुरसँ  माथक स्पर्श करी

ॐ शिखायै वषट्। बिचला तीन आँगुरसँ  टीकक स्पर्श करी

ऐं कवचाय हुम्। दूनू हाथक बिचला तीन आँगुरसँ उलटा कए दूनू कान्हक स्पर्श करी। (दहिना हाथसँ वामा कान्ह आ वामा हाथसँ दहिना कान्ह।)

ॐ नेत्रत्रयाय वौषट्। अनामिका सँ वामा आँखि, मध्यमासँ भोंह आ तर्जनीसँ दहिना आँखिक स्पर्श करी।

अः अस्त्राय फट्।। दहिना हाथ कें पाँछा दिस सँ घुमाए वामा तरहत्थी पर बिचला तीन आँगुरसँ थपडी बजाबी।

एहि प्रकारें करन्यास कए यथाशक्ति प्राणायाम कए सामान्यार्घ स्थापित करी। अपन वामा कात मे रक्त चाननसँ त्रिकोण लीखि, फूल, अक्षत चाननसँ पूजा करी

ॐआधारशक्तये नमः। ॐअनन्ताय नमः। ॐकूर्माय नमः, ॐपृथिव्यै नमः।

एहि प्रकारें पूजा कए, ओतए शंखक बैसना राखि, फट् एहि मन्त्रसँ शंख कें ओहि बैसना पर स्थापित कए शंखक तीन भाग जलसँ भरि,

अंकुश मुद्रासँ-

ॐ गङ्गे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेस्मिन् संनिधिं कुरु।

तीर्थक आवाहन कए सां एहि मन्त्रसँ ओहि में चानन, पूल, अक्षत दए, धेनुमुद्रा देखा कए आठ बेरि सां जपि, ओहि जलसँ अपना कें आ आनो सामग्री कें सिक्त कए दी।

तखनि पंचोपचारसँ निम्नलिखित देवताक पूजा करी

सूर्य- भगवन् सूर्य इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते श्री सूर्याय नमः। इदमनुलेपनं भगवते श्री सूर्याय नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवते श्री सूर्याय नमः। इदं कुङ्कुमं भगवते श्री सूर्याय नमः। इदमक्षतं भगवते श्री सूर्याय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते श्री सूर्याय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्री सूर्याय नमः। इदमाचमनीयं भगवते श्री सूर्याय नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते श्री सूर्याय नमः।

विष्णु- भगवन् विष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते श्री विष्णवे नमः। इदमनुलेपनं भगवते श्री विष्णवे नमः। एते यवतिलाः भगवते श्रीविष्णवे नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते श्री विष्णवे नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्री विष्णवे नमः। इदमाचमनीयं भगवते श्री विष्णवे नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते श्री विष्णवे नमः।

शिव- भगवन् शिव इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते शिवाय नमः। इदमनुलेपनं भगवते शिवाय नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवते शिवाय नमः। इदं कुङ्कुमं भगवते शिवाय नमः। इदमक्षतं भगवते शिवाय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते शिवाय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्री शिवाय। इदमाचमनीयं भगवते शिवाय नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते शिवाय नमः।

दुर्गा- भगवति दुर्गे देवि इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदमनुलेपनं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदं कुङ्कुमं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदं सिन्दूरं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदमक्षतं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। एतानि पुष्पाणि भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदमाचमनीयं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः।

अग्नि- भगवन् अग्निदेव इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते अग्निदेवाय नमः। इदमनुलेपनं भगवते अग्निदेवाय नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। इदं कुङ्कुमं भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। इदमक्षतं भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः।इदमाचमनीयं भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। एष पुष्पा×जलिः भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः।

केशव- भगवन् श्रीकेशव इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते श्रीकेशवाय नमः। इदमनुलेपनं भगवते श्रीकेशवाय नमः। एते यव-तिलाः भगवते श्रीकेशवाय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते श्रीकेशवाय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्रीकेशवाय नमः। इदमाचमनीयं भगवते श्रीकेशवाय नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते श्रीकेशवाय नमः।

कौशिकी- भगवति कौशिकि देवि इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदमनुलेपनं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदं कुङ्कुमं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदं सिन्दूरं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदमक्षतं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। एतानि पुष्पाणि भगवत्यै कौशिक्यै नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदमाचमनीयं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवत्यै कौशिक्यै नमः।

आदित्यादिनवग्रह- आदित्यादिनवग्रहाः इहागच्छत इह तिष्ठत। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदमनुलेपनं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदं रक्तचन्दनम् आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदं कुङ्कुमं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदमक्षतं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। एतानि पुष्पाणि आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदमाचमनीयं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। एष पुष्पाञ्जलिः आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः।

इन्द्रादिशदिक्पाल- इन्द्रादिदशदिक्पालाः इहागच्छत इह तिष्ठत। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदमनुलेपनं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदं रक्तचन्दनम् ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदं कुङ्कुमं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदमक्षतं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। एतानि पुष्पाणि ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदमाचमनीयं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। एष पुष्पाञ्जलिः ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः।

