Miracle of Gems Therapy

MIRACLE OF GEMS THERAPY

14th SERIES OF OCCULT SCIENCE FOR THE MASSES
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Book cover
Price Rs. 250 including postal Charge.

Dr.  Binodanad Jha “Vishwabandhu”

B.COM (HONS) M.A.B.L MDEH HMM (HONS)

Astrologer, Gemologist, & Homoeopath

Publisher: Binodanad Research Centre for Vedic Astrology, Tantra & Art

Dr. B N JHA

ASHRAM, OCCULT HOUSE, WEST OF S.P’S BUNGLOW,

SRINAGARHATA, PURNIA, BIHAR, INDIA

(M) PH.9936595506 -09473129595./9504721777

Sri P. K. JHA  FLAT NO.-02,

TULSI VIHAR, PLOTNO. 55, SECTOR-19,  KHARGHAR,

NAVI MUMBAI-410210 (M) PH. 9869844756

SRI P, K JHA

STAFF Qr. NO. 3/2  NIFT,

PATNA 800001

Email:- bnjha1936@Yahoo.co.in

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First Edition – 200

JANUARY  2017

DONATION PRICE – Rs. 250/

FROM THIS BOOK-

Look at the hands of people around you in the 20th and 21st century. The miracle of gems has caught them. There are ‘scientific’ minded people who are ashamed to think that gems can have any effect on men.  Man is a product of osmosis of the physical and the mental. The body and the mind are equally part of our life. They inter penetrate each other. We cannot now restrict ourselves to the metrics of I.Q. We are compelled to admit E.Q. into the comprehensive understanding of human life.

Alankarasagara

Alankarasagara by Dinabandhu Jha

अलङ्कारसागर
लेखक- महावैयाकरण दीनबन्धु झा
सम्पादक- गोविन्द झा
ISBN 978-93-84394-27-1
प्रकाशन वर्ष- 2017
प्रकाशन- साहित्यिकी, सरिसब-पाही, मधुबनी, 847424

 

 

लेखक- महावैयाकरण दीनबन्धु झा

काशीमे व्याकरण, दर्शन आ काव्यशास्त्र पढ़ि गाम इसहपुरमे अपना घर पर चौपाड़ि चलाए दस वर्ष निःशुल्क विद्यादान कएल। पछाति लक्ष्मीवती विद्यालय, सरिसब मे तथा संस्कृत विद्यापीठ, दरभंगामे आजीवन अध्यापन कएल। करीब 16 ग्रन्थ लिखल। विशेष उल्लेख्य अछि- मैथिलीमे मिथिलाभाषाविद्योतन, मिथिलाकोष, आ अलंकार सागर तथा संस्कृतमे भूषणसार, लिङ्गवचनविचार, रसिकमनोरञ्जिनी, समासशक्तिदीपिका। सभ प्रकाशित-प्रशंसित। शतकपूर्तिक अवसर पर दीनबन्धु-स्मृतिग्रन्थ प्रकाशित भेल। 2004 ई.मे साहित्य अकादमी हिनक जीवनचरित प्रकाशित कएल। हिनक मिथिलाभाषाविद्योतन पर मैथिली-साहित्य-परिषद् हिनका महावैयाकरणक पदवी प्रदान कएल जे मानू हिनक दोसर नाम भए गेल। ई मैथिली कें सर्वप्रथम मानक स्वरूप देल जे आइ धरि चलि रहल अछि।

अलङ्कार सागर

मैथिली भाषाक व्याकरण एवं कोष लिखलाक बाद महावैयाकरण दीनबन्धु झा सर्वाङ्गीण भाषाशास्त्रक एक अंगक रूपमे अलङ्कार विषय पर अलङ्कारसागरक रचना आरम्भ कएल, जे हुनक मृत्युक कारणें अपूर्णे रहि गेल। एहिमे मात्र 25 गोट अलङ्कारक विवेचन भए सकल। एकर प्रथम प्रकाशन पं. गोविन्द झाक द्वारा उपलब्ध कराओल गेल प्रतिलिपिक आधार पर आचार्य रमानाथ झाक सम्पादनमे 1967 ई.मे ग्रन्थालय प्रकाशन, दरभंगा सँ भेल। किछु अंश ग्रन्थकारक उपसृष्टधात्वर्थसंग्रहक संग संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगासँ सेहो छपल। एकर बादो मूल पाण्डुलिपिक किछु अंश पं. शशिनाथ झाक संरक्षणमे छल जाहिमे अप्रकाशित 4 टा अलंकार भेटल। सभटा संग्रह कए एतए कुल 30 अलंकारक संकलन कएल गेल अछि। एकर अतिरिक्त ग्रन्थलेखनक क्रममे बनाओल गेल अलङ्कारसूची आ विभिन्न ग्रन्थमे ओकर सन्दर्भ अग्रेतर शोधकर्ताक लेल एतए देल गेल अछि।

एतए काव्यालङ्कारक मौलिक विवेचन पारम्परिक शाब्दबोध-शैलीमे कएल गेल अछि। संस्कृतक काव्यशास्त्रीय ग्रन्थकें उद्धृत करैत ग्रन्थकार मैथिली भाषाक प्रकृतिक अनुरूप अलङ्कारक विवेचन कएने छथि, तें मैथिलीक सन्दर्भमे शास्त्रक मौलिक उद्भावना भेल भेल अछि। एहि दुर्लभ ग्रन्थक पुनःसम्पादित स्वरूप एतए प्रस्तुत अछि।