Pandit Gananath Jha Rachanavali, edited by Prof. Yashodanath Jha

पुस्तक जे पढल

पण्डित गणनाथ झा रचनावली 

पुस्तकक नाम- पण्डित गणनाथ झा रचनावली सम्पादक- प्रो. यशोदानाथ झा  प्रकाशक- श्री यशोदानाथ झा, आनन्द कुटीर, पाहीटोल, पो. सरिसब-पाही, मधुबनी-847424 (बिहार)। प्रकाशन वर्ष- 2017 ई., प्राप्तिस्थान- उपरिवत्। मूल्य– 200.00. मुद्रक- एकेडमी प्रेस, 602, दारागंज, इलाहाबाद। पृष्ठ संख्या– 278।. सजिल्द।

कवि परिचय- मिथिलाक वर्तमान मधुबनी जिलाक अन्तर्गत सरिसब-पाही गाममे पलिवार महिसी मूलक श्रोत्रियवंशक पं. धरानाथझा कें पाँच गोट पुत्ररत्न भलथिन्ह (1) विन्ध्यनाथ झा (2) गणनाथ झा (3) डा. सर गंगानाथ झा (4) विजयनाथ झा (5) वैद्यनाथ झा। एहिमे गणनाथ झाक जन्म 1870 ई.मे भेल रहय। विस्तृत परिचय एहि ग्रन्थमे देल गेल अछि।

  • विवेच्य ग्रन्थमे म.म. डा. सर गंगानाथ झा द्वारा संकलित आ प्रकाशित गणनाथ-पदावली तथा विन्ध्यनाथ पदावली कें हुनक भूमिकाक संग अविकल रूपसँ संकलित कएल गेल अछि। एक पहिल प्रकाशन 1345 साल अर्थात् 1937 ई.मे भेल छल।
  • एकर अतिरिक्त गंगानाथ झा केन्द्रीय विद्यापीठ, इलाहाबाद मे पं. गणनाथ झाक किछु रचनाक मिथिलाक्षरमे हुनकहि हाथक लिखल पाण्डुलिपि सुरक्षित अछि। वर्तमान प्रकाशक डा. यशोदानाथ झा द्वारा संपादित ओहो रचना एतए संकलित कएल गेल अछि। संगहि वर्तमान प्रकाशक कें पं. गणनाथ झाक रचनाक खर्रा लेख अर्थात् रफ कापी प्रो. (डा.) विद्यानाथ मिश्रक सौजन्यसँ प्राप्त भेलनि, जे अत्यन्त जीर्ण भए गेल छल। ओहिमेसँ किछुए कविता उतारल जा सकल। ओकरो संपादित रूप एतए संकलित अछि।
  • संगहिं पं. गणनाथ झा द्वारा 1912 ई. मे मैथिली भाषामे अनूदित ऋग्वेद-संहिताक आरम्भिक भाग डा. यशादानाथ झाक संपादन मे जिज्ञासा पत्रिका, तन्त्रवती गीता भन, मैथिली शोध एकांश, राँटी, मधुबनी, अंक 1, जनवरी-जून-1995 .मे प्रकाशित भेल छल ओकरो संकलन एतए कएल गेल अछि।
  • एहिना पं. गणनाथ झाक श्यामा-रूपक एवं महाभारतक आदिपर्वक अनुवाद प्रथम बेर एतए संपादित आ प्रकाशित कएल गेल अछि। एकर अतिरिक्त किछु संबद्ध पत्र आ आलेख सेहो एतए संकलित अछि जे मिथिलाक तन्त्रसाधनाक वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश दैत अछि।

ई पुस्तक पं. गणनाथ झा तथा पं. विन्ध्यनाथ झाक प्रकाशित आ अप्रकाशित रचनासभक पूर्ण आ प्रामाणिक संस्करण थीक जकर श्रेय डा. यशोदानाथ झाकें छनि। आदिमे “स्थितधी गणनाथ” शीर्षकसँ एक डा. यशोदानाथ झाक विस्तृत आलेख अछि जाहिमे दूनू लेखकक व्यक्तित्व आ कृतित्व पर गम्भीर व्याख्यान अछि। एकर भाषाक लालित्य आ गाम्भीर्य आकर्षक अछि। हिन्दी मे हजारीप्रसाद द्विवेदीक शैली एतए मैथिलीमे हमरालोकनिकें भेटैत अछि।

