Sarasvati Puja in Mithila Tradition

मैथिल साम्प्रदायिक सरस्वती पूजा-विधिः

संपादक पं. भवनाथ झा

[जे दीक्षा नेने छथि ओएह टा एहि विधिसँ पूजा करबाक अधिकारी छथि। ई पूजा विधि म.म. रुद्रधरक वर्षकृत्य आ पं. रमाकान्त ठाकुरक पौरोहित्यकर्मसारक आधार पर मैथिलीमे पूजानिर्देश कए बनाओल गेल अछि।]

पूर्व दिन निरामिष एकभुक्त कए प्रतिमा आदि पूजा-सामग्रीक संकलन करी।

पूजाक दिन अपन नित्यकर्म कए (सूर्यादिपंचदेवताक आ विष्णुक पूजा कए) कुश, तिल आ जल लए-

ॐ तत्सत् ॐ विष्णुः विष्णुः।

 संकल्प- ॐ अद्य माघे मकरार्के शुक्लपक्षे पञ्चम्यां तिथौ अमुकगोत्रस्य-अमुकशर्मणः सदारापत्यस्य अतुलविभूतिपुत्रपौत्रादिसद्विद्या- लाभपूर्वकसरस्वतीप्रीतिकामो लक्ष्म्याद्यङ्गदेवतापूजनपूर्वकसरस्वतीपूजन महङ्करिष्ये।।

प्रतिमा मे, घटक जलमे, शालग्राममे, फोटोमे अथवा आइनामे सरस्वती कें स्नान कराए।

सां एहि मन्त्र सँ मूर्तिमे आँखिक स्पर्श कए, आँखि दए तीन बेरि प्राणायाम करी।

मूर्तिक हृदय पर दहिना हाथ दए वामा हाथ सँ कच्छप-मुद्रा बनाए एहि मन्त्र सँ ध्यान करी। (एकर तात्पर्य जे कच्छप मुद्रा मे दहिना हाथ सँ पहिने स्पर्श केलाक बाद नीचाँ सँ वामा हाथ लगाए कच्छप मुद्रा बनाबी जाहिसँ दहिना हाथ ऊपर रहए।)

ॐ तरुण-शकलमिन्दोर्बिभ्रती शुभ्रक्रान्तिः।

कुचभर-नमिताङ्गी सन्निषण्णा सिताब्जे।

निजकर-कमलोद्यल्लेखनीपुस्तकश्रीः।

सकलविभवसिद्ध्यै पातु वाग्देवता नः।।

ध्यान कए प्राण-प्रतिष्ठा करी।

तेकुशा हाथ मे लए नीचाँ लिखल मन्त्र पढी।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या इह प्राणाः।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या इह प्राणाः।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या इह स्थितिः।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः इह श्री सरस्वतीदेव्याः सर्वेन्द्रियाणि।

ॐ आँ ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हौं हं सः श्रीसरस्वतीदेव्या वाङ्मनः चक्षुः श्रोत्रघ्राणप्राणा इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।

ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमन्तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमन्दधातु विश्वेदेवास इह मादयन्तामोम् प्रतिष्ठ।। ॐ सरस्वतीदेवि! इहागच्छ इह सुप्रतिष्ठिता भव।।

ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च। 

अस्यै देवत्वसंख्यायै स्वाहा।।

देवीक हृदय पर हाथ धेने सां ई मूलमन्त्र तीन बेरि जप कए, देवीक शरीरक अङ्गन्यास आ करन्यास कए,

