A newly found fragment of an Inscription

सिमरौनगढ़ से प्राप्त नवीन खण्डित शिलालेख

भवनाथ झा

दिनांक 15 मई, 2018 ई.को सोसल मीडिया फेसबुक के माध्यम से श्री डी. के. सिंह से सूचना दी कि समरौन गढ कोल्डस्टोर से पश्चिम स्थित तालाब की खुदाई के दौरान एक शिलालेख का टुकडा मिला है। उन्होंने इसी पोस्ट के माध्यम से लोगों से इसे पढने का भी आग्रह किया। यह अभिलेख तीन ओर से खण्डित है, केवल नीचे का भाग सुरक्षित है। इस खण्डित शिलालेख की लंबाई एवं चौड़ाई क्रमशः 29.5 से.मी. तथा 15 से.मी.है।

मिथिलाक्षर पर दीर्घकाल से कार्य करने के कारण लिपि एवं लेखन शैली देखते ही पहचान गया कि 1992 ई. में सिमरौनगढ से मिले एक खण्डित शिलालेख का यह दूसरा टुकडा है। ध्यातव्य है कि मार्च 1992 ई. में 12.3से.मी. चौडा एवं 16सें.मी. लम्बा एक टुकडा स्थानीय विद्यालय के शिक्षक के सौजन्य से मैसिमो विडाले नामक इटालियन पुरातत्त्वविद् को मिला था जो उन दिनों नेपाली एवं इटली के पुरातत्त्ववेत्ताओं के संयुक्त अभियान के तहत सिमरौनगढ पर शोध कर रहे थे। इस शिलालेख के इंक स्टम्पेज के आधार पर रिकार्डो गार्विनी ने इसका अध्ययन किया था। यह आलेख नेपाल पुरातत्त्व विभाग की पत्रिका Ancient Nepal, के 1993 ई. में अक्टूबर-नवम्बर अंक में A Fragmentary Inscription From Simraongarh, The Ancient Maithila Capital शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित हुआ था। इसमें 7 पंक्तियाँ खण्डित रूप में मिली थी जो चारो ओर से अपूर्ण थी। चूँकि पहली पंक्ति के आरम्भ मे किसी देवी की स्तुति की गयी है, जिसमें बायीं ओर अक्षर घिसे हुए हैं, फिर भी छन्द की दृष्टि से पूर्ण है. अतः हम अनुमान लगा सकते हैं कि 7 पंक्तियों का यह टुकडा बायीं ओर ऊपर का अंश है, जिसमें बायीं ओर से एक या दो अक्षर ही खण्डित हैं। चूँकि इस टुकडे की छायाप्रति मेरे पास उपलब्ध नहीं है, मैंने इस अंश को पढने के लिए उक्त शोध पत्रिकामें प्रकाशित छायाप्रति का ही उपयोग किया है तथापि कुछ स्थानों पर पाठभेद के बावजूद रिकार्डो गार्विनी द्वारा दिया गया पाठ समुचित प्रतीत होता है।

शिलालेख के टुकडे की छाया। छाया- डी. के. सिंह, साभार

वर्तमान उपलब्ध शिलालेख का अंश में 11 पंक्तियाँ है। नीचे का भाग सुरक्षित है, किन्तु ऊपर से खण्डित है अतः हम कह नहीं सकते कि इसके ऊपर भी पंक्तियाँ थीं अथवा नहीं। इस अभिलेख का पाठ इस प्रकार है-

देवनागरी लिप्यन्तरण

  1. ……………………………….………………………………ग्रामशो……
  2. ……………………………………………………….[मा]याः पयः।। सी……
  3. ………………………………….माध्वीकामृतमत्तकोकिलकुल….
  4. …………………….साहङ्कारबीजादयं कल्पान्तावधिवारिधिप्रि….
  5. ………………………सहस्रसत्कामः कामधेनुं त्रिभुवनतिलकः काञ्चनीं क….
  6. …………………………..[कै]लासमावासं यः कपालिनः।। वाराणसीतिलकमम्बरशेखरा….
  7. ……………………….[ध]त्ते ध्वजप[श्श्रि]यम्।। काश्यामयं कृतमतिर्वितरत्यजस्रमश्रान्तदान….
  8. ……………[मथि]तांगवदिन्दुकुन्दमन्दारगौरी[वद]ने यशःश्रीः।। मुरं मुरारिस्त्रिपुरं पुरारिः….
  9. ……………स्तल[प्रा]प्तरुषाद् नयेन।। यस्याहवप्रचुरतूर्य्यविकीर्य्यमाणकीर्तिच्छटाःप्रतिभटाः…
  10. ……दास्त्रीप्राप्तैरेते खलु यत् स्फुलिङ्गाः।। शीतांशुर्म्मुखमध्यवागपि सुधा बाह्वश्वकल्पद्रुम…..
  11. ………दातरि दक्षिणे नयनिधौ विद्याविवेकाश्रये प्राक् प्रत्यक् सुरताणविक्रमहरेस्त………

अभिलेख में एक भी श्लोक पूर्ण नहीं है। अतः इसका अनुवाद स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। तथापि प्रत्येक पंक्ति से प्राप्त सूचना इस प्रकार है-

  1. इसका अनुवाद होगा- गाँव गाँव (में)। राजा के यश का वर्णन हो सकता है कि उनका यश गाँव गाँव तक फैला हुआ है।
  2. यहाँ दूध अथवा जल की बात है। उमायाः पयः हो सकता है। हिमालय से निःसृत नदियों के जल की उपमा देवी पार्वती के स्तन से निःसृत दूध से दी गयी हो।
  3. महुआ के रस के कारण मत्त कोयलों का वर्णन है।
  4. अहङ्कार रूपी बीज से उत्पन्न यह, जो कल्प के अन्तकाल में उत्पन्न होने वाले समुद्र से प्रेम करे….।
  5. हजारों अच्छे कार्य करने की इच्छा रखनेवाले, तीनों लोकों के तिलक स्वरूप (राजा) ने कामधेनु को स्वर्णाभूषणों से लाद दिया।
  6. जिन्होंने कपाली शिव के आवास कैलास को (पृथ्वी पर उतार दिया)। यह राजा के यश का वर्णऩ हो सकता है, जिसकी शुभ्रता से पूरी पृथ्वी ही कैलास के समान शुभ्र हो गयी हो।(यहाँ अनुष्टुप् छन्द का एक श्लोक है।)
  7. ध्वज (राष्ट्रध्वज) की रक्षा करनेवाले राजा, मन्त्री अथवा सैनिक लक्ष्मी को धारण करते हैं। इन्होंने काशी में मन में संकल्प लेकर प्रचुर एवं विना रुके हुए दान का वितरण किया। (यह राजा के लिए है।
  8. मथितांग अर्थात् जिनके अंगका मन्थन किया गया हो अर्थाते राजा मिथि, जिनके नाम पर मिथिला है उसी राजा के समान चन्द्रमा, कुन्द फूल एवं मन्दार फूल के समान गौर कान्ति वाली यशरूपी लक्ष्मी है। मुर राक्षस को मुरारि श्रीकृष्ण ने मारा तथा त्रिपुरासुर को भगवान् शंकर ने मारा……।
  9. (यहाँ छन्दोयोजना की दृष्टिसे एक अक्षर प्र छूटा हुआ प्रतीत हो रहा है। अतः ला अक्षर को लप्रा पढा गया है।) किसी स्तर से प्राप्त क्रोध एवं नीति के द्वारा अर्थात् दण्ड एवं नीति के द्वारा शासन किया गया। जिनके युद्ध में बहुत सारे तूर्य (एक प्रकार का वाद्य यन्त्र- तुरही) से बिखरती हुई कीर्ति की छटा एवं प्रत्येक सैनिक …..(चारों दिशाओं को घेर लेते हैं।)
  10. (इस प्रकार …..) जिस प्रकार भोग देनेवाली स्त्री से प्राप्त इन (पुत्रों के) द्वारा ये अग्निकण के समान तेजस्वी हुए। मुख के वाणी तो अमृत के समान थी अतः वे चन्द्रमा की तरह थे। बाहु एवं अश्व से वे कल्पतरु के समान थे।
  11. इस दान करनेवाले में, नीति के खजाने में, दाक्षिण्य अर्थात् कोमल गुण से भरे हुए व्यक्ति में, तथा विद्या एवं विवेक के आश्रयभूत इस व्यक्ति में तथा पूर्व एवं पश्चिंम दिशाओं के सुलतान के पराक्रम का हरण करने वाले इस व्यक्ति में…..

इन 11 पंक्तियों में किसी राजा अथवा अन्य व्यक्ति का नाम नहीं है। किन्तु पूर्वप्राप्त शिलालेख अंश में दूसरी पंक्ति में नरपतिः तथा चौथी पंक्ति में राम तथा 7वीं पंक्ति में कर्म्मादित्य का नाम आया है। यदि हम इस अंश के साथ अन्वय करते हें तो अनुमान लगा सकते हैं कि यह शिलालेख रामसिंह देव के काल का है, जिसमे कर्म्मादित्य के नाम का उल्लेख अभूत् कर्म्मादित्यः के रूप में आया है। यह भी असम्भव नहीं कि कर्म्मादित्य के जन्म की बात लिखकर आगे के किसी श्लोक में उनके ज्येष्ठ पुत्र देवादित्य का नामोल्लेख किया गया हो तथा अंतिम पंक्तियाँ मन्त्री देवादित्य से सम्बद्ध हो।

जबतक इस शिलालेख के अन्य टुकडे उपलब्ध नहीं होते तबतक इससे अधिक कुछ कहना अनुमानमात्र होगा।

अनुमान को आधार पर इस सम्पूर्ण शिलालेख का निम्नलिखित रूप होना चाहिए, जिनमें से हमें दो टुकडे मिले हैं, शेष टुकडों के लिए प्रयत्न आवश्यक है।

Hindi language : in search of its native land

जमीन तलाशती हिन्दी बनाम क्षेत्रीय भाषाएँ

(मैथिली भाषा के सन्दर्भ में विशेष)

 भवनाथ झा

भारतेन्दु युग के बाद हिन्दी खडीबोली के रूप आज जिस प्रकार है और जिस स्थिति में उसे संविधान की अष्टम अनुसूची में संघ की भाषा के रूप में सम्मिलित किया गया, उसका वह रूप गौरवमय है। लगभग सम्पूर्ण भारत में आज हिन्दी सम्पर्क भाषा एवं कार्यालय की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है। कुछ कार्य शेष है, फिर भी हिन्दी का अपना विशाल फलक है। वह अपने वर्तमान रूप में भारत को एक सूत्र में बाँधने के लिए सक्षम है। विश्वस्तर पर भी भाषाओं की सूची में वह अपना स्थान बना चुकी है।

हम सभी लोग जानते हैं कि इस खडीबोली किसी जमीन की भाषा नहीं रही है। उत्तरप्रदेश अवधी, व्रज आदि अनेक भाषाओं की भूमि रही है। बिहार भी भोजपुरी, मगही, मैथिली के साथ साथ अन्य अनेक क्षेत्रीय भाषाओं /बोलियों की जमीन रही है। भारत की सम्पर्क भाषा के लिए 19वीं शती में जब इस्ट इंडिया कम्पनी ने बहस करायी, समिति का गठन किया, तब फारसी, संस्कृत एवं अंग्रेजी ये तीन ही विकल्प सामने थे। हिन्दी की कोई चर्चा नहीं थी, क्योंकि उस समय तक हिन्दी ऐसी स्थिति में नहीं थी कि वह भारत की सम्पर्क भाषाओं की सूची में अपना स्थान पा सके। हलाँकि इससे पहले ही 1800 ई. के आसपास फोर्ट विलियम कालेज कलकत्ता के द्वारा पं. सदल मिश्र एवं लल्लूलाल को स्थानीय भाषाओं के विकास के लिए लगाया गया था। पं. सदल मिश्र ने पर्याप्त कार्य किये, अनुवाद किया, रामचरितमानस का प्रथम संपादन किया। इसी कालखण्ड में हिन्दी में उपन्यास और कथा-साहित्य का सर्जन हुआ, हिन्दी अपने आधुनिक स्वरूप की ओर अग्रसर होने लगी। जमीन तलाशने की कोशिश में उसने सबसे पहले अवधी और ब्रज क्षेत्र को लिया। अवधी और देहलवी इन दोनों के संयुक्त रूप यानी हिन्दवी के अमीर खुसरो, हिन्दी के हो गये, चन्द वरदाई को उसने समेट लिया, मैथिली के सरहपाद तक को हिन्दी में समाहित कर लिया गया। इधर अंग्रेजों की भाषा नीति के कारण बिहारी भाषा की संकल्पना हुई जो मैथिली भोजपुरी एवं मगही के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध हुई।