एहिमे संकलित रचना सभक सूची एना अछि-

पण्डित गणनाथ झा

  • पदावली भाग
    • मैथिली पद- कुल 32 गीत जाहिमे देवीपद, समदाउनि, चैत, समदाउनि विजयदशमीक, भगवतीक, काशीमे श्रीताराक धातुविग्रह प्रतिमा अयलापर, श्रीक शयनक, वेरू पहर उठएबाक, सोहर, देशी, कलशस्थापन दिनुक, समदाउनि, लगनी, आसावरी सिन्दूरा गीतक संकलन अछि।
    • मैथिली तथा हिन्दी- एहि अंशमे देव देवी पद, होरी, रसिया, पहाडी आदि रागक गीत संकलित अछि, जाहिमे श्रीराम, शिव, देवी आदिक विनती संकलित अछि।
    • मैथिली शृंगार गीत- एहिमे लगनी एवं तिरहुत रागमे 13 गोट गीत अछि।
    • हिन्दी- एहिमे भगवती एवं श्रीकृष्णक कुल 40 गीतक संकलन अछि जकर अंतिम गीतमे कवि अपन माता-पिताक नामोल्लेख करैत छथि।
    • गणनाथ झाक खर्रा कापीसँ उतार गेल 3 पद, जाहिमे तेसर खण्डित अछि।
  • महाभारत आदिपर्वक मैथिली गद्यानुवाद- 1907 ई. मे कएल गेल छल। एहिमे 20म शतीक आदिमे मैथिलीगद्यक स्वरूप स्पष्ट होइत अछि।
  • ऋग्वेद-संहिताक मिथिलाभाषामध्य अनुवाद- 1912 ई.सँ आरम्भ भएल छल। एहिमे प्रथम मण्डलक 22 सूक्त धरि गद्यानुवाद अछि। एहिमे 20म शतीक आदिमे मैथिलीगद्यक स्वरूप स्पष्ट होइत अछि।
  • श्यामारूपक (ईहामृग)
  • शिवपार्वती नाटिका- एकर प्रथम प्रकाशन श्रीमती आद्याझाक संपादनमे हिन्दी प्रचार पुस्तकालय वाराणसीसँ 1959 ई.मे भेल छल।
  • डा. सर गंगानाथ झा प्रसन्नराघव नाटकक भावबोधिनी व्याख्या लिखने छथि, जाहिमे वैयाकरणप्रवर श्रीयदुनन्दन शर्मा टीकाकारक वंश परिचय संस्कृत 36 टा श्लोकमे लिखने छथि। ई अश मूल रूपमे एतए संकलित कएल गेल अछि।

विन्ध्यनाथ झा

  • हिनक कुल 17 पद संकलित अछि।

ई सन्दर्भ-पुस्तक थीक, जे संकलनीय आ पठनीय अछि।

पुस्तक-प्राप्तिक लेल प्रो.. यशोदानाथ झासँ सम्पर्क कए जा सकैत अछि।

Simaria and Chamtha Ghat in Begusarai District: A Religious Annotation

मिथिला की गंगा के तट का माहात्म्य, चौमथ घाट एवं सिमरिया के सन्दर्भ में

भवनाथ झा

(यह आलेख 2016 ई. में बेगूसराय, संग्रहालय के वार्षिकोत्सव के अवसर पर पढ़ा गया है)

हाल के कुछ वर्षों में पाण्डुलिपियों के अध्ययन एवं प्रकाशन के क्रम में इन पंक्तियों के लेखक को  रुद्रयामल तन्त्र के एक अंश के नाम पर परवर्ती काल में लिखी दो रचनाएँ मिलीं हैं, जिनमें मिथिला के इतिहास एवं भूगोल पर कुछ सामग्री है। 

एक रचना रुद्रयामलसारोद्धारे तीर्थविधिः के नाम से है जिसका प्रकाशन मैथिली साहित्य संस्थान की शोधपत्रिका मिथिला भारती के नवांक 1 में हुआ है। इसमें कुल 98 श्लोक हैं। इसमें अधिकांश वर्णन मिथिला से बाहर के तीर्थों काशी प्रयाग, गंगा-सरयू संगम क्षेत्र आदि का है, किन्तु घटना चक्र के केन्द्र में मिथिला का गंगातट है, जो बेगूसराय जिला में अवस्थित चमथा घाट है।

ध्यातव्य है कि यह प्रक्षिप्त अंश है, क्योंकि रुद्रयामल तन्त्र की रचना कम से कम 10वीं शती से पहले हो चुकी है। एसियाटिक सोसायटी में ब्रह्मयामल तन्त्र की एक पाण्डुलिपि 1052 ई. में प्रतिलिपि की गयी उपलब्ध है,  जिसमें रुद्रयामल तन्त्र उल्लेख हुआ है। अतः हाल में रुद्रयामल के नाम पर जो तीन अंश उपलब्ध हुए हैं, उनमें से कोई भी अंश आन्तरिक साक्ष्यों के आधार पर 12वीं शती से प्राचीन नहीं हो सकता, अतः इन्हें ऐतिहासिक दृष्टि से परवर्ती प्रक्षेप ही माना जायेगा, जिसकी रचना किसी क्षेत्रीय विद्वान् के द्वारा की गयी है, फलतः इन अंशों में जो भी उल्लेख है वह स्थानीय इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण है।