तखनि लक्ष्मीक ध्यान करी-

ॐ पाशाक्षमालिकाम्भोज  शृणिभिर्याम्यसौम्ययोः।

प्रसनास्थां ध्यायेच्च श्रियं त्रैलोक्यमातरम्।

गौरवर्णां सुरूपाञ्च सर्वालङ्कारभूषिताम्।

रौक्मपद्मव्यग्रकरां वरदां दक्षिणेन तु।

ध्यान कए पाद्य आदि उपलब्ध वस्तुसँ ॐ लक्ष्मीदेव्यै नमः एहिसँ पूजा कए,

ॐ लक्ष्मीदेव्यै नमः ई दस बेरि जप करी।

ॐ नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये।

या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्त्वदच्र्चनात्।

एहिसँ पुष्पाञ्जलि दए स्तोत्र आदि पाठ कए लक्ष्मीकें प्रणाम करी।

सरस्वतीक पूजा

ध्यान- 

ॐ तरुणशकलमिन्दोर्बिभ्रती शुभ्रक्रान्तिः।

कुचभर-नमिताङ्गी सन्निषण्णा सिताब्जे।

निजकर-कमलोद्यल्लेखनीपुस्तकश्रीः। 

सकलविभवसिद्ध्यै पातु वाग्देवता नः।।

ध्यान कए अपन माथ पर एकटा फूल राखि मनहिं मन सरस्वतीक पूजा करी। तकर बाद,

ॐ ऐं भगवति सरस्वति स्वकीयगणसहिते इहागच्छ इहागच्छ, इह तिष्ठ, इह सन्निधेहि इह सन्निरुद्धा भव, अत्राधिष्ठानं कुरु, मम पूजां गृहाण स्थां स्थीं स्थिरा भव।।

एहिसँ आवाहन कए-

जल- इदं पाद्यम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

अघ्र्य- एषोर्घ्यः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः। (अरघा मे जल, चानन, अक्षत, दूबि, दूध, दही, कुषक अगिला भाग, पीरा सरिसब, तिल दए)

जल- इदमाचमनीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

जल- इदं स्नानीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः। 

जल- इदं पुनराचमनीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

वस्त्र- इदं शुक्लवस्त्रं बृहस्पतिदैवतम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

श्रीखण्ड चानन- इदमनुलेपनम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

सिन्दूर- इदं सिन्दूरम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

अबीर- इदम् अबीरकं ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

अक्षत- इदमक्षतम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

फूल- एतानि पुष्पाणि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

आमक मज्जर- इदम् आम्रमञ्जरीकं ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

माला- इदं माल्यम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

आभूषण- इदं भूषणम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

सौन्दर्य-प्रसाधन- एतानि नानाविधसौन्दर्यप्रसाधनानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

धूप- एष धूपः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

दीप- एष दीपः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

नैवेद्य- एतानि नानाविधनैवेद्यानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

फल- एतानि नानाविधफलानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

पकमान- एतानि नानाविधपक्वान्नानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

जल- इदमाचमनीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

फूल- ॐ पुष्पं मनोहरं दिव्य सुगन्धं देवनिर्मितम्।

हृद्यमद्भुतमाघ्रेयं देवि! तत् प्रतिगृह्यताम्।। एष पुष्पाञ्जलिः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः

एहि प्रकारें षोडशोपचारसँ सरस्वतीक पूजा करी।

तकर बाद पुस्तक पर- ॐ पुस्तकाय नमः एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

मोसिदानी पर ॐ मस्याधाराय नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

कलम पर ॐ लेखन्यै नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

चक्कू पर ॐ सर्वशस्त्रेभ्यो नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

ॐ अस्त्रेभ्यो नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

आरती कए पुष्पाञ्जलि दी

ॐ यथा न देवो भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।

त्वां परित्यज्यं सन्तिष्ठेत्तथा भव वरप्रदा।।

वेदाः पुराणशास्त्राणि नृत्यगीतादिकं च यत्।

न विहीनं त्वया देवि तथा मे सन्तु सिद्धयः।।

विशदकुसुमतुष्टा पुण्डरीकोपविष्टा धवलवसनवेशा मालतीबद्धकेशा।

शशधरकरवर्णा सुभ्रताटङ्ककर्णा जयति जितसमस्ता, भारती वेणुहस्ता।

पुष्पाञ्जलिक बाद प्रणाम करी

ॐ सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमोनमः।

वेदवेदान्तवेदाङ्गविद्यास्थानेभ्य एव च (स्वाहा)।।

एहिसँ प्रणाम कए प्रार्थना करी।

ॐ लक्ष्मीर्मेधा धरापुष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभा धृतिः।

एताभिः पाहि तनुभिरष्टाभिर्मां सरस्वति।।

रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भवगति! देहि मे।

धर्मान् देहि धनं देहि सर्वाविद्याः प्रदेहि मे।।

सा मे वसतु जिह्वायां वीणां पुस्तकधारिणी।

मुरारिवल्लभा देवि! सर्वशुक्ला सरस्वती।।

भद्रकाल्यै नमो नित्यं सरस्वत्यै नमो नमः।

वेदवेदान्त-वेदाङ्ग-विद्यां देहि नमोस्तु ते।।

एहिसँ प्रार्थना कए प्रणाम करी।

नाच-गान करैत दिन-राति बिताए, भोरे विसर्जन करी।

तखनि कुश, तिल आ जल लए-

ॐ कृतैतत्साङ्गसपरिवार सरस्वती-पूजनकर्म-प्रतिष्ठार्थमेतावद्द्रव्यमूल्यक- हिरण्यमग्निदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे ब्राह्मणकें दय दी।

।।इति सरस्वतीपूजाविधिः।।


शारदाशतनामस्तोत्रम्>>

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