ऐँ एहि बीज सँ संनिरोधनी मुद्रा देखाबी आ सां एहि मूलमन्त्रसँ पुष्पाञ्जलि दी।

 कलश स्थापना

तखनि आसन पर बैसि कलश स्थापित करी। जल छीटि, बीचमे पूजा करी।

आवाहन- अक्षत लए, ॐ कलशाधारशक्ते इहागच्छ इह तिष्ठ।

जल- एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ कलशाधारशक्तये नमः।

श्रीखण्ड चानन- इदमनुलेपनं कलशाधारशक्तये नमः।

रक्तचानन- इदं रक्तचन्दनम् कलशाधारशक्तये नमः।

रोली- इदं कुङ्कुमं कलशाधारशक्तये नमः।

सिन्दूर- इदं सिन्दूरं कलशाधारशक्तये नमः।

अक्षत- इदमक्षतं कलशाधारशक्तये नमः।

फूल- एतानि पुष्पाणि कलशाधारशक्तये नमः।

नैवेद्य- एतानि नानाविधनैवेद्यानि कलशाधारशक्तये नमः।

आचमन- इदमाचमनीयं कलशाधारशक्तये नमः।

पुष्पाञ्जलि- एष पुष्पाञ्जलिः कलशाधारशक्तये नमः।

भूमिक स्पर्श कए,

ॐ भूरसि भूमिरसि अदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री।

पृथिवीं यच्छ पृथिवीं ह पृथ्वीं मा हिंसीः।

गायक गोबरसँ निपबाक मन्त्र- 

ॐ मानस्तोके तनये मानऽआयुषि मानो गोषु मानोऽअश्वेषुरीरिषः।

मानोव्वीरान् रुद्रभामिनोव्वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे।

गंगाजल छिटबाक मन्त्र-

वेद्या वेदिः समाप्यते बर्हिषा बर्हि इन्द्रियम्।

यूपेन यूपऽआप्यते प्रणीतोऽअग्निरग्निना।।

एकर बाद एहि पर पिठारसँ अष्टदल कमल बनाबी। कमलक बीच मे धान अथवा जौ राखी, तकर मन्त्र- धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।

खाली कलश रखबाक मन्त्र- ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्वन्दवः पुनुरूर्जा नि वर्तस्व सा नः सहस्त्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशाताद्रयिः।

कलश पर दही आ अक्षतक लेप करी। तकर मन्त्र-  ॐ दधिक्राव्णोऽअकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखाकरत्प्रण आयूंषि तारिषत्।

लोटासँ कलश में जल भरबाक मन्त्र- ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भ सज्र्जनीस्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद।

पंचरत्न- ॐसरत्नानि दाशुषे अरातिसहिता भगो भाग्यन्य तत्र मीमहे।

सप्तमृत्तिका- ॐ उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना। नमस्ते सर्वदेवानां प्रभुवारिणि सुव्रते।

सर्वौषधी- ॐ या ओषधीः पूर्व्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।

मनैनु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च।

श्रीखण्ड चानन-

ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।

ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्नये श्रियम्।

सुपारी-

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।

बृहस्पति प्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वं हसः।।

पंचपल्लव अथवा केवल आमक पल्लव-

ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मानयति कश्चनः।

ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकाम् काम्पीलवासिनीम्।

दूबि-

ॐ काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।

एवानो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च।

गंगाजल-

ॐ इमम्मे वरुण श्रुधीहवमदद्या च मृडय त्वामवस्युराचके।

गंगाद्याः सरितः सर्वाः समुद्राश्च सरांसि च।

सर्वे समुद्राः सरितः सरांसि दलदायकाः।

आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः।।

ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः, ता नऽऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे।

ॐ यो वः शिवतमो रसः, तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः।

ॐ तस्माऽअरंगमामवो, यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जन यथा च नः।

पानक पात- ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा। ॐव्यानाय स्वाहा।

पाइ- ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।

नारिकेर- ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पति प्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वं हसः।

वस्त्र- ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः।

कलशक कात अरवा चाउर भरल ढकना राखी- ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।

ओहि धान पर दीप राखी- ॐ अग्निर्ज्योतिः ज्योतिरग्निः स्वाहा। सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा। अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा। सूर्यो वर्चो ज्योतिः वर्चः स्वाहा। ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।