रुद्रयामलसारोद्धारे तीर्थविधिः के अनुसार पाण्डवग्राम (वर्तमान समस्तीपुर जिला का पाँड गाँव) का एक व्यापारी सुधामा तीर्थाटन करना चाहता है वह अपने गुरु से पूछता है कि मुझे शास्त्र के अनुसार कहाँ कहाँ कैसे तीर्थाटन करना चाहिए। इस प्रश्न पर गुरु उसे तीर्थविधि का उपदेश करते हुए कहते हैं कि अपने घर के सबसे निकट में जो मन्दिर हो वहाँ पहले दर्शन करें फिर अपने गाँव के निकटवर्ती किसी महानदी के तट पर जाकर तीन रात्रि बितावें। इसके बाद हर प्रकार से पवित्र होकर वहाँ से अन्य तीर्थों के लिए यात्रा प्रारम्भ करें।

इस अंश में पाण्डवग्राम से निकटवर्ती गंगातट का स्थान निरूपित करते हुए गुरु उपदेश करते हैं कि गंगा के किनारे एक शेमलग्राम है, जो शाल्मली यानी सेमल के वन के बीच है, वहाँ चतुर्मठ तीर्थ है। हर प्रकार से पवित्र इस तीर्थ पर जाकर तुम तीन रात्रि गंगातट का सेवन करो तब आगे की यात्रा पर निकलोगे। इस उपदेश पर गुरु चतुर्मठ तीर्थ की स्थापना के बारे में कहते हैं कि पूर्व में विदेह के किसी राजा ने भी यहाँ से तीर्थयात्रा आरम्भ की थी। वे जब यहाँ पहुँचे तब इस शेमलग्राम में घनघोर जंगल था, जिसमें ऋषि-मुनि तपस्या कर रहे थे और गंगा का निर्मल तट बहुत सुन्दर था। राजा को यह सब बहुत अच्छा लगा तो उन्होंने यहाँतक पहुँचने का मार्ग बनवाया, चार मठों का निर्माण कराया और तीर्थ पुरोहितों को बसाया। 

फिर यहाँ के तपस्वियों के साथ धार्मिक चर्चा करते हुए इसी घाट पर तीन रात्रि विताकर नाव से काशी की ओर निकल गये। गंगा और सरयू के जलमार्ग से यात्रा कर वे पुनः अपने देश लौटने के लिए इसी घाट पर उतरे। 

राजा जब यहाँ पहुँचे तो एक घटना घट गयी। लोगों से निकटवर्ती गाँव में तुर्कों के द्वारा लूट-पाट का समाचार सुना। राजा थके हुए थे, साथ में सेना भी अधिक नहीं थी, अतः वे चिन्तित हो गये। उऩकी चिन्ता देखकर ऋषि-मुनियों ने कहा कि यह शाल्मलीवन परम पवित्र है, यहाँ जो भी दुष्ट आते हैं वे भगवान् विष्णु की माया से वन में भटककर नष्ट हो जाते हैं। अतः वे तुर्क लोग भी अपने आप नष्ट हो जायेंगे। आपको चिन्ता की कोई आवश्यकता नहीं है। 

राजा के द्वारा पुनः इस वन के सम्बन्ध में जिज्ञासा करने पर ऋषि-मुनि बतलाते हैं कि यह वही स्थान है जहाँ समुद्रमन्थन के बाद देवताओं ने पंक्ति में बैठकर अमृत पीया था। इस तीर्थ की महिमा स्वयं भगवान् शंकर ने कही है। रुद्रयामलसारोद्धार के इस अंश में अमृतपान का केवल संकेत है।

यह संकेतित अंश हमें रुद्रयामलोक्तामृतीकरणप्रयोग नामक लघु रचना में उपलब्ध होता है, जिसका प्रकाशन 2011 ई. में डा. विद्येश्वर झा एवं डा. श्रवण कुमार चौधरी के सम्पादन में हिन्दी अनुवाद के साथ दरभंगा में हुआ है।

यह भी तीर्थयात्राविधि के समान ही परवर्ती रचना है। किन्तु इस अंश के आन्तरिक साक्ष्य के आधार पर इसका रचनाकाल 12वीं से 15वीं शती  के बीच माना जा सकता है। इस अंश में भी भयंकर आक्रान्ताओं के द्वारा बलपूर्वक लोगों को दास बनाने का उल्लेख हुआ है। लेकिन यह तीर्थयात्रा विधि से कुछ प्राचीन प्रतीत होता है। क्योंकि गंगातट के जिस स्थान पर अमृतीकरण प्रयोग में केवल सघन वन की चर्चा है वहाँ तीर्थविधि में चार मन्दिरों की स्थापना, सडक-निर्माण आदि का भी उल्लेख है जो परवर्ती विकास है। इतना तो निश्चित ही है कि महाकवि विद्यापति से पहले ही चौमथ घाट का धार्मिक महत्त्व स्थापित था, अतः वे गंगालाभ के लिए यहीं आ रहे थे किन्तु मार्ग में ही उनका देहावसान हो गया, जो स्थान विद्यापति नगर के रूप में चमथा घाट से उत्तर है।