बिहार में हिन्दी अपनी जमीन तलाशती हुई जब मैथिली के निकट आयी तो अपना इतिहास सुदृढ करने के लिए सरहपाद, ज्योतिरीश्वर एवं विद्यापति को समेट लिया और मैथिली को भी हिन्दी की सहायक बोली के रूप में प्रचारित करने लगा, जबकि भाषा के स्तर पर मैथिली बंगला  अत्यन्त निकट है। उक्त तीनों की रचनाओं को तो हिन्दी ने अपने साहित्य का स्तम्भ मान लिया लेकिन विद्यापति के बाद मैथिली साहित्य की धारा के अन्य कवि से उसे कोई मतलब नहीं रहा। यदि मैथिली की जमीन हिन्दी की अपनी जमीन है मैथिली हिन्दी की सहायक बोली मात्र है तो मनबोध, रतिपति, चन्दा झा, लालदास ये सभी हिन्दी के साहित्यकार हुए, पर आजतक इतिहास-संकलन में भी इनके नाम नहीं लिये गये। तर्क यह रहा कि मैथिली की प्रकृति एवं उसकी शब्दावली हिन्दी से अलग है, अतः उन्हें हम हिन्दी-साहित्य में नहीं रख सकते। भोजपुरी के हीरा डोम की कविता तो छप गयी पर आगे भोजपुरी के अन्य साहित्यकारों की चर्चा तक हिन्दी साहित्य के इतिहास में नहीं हुई। मगही के साथ भी यहीं स्थित रही। हाँ, अवधी एवं ब्रजभाषा की परम्परा को उसने पूरा आत्मसात् कर लिया।

हिन्दी राजभाषा रही, उसे सभी प्रकार की आर्थिक सुविधा प्रदान की गयी, लेकिन इन सुविधाओं से हिन्दी की सहायक तथाकथित बोलियाँ वंचित रही। इधर क्षेत्रीय भाषाओं का धीर धीरे अपने बल-बूते पर विकास हुआ, साहित्य रचे गये, कोष, व्याकरण, छन्दःशास्त्र रचे गये और उन्होंने उनके इतिहास लिखे गये तो जमीन की भाषा होने के कारण काफी पुराना इतिहास मिला। मैथिली का इतिहास सरहपाद तक चला गया। सरहपाद की भाषा-शैली मैथिली की शैली के अत्यन्त निकट है।

आज मैथिली अपने सपूतों के प्रयास के बल पर संविधान की अष्टम अनुसूची में भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है। मैथिली की अपनी लिपि है, जिसमें हजारों पाण्डुलिपियाँ संग्रहालयों में सुरक्षित हैं, शिलालेख हैं। मगही, भोजपुरी भी प्रयत्नशील है। इन भाषाओं के कोष प्रकाशित हो रहे हैं, व्याकरण लिखे गये हैं, साहित्य की रचना तो निरन्तर हो रही है। बिहार भोजपुरी अकादमी एवं मगही अकादमी से प्रकाशित पुस्तकों की सूची भी देखी जा सकती है। हमें पूर्ण विश्वास है कि एक न एक दिन अवश्य ये भी भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होंगी, क्योंकि भाषाविज्ञान का नियम है कि जब बोली में स्थिरता आती है, साहित्य की रचना होती है, कोष, व्याकरण आदि बन जाते हैं तो वह बोली से ऊपर उठकर भाषा बन जाती है। हम विकासशाल हैं तो हमारी बोली भी विकसित होकर भाषा अवश्य बनेगी।

इससे हिन्दी को अपनी वह जमीन खिसकती नजर आ रही है, जिसके लिए बह आजतक प्रयत्नशील रही है। हिन्दी के पुरोधाओं को यह चिन्ता सताती रही है कि इससे हिन्दी की हानि होगी। वे आज भी राष्ट्र की अखण्डता की दुहाई देकर इन क्षेत्रीय भाषाओं को बोलियों के रूपमे ही रखने/मानने के लिए अथक प्रयास कर रही है।

वास्तविकता यह है कि हिन्दी की अपनी जमीन न हो तब भी वह आज अपने रूप में गौरवमयी भाषा है। वह इतना विकसित हो चुकी है कि राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधने के लिए पर्याप्त है। मैथिली क्षेत्र में भी हिन्दी में साहित्य के साथ-साथ अन्य विधाओं में कम रचना नहीं हो रही है। मैथिली से हिन्दी में अनुवाद भी हो रह हैं।


किन्तु क्षोभ तब उभर कर सामने आता है, जब मैथिली को स्वतन्त्र भाषा के रूप में स्थान न देकर हिन्दी के पुरोधा एक क्षेत्रीय बोली के रूप में बार-बार अवमानित करने का प्रयास करते रहते हैं।


लेकिन हमें यह जानना होगा कि मैथिली के विकास से हिन्दी को कोई खतरा नहीं है बल्कि सह-अस्तित्व से परस्पर आदान-प्रदान होने से लाभ ही है। मैथिली की जमीन उसकी भी जमीन है, वह संस्कृत की भी जमीन है, फारसी, उर्दू की भी जमीन है, सभी भाषाओं के सह-अस्तित्व में ही सबकी भलाई है। एकाधिकार के सामन्तवाद का व्यामोह सभी भाषाओं के लिए खतरा है। इसी स्थिति की आशंका में शिवदान सिंह चौहान ने भी आलोचना पत्रिका के सम्पादकीय में इस बात पर जोड दिया था कि भाषा-प्रश्न का समाधान बहुमत से नहीं सहमति से सम्भव है। भारत सरकार को स्पष्ट भाषा-नीति अपनानी चाहिए जिससे सभी भाषाओं के साहित्य का विकास हो, विभिन्न भाषा-भाषियों के बीच विवाद न हीं संवाद स्थापित हो।

प्राच्यविद्या के वरेण्य विद्वान् सीताराम चतुर्वेदी ने 1950-55 के बीच अपना सिद्धान्त रखा था कि हिन्दी को यदि समृद्ध करना है तो हमें संस्कृत और उर्दू/फारसी का दामन त्यागकर जनभाषाओं से शब्दों को लेना चाहिए। वे अपनी रचनाओं में इस सिद्धान्त का प्रयोग करते रहे। उऩके द्वारा हिन्दी में अनूदित वाल्मीकि-रामायण महावीर मन्दिर प्रकाशन, पटना से प्रकाशित है इसमें उन्होंने इसका भरपूर उपयोग किया है। उन दिनों यदि उनकी बात मानी गयी होती तो आज हिन्दी को अपनी जमीन खिसकने का भय नहीं रहता। रेणु, नागार्जुन आदि ने हिन्दी में क्षेत्रीय शब्दों का प्रयोग किया तो उन्हें आंचलिक उपन्यासकारों की श्रेणी में डाल दिया गया।

खैर जो हो, आज हिन्दी जिस रूप में है, वह सभी क्षेत्रीय भाषाओं से बिल्कुल भिन्न है और अपने रूप में स्थापित है। यदि हम कहें कि उसे जमीन की जरूरत ही नहीं है तो यह भी गलत नहीं होगा।

अन्धराठाढीक तीन अभिलेख

भवनाथ झा


दिनांक 16 एवं 17 मार्च, 2018 कें अन्धराठाढी में वाचस्पति-महोत्सव मनाओल गेल। एहि अवसर पर दिनांक 17 मार्च कें डा. फणीकान्त मिश्रक अध्यक्षतामे इतिहास एवं पुरातत्त्व सत्र मे पढल गेल आलेख।


मिथिलामे अन्धराठाढी पुरातात्त्विक दृष्टसँ महत्त्वपूर्ण अछि। एकर नामकरणसँ सूचित होइत अछि जे आन्ध्र-प्रदेश अर्थात् कर्णाटसँ आएल विजेताक ई एकटा स्थल छल। एहि घटनाकें नान्यदेवक संग जोडल जाइत अछि आ एहि गाममे कमलादित्यस्थान सँ उपलब्ध विष्णुक प्रतिमाक मूर्तिलेखक आधार पर एकरा सिद्ध कएल जाइत अछि जे ओ व्यक्ति नान्यदेव छलाह जे एतय आबि अपन सैन्य शिविर लगोल आ मिथिलाक विजययात्रा प्रारम्भ कएल।

एहि गामसँ प्राप्त दूटा मूर्तिलेखक अध्ययन एतय अपेक्षित अछि। पहिल अभिलेख कमलादित्यस्थान सँ प्राप्त मूर्तिलेख थीक। ई वर्तमानमे खण्डित विष्णुमूर्तिक पादपीठ पर उत्कीर्ण अछि। लेख पर्याप्त खण्डित भए चुकल छैक तें पढबामे अधिक स्पष्ट नै अछि। एकर पहिल पाठ म.म. परमेश्वर झा मिथिलातत्त्वविमर्श मे एहि रूपमे देने छथि-

श्रीमन्नान्यपतिर्जेता गुणरत्नमहार्णवः।

यत्कीर्तिजनितो विश्वे द्वितीयः क्षीरसागरः।।1।।

मन्त्रिणातस्य नान्यस्य (मन्त्र-मन्त्र) नवरङ्गाब्जभानुना।

तेनायं कारितो देवः श्रीधरः श्रीधरेण च।

(दरभंगा संस्करण, 1949, प. सं. 104)

एहि लेख कें कतेको बेर पढबाक प्रयास कएल गेल अछि। किछु वर्ष पूर्व दरभंगाक श्रद्धेय सत्यनारायण झा सत्यार्थी एकटा नीक कलाकार आ फोटोग्राफरक रूपमे एहि शिलालेखकें साफ कए एकर प्रिंट तैयार कएलनि जे हुनक पुस्तक मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास मे प्रकाशित भेल।

एहिसँ पूर्व एहि शिलालेखक प्रामाणिक इक-स्टम्पेज काशी प्रसाद जायसवाल रिसर्च इन्सिटीच्यूटक शोध पत्रिकामे आ पुनः पं. राजेश्वर झाक पुस्तक मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास मे निगेटिव प्रिंटक संग प्रकाशित भए चुकल छल

जेकर अवलोकन केलाक बाद दूनू कें मिलाए पढला पर म.म. परमेश्वर झाक पाठ मे संशोधनक अवसर आएल। एकर मुख्य स्थान अछि दोसर पंक्तिक 9-12 अक्षर जतए पाठक कारणें ऐतिहासिक साक्ष्य पर असरि पडैत अछि।

एहि चारि अक्षर कें म.म. परमेश्वर झा ‘नवरङ्गा’ पढने छथि आ तें ओ श्रीधरदासक नाम लैत हुनका रङ्गवाली कायस्थ मानने छथि। बादमे सत्यनारायण झाक फोटोग्राफीक आधार पर एकरा ‘क्षत्रवंशा’ पढल गेल आ एहि आधार पर श्रीधर कें क्षत्रिय मानल गेल। किन्तु सत्यनारायण झाक फोटोग्राफी हुनका द्वारा ओहि पर कलम चला देबाक कारणें अधिक प्रामाणिक नहि रहि गेल अछि तें काशी प्रसाद जायसवाल रिसर्च इन्सिटीच्यूटक शोध पत्रिका आ राजेश्वर झा द्वारा प्रकाशित शिलालेखक इंकस्टम्पेज सभसँ प्रामाणिक अछि।

एकर दोसर पंक्तिक 9-10म अक्षर क्ष एवं त्र के रूपमे पढल जा सकैत अछि जकरा परमेश्वर झा म एवं न्त्र के रूपमे पढने रहथि। वस्तुतः एकर पहिल पंक्तिक तेसर अक्षर ‘म’ अछि जेकरा संग दोसर पंक्तिक नवम अक्षर एकदम भिन्न अछि आ तें एकरा ‘क्ष’ पढब उचित थीक। मुदा एतहि 12म अक्षर कें सत्यनारायण झा ‘श’ मानैत छथि जे उचित नहि बुझाइत अछि। कारण जे एहि आकृतिक नीचाँमे जे अंश अछि से ‘श’ मे नहिं होएत (मिलाउ पहिल पंक्तिक श्री अक्षर)। संगहि व अक्षरक ऊपर अनुस्वार सेहो नहि छैक। तखनि ई अक्षर ‘ङ्ग’ अवश्य थीक। एहि अक्षर कें परमेश्वर झा वेसी नीक जकाँ चिन्हने छथि। तखनि ई चारू अक्षर ‘क्षत्रवङ्गाब्ज’ अथवा ‘क्षत्ररङ्गाब्ज’ पढल जेबाक चाही। ‘क्षत्रवङ्ग’ कें जँ कोनो स्थान मानी तँ इहो पाठ संगत भए सकैत अछि मुदा ‘क्षत्ररङ्गाब्जभानुना’ क अर्थ होएत क्षत्रियक रङ्गभूमि अर्थात् “युद्धभूमिमे फुलाएल कमल कें विकसित कएनिहार।” एहिसँ अर्थ निकालल जा सकैत अछि जे नान्यदेवक मन्त्री श्रीधर अप्रतिम योद्धा रहथि आ हुनक सहायतासँ नान्यदेवरूपी कमल विकसित भेल छल। संगहि श्रीधर स्वयं सेहो क्षत्रिय रहथि सेहो कोनो असंभव नहि, ओना एहि पाठमे स्पष्ट निर्देश नहि अछि। जँ सत्यनारायण झाक पाठ मानल जाए तँ हुनक क्षत्रिय होएबाक स्पष्ट निर्देश सेहो अछि। सभ प्रकारें ई शिलालेख नान्यदेवक आरम्भिक विजयक संकेत करैत अछि। ध्यातव्य जे कल्चरल हेरिटेज ऑफ मिथिलामे जयकान्त मिश्र सेहो “क्षत्रवंशाब्जभानुना” पाठ मानने छथि। आ तें ई स्पष्ट कहल जा सकैत अछि जे श्रीधर क्षत्रिय छलाह, कायस्थ नहि, आ ओ श्रीधरदाससँ भिन्न छलाह। संगहिं नान्यदेवक पहिल राजधानी अन्धराठाढीमे छल।