दही आ अक्षत लए कलशक स्पर्श करैत- ॐ मनोजूतिर्जुषता माज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह मादयन्तामों प्रतिष्ठ। कलशस्थितगणेशादिदेवता इह सुप्रतिष्ठिता भवन्तु।

ॐ कलशस्थितगणेशादिदेवताभ्यो नमः एहि मन्त्रसँ कलश पर पूजा करी।

इति कलशस्थापन विधि।

कलश स्थापित कए विघ्नापसारण करी। भूमि पर वामा पयरक एंडी तीन पटकि कए दए, तीन बेरि ताली बजाए, आँखि गुड़ाड़ि कए चारूकात देखि, ॐ फट् एहि मन्त्रसँ तीन बेरि ताली बजा कए दसो दिशा मे चुटकी बजाबी।

चानन आ फूलसँ हाथ कें शोधित कए नाराच मुद्रासँ ओकरा ईशानकोण में फेंकि आसन पर बैसी-

ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्माे देवता आसनोपवेशने विनियोगः।।

ॐपृथ्वि त्वया धृता लोकाः देवि त्वं विष्णुना धृता।

त्वं च धारय मां नित्यं पवित्रं कुरु चासनम्।।

ॐ आधारशक्तिकमलासनाय नमः।

एहि तरहें आसनक पूजा कए

ॐ अस्त्राय फट् ई मन्त्र पढ़ैत पूर्व अथवा उत्तरमुख बैसि

वाम भागमे- ॐ गुरुभ्यो नमः।

दहिन भागमे- ॐ गणेशाय नमः।

सोझाँमे- ॐ सरस्वत्यै नमः। एहि मन्त्रसँ एक एक फूल राखी।

तकर बाद ऋष्यादिन्यास करी-

बिचला तीन आँगुरसँ माथक स्पर्श करी- ॐ ब्रह्मणे ऋषये नमः।

बिचला तीन आँगुरसँ  मुखक स्पर्श करी- ॐ गायत्रीच्छन्दसे नमः।

बिचला तीन आँगुरसँ  हृदयक स्पर्श करी- ॐ ऐं सरस्वतीदेवतायै नमः।

तकर बाद ऐं एहि बीजमन्त्रसँ तीन बेरि प्राणायाम कए कराङ्गन्यास करी। यथा-

आं हृदयाय नमः।। बिचला तीन आँगुरसँ  हृदयक स्पर्श करी

ईं शिरसे स्वाहा। बिचला तीन आँगुरसँ  माथक स्पर्श करी

ॐ शिखायै वषट्। बिचला तीन आँगुरसँ  टीकक स्पर्श करी

ऐं कवचाय हुम्। दूनू हाथक बिचला तीन आँगुरसँ उलटा कए दूनू कान्हक स्पर्श करी। (दहिना हाथसँ वामा कान्ह आ वामा हाथसँ दहिना कान्ह।)

ॐ नेत्रत्रयाय वौषट्। अनामिका सँ वामा आँखि, मध्यमासँ भोंह आ तर्जनीसँ दहिना आँखिक स्पर्श करी।

अः अस्त्राय फट्।। दहिना हाथ कें पाँछा दिस सँ घुमाए वामा तरहत्थी पर बिचला तीन आँगुरसँ थपडी बजाबी।

एहि प्रकारें करन्यास कए यथाशक्ति प्राणायाम कए सामान्यार्घ स्थापित करी। अपन वामा कात मे रक्त चाननसँ त्रिकोण लीखि, फूल, अक्षत चाननसँ पूजा करी

ॐआधारशक्तये नमः। ॐअनन्ताय नमः। ॐकूर्माय नमः, ॐपृथिव्यै नमः।

एहि प्रकारें पूजा कए, ओतए शंखक बैसना राखि, फट् एहि मन्त्रसँ शंख कें ओहि बैसना पर स्थापित कए शंखक तीन भाग जलसँ भरि,