अमृतीकरणप्रयोग में विशेष रूप से समुद्रमन्थन की कथा आयी है। कथा के अनुसार मन्दार पर्वत के पास जब मन्थन से अमृत का घडा निकला तब दैत्यों के राजा बलि उसे झपट कर भाग गया और अपनी राजधानी बलिग्राम (वर्तमान बलिया) जाने के लिए पश्चिम की ओर चला। दैत्य लोग हल्ला करते हुए निकले। देवता भी उन्हें खदेडने लगे। इसी क्रम में बलि ने गंगा के उत्तरी तट से होकर भागने का प्रयास किया, किन्तु यहाँ शाल्मलीवन में आकर भटक गया। उसके साथ चल रहे सभी दैत्य आपस में झगडने लगे कि रात में ही हमलोग अमृत बाँटकर पी लेते हैं। इसी समय भगवान् विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर वहाँ पहुँचे तो सारे दैत्य उस रूप पर मोहित हो गये और अमृत पिलाने के लिए मोहिनी को ही आग्रह करने लगे। मोहिनी ने कहा कि यह अमृत है, रात्रि में इसे पीने के बजाय कल प्रातःकाल गंगा में स्नान आदि करके पीना बेहतर रहेगा। सारे दैत्य उनकी बात मान गये। रात में बलि ने वहीं ठहरने की व्यवस्था की। प्रातःकाल जबतक दैत्य लोग स्नान कर तैयार होते तब तक सभी देवता भी वहाँ पहुँच गये। इसपर मोहिनी ने बलि से कहा कि गृहस्थों का कर्तव्य है कि आये हुए अतिथि को भोजन कराने के बाद ही स्वयं भोजन करे। अतः इन देवताओं को सबसे पहले बैठाना चाहिए। मोहिनी के रूप से मोहित दैत्यों ने इसे भी स्वीकार कर लिया। योजनानुसार सभी देवता गंगा के तट पर पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये। उनकी पंक्ति हिमालय तक पहुँच गयी। इससे उत्तर बलि एवं दैत्य गण बैठे।फिर अमृत बाँटने तथा राहु के द्वारा छल करने की कथा जो हर जगह है वहीं यहाँ भी कही गयी है। अंतर इतना है कि राहु का सिर काटने के बाद जब दैत्यों ने फिर विष्णु से अमृत घट छीनने का प्रयास किया तो उन्होंने इसी शाल्मलीतीर्थ में खाली घडा फेंक दिया। घडा में जितना अंश अमृत का लगा हुआ था उससे यहाँ की गंगा अमृतमयी हो गयी और तीर्थ महिमामण्डित हो गया।

इस कथा के अनुसार अमृत का बँटवारा उसी स्थान पर हुआ था, जहाँ बाद में मिथिला के राजा ने चतुर्मठ तीर्थ की स्थापना की। वहाँ चार मन्दिरों के निर्माण का उल्लेख है।

इस प्रकार रुद्रयामल के स्थानीय परवर्ती प्रक्षेप के आधार पर ऐतिहासिक दृष्टि से चमथा घाट का महत्त्व स्पष्ट होता है।