म.म. परमेश्वर झा अपन पाठ नवरङ्गाब्जभानुनाक आधार पर लिखैत छथि जे- “नान्य राजाक धीसचिव (देवान, मुन्तजिम मुल्क) बटुदासक बेटा श्रीधरदास नामक रङ्गवाली कायस्थ छलाह। ओ पूर्वमे वल्लाल सेनक भृत्य छलाह। वल्लालसेन के हुनका प्रसंग संशय भेलैन्ह जे पुत्र लक्ष्मणसेनसँ विरोध करावय चाहैत छथि, तें अपना ओहिठामसँ निकालि देलथीन्ह, तखन नान्य राजाक शरणमे अयलाह। हिनक स्थापित कमलादित्य नामक विष्णुमूर्ति अन्धराठाढी गाम प्रगन्ना जबदीमे छथि।“ (पृ. 103)

एतय कालक्रम निर्धारणमे नान्यदेवक सिमरौनगढक वास्तुसम्बन्धी शिलालेख उद्धृत करब प्रासंगिक होएत। म.म. परमेश्वर झा सेहो सिमरौन गढक एहि शिलालेखक पाठ एहि प्रकारें देने छथि-

नन्देन्दुबिन्दुविधुसम्मितशाकवर्षे

सच्छ्रावणे सितदले मुनिसिद्धितिथ्याम्

स्वा(ती)तौ शनैश्चरदिने करिवैरिलग्ने

श्रीनान्यदेवनृपतिर्व्यदधीत वास्तुम्।

एहि शिलालेखक अनुसार नान्यदेव शाके 1019 अर्थात् 1096 ई.मे सिमरौनगढक वास्तु लेलनि। एतए हुनका नृपति कहल गेल अछि मुदा अन्धराठाढीक विष्णुमूर्ति अभिलेखमे हुनका जेता कहल गेल अछि। नान्यदेव वंगालक दिससँ आएल छलाह जे स्पष्ट अछि तखनि इहो मानल जाएत जे ओ पूव देससँ मिथिलाकें जितैत सुदूर पश्चिंम पहुँचि सिमरौन गढमे अपनाकें राजा घोषित कएल आ राजधानीक लेल वास्तु लेलनि। अर्थात् सिरौनगढक वास्तु लेबाक घटनासँ पहिनहि अंधराठाढीमे ओ अपन जडि जमा चुकल छलाह। तें ई मानब अनुचित नहि जे 1096 सँ किछु पहिनहि एहि कमलादित्य स्थानक मूर्ति स्थापित भेल।

मिथिलातत्त्वविमर्शक पहिल संस्करण जे 1949 ई. मे श्रीहरिश्चन्द्र झा प्रकाशित कएलनि ओकर पाद-टिप्पणी सेहो एकटा भ्रान्ति उत्पन्न कएलक। ओहि पाद-टिप्पणीमे श्रीधरदासक परिचयमे कहल गेल जे ओ सूक्तिकर्णामृत (सदुक्तिकर्णामृत) नामक सुभाषित ग्रन्थक संकलन कर्ता थिकाह। सदुक्तिकर्णामृत ग्रन्थक पुष्पिकाक उल्लेख करैत ओतहि हुनक काल निर्धारण तँ कएल गेल मुदा ई ध्यान नहि देल गेल जे दूनू तिथिमे कतेक अंतर अछि। सदुक्तिकर्णामृतक पुष्पिकामे कहल गेल अछि-

शाके तु सप्तविंशत्यधिकशतोपेतदशशते शरदाम्।

श्रीमल्लक्ष्मणसेनक्षितिपस्य रसैकयुतकत्रिंशे।।

श्रीधरदासेनेदं सूक्ति(सदुक्ति) कर्णामृतं चक्रे।।

अर्थात् शाके 127+1000 अर्थात्1127 आ लक्ष्मण संवत् 37 मे श्रीधरदास सदुक्तिकर्णामृत बनाओल। इहो द्रष्टव्य थिक जे लक्षमणसेनक पिता वल्लालसेनक अद्भुतसागर ग्रन्थक आधार पर हुनक राज्यारोहण काल 1082 शाके थिक हुनक पुत्र लक्ष्मणसेनक द्वारा चलालोल संवतक 37म वर्षमे श्रीधर दास  सदुक्ति कर्णामृत लिखलनि जे सभटा नान्यदेवक कालक परवर्ती घटना थिक। नान्यदेवक सिमरौन गढक शिलालेखक तिथि शाके 1019 सँ ई तिथि 126 वर्षक बादक थिक। तें दूनू श्रीधर एके थिकाह से असम्भव अछि। आ 1019 शाके सँ पूर्वहि अन्धराठाढीमे सेहो ओएह श्रीधर कमलादित्य स्थानक मूर्ति स्थापित कएने हेताह से तँ आरो असम्भव अछि। तें सदुक्तिकर्णामृतकार श्रीधरदास आ अन्धराठाढीक श्रीधर दूनू भिन्न व्यक्ति थिकाह से निश्चय होइत अछि। संगहि श्रीधर कायस्थ रहथि से एतय कोनो उल्लेख नहि अछि।

तारामूर्ति अभिलेख

अंधराठाढी गामक सुखाएल सरखरा पोखरि मे भूतल सँ प्रायः 10 फीट नीचाँ जे.सी.बी. मशीन द्वारा माँटि काटल जेबाक क्रम मे दिनांक 11 फरवरी, 2016 कें ताराक एक मूर्ति भेटल जेकरा ग्रामीणलोकनि गामक प्राचीन दुर्गास्थान परिसरमे अवस्थित राधाकृष्ण मन्दिर मे रखलनि। 27× 20 इंचक एहि मूर्तिक पादपृष्ठ पर 7×15 इंच स्थान पर तीन पंक्तिक एक मूर्तिलेख अछि।

तारामूर्ति अभिलेख, अन्धराठाढी

एहि अभिलेखक लिपि मिथिलाक्षर अछि, जे लिपिक दृष्टि सँ नान्यदेवक कालक थिक। अंधराठाढ़ी सँ प्राप्त 1096 ईस्वीसँ किछु पहिलुक श्रीधरक अभिलेख सँ लिपि समान अछि। दूनू मे ‘भ’ अक्षर अपन प्राचीनतम रूपमे अछि, जे बादमे मिथिलाक्षरमे बदलि गेल अछि। एहि प्रकारें अभिलेखक काल 11-12म शतीक मानल जा सकैत अछि।

पाठ

  1. ओम् ये धर्म्मा हेतुप्रभवा हेतुं तेषां तथागतोह्यवदत्तेषां च यो
  2. निरोध एवं वादी महाश्रमणः।। देयधर्म्मोयं प्रवरमहा
  3. यान++[प्रका]रः प्रव+]र्त्त]नपुरराज्ये सुधाविहारे भगवते दत्तः।।

अनुवाद- जे कार्य कोनो कारणें होइत अछि ओ कारण तँ तथागतक द्वारा कहल गेल अछि। मुदा ओकरा रोकबाक उपाय जे अछि ओ महाश्रमण एवंप्रकारें कहलनि। ई कबुला प्रवर्त्तनपुर (?) राज्यमे सुधाविहारमे भगवान् महाश्रमण कें श्रेष्ठ महायानक अनुरूप देल गेल।

एहि अभिलेख मे प्रसिद्ध बौद्धमन्त्रक उल्लेख भेल अछि तथा मूर्ति पर दाहिना कात ध्यानी बुद्धक अंकन अछि। एहिसँ स्पष्ट अछि जे बौद्ध महायान मे पूजित ताराक ई मूर्ति थिक। ताराक एकटा रूप सनातन धर्ममे सेहो पूजित अछि, मुदा ओ शवासना तारा थिकीह। एतए महायानक ताराक रूप भेटैत अछि। मूर्ति देखलासँ ई प्रथम दृष्ट्या खदिरवनीक श्याम अथवा हरित ताराक रूप अछि।

एहि मूर्तिलेखमे दू स्थानसूचक शब्द प्रवर्तनपुर राज्य एवं सुधाविहारक उल्लेख भेल अछि। प्रवर्त्तनपुर कें आधुनिक पस्टनक संग जोड़ल जा सकैत अछि, जतए अवस्थित बौद्ध-स्तूपक अवशेष कें सुधाविहारक संग सम्बद्ध कएल जा सकैत अछि, किन्तु एकरा लेल अग्रेतर शोधक आवश्यकता छैक। जा धरि पस्टनक मुसहरनिया डीहक खुजाइ नहि होइत अछि आ ओतए सँ सुधाविहारक कोनो लिखित साक्ष्य उपस्थित नहिं होइत अछि ता धरि एकरा प्रामाणिक नहिं मानल जाएत। ई मात्र शोधक दिशाक संकेत करैत अछि।

एतए इहो संदेह भए सकैत अछि जे पस्टन सँ सरखरा पोखरि मे ई मूर्ति केना आएल? प्राचीन कालमे जखनि मूर्ति खण्डित भए जाइत छल तँ विधानपूर्वक ओकर विसर्जन करबाक परम्परा छल। विसर्जनक क्रममे शोभायात्रा निकालि ओकरा गाममे घुमाओल जाइत छल आ कोनो पोखरिमे जलप्रवाह कए देल जाइत छलैक।

परवर्ती कालमे विधर्मी आक्रान्तासँ मूर्ति कें बचयबाक लेल ओकरा पोखरिमे राखि देबाक काज सेहो कएल गेल अछि।

बौद्ध महायानक परम्परा रहल अछि जे कबुला पूर्ण भेला पर कोनो विहारक महाश्रमणक देखरेख मे मूर्ति बनाओल जाइत छल, ओहि मूर्तिक विशेष पूजा होइत छल। एहि पूजामे यजमान प्रचुर धनक संग ओहि पूजित प्रतिमाकें ओही विहारमे दान कए दैत छलाह। एकरा देयधर्म कहल गेल अछि। ई देयधर्म शब्द कुषाणकालहि सँ भेटैत अछि। महिषीक उग्रतारा स्थान सँ सेहो एहि प्रकारक एक खण्डित मूर्ति भेटल अछि।

कमलादित्यस्थान पर म.म. परमेश्वर झा कें एकटा लेख भेटल रहनि जकर उल्लेख ओ मिथिलातत्त्वविमर्श मे कएने छथि- “एकर एक स्तम्भमे “मगरधज जोगी 700” एतबा लेख अछि। एर्थात् मकरध्वज योगी, परन्तु सात सय 700 अङ्कक अभिप्राय स्पष्ट प्रतीत नहि भयसकैत अछि।“ ई स्तम्भ वर्तमानमे नहि भेटैत अछि। प्रायः नव निर्मित मन्दिरमे जे दूनू कात स्तम्भ लगा देल गेल अछि ताहिमे ओ दिवालक संग झँपाए गेल हो। परमेश्वर झा सेहो एतए बौद्धसंघक संकेत कएने छथि जे निराधार आ असंगत नहि अछि। एहन स्थान सभ बौद्ध महायानक साधना स्थल रहल अछि।

एहि प्रकारें स्पष्ट अछि जे अन्धराठाढी शिलालेखक आलोकमे सेहो महत्तवपूर्ण अछि। एहि ठामक लेख सभक संरक्षण होएबाक चाही। कमलादित्यस्थानमे किछु स्तम्भसभ ओंघराएल अछि ओकर उचित संरक्षण होएब आवश्यक। संगहि ओकर चारूकात कोनो कोडल नै जाए से सुनिश्चित करब आबश्यक। एकर दक्षिणमे जे हालहिमे मन्दिरक निर्माण भेल अछि ताहि क्रममे पुरातात्त्विक सामग्रीक न्ष्ट हएबाक संभावनाकें नकारल नै जा सकैत अछि।

Sarasvati Puja in Mithila Tradition

मैथिल साम्प्रदायिक सरस्वती पूजा-विधिः

संपादक पं. भवनाथ झा

[जे दीक्षा नेने छथि ओएह टा एहि विधिसँ पूजा करबाक अधिकारी छथि। ई पूजा विधि म.म. रुद्रधरक वर्षकृत्य आ पं. रमाकान्त ठाकुरक पौरोहित्यकर्मसारक आधार पर मैथिलीमे पूजानिर्देश कए बनाओल गेल अछि।]

पूर्व दिन निरामिष एकभुक्त कए प्रतिमा आदि पूजा-सामग्रीक संकलन करी।

पूजाक दिन अपन नित्यकर्म कए (सूर्यादिपंचदेवताक आ विष्णुक पूजा कए) कुश, तिल आ जल लए-

ॐ तत्सत् ॐ विष्णुः विष्णुः।

 संकल्प- ॐ अद्य माघे मकरार्के शुक्लपक्षे पञ्चम्यां तिथौ अमुकगोत्रस्य-अमुकशर्मणः सदारापत्यस्य अतुलविभूतिपुत्रपौत्रादिसद्विद्या- लाभपूर्वकसरस्वतीप्रीतिकामो लक्ष्म्याद्यङ्गदेवतापूजनपूर्वकसरस्वतीपूजन महङ्करिष्ये।।

प्रतिमा मे, घटक जलमे, शालग्राममे, फोटोमे अथवा आइनामे सरस्वती कें स्नान कराए।

सां एहि मन्त्र सँ मूर्तिमे आँखिक स्पर्श कए, आँखि दए तीन बेरि प्राणायाम करी।

मूर्तिक हृदय पर दहिना हाथ दए वामा हाथ सँ कच्छप-मुद्रा बनाए एहि मन्त्र सँ ध्यान करी। (एकर तात्पर्य जे कच्छप मुद्रा मे दहिना हाथ सँ पहिने स्पर्श केलाक बाद नीचाँ सँ वामा हाथ लगाए कच्छप मुद्रा बनाबी जाहिसँ दहिना हाथ ऊपर रहए।)