अंकुश मुद्रासँ-

ॐ गङ्गे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेस्मिन् संनिधिं कुरु।

तीर्थक आवाहन कए सां एहि मन्त्रसँ ओहि में चानन, पूल, अक्षत दए, धेनुमुद्रा देखा कए आठ बेरि सां जपि, ओहि जलसँ अपना कें आ आनो सामग्री कें सिक्त कए दी।

तखनि पंचोपचारसँ निम्नलिखित देवताक पूजा करी

सूर्य- भगवन् सूर्य इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते श्री सूर्याय नमः। इदमनुलेपनं भगवते श्री सूर्याय नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवते श्री सूर्याय नमः। इदं कुङ्कुमं भगवते श्री सूर्याय नमः। इदमक्षतं भगवते श्री सूर्याय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते श्री सूर्याय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्री सूर्याय नमः। इदमाचमनीयं भगवते श्री सूर्याय नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते श्री सूर्याय नमः।

विष्णु- भगवन् विष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते श्री विष्णवे नमः। इदमनुलेपनं भगवते श्री विष्णवे नमः। एते यवतिलाः भगवते श्रीविष्णवे नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते श्री विष्णवे नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्री विष्णवे नमः। इदमाचमनीयं भगवते श्री विष्णवे नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते श्री विष्णवे नमः।

शिव- भगवन् शिव इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते शिवाय नमः। इदमनुलेपनं भगवते शिवाय नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवते शिवाय नमः। इदं कुङ्कुमं भगवते शिवाय नमः। इदमक्षतं भगवते शिवाय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते शिवाय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्री शिवाय। इदमाचमनीयं भगवते शिवाय नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते शिवाय नमः।

दुर्गा- भगवति दुर्गे देवि इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदमनुलेपनं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदं कुङ्कुमं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदं सिन्दूरं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदमक्षतं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। एतानि पुष्पाणि भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। इदमाचमनीयं भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवत्यै दुर्गादेव्यै नमः।

अग्नि- भगवन् अग्निदेव इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते अग्निदेवाय नमः। इदमनुलेपनं भगवते अग्निदेवाय नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। इदं कुङ्कुमं भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। इदमक्षतं भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः।इदमाचमनीयं भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः। एष पुष्पा×जलिः भगवते भगवते अग्निदेवाय नमः।

केशव- भगवन् श्रीकेशव इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवते श्रीकेशवाय नमः। इदमनुलेपनं भगवते श्रीकेशवाय नमः। एते यव-तिलाः भगवते श्रीकेशवाय नमः। एतानि पुष्पाणि भगवते श्रीकेशवाय नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवते श्रीकेशवाय नमः। इदमाचमनीयं भगवते श्रीकेशवाय नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवते श्रीकेशवाय नमः।

कौशिकी- भगवति कौशिकि देवि इहागच्छ इह तिष्ठ। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदमनुलेपनं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदं रक्तचन्दनम् भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदं कुङ्कुमं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदं सिन्दूरं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदमक्षतं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। एतानि पुष्पाणि भगवत्यै कौशिक्यै नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि भगवत्यै कौशिक्यै नमः। इदमाचमनीयं भगवत्यै कौशिक्यै नमः। एष पुष्पाञ्जलिः भगवत्यै कौशिक्यै नमः।

आदित्यादिनवग्रह- आदित्यादिनवग्रहाः इहागच्छत इह तिष्ठत। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदमनुलेपनं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदं रक्तचन्दनम् आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदं कुङ्कुमं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदमक्षतं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। एतानि पुष्पाणि आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। इदमाचमनीयं आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः। एष पुष्पाञ्जलिः आदित्यादिनवग्रहेभ्यो नमः।