तस्माच्छेमलग्रामं       जाह्नवीतीरसंस्थितम्।

शाल्मलीवनसंच्छन्नं  मुनिभिः सेवितं शुभम्।।26।।

वैदेहकैः  सदा(सेव्यं गन्त)व्यं    प्रथमं   त्वया।

स्थाण्वीश्वरं शिवं नत्वा गच्छ गंगातटं प्रति।।27।।

     सुधामोवाच

सुर(म्यः सेमल)ग्रामः सुरम्यं   जाह्नवीतटम्।

रम्या  सरिद्वरा तत्र धर्मस्तिष्ठति  देहवान्।।28।।

केनेदं  निर्मितं  तीर्थं  केनेदं  ख्यापितं भुवि।

तत्सर्वं  श्रोतुमिच्छामि  पुरावृत्तं  शुभप्रदम्।।29।।

गुरुरुवाच

कश्चिद्  वैदेहको  राजा  प्रजापालनतत्परः।

धर्मिष्ठः साधुशीलश्च  बभूव भुवि विश्रुतः।।30।।

वार्द्धक्ये ज्येष्ठपुत्राय राज्यं दत्वा  विधानतः।

गन्तुं तीर्थानि भूयांसि  मुक्तिक्षेत्राणि भूतले।।31।।

स   च  विप्रं  पुराणज्ञं   धर्मकर्मबहुश्रुतम्।

कृत्वा सहायं  प्रययौ  तीर्थानि  सपरिच्छदः।।32।।

शाल्मली  तरुसंच्छन्ने  स्नानार्थं  समुपागतः।

दृष्ट्वाश्रमान् मुनीनां तु  रेमे स मन्त्रिभिः सह।।33।

त्रिरात्रं  संव्यतीयाय  तत्र  कृत्वा निजाश्रमम्।

तेन मार्गाश्च  कृताः तीर्थिकाश्च प्रतिष्ठिताः।।34।।

तस्माच्छेमलग्रा(मो) भूतले        सुप्रतिष्ठितः।

चत्वारो   मठास्तत्र   राज्ञा  निर्मिताः शुभाः।।35।।

…………………………………………………..