ॐ तरुण-शकलमिन्दोर्बिभ्रती शुभ्रक्रान्तिः।

कुचभर-नमिताङ्गी सन्निषण्णा सिताब्जे।

निजकर-कमलोद्यल्लेखनीपुस्तकश्रीः।

सकलविभवसिद्ध्यै पातु वाग्देवता नः।।

ध्यान कए प्राण-प्रतिष्ठा करी।

तेकुशा हाथ मे लए नीचाँ लिखल मन्त्र पढी।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या इह प्राणाः।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या इह प्राणाः।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या इह स्थितिः।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः इह श्री सरस्वतीदेव्याः सर्वेन्द्रियाणि।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या वाङ्मनः चक्षुः श्रोत्रघ्राणप्राणा इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।

ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमन्तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमन्दधातु विश्वेदेवास इह मादयन्तामोम् प्रतिष्ठ।। ॐ सरस्वतीदेवि! इहागच्छ इह सुप्रतिष्ठिता भव।।

ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च। 

अस्यै देवत्वसंख्यायै स्वाहा।।

देवीक हृदय पर हाथ धेने सां ई मूलमन्त्र तीन बेरि जप कए, देवीक शरीरक अङ्गन्यास आ करन्यास कए,

ऐँ एहि बीज सँ संनिरोधनी मुद्रा देखाबी आ सां एहि मूलमन्त्रसँ पुष्पाञ्जलि दी।

 कलश स्थापना

तखनि आसन पर बैसि कलश स्थापित करी। जल छीटि, बीचमे पूजा करी।

आवाहन- अक्षत लए, ॐ कलशाधारशक्ते इहागच्छ इह तिष्ठ।

जल- एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ कलशाधारशक्तये नमः।

श्रीखण्ड चानन- इदमनुलेपनं कलशाधारशक्तये नमः।

रक्तचानन- इदं रक्तचन्दनम् कलशाधारशक्तये नमः।

रोली- इदं कुङ्कुमं कलशाधारशक्तये नमः।

सिन्दूर- इदं सिन्दूरं कलशाधारशक्तये नमः।

अक्षत- इदमक्षतं कलशाधारशक्तये नमः।

फूल- एतानि पुष्पाणि कलशाधारशक्तये नमः।

नैवेद्य- एतानि नानाविधनैवेद्यानि कलशाधारशक्तये नमः।

आचमन- इदमाचमनीयं कलशाधारशक्तये नमः।

पुष्पाञ्जलि- एष पुष्पाञ्जलिः कलशाधारशक्तये नमः।

भूमिक स्पर्श कए,

ॐ भूरसि भूमिरसि अदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री।

पृथिवीं यच्छ पृथिवीं ह पृथ्वीं मा हिंसीः।

गायक गोबरसँ निपबाक मन्त्र- 

ॐ मानस्तोके तनये मानऽआयुषि मानो गोषु मानोऽअश्वेषुरीरिषः।

मानोव्वीरान् रुद्रभामिनोव्वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे।

गंगाजल छिटबाक मन्त्र-

वेद्या वेदिः समाप्यते बर्हिषा बर्हि इन्द्रियम्।

यूपेन यूपऽआप्यते प्रणीतोऽअग्निरग्निना।।

एकर बाद एहि पर पिठारसँ अष्टदल कमल बनाबी। कमलक बीच मे धान अथवा जौ राखी, तकर मन्त्र- धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।

खाली कलश रखबाक मन्त्र- ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्वन्दवः पुनुरूर्जा नि वर्तस्व सा नः सहस्त्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशाताद्रयिः।

कलश पर दही आ अक्षतक लेप करी। तकर मन्त्र-  ॐ दधिक्राव्णोऽअकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखाकरत्प्रण आयूंषि तारिषत्।

लोटासँ कलश में जल भरबाक मन्त्र- ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भ सज्र्जनीस्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद।

पंचरत्न- ॐसरत्नानि दाशुषे अरातिसहिता भगो भाग्यन्य तत्र मीमहे।

सप्तमृत्तिका- ॐ उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना। नमस्ते सर्वदेवानां प्रभुवारिणि सुव्रते।

सर्वौषधी- ॐ या ओषधीः पूर्व्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।

मनैनु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च।

श्रीखण्ड चानन-

ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।

ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्नये श्रियम्।

सुपारी-

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।

बृहस्पति प्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वं हसः।।

पंचपल्लव अथवा केवल आमक पल्लव-

ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मानयति कश्चनः।

ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकाम् काम्पीलवासिनीम्।

दूबि-

ॐ काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।

एवानो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च।

गंगाजल-

ॐ इमम्मे वरुण श्रुधीहवमदद्या च मृडय त्वामवस्युराचके।

गंगाद्याः सरितः सर्वाः समुद्राश्च सरांसि च।

सर्वे समुद्राः सरितः सरांसि दलदायकाः।

आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः।।

ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः, ता नऽऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे।

ॐ यो वः शिवतमो रसः, तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः।

ॐ तस्माऽअरंगमामवो, यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जन यथा च नः।

पानक पात- ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा। ॐव्यानाय स्वाहा।

पाइ- ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।

नारिकेर- ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पति प्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वं हसः।

वस्त्र- ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः।

कलशक कात अरवा चाउर भरल ढकना राखी- ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।

ओहि धान पर दीप राखी- ॐ अग्निर्ज्योतिः ज्योतिरग्निः स्वाहा। सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा। अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा। सूर्यो वर्चो ज्योतिः वर्चः स्वाहा। ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।

दही आ अक्षत लए कलशक स्पर्श करैत- ॐ मनोजूतिर्जुषता माज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह मादयन्तामों प्रतिष्ठ। कलशस्थितगणेशादिदेवता इह सुप्रतिष्ठिता भवन्तु।

ॐ कलशस्थितगणेशादिदेवताभ्यो नमः एहि मन्त्रसँ कलश पर पूजा करी।

इति कलशस्थापन विधि।

कलश स्थापित कए विघ्नापसारण करी। भूमि पर वामा पयरक एंडी तीन पटकि कए दए, तीन बेरि ताली बजाए, आँखि गुड़ाड़ि कए चारूकात देखि, ॐ फट् एहि मन्त्रसँ तीन बेरि ताली बजा कए दसो दिशा मे चुटकी बजाबी।

चानन आ फूलसँ हाथ कें शोधित कए नाराच मुद्रासँ ओकरा ईशानकोण में फेंकि आसन पर बैसी-

ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्माे देवता आसनोपवेशने विनियोगः।।

ॐपृथ्वि त्वया धृता लोकाः देवि त्वं विष्णुना धृता।

त्वं च धारय मां नित्यं पवित्रं कुरु चासनम्।।

ॐ आधारशक्तिकमलासनाय नमः।

एहि तरहें आसनक पूजा कए

ॐ अस्त्राय फट् ई मन्त्र पढ़ैत पूर्व अथवा उत्तरमुख बैसि

वाम भागमे- ॐ गुरुभ्यो नमः।

दहिन भागमे- ॐ गणेशाय नमः।

सोझाँमे- ॐ सरस्वत्यै नमः। एहि मन्त्रसँ एक एक फूल राखी।

तकर बाद ऋष्यादिन्यास करी-

बिचला तीन आँगुरसँ माथक स्पर्श करी- ॐ ब्रह्मणे ऋषये नमः।

बिचला तीन आँगुरसँ  मुखक स्पर्श करी- ॐ गायत्रीच्छन्दसे नमः।

बिचला तीन आँगुरसँ  हृदयक स्पर्श करी- ॐ ऐं सरस्वतीदेवतायै नमः।

तकर बाद ऐं एहि बीजमन्त्रसँ तीन बेरि प्राणायाम कए कराङ्गन्यास करी। यथा-

आं हृदयाय नमः।। बिचला तीन आँगुरसँ  हृदयक स्पर्श करी

ईं शिरसे स्वाहा। बिचला तीन आँगुरसँ  माथक स्पर्श करी

ॐ शिखायै वषट्। बिचला तीन आँगुरसँ  टीकक स्पर्श करी

ऐं कवचाय हुम्। दूनू हाथक बिचला तीन आँगुरसँ उलटा कए दूनू कान्हक स्पर्श करी। (दहिना हाथसँ वामा कान्ह आ वामा हाथसँ दहिना कान्ह।)

ॐ नेत्रत्रयाय वौषट्। अनामिका सँ वामा आँखि, मध्यमासँ भोंह आ तर्जनीसँ दहिना आँखिक स्पर्श करी।

अः अस्त्राय फट्।। दहिना हाथ कें पाँछा दिस सँ घुमाए वामा तरहत्थी पर बिचला तीन आँगुरसँ थपडी बजाबी।

एहि प्रकारें करन्यास कए यथाशक्ति प्राणायाम कए सामान्यार्घ स्थापित करी। अपन वामा कात मे रक्त चाननसँ त्रिकोण लीखि, फूल, अक्षत चाननसँ पूजा करी

ॐआधारशक्तये नमः। ॐअनन्ताय नमः। ॐकूर्माय नमः, ॐपृथिव्यै नमः।

एहि प्रकारें पूजा कए, ओतए शंखक बैसना राखि, फट् एहि मन्त्रसँ शंख कें ओहि बैसना पर स्थापित कए शंखक तीन भाग जलसँ भरि,

अंकुश मुद्रासँ-

ॐ गङ्गे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेस्मिन् संनिधिं कुरु।

तीर्थक आवाहन कए सां एहि मन्त्रसँ ओहि में चानन, पूल, अक्षत दए, धेनुमुद्रा देखा कए आठ बेरि सां जपि, ओहि जलसँ अपना कें आ आनो सामग्री कें सिक्त कए दी।

तखनि पंचोपचारसँ निम्नलिखित देवताक पूजा करी

सूर्य- भगवन् सूर्य इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते श्री सूर्याय नमः। इदमनुलेपनं भगवते श्री सूर्याय नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवते श्री सूर्याय नमः। इदं कुङ्कुमं भगवते श्री सूर्याय नमः। इदमक्षतं भगवते श्री सूर्याय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते श्री सूर्याय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्री सूर्याय नमः। इदमाचमनीयं भगवते श्री सूर्याय नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते श्री सूर्याय नमः।

विष्णु- भगवन् विष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते श्री विष्णवे नमः। इदमनुलेपनं भगवते श्री विष्णवे नमः। एते यवतिलाः भगवते श्रीविष्णवे नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते श्री विष्णवे नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्री विष्णवे नमः। इदमाचमनीयं भगवते श्री विष्णवे नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते श्री विष्णवे नमः।

शिव- भगवन् शिव इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते शिवाय नमः। इदमनुलेपनं भगवते शिवाय नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवते शिवाय नमः। इदं कुङ्कुमं भगवते शिवाय नमः। इदमक्षतं भगवते शिवाय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते शिवाय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्री शिवाय। इदमाचमनीयं भगवते शिवाय नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते शिवाय नमः।

दुर्गा- भगवति दुर्गे देवि इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदमनुलेपनं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदं कुङ्कुमं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदं सिन्दूरं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदमक्षतं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। एतानि पुष्पाणि भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदमाचमनीयं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः।

अग्नि- भगवन् अग्निदेव इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते अग्निदेवाय नमः। इदमनुलेपनं भगवते अग्निदेवाय नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। इदं कुङ्कुमं भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। इदमक्षतं भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः।इदमाचमनीयं भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। एष पुष्पा×जलिः भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः।

केशव- भगवन् श्रीकेशव इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते श्रीकेशवाय नमः। इदमनुलेपनं भगवते श्रीकेशवाय नमः। एते यव-तिलाः भगवते श्रीकेशवाय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते श्रीकेशवाय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्रीकेशवाय नमः। इदमाचमनीयं भगवते श्रीकेशवाय नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते श्रीकेशवाय नमः।

कौशिकी- भगवति कौशिकि देवि इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदमनुलेपनं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदं कुङ्कुमं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदं सिन्दूरं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदमक्षतं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। एतानि पुष्पाणि भगवत्यै कौशिक्यै नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदमाचमनीयं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवत्यै कौशिक्यै नमः।

आदित्यादिनवग्रह- आदित्यादिनवग्रहाः इहागच्छत इह तिष्ठत। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदमनुलेपनं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदं रक्तचन्दनम् आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदं कुङ्कुमं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदमक्षतं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। एतानि पुष्पाणि आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदमाचमनीयं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। एष पुष्पाञ्जलिः आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः।

इन्द्रादिशदिक्पाल- इन्द्रादिदशदिक्पालाः इहागच्छत इह तिष्ठत। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदमनुलेपनं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदं रक्तचन्दनम् ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदं कुङ्कुमं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदमक्षतं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। एतानि पुष्पाणि ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदमाचमनीयं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। एष पुष्पाञ्जलिः ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः।