इन्द्रादिशदिक्पाल- इन्द्रादिदशदिक्पालाः इहागच्छत इह तिष्ठत। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदमनुलेपनं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदं रक्तचन्दनम् ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदं कुङ्कुमं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदमक्षतं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। एतानि पुष्पाणि ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। एतानि नानाविधनैवेद्यानि ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। इदमाचमनीयं ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः। एष पुष्पाञ्जलिः ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः।

तखनि लक्ष्मीक ध्यान करी-

ॐ पाशाक्षमालिकाम्भोज  शृणिभिर्याम्यसौम्ययोः।

प्रसनास्थां ध्यायेच्च श्रियं त्रैलोक्यमातरम्।

गौरवर्णां सुरूपाञ्च सर्वालङ्कारभूषिताम्।

रौक्मपद्मव्यग्रकरां वरदां दक्षिणेन तु।

ध्यान कए पाद्य आदि उपलब्ध वस्तुसँ ॐ लक्ष्मीदेव्यै नमः एहिसँ पूजा कए,

ॐ लक्ष्मीदेव्यै नमः ई दस बेरि जप करी।

ॐ नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये।

या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्त्वदच्र्चनात्।

एहिसँ पुष्पाञ्जलि दए स्तोत्र आदि पाठ कए लक्ष्मीकें प्रणाम करी।

सरस्वतीक पूजा

ध्यान- 

ॐ तरुणशकलमिन्दोर्बिभ्रती शुभ्रक्रान्तिः।

कुचभर-नमिताङ्गी सन्निषण्णा सिताब्जे।

निजकर-कमलोद्यल्लेखनीपुस्तकश्रीः। 

सकलविभवसिद्ध्यै पातु वाग्देवता नः।।

ध्यान कए अपन माथ पर एकटा फूल राखि मनहिं मन सरस्वतीक पूजा करी। तकर बाद,

ॐ ऐं भगवति सरस्वति स्वकीयगणसहिते इहागच्छ इहागच्छ, इह तिष्ठ, इह सन्निधेहि इह सन्निरुद्धा भव, अत्राधिष्ठानं कुरु, मम पूजां गृहाण स्थां स्थीं स्थिरा भव।।

एहिसँ आवाहन कए-

जल- इदं पाद्यम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

अघ्र्य- एषोर्घ्यः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः। (अरघा मे जल, चानन, अक्षत, दूबि, दूध, दही, कुषक अगिला भाग, पीरा सरिसब, तिल दए)

जल- इदमाचमनीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

जल- इदं स्नानीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः। 

जल- इदं पुनराचमनीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

वस्त्र- इदं शुक्लवस्त्रं बृहस्पतिदैवतम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

श्रीखण्ड चानन- इदमनुलेपनम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

सिन्दूर- इदं सिन्दूरम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

अबीर- इदम् अबीरकं ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

अक्षत- इदमक्षतम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

फूल- एतानि पुष्पाणि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

आमक मज्जर- इदम् आम्रमञ्जरीकं ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

माला- इदं माल्यम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

आभूषण- इदं भूषणम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

सौन्दर्य-प्रसाधन- एतानि नानाविधसौन्दर्यप्रसाधनानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

धूप- एष धूपः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

दीप- एष दीपः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

नैवेद्य- एतानि नानाविधनैवेद्यानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

फल- एतानि नानाविधफलानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

पकमान- एतानि नानाविधपक्वान्नानि ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

जल- इदमाचमनीयम् ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

फूल- ॐ पुष्पं मनोहरं दिव्य सुगन्धं देवनिर्मितम्।

हृद्यमद्भुतमाघ्रेयं देवि! तत् प्रतिगृह्यताम्।। एष पुष्पाञ्जलिः ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः

एहि प्रकारें षोडशोपचारसँ सरस्वतीक पूजा करी।

तकर बाद पुस्तक पर- ॐ पुस्तकाय नमः एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

मोसिदानी पर ॐ मस्याधाराय नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

कलम पर ॐ लेखन्यै नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

चक्कू पर ॐ सर्वशस्त्रेभ्यो नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