संप्राप्य   शेमलग्रामं   परं  मुदमवाप  सः।

वीक्ष्य हर्षान्विताः सर्वे तीर्थिकाः समुपागतम्।।60।।

मंगलानि   समाचक्रुः  स्वस्तिवाचनतत्पराः।

राजा स्वदेशं सम्प्राप्य स्वस्थोऽभूद् विनयान्वितः।।61।।

तस्मिन्नेव  क्षणे  दिक्षु  भयार्तानां भयंकरः।

सम्मर्दः  प्रथितस्तत्र   जनानां शोककारकः।।62।।

सर्वे  विस्मयं  जग्मुः श्रुत्वा कोलाहलं परम्।

किमभूदिति  संज्ञातुं  भेजिरे धावकाः दिशः।।63।।

ते  चागत्य  तुरुष्कानां लुण्ठकानां भयंकरम्।

वृत्तान्तं        कथयामासुर्जनसंहारकारकम्।।64।।

तीर्थयात्राश्रमक्लान्तो  राजाभूदति  दुःखितः।

शस्त्रास्त्ररहिताः  सर्वे  हताशाः ग्लानिमादधुः।।65।।

दृष्ट्वा  भीतं   नृपं  प्राहुर्मुनयस्ते तपोधना।

शोकं मा कृथाः  राजन्  धैर्यं धेहि महामते।।66।।

यास्यन्ति संक्षयं शीघ्रं तुरुष्काः धनलुण्ठकाः।

आगमिष्यन्ति   ते  शीघ्रमत्रैव  सपरिच्छदाः।।67।।

अस्य तीर्थ  प्रभावेण सर्वे यास्यन्ति संक्षयम्।

शाल्मलीवृक्षसंच्छन्ने भ्रान्ताः यास्यन्ति निर्बलाः।।68।।

विष्णोर्माया  भगवती  यया संमोहितं जगत्।

मोहयिष्यति  तान्  पापानत्रैव  शाल्मलीवने।।69।।

समुद्रमथनाज्जातमपहृत्य         सुधाघटम्।

दानवा  आगता  अत्र   पूर्वकाले  नृपोत्तम।।70।।

वनेऽस्मिन् तेऽपि दिग्भ्रान्ताः सुधां पातुं कृतोद्यमाः।

मोहिन्या   मोहिताः  सर्वे   तेनुर्वैरं   परस्परम्।।71।।

विष्णोः    प्रसादादत्रैव  पश्चाद्देवगणास्ततः।

चक्रः सम्यक् सुधापानं दानवाश्च प्रवंचिताः।।72।।

ततः   कालादिदं तीर्थं ख्यातं भुवि महामते

तस्मान्नाद्य   भेतव्यं   तुरुष्कास्तु  परस्परम्।।73।।

युद्धं कृत्वा स्वयं सद्यो यास्यन्ति धनवंचिताः।।

राजोवाच

अहो किमिति माहात्म्यं कथितं मे त्वया मुने।

तीर्थस्यास्य पुरावृत्तं  भीतिर्मे  निर्गता क्षणात्।।74।।

अथान्यदपि  माहात्म्यं  यदि तीर्थस्य विद्यते।

तदहं     श्रोतुमिच्छामि    पुरावृत्तान्तदर्शन।।75।।

मुनिरुवाच

अस्य तीर्थस्य माहात्म्यं स्वयं रुद्रेण भाषितम्।

गौर्या  पृष्टो  हिमवति  कैलाशशिखरे पुरा।।76।।

धन्वन्तरित्रयोदश्याः माहात्म्यं प्रथितं भुवि।

कार्तिके कृष्णपक्षे तु सवितोदयगामिनी।।77।।

त्रयोदशी तिथिः साक्षाद्धनारोग्यविवर्द्धिनी।

घटं संस्थाप्य यः कश्चित्पूजां कृत्वा विधानतः।।78।।

आत्मानमभिषिंच्यैव रोगमुक्तो भवेन्नरः।

एतद् व्रतस्य माहात्म्यं रुद्रेण प्रथितं भुवि।।79।।

तदहं कथयिष्यामि शृणु राजन् समासतः।।

इति रुद्रयामलसारोद्धारे तीर्थयात्राविधाने प्रथमोऽध्यायः।

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Sr. No. Title Subject
  1 Aparajita Stotra अपराजिता-स्तोत्रम् Stotra, Mantra
  2 Shri Gayatri-kavacham श्रीगायत्रीकवचम् Tantra, Stotra, Mantra
  3 Yantra-chintamani ? यन्त्र-चिन्तामणि Tantra, Stotra, Mantra
  4 Uchchist-vinayaka mantra उच्छिष्ट-विनायकमन्त्र Tantra, Rituals, Mantra
  5 Vajra-kavacham वज्रकवचम् Tantra, Stotra, Mantra
  6 Apaduddharak Hanumat-kavacham आपदुद्धारक-हनुमत्-कवचम् Tantra, Stotra, Mantra
  7 Surya-saptati-namarghya-dipika सूर्य्य-सप्ततिनामार्घ्य-दीपिका Tantra, Stotra, Mantra
  8 Kalika-kula-sarvasvam कालिकाकुलसर्वस्वम् Tantra, Stotra, Mantra
  9 Vagalamukhi-stotra बगलामुखीस्तोत्रम् Tantra, Stotra, Mantra
  10 Aparadh-bhanjana stotram अपराध-भञ्जनस्तोत्रम् Tantra, Stotra, Mantra
  11 Chaturthi-chandra puja paddhati चतुर्थीचन्द्रपूजापद्धति Ritual
  12 Padya-pushpanjali by Ramakrishna रामकृष्णकृत पद्यपुष्पाञ्जलि Poetry
  13 Mohamudgara Stotra by Shankaracharya शङ्कराचार्यकृतम् मोहमुद्गरस्तोत्रम् poetry
  14 Bhavani Stotra by Shankaracharya शङ्कराचार्यकृतम् भवानीस्तोत्रम् Stotra
  15 Aparadh-bhanjana Stotra by Shankaracharya शङ्कराचार्यकृतम् अपराधभञ्जनस्तोत्रम् Stotra
  16 Devi-aparadh-kshamapana Stotra by Shankaracharya शङ्कराचार्यकृतम् देवी-अपराधभ़ञ्जनस्तोत्रम् Stotra