तखनि लक्ष्मीक ध्यान करी-

ॐ पाशाक्षमालिकाम्भोज  शृणिभिर्याम्यसौम्ययोः।

प्रसनास्थां ध्यायेच्च श्रियं त्रैलोक्यमातरम्।

गौरवर्णां सुरूपाञ्च सर्वालङ्कारभूषिताम्।

रौक्मपद्मव्यग्रकरां वरदां दक्षिणेन तु।

ध्यान कए पाद्य आदि उपलब्ध वस्तुसँ ॐ लक्ष्मीदेव्यै नमः एहिसँ पूजा कए,

ॐ लक्ष्मीदेव्यै नमः ई दस बेरि जप करी।

ॐ नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये।

या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्त्वदच्र्चनात्।

एहिसँ पुष्पाञ्जलि दए स्तोत्र आदि पाठ कए लक्ष्मीकें प्रणाम करी।

सरस्वतीक पूजा

ध्यान- 

ॐ तरुणशकलमिन्दोर्बिभ्रती शुभ्रक्रान्तिः।

कुचभर-नमिताङ्गी सन्निषण्णा सिताब्जे।

निजकर-कमलोद्यल्लेखनीपुस्तकश्रीः। 

सकलविभवसिद्ध्यै पातु वाग्देवता नः।।

ध्यान कए अपन माथ पर एकटा फूल राखि मनहिं मन सरस्वतीक पूजा करी। तकर बाद,

ॐ ऐं भगवति सरस्वति स्वकीयगणसहिते इहागच्छ इहागच्छ, इह तिष्ठ, इह सन्निधेहि इह सन्निरुद्धा भव, अत्राधिष्ठानं कुरु, मम पूजां गृहाण स्थां स्थीं स्थिरा भव।।

एहिसँ आवाहन कए-

जल- इदं पाद्यम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

अघ्र्य- एषोर्घ्यः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः। (अरघा मे जल, चानन, अक्षत, दूबि, दूध, दही, कुषक अगिला भाग, पीरा सरिसब, तिल दए)

जल- इदमाचमनीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

जल- इदं स्नानीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः। 

जल- इदं पुनराचमनीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

वस्त्र- इदं शुक्लवस्त्रं बृहस्पतिदैवतम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

श्रीखण्ड चानन- इदमनुलेपनम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

सिन्दूर- इदं सिन्दूरम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

अबीर- इदम् अबीरकं ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

अक्षत- इदमक्षतम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

फूल- एतानि पुष्पाणि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

आमक मज्जर- इदम् आम्रमञ्जरीकं ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

माला- इदं माल्यम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

आभूषण- इदं भूषणम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

सौन्दर्य-प्रसाधन- एतानि नानाविधसौन्दर्यप्रसाधनानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

धूप- एष धूपः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

दीप- एष दीपः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

नैवेद्य- एतानि नानाविधनैवेद्यानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

फल- एतानि नानाविधफलानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

पकमान- एतानि नानाविधपक्वान्नानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

जल- इदमाचमनीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

फूल- ॐ पुष्पं मनोहरं दिव्य सुगन्धं देवनिर्मितम्।

हृद्यमद्भुतमाघ्रेयं देवि! तत् प्रतिगृह्यताम्।। एष पुष्पाञ्जलिः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः

एहि प्रकारें षोडशोपचारसँ सरस्वतीक पूजा करी।

तकर बाद पुस्तक पर- ॐ पुस्तकाय नमः एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

मोसिदानी पर ॐ मस्याधाराय नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

कलम पर ॐ लेखन्यै नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

चक्कू पर ॐ सर्वशस्त्रेभ्यो नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

ॐ अस्त्रेभ्यो नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

आरती कए पुष्पाञ्जलि दी

ॐ यथा न देवो भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।

त्वां परित्यज्यं सन्तिष्ठेत्तथा भव वरप्रदा।।

वेदाः पुराणशास्त्राणि नृत्यगीतादिकं च यत्।

न विहीनं त्वया देवि तथा मे सन्तु सिद्धयः।।

विशदकुसुमतुष्टा पुण्डरीकोपविष्टा धवलवसनवेशा मालतीबद्धकेशा।

शशधरकरवर्णा सुभ्रताटङ्ककर्णा जयति जितसमस्ता, भारती वेणुहस्ता।

पुष्पाञ्जलिक बाद प्रणाम करी

ॐ सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमोनमः।

वेदवेदान्तवेदाङ्गविद्यास्थानेभ्य एव च (स्वाहा)।।

एहिसँ प्रणाम कए प्रार्थना करी।

ॐ लक्ष्मीर्मेधा धरापुष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभा धृतिः।

एताभिः पाहि तनुभिरष्टाभिर्मां सरस्वति।।

रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भवगति! देहि मे।

धर्मान् देहि धनं देहि सर्वाविद्याः प्रदेहि मे।।

सा मे वसतु जिह्वायां वीणां पुस्तकधारिणी।

मुरारिवल्लभा देवि! सर्वशुक्ला सरस्वती।।

भद्रकाल्यै नमो नित्यं सरस्वत्यै नमो नमः।

वेदवेदान्त-वेदाङ्ग-विद्यां देहि नमोस्तु ते।।

एहिसँ प्रार्थना कए प्रणाम करी।

नाच-गान करैत दिन-राति बिताए, भोरे विसर्जन करी।

तखनि कुश, तिल आ जल लए-

ॐ कृतैतत्साङ्गसपरिवार सरस्वती-पूजनकर्म-प्रतिष्ठार्थमेतावद्द्रव्यमूल्यक- हिरण्यमग्निदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे ब्राह्मणकें दय दी।

।।इति सरस्वतीपूजाविधिः।।


शारदाशतनामस्तोत्रम्>>

Mithila Bharati, a research journal on Mithila vol. IV, 2017

Mithila Bharati
Bilingual Quarterly Research Referral Journal
Published by
Maithili Sahitya Sansthan
B-402, Shri Ram Kunja Apartment, Road No.-4,
Mahesh Nagar, P.O.- Keshri Nagar, Patna-800024.
Phone : 09430606724 & 09835884843
Email : blds412@gmail.com & skmishra2612@gmail.com
Web : www.maithilisahityasansthan.org
Editors
Dr. Shiva Kumar Mishra
Shri Bhairab Lal Das
© Maithili Sahitya Sansthan
Year : 2017
ISSN : 2349-834X

List of Contents] volume 4, 2017

  1. प्रोफसर उपेन्द्र ठाकुर: व्यक्तित्व ओ कृतित्व -शिव कुमार मिश्र
  2. प्रोफेसर उपेन्द्र ठाकुर सन दोसर होअए से असम्भव -पद्मश्री उषा किरण खान
  3. हमर बाबूजी स्व. उपेन्द्र ठाकुर -कल्पना झा
  4. हमर परम गुरू प्रोफेसर उपेन्द्र ठाकुर -मो. सईद आलम
  5. Publications and Other Academic Activities of Professor Upendra Thakur Shiva Kumar Mishra
  6.  मिथिलाक नऽव पुरातात्विक उपलब्धि शिवकुमार मिश्र
  7. मिथिलाक किछु पुरास्थलक भ्रमण विदेशी कलामर्मज्ञक संग -सुशान्त कुमार
  8. चन्दाझाक मिथिला – इतिहास ओ पुरातत्व चिन्तन -शंकरदेव झा
  9. मिथिलाक्षरक विकास- आचार्य परमानन्दन शास्त्री
  10. मधेशी आन्दोलन आ नेपालक राजनीतिः ऐतिहासिक सन्दर्भ -रत्नेश्वर मिश्र
  11. तमाकू: व्यापार, कृषि, लगान ओ रैयत (सरैसा परगना, तिरहुतक विशेष संदर्भमे) अवनीन्द्र कुमार झा
  12. वैद्यनाथधामक दण्डी बम- एक सामाजिक अध्ययन भैरव लाल दास
  13. A Newly Discovered Brahmå Image from Vaishali, Bihar Jalaj Kumar Tiwari
  14. Report on a Brief Tour of North Bihar (Mithilå), January 2017 Rob Linrothe
  15.  Art History of Mithilå : Some Observations Umesh Kumar Singh
  16. Mithilå in Dandi : Myth of Upahåra Varmå S.N. Arya
  17. Contributions of Maithila Scholars to the Formation of Gayå-shråddha Procedure: Focusing on Extra Offerings Called Shodashikarma  Tomoka MUSHIGA
  18.  Maithili and the Politics of Identity Sneha Jha
  19. Making Sense of a Quarrel: Lakshmishwar Singh and Rameshwar Sing of Darbhanga Raj Pankaj Kumar Jha
  1. पुस्तक समीक्षा
  2. A letter to Pt. Govind Jha from Dr. Ramawatar Yadav on a article published in Mithilå Bhåratë, Vol. 3
  3. पुरास्थलक सर्वेक्षण प्रतिवेदन
  4. मिथिला मैथिली
  5. मिथिला भारतीक नवांक मे पूर्व प्रकाशित आलेखक सूची
  6. चित्रावली

 

Esperanto for Sanskrit Part III

This is the Esperanto for Sanskrit language made and proposed by Pt. Govind Jha, the renowned linguist and Grammarian of Sanskrit and Maithili languages.

राष्ट्रभारती-व्याकरणम्

(Esperanto for Sanskrit)

Established and proposed by  Govind Jha

Esperanto for Sanskrit Part I

Esperanto for Sanskrit Part II


  1. स्वनाः – अआइईउऊएऐओऔऋ कखगघङ चछजझञ टठकडढण तथदधन पफबभम यरलव शषसह इति चतुश्चत्वारिंशत् स्वनाः। एषु विसर्गस्य स्थाने हकारो वा। नासिक्यानां स्थाने अनुस्वारः वैकल्पिकः, यथा पङ्कजम् चञ्चलम्, कण्ठम्, अन्तम्, इत्येतेषां स्थाने पंकजं, चंचलं, कंठं, अंतं, चंपकं इति यथाक्रमम् ऐच्छिकम्। ऋस्वरः संस्कृते द्विधा उच्चार्यते, ऱि सदृशः, रु सदृशो वा। ऋ एकमातृकः, रि सार्धैकमातृकः। तथा च प्रकृति इति त्रिमात्रिकः, प्रक्रम इति चतुर्मात्रिकः, संयोगे गुरुः इति नियमात्।
  2. सन्धिः – अत्र सन्धिः पदाभ्यन्तर एव। यथा प्रत्ययेन, उपसर्गेण, समासे पदान्तरेण च । स पंचविधः सवर्णदीर्घः, दीर्घस्य ह्रस्वता, स्वनलोपः, यकारागमः, वकारागमश्च। उदाहरणानि नामरूपावल्यां धातुरूपावल्यां च द्रष्टव्यानि।
  3. नामानि ( सुप् ) — अर्थवान् लघुतमः स्वनराशिः द्विविधः वस्तुवाचकः व्यापारवाचकश्च। प्रथमः नाम इत्युच्यते, द्वितीयः धातु इति। उभौ भाषायाः बीजम्। तस्य प्ररोहो भाषा। नामानि द्विविधानि मौलिकानि ( अव्युत्पन्नानि ) व्युत्पन्नानि च। व्युत्पन्नानि त्रिविधानि कृदन्तानि ( 8 द्र ), तद्धितान्तानि, समासाश्च ( 6 द्र )। नाम्नि त्रयो गुणाः कारकम्, लिंगम्, वचनं च।
  4. कारकम् — विभक्तियुक्तं नाम कारकम् इत्युच्यते। तस्य सप्त रूपाणि भवन्ति — (1) कर्तारि – विसर्गः, (2) कर्मणि –म्, (3) करणे -एन, (4) सम्प्रदाने –आय, (5) अपादाने –आत्, (6) सम्बन्धे –स्य (7) अधिकरणे –ए। यथा घटः, घटम्, घटेन, घटाय, घटात्, घटस्य, घटे।

 विभक्तियोजनात् पूर्वम् आधारः सरलीकरणीयः। यथा (क) यदि अन्ते व्यञ्जनं तदा अकारो योज्यः, यथा उपनिषद् इत्यस्य स्थाने उपनिषद। तस्य रूपाणि उपनिषदः, उपनिषदम्, उपनिषदेन इत्या. (ख) अवसाने ऋकारस्य स्थाने अर । यथा पितृ – पितर। पितरः, पितरम्, पितरेन। (ग) गो-शब्दस्य गाव आदेशः। (ग) नौ-शब्दस्य नाव आदेशः। (घ) एजन्तेषु व्यक्तिनामसु ककारो योज्यः, यथा चौबेकः, चौबेकम्।

कारकप्रत्ययेषु चत्वारः स्वरादयः —एन ( तृतीया ), -आय ( चतुर्थी ), आत् ( पंचमी ), – ( सप्तमी ) । एषु परेषु आधारस्य अन्त्यः अकारो लुप्यते, यथा घट एन घटेन, घट आत् घटात्, घट ए घटे। आधारस्य अन्ते आ इ ई स्वरः चेत्, यकारागमः, उ ऊ चेत् वकारागमः, पूर्वस्य स्वरस्य ह्रस्वता च। उदाहरणानि अघः सारिण्यां द्रष्टव्यानि।                   

  1. नामरूपावली

प्रथमा          द्वितीया        तृतीया       चतुर्थी         पंचमी        षष्ठी          सप्तमी

  • तटः              तटम्             तटेन          तटाय           तटात्         तटस्य       तटे
  • पितरः          पितरम्          पितरेन      पितराय       पितरात्       पितरस्य    पितरे
  • धाराः            धाराम्           धारायेन     धाराय,          धारात्,        धारास्य    धाराये
  • राजाः            राजाम्          राजायेन    राजाय           राजात्         राजास्य   राजाये
  • गिरिः            गिरिम्          गिरियेन    गिरियाय       गिरियात्      गिरिस्य  गिरिये
  • नदीः             नदीम्           नदियेन     नदियाय         नदियात्      नदीस्य   नदिये
  • धनीः            धनीम्           धनियेन    धनियाय         धनियात्     धनीस्य   धनिये
  • तरुः             तरुम्             तरुवेन      तरुवाय           तरुवात्       तरुस्य     तरुवे
  • भूः            भूम्                 भूवेन         भूवाय             भूवात्         भूस्य       भूवे
  • गावः        गावम्              गावेन         गावाय            गावात        गावस्य    गावे

