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Brahmi Publication

Art, Culture and History of Mithila

मिथिलाक इतिहास, संस्कृति, लिपि एवं कला पर शोधपरक आलेखक प्रकाशन

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जितिया व्रतकथा

मिथिलाक पारम्परिक जितिया व्रतकथा
(आधार ग्रन्थ- रुद्रधर कृत वर्षकृत्य, मीमांसकशिरोमणि जगद्धरशर्मपरिवर्द्धित एवं डा. पण्डित शशिनाथ झा द्वारा सम्पादित, उर्वशी प्रकाशन, पटना, 1998 ई.)

जितिया पाबनि वास्तवमे जीवितपुत्रिका अथवा जीवपुत्रिका व्रत थीक। एकरे जिउतिया आ जितिया कहल जाइत अछि। आश्विन मासक कृष्ण पक्षक अष्टमी तिथि कें ई व्रत होइत अछि। कहल गेल अछि जे जे नारी ई व्रत कए शालिवाहन राजाक पुत्र जीमूतवाहनक पूजा करैत छथि, हुनक सौभाग्य अटल रहैत छनि आ सन्तानक उन्नति होइत छनि। जाहि दिन सन्ध्याकालमे अष्टमी तिथि रहए ताहि दिन व्रत करबाक चाही। जँ सप्तमीक उदय हो आ तकर बाद अष्टमी तिथि पड़ि जाए तँ ओही दिन व्रत होएत अगिला दिन नहिं। जँ दूनू दिन मे सँ कोनो दिन अष्टमी सन्ध्याकाल नहिं रहए तँ दोसर दिन ई व्रत करी। एहि व्रतमे अष्टमी तिथिमे भोजन कएने दोष कहल गेल अछि।
व्रत आरम्भ करबासँ पहिने ओठगन करबाक थीक। मिथिलामे सौभाग्यसूचक पदार्थ सभक भोजन अर्थात् माँछ, मडुआ आदि सप्तमी तिथि कें खेबाक परम्परा अछि। जे माँछ नै खाइत छथि ओ नोनी सागक व्यवहार करैत छथि। कथाक अनुसार महिलालोकनिक बीच बेन बाँडब सेहो एकर एकटा अभिन्न अंग थीक। अंकुरीसँ पारणा करबाक चर्चा कथामे अछि।
मिथिलामे जितिया व्रतक कथा गौरीप्रस्तार नामक ग्रन्थ सँ उद्धृत मानल गेल अछि। मीमांसकशिरोमणि जगद्धर झा द्वारा सम्पादित वर्षकृत्यमे संस्कृतमे ई कथा देल गेल अछि। जीमूतवाहनक व्रतक कथाक नाम पर मैथिलसँ भिन्न सम्प्रदायमे सेहो दोसर कथा देल गेल अछि, जे हिन्दीमे किताब बनल भेटैत अछि। ओहिमे राजा जीमूतवाहन द्वारा साँपकें बचेबाक कथा अछि जे संस्कृतक नागानन्द नामक नाटकमे अछि। ओ कथा मिथिलामे प्रचलित नै अछि।
मुदा मैथिलमे दोसर कथा अछि। मिथिलाक लोककें अपन परम्पराक पालन करब ओतबे आवश्यक अछि, जतेक आवश्यक कि पाबनि करब। परम्पराकें छोडब सेहो एकटा पाप थीक। पद्धति सभमे जे कथा संस्कृतमे देल अछि से बुझाइत अछि जे मौखिक कथाकें सूनि केओ पण्डित ओकरा संस्कृतमे अनुवाद कए देने छथि। संस्कृत कथा पढब जँ सम्भव नहिं हो तँ मैथिलीमे कथा सुनी आ सुनाबी। तें एतए एहि संस्कृत कथाक मैथिली अनुवाद देल जा रहल अछि। Read more>>

 
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