  17 Charpata-panjarika-stotram by Shankaracharya शङ्कराचार्यकृतम् चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् Stotra, philosophy
  18 Vishnu-shatpadi Stotram by Shankaracharya शङ्कराचार्यकृतम् विष्णुषट्पदीस्तोत्रम् Stotra
  19 Ambastaka by Shankaracharya शङ्कराचार्यकृतम् अम्बाष्टकस्तोत्रम् Stotra
  20 Bhaja-govindam Stotra by Shankaracharya शङ्कराचार्यकृतम् भजगोविन्दम् स्तोत्रम् Stotra, philosophy
  21 Mahishamardini-puja Paddhati महिषासुरमर्दिनीपूजापद्धतिः Rituals
  22 Nitya-tantrika-puja Vidhi नित्य तान्त्रिक-पूजाविधि Rituals
  23 Mahish-mardini Kavacha महिषमर्दिनीकवचम् Tantra, Stotra
  24 Mahish-mardini Yantra महिषमर्दिनीयन्त्रम् Spiritua Drawing
  25 Shata-rudriya Prayoga शतरुद्रिय-प्रयोगः Rituals
  26 Rudradhyaya रुद्राध्यायः Vedic text
  27 Shata-rudriya Prayoga शतरुद्रिय-प्रयोगः Rituals
  28 Durga-nama-shatastaka Stotra दुर्गानामशताष्टकस्तोत्रम् Mantra, Stotra
  29 Sharabha Kavacha शारभकवचम् Stotra
  30 Sharabheshvara Kavacha शरभेश्वरकवचम् Stotra
  31 Ganesh-stotra गणेशस्तोत्रम् Stotra
  32 Apaduddharaka Hanumat-kavacha आपदुद्धारक-हनुमत् कवचम् Kavacha, Tantra
  33 Surya-saptati-namarghya-dipika सूर्यसप्ततिनामार्घ्यदीपिका Stotra
  34 Surya-stavaraja सूर्यस्तवराज Stotra
  35 Bagalamukhi-stotra बगलामुखीस्तोत्रम् Stotra, Tantra
  36 Bagalamukhi-stotra बगलामुखीस्तोत्रम् Stotra, Tantra
  37 Pãshupatastram पाशुपताष्टकम् Stotra, Tantra
  38 Kãlikopanishat कालिकोपनिषत् Agamic text
  39 Kãlikã-shatanama कालिकाशतनाम Stotra, Tantra
  40 Smara-dipika स्मरदीपिका Sex Education
  42 Matangi-mantra मातङ्गीमन्त्रः Stotra, Tantra
  43 Bhairava Sahasra-nama भैरवसहस्रनामस्तोत्रम् Stotra, Tantra
  44 Kali-stavaraja कालीस्तवराज Stotra, Tantra
  45 Gayatri-shapa-vimochana गायत्रीशापविमोचनम् Stotra, Tantra
  46 Uchchhista-ganesh Sahastranama उच्छिष्टगणेशसहस्रनाम Stotra, Tantra
  47 Kalagni-rudropanishat कालाग्निरुद्रोपनिषत् Vedic text
  48 Janma-dina Krityam जन्मदिनकृत्यम् Rituals
  49 Rina-kartana-shesha Stotra ऋणकर्तनशेषस्तोत्रम् Stotra, Tantra
  50 Nrisimha Kavacha नृसिंहकवचम् Stotra, Tantra
  51 Nrisimha-mahamantra Japa-samkalpa नृसिंहमहामन्त्र-जपसंकल्पः Rituals
  52 Mala-samskara Vidhi मालासंस्कारविधि Rituals
  53 Yantra-pratistha Paddhati यन्त्रप्रतिष्ठापद्धतिः Rituals  
  54 Trailokya-mohana Kavacha त्रैलोक्यमोहनकवचम् Stotra, Tantra  
  55 Trailokya-mohana Surya Kavacha त्रैलोक्यमोहनसूर्य्यकवचम् Stotra, Tantra  
  56 Trailokya-mohana Surya Kavacha त्रैलोक्यमोहनसूर्य्यकवचम् Stotra, Tantra  
  57 Surya Sahasra-nama सूर्य्यसहस्रनाम Stotra, Tantra  
  58 Makara-samkranti Dana-vidhi मकरसंक्रान्ति-दानविधि Rituals  
  59 Durvakshata-mantra दूर्वाक्षतमन्त्र Vedic Rituals  
  60 Guru Kavacham गुरुकवचम् Stotra, Tantra  
  61 Hanumat-dhvajarohana vidhi हनुमद्-ध्वजारोहणविधि Rituals  
  62 Ugratara Puja-vidhi उग्रतारापूजाविधि Rituals  
  63 Apaduddharaka Batuka-bhairava Stotra आपदुद्धारकबटुकभैरवस्तोत्रम् Stotra, Tantra  
  64 Hariharatmaka-Stava हरिहरात्मकस्तवः Stotra  
  65 Hariharatmaka-stotra हरिहरात्मकस्तोत्रम् Stotra  
  66 Hariharatmaka-stotra हरिहरात्मकस्तोत्रम् Stotra  
  67 Apamarjana-stotra अपामार्जनस्तोत्रम् Stotra, Tantra  
  68 Apamarjana-stotra अपामार्जनस्तोत्रम् Stotra, Tantra  
  69 gayatri-varnarth-talika गायत्री-वर्णार्थ-तालिका Tantra  
  70 Surya-sahasra-nama Stotram सूर्य्यसहस्रनामस्तोत्रम् Stotra, Tantra  
  71 Kupotsarga-vidhi कूपोत्सर्ग-विधिः Rituals  
  72 Ganga-Stotram गङ्गास्तोत्रम् Stotra  
  73 ? अज्ञातनामा Dharmashastra  
  74 Vajasaneyi-parvana-vidhi वाजसनेयिपार्वण-विधिः Rituals  