नामवत् विशेषणे अपि विभक्तिः। यथा सुशीलः बालकः। ( 12 द्र)

  1. लिङ्गम् – लिङ्गं दैहिकम् ( सेक्स ), नतु शाब्दिकम् ( जेन्डर)। तत् पुरुषे स्त्रियां च। स्त्रीप्रत्ययः ईकारः सर्वत्र। यथा देव-देवी, मानव-मानवी, गाव-गावी, अज-अजी।

टि – गौः चरति इत्युक्ते न ज्ञायते गावो वा, गावी वा, उभयं वेति। अतः अस्य वाक्यस्य परिशुद्धोsनुवादो न हिन्द्यां न वा अंग्रेज्यां सम्भवति। यः चौर्यं करोति स दण्ड्यः इत्युक्ते नार्यः अदण्ड्याः प्रतीयन्ते। ईदृशीं भ्रान्तिं संशयं च निराकर्तुं न संस्कृतस्य व्याकरणं समर्थम्, न हिन्द्याः, नापि अंग्रेज्याः। यदि व्याकरणेन युगपत् उभयलिङ्गव्यञ्जनम् इष्टम् तदा कश्चित् संकेतः कल्प्यः।

  1. वचनम् (संख्या ) –वचनं नाम्न्येव। तद्बोधकः आदौ संख्यावाचकः शब्दः। यथा – एककविः, द्विकवि, बहुकवि संख्यावाचकाः – .
  •      एक,, द्वि, त्रि, चतुर, पञ्च, षट, सप्त, अष्ट, नव, दश,
  •      एकदश, द्विदश, त्रिदश, चतुर्दश, पञ्चदश, षटदश, सप्तदश, अष्टदश,   नवदश, विंश।
  •      एकविंश, द्विविंश, त्रिंश, चतुर्विंश पञ्चविंश, षट्विंश, सप्तविंश, अष्टविंश, नवविंश, त्रिंश ,
  •      एकत्रिंश तइत्यादि शत, सहस्र, अयुत, लक्ष, कोटि।
  •      एकचत्वारिंश, ….नवचत्वारिंश, पंचाश।
  •      एकपंचाश,…….. नवपंचाश, षष्टि।
  •      एकषष्टि, नवषष्टि, सप्तति
  •      एकसप्तति, ..नवसपतति, अशीति।
  •      एकाशीति, द्विअशीति, …….नवाशीति, नवति
  •      एकनवति, …..नवनवति, शतम्

1 .एक, 10 दश, 100 शत, 1000 सहस्र, 10,000 अयुत, 10,0000 लक्ष, 1000000 कोटि। अनुक्रमे -म सर्वत्र। यथा एकमः, द्विमः, त्रिमः इत्यादि। 2म, 3म इत्यादीनि च। आवृत्तौ –वारम्। एकवारम्, द्विवारम्। एकैकक्रमे –शः। एकशः, द्विशः।

 8 सर्वनाम — सर्वनामानि चतुर्विधानि – ( क ) पुरुषवाचकम् –- प्रथमपुरुषः म- , ;द्वितीयपुरुषः त्व- , तृतीयपुरुषः स- ( निकटे ), अस- ( दूरे ) । (ख) निर्देशवाचकम् – निर्देश्यम् -य. प्रतिनिर्देश्यम् – त- । (ग) प्रश्नवाचकम् – क- ।

सर्वेषां सर्वनाम्नां रूपाणि नामवत्। तद् यथा – मः ( अहम् ), मम् ( माम् ), मेन ( मया ), माय ( मह्यम् ), मात् ( मत् ), मस्य ( मम ), मे ( मयि ) इ.। सर्वनाममूलकाः अन्ये प्रत्ययाः अव्ययप्रकरणे द्रष्टव्याः।
9. तद्धितप्रत्ययाः – तद्धितप्रत्ययैः यौगिकानि नामानि सिध्यन्ति। संस्कृते केषुचित् प्रत्ययेषु परेषु आधारे आदिवृद्धिर्जायते। अस्यां सा यथासंभवं वर्जनीया। तद्धितप्रत्ययो द्विविधः, सम्बन्धवाचकः इकसंसारिक, समाजिक, इतिहासिक, ग्रामिक। भाववाचकः –त्व –- मधुरत्वम्, मनुष्यत्वम्, जलत्वम्, ममत्वम्।

10.समासः — द्वयोः पदायोः एकपदत्वं समासः। स त्रिविध एव। उत्तरपदप्रधानः तत्पुरुषः। यथा, राष्ट्रस्य पतिः राष्ट्रपतिः। अन्यपदार्थप्रधानः बहुव्रीहिः। यथा. लम्बोदरः। सर्वपदसमानो द्वन्द्वः। यथा, विद्याबुद्धिविवेकः। बहुपदो द्वन्द्व एव। तत्पुरुषः बहुव्रीहिश्च द्विपद एव। अव्ययीभावः अव्ययप्रकरणे द्रष्टव्यः।

11. धातवः – तृतीयकाण्डारम्भे उक्तं स्मर्तव्यम् – अर्थवान् लघुतमः स्वनराशिः द्विविधः वस्तुवाचकः, व्यापारवाचकश्च। प्रथमः नाम इत्युच्यते, द्वितीयः धातु इति। तत्र नाम्नो विवेचनम् उपरि कृतम्। धातो आरभ्यते। धातूनां रूपबाहुल्यं परिहर्तुं तेषु अधस्तनाः स्वनसंस्काराः कर्तव्याः

  • व्यञ्जनान्ते –                  पठ्+ति पठति,                          गम्+ ति गमति।      
  • आकारान्ते –                   याति यायति,                          पाति पायति,
  • इकार-ईकारयोः अय –        जिति    जयति,                       नीति नयति।
  • उकार-ऊकारयोः अव –       श्रु +ति श्रवति,                              भू + ति भवति।
  • ऋकारस्य अर                  कृति करति,                            सृति सरति।
  • ऐकारस्य आय –                 गैति गायति,                           ध्यैति ध्यायति।
  • ओकारस्य आव –               दोति दावति,                            सोति सावति।

इत्थम् राष्ट्रभारत्यां सर्व एव धातवः अकारान्ताः संवृत्ताः। तत्प्रसादात् अत्र सर्वेषां धातूनां सर्वाँणि रूपाणि एकविधानि जायन्ते। तथा हि

  1. धातुरूपावली

धातोः दशविधानि रूपाणि भवन्ति। तानि सर्वाणि कर- ( कृ ) धातौ अधः उदाहृयन्ते –

क. ज्ञापने – (1) वर्तमाने करति। (2) भूते करित। (3) भविष्ये करिसति।
ख. प्रेरणे – (4) आज्ञायाम् कर। (5) अनुज्ञायाम करतु। (6) अनुशंसायाम् करेतु। (7) सम्भावने आशङ्कने च करेत। (8) हेतुमति आदौ यदि, अन्ते वा चेत्। (9) इच्छायाम् करीसति इत्यादि।
ग. कर्मवाच्ये – (10) करीयति इत्यादि।

  1. बहुपदीयं क्रियापदम्

     आधुनिकासु अनेकासु भाषासु विविधेषु अर्थेषु नानाविधानि बहुपदानि आख्यातानि प्रयुज्यन्ते। तेषां प्रतिरूपाणि अस्यां भाषायां रचितानि अधः सारिण्यां द्रष्टव्यानि।

                      रूपाणि

  • वर्तमानसामान्यं   करता          करति
  • वर्तमान+वर्तमानं  करता है        करन्तः
  • असति       वर्तमान+भूतं     करता था करन्तः असित
  • वर्तमान+भविष्यं   करता होगा      करन्तः असिसति
  • भूत सामान्य         किया           करित
  • भूत+वर्तमानं     किया है         करितवन्तः असति
  • भूत+भूतं        किया था        करितवन्तः असित
  • भूत+भविष्यं     किया होगा      करितवन्तः असिसति
  • भविष्यसामान्यं   करेगा          करिसति
  • भविष्य+वर्तमानं   करनेवाला है     करिसन्तः असति
  • भविष्य+भूतं     करनेवाला था    करिसन्तः असित
  • भविष्ये+ भविष्यं  पढ़नेवाला होगा   करिसन्तः असिसति

टिप्पणी – लड़का पढ़ रहा है। उसे मत भेजो। अत्र रह धातुः संस्कृते नास्ति। तेन अस्य वाक्यस्य संस्कृते अनुवादः शब्दशः न शक्यः। भंग्यन्तरेण शक्यः यथा — पठन्तं बालकं मा प्रेषय। वह जो लड़का खेल रहा है उस से यह काम कराना चाहिये। अमुना क्रीड़ता बालकेन एतत् कार्यं साधनीयम्। जो दूसरा लड़का आने वाला है उसे यह पुस्तक देनी है। अमुष्मै आगमिष्यते अपराय छात्राय इदं पुस्तकं देयम्।

  1. कृदन्तानि नामानि — धातोः प्रत्ययेन योगे क्रियापदानि, नामानि, अव्ययानि च जायन्ते। तत्र नामसाधकः प्रत्ययः कृत् इत्युच्यते। अतो धातु जातानि नामानि कृदन्तानि । तानि कर-धातुम् आश्रित्य उदाहृयन्ते।

कालवाचकः– वर्तमाने (1) करन्त। भविष्यति (2) करिसन्त। भूते  (3) करित।
कालक्रमवाचकः — पूर्वकाले (4) करित्वा। उत्तरकाले (5) करितुम्।.
     कर्मवाचकः — विधेये (6) करितव्य, (7) करेय। अनुशंसायाम् (8)  करनीय।.
कर्तृवाचकः – (9) कारक, (10) करिता।
भाववाचकः – (11) करन, (12) कर, (14) कार।

अधस्तन्यां सारिण्याम् कृदन्तानि रूपाणि ऱाष्ट्रभारत्याः नियमान् अनुसृत्य प्रदर्शितानि। एषां पारम्परिकानि रूपाण्यपि तात्कालिकाय सौविध्याय ग्राह्यानि। यथा पठकः पाठको वा। करिता कर्ता वा, नयिता नेता वा।

सारिणी

  1. –अ        पाठ              याय               जय             श्रव                 -कर/ -कार
  2. -क         पाठक          यायक            जयक          श्रवक             कारक
  3. -त          पठित          यात               जयित         श्रवित             करित
  4. -तव्य     पठितव्य      यातव्य           जयितव्य    श्रवितव्य       करितव्य
  5. -ता         पठिता         याता              जयिता         श्रविता         करिता
  6. -तुम्       पठितुम्       यातुम्            जयितुम्      श्रवितुम्        करितुम्
  7. -त्वा       पठित्वा       यात्वा             जयित्वा      श्रवित्वा        करित्वा
  8. -न         पठन            यान               जयन          श्रवण             करण
  9. न्त         पठन्त           यान्त            जयन्त         श्रवन्त          करन्त

टि – अकारान्ते धातौ, -क प्रत्यये आदिवृद्धिः वैकल्पिकी। यथा पठकः पाठको वा।

  1. उपसर्गाः — उपसर्गाः अधोनिर्दिष्टेषु अर्थेषु यथेच्छं प्रयोज्याः, न तु धातुविशेषे एव। यथा
  • अति उत्कर्षे अतिक्रमणे च – मेधावी छात्रः गुरुम् अतिवर्तते
  • अधि ऊर्ध्वस्थितौ – अधिरोहति।
  • अनु सदृशाचरणे, पश्चाद्भावे च. – अनुगमति, अनुतपति, अनुवदति।
  • अप पृथग्भावे निन्दाया च – अपसरति. अपवदति।
  • अव अधोगतौ – अवतरति — अवगमति मर्मम्।
  • आभिमुख्ये- आगमति — आह्वयति।
  • उत् ऊर्ध्वगतौ अपसारणे च — उत्तिष्ठति,उत्खनति
  • नि प्रतिबन्धे – निग्रहः, निरोधः, नियन्त्रणम्।,
  • निस् अपसरणे – निःसरति, निर्गमति।
  • परा प्रतिवर्तने वैपरीत्ये च — परावर्तति, पराजयति।
  • प्र अग्रगतौ – प्रचरति, प्रवर्तते।
  • प्रति विपरीताचरणे – प्रत्यागमति, प्रतिकरोति
  • सम् साहित्ये – संगमति, संवसति।
  1. अव्ययम् – अव्ययं द्विविधम् मौलिकं यौगिकं च। मौलिकेषु राष्ट्रभारत्यां एतानि अव्ययानि अपेक्षितानि – च, तथा, सह, अपि, एव, तु, किन्तु, अपितु, अथवा, वा, यदि, चेत्, एवम्, तर्हि, न, मा, सकृत्, पुनः, मुहुः। एषाम् अर्थाः वाक्ये स्थानं च संस्कृतवत्। यौगिकं सर्वनामजम्। तत् पंचविधम्
    (क) कालवाचकम् — कदा, यदा, तदा, एकदा, सर्वदा।
    (ख) स्थानवाचकम् – अत्र,, यत्र,, तत्र, सर्वत्र।
    (ग) हेतुवाचकम् – कतः, यतः, ततः, अतः
    (घ) रीतिवाचकम् – कथा, यथा, तथा, सर्वथा।
    (ङ) अनिर्धारणे – चित्। कःचित, कं चित, केन चित।
  2. वाक्यम् — कारकान्वितायाः क्रियायाः वाचकं वाक्यम्। तत् द्विपदं बहुपदं च। तत्र पदं द्विविधम् विशेष्यं ( द्रव्यवाचकम् ), विशेषणं ( गुणवाचकम् ) च। वाक्ये पदानां अनुक्रमः ऐच्छिकः, किन्तु विशेष्यविशेषणयोः उद्देश्य विधेयभावे विधेयं सदा परम्। यथा एसः वटुः सुशीलः। ईदृशं वाक्यं क्रियापदं नापेक्षते। विशेष्यविशेषणयोर्मध्ये विशेषणद्वयमध्ये च पदान्तरेण व्यवधानं वर्जितम्।
  3. विशेषणम् — विशेषणं द्विविधम्, नामरूपम् अव्ययरूपं च। प्रथमं विशेष्यवद् विभक्तिं भजते, यथा शीतलः जलः, शीतले जले। यदा तत् क्रियां विशिनष्टि, तदा कर्म-कारकस्य विभक्तिं भजते। यथा मन्दं गमति, मधुरं भासति। विशेषणं पुनः प्रकारान्तरेण द्विविधम् नामजं सर्वनामजं च। प्रथमम् उक्तम्। द्वितीयम् अव्ययरूपम् अव्ययप्रकरणे द्रष्टव्यम्।

इति गोविन्दझाविरचितं राष्ट्रभारती-व्याकरणं समाप्तम्

(C) All rights are reserved : Govind Jha Contact for further help:   email: ptgovind.jha@gmail.com

excerpts from writer’s coming book Tripathaga

Esperanto for Sanskrit Part II

संस्कृतस्य सरलीकरणम्

(Esperanto for Sanskrit)

<<Esperanto for Sanskrit Part I

Proposed by Govind Jha

[अस्य साहसस्य प्रेरिका अभूत् मया चिरात् पोषिता कामना – संस्कृतं भारतस्य राष्ट्रभाषा भवेत् इति। अस्याः तदनुरूपं नाम राष्ट्रभारती इति समीचीनं प्रतिभाति। एवं सरलीकृता संस्कृतभाषा राष्ट्रभाषापदम् आरोढ़ुं समर्था भविष्यतीति मे विश्वासः।]

वयम् आत्मन आचारे विचारे व्यवहारे जीवनोपयोगिषु अन्येष्वपि बहुषु वस्तुषु च लक्षितान् दोषान् निराकृत्य अपेक्षितान् गुणांश्च आधाय तेषां परिष्करणे मुन्नयने च सततं प्रयतमानाः स्म। परन्तु भाषासु चिरात् प्रवर्तमानान् दोषान् पश्यन्तोSपि शिरसा वहन्तः तेषां निराकरणे अकारणं भीताः स्म। कस्यां कस्यां भाषायां के-के कीदृशाः कियन्तश्च दोषाः इति नाविदितम् भाषा-शास्त्रविदाम्। तथापि पतंजलिमारभ्यरभ्य चौम्सकीपर्यन्तं न कोपि भाषायाः परिष्कारं मनसापि अचिन्तयत।

तथा हि पतंजलिः– सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे …….। सत्यं शब्दः, अर्थः, तयोः सम्बन्धश्च लोकतः सिद्धः(नास्माभिः साध्यः)। भाषाया जन्मदाता संरक्षकः संस्कर्ता, परिपोषकश्च लोक एव। न तर्कः, नापि सौविध्यम्। संस्कृतभाषायाः धातवः, नामानि, प्रत्ययाः, उपसर्गाः निपाताश्चेति प़ञ्चापि उपादानानि लोकतः सिद्धानि। एषु सर्वेषु कालक्रमेण सम्प्राप्ताः दोषा अपि लोकतः सिद्धाः क्रमशो बहुलीभूताश्च।

भवन्तु नाम लोकसिद्धाः, दोषा हि सर्वत्र सदा त्याज्याः इत्यवधार्य विचारणीयं यत् पाणिनिमनुसरन्त्यां संस्कृतभाषायां के-के दोषाः कथं च ते निराकर्तुं शक्याः इति।

कारक-प्रत्ययाः परिमिताः, किन्तु तेषां रूपान्तराणि अपरिमितानि। इयमेव स्थितिः क्रिया-प्रत्ययानामपि। इत्थम् एकैकस्य प्रत्ययस्य नाना रूपान्तराणि भाषाया भारभूतानि। ईदृशानाम् अनपेक्षितानां रूपान्तराणां निरसनम् संस्कृत भाषायाः सरलीकरणस्य प्रथमा महती युक्तिः।

संस्कृते नाम्नां सप्त विभक्तयः, तासां विविधाः आधाराः, त्रिविधं लिंगम्, त्रिविधं वचनम्। अतः असंख्यानि नामरूपाणि। तथाहि तटशब्दः त्रिलिङ्गः। तस्य पुंलिङ्गे सप्त विभक्तय़ः। त्रीणि वचनानि। 7 × 3 = 21 रूपाणि। एवं नपुंसके1 स्त्रीलिङ्गे च 21 रूपाणि। फलतः 21 × 3 = 63 रूपाणि।

(नितान्तं विस्मयकराणि नपुंसके गवाञ्च् शब्दस्य रूपाणि यानि महावैयाकरणेन भट्टोजिदीक्षितेनसाकल्येनपरिगणितानि–

गवाक्शब्दस्य रूपाणिक्लीबेर्चागतिभेदतः

असन्थ्यवङ्-पूर्वरूपैः नवाधिकशतं (109) मतम्।)

वस्तुतः नाम्नां रूपाणि सप्तैव अपेक्षितानि। तथाहि वचनं नामगतम्। विभक्त्या तद्बोधनं पुनरुक्तिः। यथा त्रयः छात्राः क्रीड़न्तो दृश्यन्ते अत्र एकमेव बहुत्वं चतुर्धा उक्तम्। वस्तुतः एकः शब्दः त्रि इत्येव तद्बोधने समर्थः। एवं लिङगं नामगतम्, क्रियापदेन तद्बोधनं पुनरुक्तिः। संस्कृते वस्तुतः सप्तैव कारक- विभक्तयः।

ईदृश्येव स्थितिः धातुरूपाणामपि। तथाहि असंख्या धातवः। तेषां यौगिकाः ण्यन्त-सनन्त-यङन्ताः। विविधानि अवसानानि। नव गणाः। दश लकाराः। परस्मै पद-आत्मनेपदेति द्वे पदे। त्रयः पुरुषाः। त्रीणि वचनानि। त्रीणि वाच्यानि। एतानि सर्वाणि रूपभेदकराणि। अतः असंख्येयानि धातुरूपाणि। वस्तुतः धातुरूपाणि नवैव अपेक्षितानि। तथाहि वचनं कारकेषु, न कदापि व्यापारे। क्रियापदेनापि तस्य बोधनं पुनरुक्तिः। एवं पुरुषभेदः कारकगतः क्रियापदेनापि तद्बोधनं पुनरुक्तिः। इत्थम् धातूनां नवैव रूपाणि सप्रयोजनानि। ततोSधिकानि भाषाया भारभूतान्येव।
एवंविधं निरर्थकं रूपबाहुल्यं कथं दूरीकरणीयम् इति अधस्तने राष्ट्रभारती- व्याकरणे द्रष्टव्यम्।

टिप्पणी – संस्कृते एतादृशं रूपबाहुल्यं कथं सम्प्राप्तम् इत्यस्य उत्तरम् समाजशास्त्रे विशेषतः सामाजिके भाषाशास्त्रे लब्धुं शक्यम्। अत्र एतावदेव वक्तुम् अलं यत् इयं संस्कृतभाषा अतिप्राचीनानाम् इदानीं लुप्तानां विविधानां भाषाणां संम्मिश्रणेन उद्भूता। तथा हि ताभ्यो भाषाभ्यः एकतः –एन इति गृहीतम्, अन्यतः –ना इति। एकतः –ति ( पठति ), अन्यतः –ते ( वर्धते )। एवं धातवः -इ, -या, -गम् ; नामानि आपस् , पयस् , उदक , इत्यादीनि।

पूर्वोक्तानि अन्यानि च नानाविधानि निरर्थकानि भारभूतानि बाहुल्यानि वैविध्यानि च अपाकृत्य जीर्णां देववाणीं नवीनां लोकवाणीं विधातुं ममायं प्रयासः। परमपूतायां देववाण्याम् ईदृशेन हस्तक्षेपेण बहूनां नैष्ठिकानां कोपभाजनं भवेयम् इति जानन्नपि अस्याः संजीवनकामनया एतत् साहसं कर्तुम् उद्यतोSस्मि।

अस्य साहसस्य प्रेरिका अभूत् मया चिरात् पोषिता कामना – संस्कृतं भारतस्य राष्ट्रभाषा भवेत् इति। अस्याः तदनुरूपं नाम राष्ट्रभारती इति समीचीनं प्रतिभाति। एवं सरलीकृता संस्कृतभाषा राष्ट्रभाषापदम् आरोढ़ुं समर्था भविष्यतीति मे विश्वासः।

मम अपरा प्रेरिका अभवत् एस्परान्तो ( Esperanto ) नाम कृत्रिमा भाषा, या गते क्रीष्टशतके यूरोपे एस्परान्तो-नामकेन विदुषा तत्रत्याभ्यः प्राच्याभ्यः नव्याभ्यश्च भाषाभ्यः समानं सारम् उद्धृत्य एकाक्षरान् प्रत्ययांश्च प्रकल्प्य विरचिता क्रमशः राष्ट्रसंघेन अभिज्ञाता सती विद्वत्सु प्रसारं प्राप्तवती। किन्तु यूरोपीयं भाषासमुदायम् आश्रित्य विरचिता इयम् एस्परान्तो भारतवासिनां न तथा सुगम्या यथा यूरोपीयानाम्। अतोSहं संस्कृतस्य व्याकरणम्, अखिले भारते इदानीं प्रचलितान् विविधमूलकान् शब्दराशींश्च आश्रित्य अभिनवां सरलां भाषां स्रष्टुं प्रवृत्तोSस्मि।

किन्तु मम इयं सृष्टिः न तथा कृत्रिमा यथा एस्परान्तो भाषा। एतत् अधः सारिण्यां स्फुटं भविष्यति –

राष्ट्रभारती संस्कृतम् एस्परान्तो

कर्तरि     -विसर्गः/ ह विसर्गः                       -ओ
कर्मणि                -म       -अम्                    -न
करणे                  -न      -एन                  परसर्गाः
सम्प्रदाने               य      -आय                परसर्गाः
अपादाने               -त     -आत्                परसर्गाः
सम्बन्धे               -स     -स्य                  परसर्गाः
अधिकरणे            -ए     -ए                    परसर्गाः
वर्तमाने                -ति   -ति                     -अस्
भूते                      -त    -त (क्त)                  -इस्
भविष्ये                -स    -ष्य                      -ओस्

राष्ट्रभारत्यां प्रातिपदिकानि धातवश्च भारते विशेषेण उत्तरभारते विभिन्नेषु प्रदेशेषु प्रचलिताभ्यः विविधाभ्यो भाषाभ्यः गृहीताः अतः ते इदानीं प्रायेण अखिले भारते सुपरिचिता एव। संस्कृतं बहूनां भारतीयानां धर्मभाषा। ते हि इमां भाषां यथाकथंचित् यत्किंचित् अवश्यं जानन्ति। अस्यां नाम्नां धातूनां च बहवो विभक्तयः मनाक् परिष्कृत्य संस्कृतात् गृहीताः प्रायेण बहुजनपरिचिता एव अस्माकं देशे।

व्याकरणं भाषायाः इन्द्रियाणि, कोशः कायः। राष्ट्रभारत्याः इन्द्रियाणां परिष्कारः मया त्रिनवतितमे वयसि संक्षिप्तम् अधस्तनं व्याकरणं विरच्य कथंचित् कृतः। किन्तु कोषं चिन्तयतो मम मुखात् स्वतो निःसरति – उत्पत्स्यते मम तु कोपि समानधर्मा। तथापि तस्य उत्पत्स्यमानस्य मार्गदर्शनाय उच्यते किंचित्। पर्यायबाहुल्यं न केवलं भारभूतमेव, बहुधा भ्रान्तिकरमपि। भाषायाः त्रिविधा शैली भवति आलंकारिकी, शास्त्रीया व्यावहरिकी चेति। तत्र व्यावहारिक्यां पर्यायवाचिनः सर्वथा त्याज्याः। विविधासु भाषासु नवोद्भूतेषु अर्थेषु सृष्टाः शब्दाः स्वनतन्त्रं संस्कृतानुकूलं कृत्वा ग्राह्याः। अलम् अधिकेन।

Excerpt from writer’s coming book Tripathaga


Read next>>

Esperanto for Sanskrit Part I

राष्ट्रभारती

(Introduction to Esperanto for Sanskrit)

Govind Jha

Esperanto for Sanskrit Part II

Esperanto for Sanskrit Part III

क. वाक्यार्थबोधे मुख्यत्वविचारः

वाक्ये क्रियापदं प्रधानमिति वैयाकरणाः, कर्तृपदं प्रधानमति नैयायिकाः।

अनयोः कतरः पक्षः साधुरिति वाक्यलक्षणेंन निर्णेतुं शक्यम्। भर्तृहरिणा वाक्य- वाक्यपदीये वाक्यस्य अष्ट लक्षणानि प्रोक्तनि –