  75 Satya-narayan Puja-paddhati सत्यनारायणपूजापद्धतिः Rituals  
  76 Suryastavaraj सूर्य्यस्तवराज Stotra  
  77 Yama-loka Varnanam यमलोकवर्णनम् Stotra  
  78 Vajasaneyi-Sandhya-vandan वाजसनेयि-सन्ध्यावन्दनम् Rituals  
  79 Vajasaneyi-Sandhya-vandan वाजसनेयि-सन्ध्या-वन्दनम् Rituals  
  80 Gayatri-Rahasya by Parashurama परशुरामकृतम् गायत्रीरहस्यम् Theology  
  81 Mudra-prakasha by Rama kishore रामकिशोरकृतः मुद्राप्रकाशः Tantric Text, Commentary  
  82 Sarva-sara-samgraha सर्वसारसंग्रहः Theology  
  83 Shraut-sutra Uttara-satka श्रौतसूत्र-उत्तरषट्कः Vedic TExt  
  84 Gita-govinda Tika गीतगोविन्द-टीका Poetry, Commentary  
  85 Rama-kavacha Stotram रामकवचस्तोत्रम् Stotra  
  86 Shitala-stotram शीतलास्तोत्रम् Stotra  
  87 Apamarjana-stotra अपामार्जनस्तोत्रम् Stotra  
  88 Kula-sambhavi Jnana-samkuli Tantra कुलशाम्भवीज्ञानसङ्कुली-तन्त्रम् Tantra  
  89 Tara Tantra तारा-तन्त्रम् Tantra  
  90 Sarasvati Tantra सरस्वतीतन्त्रम् Tantra  
  91 Somavati Amavasya-puja-vidhi सोमवती-अमावस्या-पूजा-विधिः Rituals  
  92 Ramanavami Puja-vidhi रामनवमी-पूजा-विधिः Rituals  
  93 Ramanavami Puja-vidhi रामनवमी-पूजा-विधिः Rituals  
  94 Bahula-puja-vidhi बहुला-पूजा-विधिः Rituals  
  95 Ramanavami Puja-vidhi रामनवमी-पूजा-विधिः Rituals  
  96 Bhairavi Stava-raja भैरवीस्तवराज Stotra, Tantra  
  97 Uchchhista-ganesh mantra kavacha उच्छिष्टगणेशमन्त्रकवचम् Stotra, Tantra  
  98 Varada tantra वरदा-तन्त्रम् Tantra  
  99 Bheranda Tantra भेरण्डा-तन्त्रम् Tantra  
  100 Matsy-sukta-Tara-kalpa मत्स्य-सूक्तताराकल्पम् Tantra  
  101 Mahish-mardini Tantra महिषमर्दिनी-तन्त्रम् Tantra  
  102 Dattatreya Tantra दत्तात्रेय-तन्त्रम् Tantra  
  103 Nahnidutta pancha-vimshatika Tika by Ruchipati रुचिपतिकृता नाह्निदत्तपञ्चविंशतिका-टीका Jyotish, Commentary  
  104 Tantrika siddhi prayoga Sangraha तान्त्रिकसिद्धि-प्रयोग-सङ्ग्रहः Tantra  
  105 Pratyangira Prayoga vidhi प्रत्यङ्गिरा-प्रयोगविधि Tantra  
  106 Gauri Kanchulika गौरीकञ्चूलिका Ayurveda, medicine  
  107 Shuddhi-nirnaya by Umapati उमापतिकृतः शुद्धिनिर्णयः Theology  
  108 Saundarya Lahari by Shankaracharya शङ्कराचार्यकृता सौन्दर्यलहरी Stotra, Tantra, shrividya philosophy  
  109 Meghadutam by Kalidasa कालिदासकृतम् मेघदूतम् Poetry  
  110 Tryambaka-mantra Prayoga-vidhi त्र्यम्बकमन्त्र-प्रयोग-विधिः Rituals  
  111 Graha-purascharana from Sadhu-sankulini Tantra साधुसङ्कुलिनीतन्त्रोक्ता ग्रहपुरश्चरणविधिः Rituals  
  112 Kirata-chandrika by Pitambara पीताम्बरकृता किरातचन्द्रिका Poetry, Commentary  
  113 Karpura-stava-tika by Rama Kishore रामकिशोरकृता कर्पूरस्तवटीका Tantrik Text, Commentary  
  114 Prabodha-chandrodaya Tika by Ramadas रामदासकृता प्रबोधचन्द्रोदय-टीका Poetry.Commentary, Philosophy  
  115 Vajasaneyi Vivaha-paddhati वाजयनेयि-विवाह-पद्धतिः Rituals  
  116 Uchchatana-prayoga उच्चाटनप्रयोगः Tantra  
  117 Dipa-yantra, Anka-yantra from Tandava Tantra ताण्डवतन्त्रोक्तम् दीपयन्त्रम्, अङ्कयन्त्रम् Yantra  
  118 Garbhopanishat गर्भोपनिषत् Vedic Text  
  119 Annapurna Stotram अन्नपूर्णा-स्तोत्रम् Stotra  
  120 Chanakyam चाणक्यम् Ethics  
  121 Vyavahara-ratnavali by Pashupati पशुपतिकृता व्यवहाररत्नावली Theology  
  122 Gitavali, a collection of Maithili song गीतावली (मैथिली-गीत-सङ्ग्रह) Poetry  
  123 Ganga-snana sankalpa गङ्गास्नान-सङ्कल्पः Rituals  
  124 Vidya-sundara Kavya विद्यासुन्दरकाव्यम् Poetry  
  125 Samba-purana साम्बपुराणम् Upa-purana  
  126 Tantric Dictionary According To Hadi- हादिमते तन्त्रकोषः Tantric Dictionary