1. आख्यातशब्दः 2. संघातो 3. जातिः संघातवर्तिनी।

4. एकोनवयवः सङ्घः 5. क्रमो 6. बुद्ध्यनुसंहृतिः।।

7. आद्यं पदं पृथक् 8. सर्वं पदं साकाङ्क्षमित्यपि।

वाक्यं प्रति मतिर्भिन्ना बहुधा न्यायवादिनाम्।।

एषु प्रथमं लक्षणम् आख्यातशब्दो वाक्यमिति। आख्यातशब्दो नाम क्रियापदम्। तदेव वाक्यम्। अन्यानि सर्वाणि पदानि तस्य विशेषणानि। तथा हि देवदत्तः मध्याह्ने तालपत्रे न्यायसूत्राणि लिखतीति वाक्यस्य अन्वितोऽर्थः – देवदत्त कर्तृकः मध्याह्नकालिकः तालपत्राधिकरणकः न्यायसूत्रकर्मकः लेखनव्यापारः। अत्र लेखनव्यापारो मुख्यः, अन्ये सर्वे अर्थाः तस्य विशेषकाः। अयमेव वैयाकरणैः अनुसृतो मार्गः।

भर्तृहरिप्रोक्तं सप्तमं लक्षणम् आद्यं पदं वाक्यम् इति विशेषतो विवेच्यम्। वाग्व्यवहारे कर्तृवाचकस्यैव पदस्य आदो प्रयोगो दृश्यते अतोSत्र आद्यपदं कर्तृ- परम्। तथा च कर्तृवाचकं पदं वाक्यम्, अन्यानि सर्वाणि पदानि साक्षात् परम्परया वा तस्य विशेषणानि इति सप्तमस्य लक्षणस्य आशयः। इदं लक्षणं मूलतः पाणिनिना कृतस्य स्वतन्त्रः कर्ता इति लक्षणस्य अनुवादः। तदनुसार्येव प्रथमान्तार्थमुख्यविशेष्यकः शाब्दबोध इति  नैयायिकानां मतम्। एतन्मतानुसारम्  एव क्रियान्वयित्त्वं कारकत्वम् इति, कारकाणां क्रिययैवान्वयः इति च प्रसिद्धिः।

इत्थं निरूपितयोः पक्षयोः कतरो ग्राह्य इति विद्वांसः स्वयं निर्णेतुं समर्थाः। अहं मौनमेव श्रेयो मन्ये। तथापि विषयोपस्थापनमिषेण किंचत् उच्यते। स्वतन्त्रः कर्ता इति पाणिनिः। पदम् आद्यम् इति कात्यायनः। उभयोर्मतम् अखण्डनीयं विभावयन् अहम् मन्ये वाक्ये कर्ता विशेष्यः, अन्यानि सर्वाणि पदानि कर्तुः  विशेषणानि। आधुनिकेषु भाषाशास्त्रिषु केचित् वाक्यं एकशीर्षकम्, केचित् द्विशीर्षकम् केचिच्च त्रिशीर्षकम् आहुः। केचित् एकां क्रियामेव शीर्षं अवधारयन्तः वाक्यगतम् अन्यत् सर्वम् क्रिया-विशेषणम् मन्यन्ते।

अत्र इदमपि अवधेयं यत् वाक्यं क्रियापदहीनमपि भवति, यथा – अयम् आम्रतरुः, असौ पनसतरुः। यदि आख्यातशब्दो वाक्यम्, अत्र वाक्यत्वं नोपपद्यते। ईदृशे वाक्ये अस्तीति क्रियापदम् अध्याहार्यम् इति प्राच्या वैयाकरणाः। नव्यास्तु तत् नानुमन्यन्ते। अध्याहारो हि अन्यथा अनुपपत्तावेव भवति। नात्र सा प्रतीयते।

वाक्ये एकः पदार्थः उद्देश्यो ( निर्दिश्यमानः ) भवति, अपरः विधेयः ( प्रति निर्दिश्यमानः)। तथा हि देवदत्तः कस्य पुत्रः इति पृष्टो यदा भवदत्तस्य इति प्रतिवदति तदा उत्तरवाक्ये भवदत्तो विधेयो भवति, यदा तु को भवदत्तस्य पुत्र इति प्रश्ने देवदत्त इत्युत्तरम् तदा देवदत्तो विधेयो भवति। ईदृशे वाक्ये बोधस्य अयं तृतीयः प्रकारः प्रकरणात् व्यंग्यः, न वाच्यः। शब्दवाच्यः प्रथम एव, द्वितीयस्तु प्रथमार्थव्यङ्ग्यः अपरोऽर्थः इति वैयाकरणाः नैयायिकाश्च। परे तु व्यङ्यस्यापि अर्थस्य मूलतः शब्दगम्यत्वात् शाब्दबोधविषयत्वम् अव्याहतम्। अत्र पाश्चात्या विद्वांसस्तु विधेयतां बलाघातगम्याम् आहुः।

भर्तृहरिणा तु अस्य प्रश्नस्य समाधानम् अष्टमेन वाक्यलक्षणेन कृतम् – पदं सर्वम् इति। तथाहि वाक्यार्थान्तर्गतेषु पदार्थेषु यत्र-यत्र विधेयता तत्तद्वाचकं सर्वं पदम् पर्यायेण वाक्यम्।

अस्मिन् प्रसंगे किं नाम कारकम् इत्यपि विवेनीयम्। क्रियान्वयित्वं तत् इति चेत् सर्वेषां पदानां साक्षात् परम्परया वा क्रियान्वयित्वेन महती अतिव्याप्तिः। कारकाणां प्तत्वमपि अलीकं भवेत्। अतः कारकम् इति स्वादीनां सप्तानां विभक्तीनां संज्ञा इत्येव साधु प्रतिभाति।

– Excerpt for writer’s coming book Tripathaga


Read Next>>

Esperanto for Indian languages

Esperanto for decidedly Indic languages such as Sanskrit and Maithili would be most important. For Non-Maithili speakers it is generally a good idea to start with something very easy such as Esperanto or Interlingua for Maithili to get fast results and a general feeling for Maithili language, and to move on to a specific language such as literal Maithili after that.

The advantage of Esperanto for in this context is of course that you can find speakers everywhere, and the advantage of Interlingua is that you can easily communicate with the much larger number of Maithila as well as non-Maithila speakers.

Govind Jha, a renowned scholar of Maithili and Sanskrit grammar and a linguist has prepared Esperanto for two languages (i) Maithili and (2) Sanskrit.

Here we are publishing these guidelines and conceptions from his writings.


Read more>>

(C) Govind Jha

Contact writer for further development  email : ptgovind.jha@gmail.com

Proccess of Ashtadala Aripana in Mithila

मिथिलाक अष्टदल अरिपन

अरिपनक आवश्यकता
हमरालोकनि सभ केओ जनैत छी जे कोनो पूजामे मुख्य देवताक आवाहन एसकर नै होइत छनि। हुनक आवाहन अङ्ग देवता, अस्त्र-शस्त्र, वाहन एवं परिवारक संग होइत अछि। तें मन्त्रमे कहल जाइत अछि- साङ्गसायुधसवाहनसपरिवार।

एहि प्रकारें हुनक स्थानक चारूकात घेरि कए हुनक अंगदेवता अप्रत्यक्ष रूपमे अपन-अपन निर्धारित स्थान पर अपनहिं स्थापित भए जाइत छथि आ मुख्यदेवताक आवरण रूपमे चारूकात रहैत छथि। सभ अस्त्र-शस्त्र, परिवार देवता, परिजन, परिकर, वाहन सभक स्थान निर्धारित छैक, सभक संख्या सेहो प्रत्येक देवताक लेल निर्धारित छनि। एही कारणें पूजाक पटल (यन्त्र माने अरिपन) देल जाइत अछि।

अरिपनक स्वरूप
शास्त्रीय यन्त्रक कर्णिका, केशर, दल आ भूपुर ई चारि टा अंग होइत अछि। एकर अतिरिक्त मण्डल मे ई विभाजित रहैत अछि।
मिथिलाक अरिपन मूल रूपसँ यैह शास्त्रीय यन्त्र थीक, जाहिमे आब भूपुरक रेखांकन समाप्त भए चुकल अछि, मुदा एखनहुँ कर्णिका, केशर आ दल प्रत्यक्ष विद्यमान अछि। एहि तीनू टाक शुद्धता पर आइयो ध्यान राखब आवश्यक।
एतय शुद्धताक अर्थ ई जे कमसँ कम संख्याक पालन कएल जाए। टेढ-सोझ भए सकैत अछि, मुदा कर्णिकाक स्वरूप, केसरक संख्या आ दलक संख्या मे परिवर्तन नै होएबाक चाही। कारण जे मुख्यदेवताक परिजन आ परिकरक संख्या जखनि निर्धारित अछि तखनि ओहिमे कमी-वेशी कोनो प्रकारें उचित नै।
मिथिलामे देवीक पूजामे षट्दल आ पुरुषदेवताक पूजामे अष्टदलक प्रचलन अछि।

तैं सत्यनारायण भगवानक पूजामे अष्टदल देल जाइत अछि। एतबे नहिँ, महादेवक विशेष पूजामे, जेना रुद्राभिषेक आदि मे सेहो अष्टदलक निर्माण होएबाक चाही। एकर परम्परा मिथिलामे रहल अछि। गौरीशंकर, जमुथरिक महादेव आ हाजीपुरक गौरीशंकर आ आनोठाम महादेवक स्थापना अष्टदल पर भेल अछि। जँ घरोमे रुद्राभिषेक आदि विशेष पूजामे एकर व्यवहार कएल जाए तँ उत्तम।
अष्टदलक निर्माणक प्रथम चरणमे एकर कर्णिका सेहो आठकोण वला होएबाक चाही। एकर निर्माण विधि एना अछि। सभसँ पहिने चित्रानुसार एहन आकृति बनाबीः-

1st phase
1st phase

एकर बाद कर्णिका कें अष्टकोणीय बनबैत एक रेखा कें दोसरसँ मिलाबी जाहिसँ एहन आकृति बनि जाएत।

IInd phase
IInd phase

एकर बाद एकटा वृत्त बनाबी। एकरा लेल एक विन्दुसँ दोसर विन्दु कें मिलौला सँ बनि एना बनि जाएत।

Third phase
Third phase

तकर बाहर आठ टा दल बनाबी।

fourth phase
fourth phase

आब अरिपनक रेखांकन भए गेल। एहि मे कलाकारी भेल जे बीचक कर्णिका एहि प्रकारक देखाए।

Karnika
Karnika

अष्टदलमे एष्टकोणीय आ षट्दलमे षट्कोणक कर्णिका अनिवार्य अछि।
आब ध्यानसँ देखू जे कर्णिकाक बाहर दू चक्रमे आठ टा कें त्रिभुज बनि गेल अछि। ई दूनू आवरण थीक। एकरे केशर कहल जाइत अछि। दू आवरणमे केशर रहबाक चाही। तखनि ने भगवानक परिवार देवता आ परिजन देवताक लेल स्थान बनत। एको टा आवरण जँ छुटि जाएत तँ ओएह अशुद्धि भेल।
एकर बाद दू टा केशरक बीच जे स्थान अछि ओहिमे भगवानक अस्त्र-शस्त्र आ हुनक धारण करबाक वस्तु सभ लिखल जाएत। एकर अनेक परम्परा अछि। एतहि आबि अरिपन मे अंतर भए सकैत छैक। प्रत्येक देवताक लेल अलग अलग वस्तु रहैत अछि। एहिमे ध्यान राखी जे कोनो घर छुटए नै।
एहि प्रकारें शुद्धतापूर्वक अरिपन बनाबी। ई अरिपन देवताक संग हुनक अंगदेवता सभक स्थान होइत छनि।

पूजा करबाक लेल जे अरिपन देल जाएत ओहि मे कर्णिका पर दू टा पयर रहत। एहि दूनू पयरक अंगुरी सभ पूजा केनिहारक दिस रहबाक चाही। तखनि सम्मुख पूजा होएतैक। कल्पना करी जे भगवान् आगाँमे ठाढ छथि। तखनि हुनक पयरक अंगुरी पूजा केनिहार दिस रहबाक चाही।

प्राचीन कालमे एहि सभ दल पर मातृकावर्ण लिखल जाइत छल, मुदा आब ओ परम्परा समाप्त भए गेल अछि। शास्त्रीय ग्रन्थ सभमे आ स्थापित मूर्ति सभमे ई भेटैत अछि। जेना गौरीशंकरमे आठो टा दल पर अ सँ ह धरि अक्षर लिखल अछि।
पहिने मिथिलाक महिला एतेक पढलि-लिखलि रहथि जे अपनहिं सँ विधानपूर्वक यन्त्र बना लैत छलीह, मुदा बीचमे ई परम्परा विलुप्त भए गेल अछि। प्रसन्नताक विषय जे आब महिलालोकनि नीक पढल-लिखल छथि। हुनकासँ आशा जे परम्पराकें फेरसँ जगाबथि। कलाकारीक नाम पर एकर मूल रूपकें दूरि करबाक प्रवृत्ति उचित नै।
मिथिलामे गोसाउनिक सीर पर जे आरतक पात साटल जाइत अछि ओहि पर पहिने यन्त्र लिखल जाइत छल आ यन्त्रपूजाक विधान आ परम्परा छलैक। एहिना छठिक अर्घौती पर सेहो सूर्यक यन्त्र लिखाइत छल हैत से कल्पना कए सकैत छी। मुदा आब केबल कागज बचि गेल अछि। इहो जनबाक चाही जे पहिने तूरसँ कागज बनाओल जाइत छल। ओकरे घसाएल रूप आधुनिक आरतक पात थीक।