ॐ अस्त्रेभ्यो नमः। एहि मन्त्रसँ पञ्चोपचारसँ पूजा करी।

आरती कए पुष्पाञ्जलि दी

ॐ यथा न देवो भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।

त्वां परित्यज्यं सन्तिष्ठेत्तथा भव वरप्रदा।।

वेदाः पुराणशास्त्राणि नृत्यगीतादिकं च यत्।

न विहीनं त्वया देवि तथा मे सन्तु सिद्धयः।।

विशदकुसुमतुष्टा पुण्डरीकोपविष्टा धवलवसनवेशा मालतीबद्धकेशा।

शशधरकरवर्णा सुभ्रताटङ्ककर्णा जयति जितसमस्ता, भारती वेणुहस्ता।

पुष्पाञ्जलिक बाद प्रणाम करी

ॐ सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमोनमः।

वेदवेदान्तवेदाङ्गविद्यास्थानेभ्य एव च (स्वाहा)।।

एहिसँ प्रणाम कए प्रार्थना करी।

ॐ लक्ष्मीर्मेधा धरापुष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभा धृतिः।

एताभिः पाहि तनुभिरष्टाभिर्मां सरस्वति।।

रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भवगति! देहि मे।

धर्मान् देहि धनं देहि सर्वाविद्याः प्रदेहि मे।।

सा मे वसतु जिह्वायां वीणां पुस्तकधारिणी।

मुरारिवल्लभा देवि! सर्वशुक्ला सरस्वती।।

भद्रकाल्यै नमो नित्यं सरस्वत्यै नमो नमः।

वेदवेदान्त-वेदाङ्ग-विद्यां देहि नमोस्तु ते।।

एहिसँ प्रार्थना कए प्रणाम करी।

नाच-गान करैत दिन-राति बिताए, भोरे विसर्जन करी।

तखनि कुश, तिल आ जल लए-

ॐ कृतैतत्साङ्गसपरिवार सरस्वती-पूजनकर्म-प्रतिष्ठार्थमेतावद्द्रव्यमूल्यक- हिरण्यमग्निदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे ब्राह्मणकें दय दी।

।।इति सरस्वतीपूजाविधिः।।


शारदाशतनामस्तोत्रम्>>

Proccess of Ashtadala Aripana in Mithila

मिथिलाक अष्टदल अरिपन

अरिपनक आवश्यकता
हमरालोकनि सभ केओ जनैत छी जे कोनो पूजामे मुख्य देवताक आवाहन एसकर नै होइत छनि। हुनक आवाहन अङ्ग देवता, अस्त्र-शस्त्र, वाहन एवं परिवारक संग होइत अछि। तें मन्त्रमे कहल जाइत अछि- साङ्गसायुधसवाहनसपरिवार।

एहि प्रकारें हुनक स्थानक चारूकात घेरि कए हुनक अंगदेवता अप्रत्यक्ष रूपमे अपन-अपन निर्धारित स्थान पर अपनहिं स्थापित भए जाइत छथि आ मुख्यदेवताक आवरण रूपमे चारूकात रहैत छथि। सभ अस्त्र-शस्त्र, परिवार देवता, परिजन, परिकर, वाहन सभक स्थान निर्धारित छैक, सभक संख्या सेहो प्रत्येक देवताक लेल निर्धारित छनि। एही कारणें पूजाक पटल (यन्त्र माने अरिपन) देल जाइत अछि।

अरिपनक स्वरूप
शास्त्रीय यन्त्रक कर्णिका, केशर, दल आ भूपुर ई चारि टा अंग होइत अछि। एकर अतिरिक्त मण्डल मे ई विभाजित रहैत अछि।
मिथिलाक अरिपन मूल रूपसँ यैह शास्त्रीय यन्त्र थीक, जाहिमे आब भूपुरक रेखांकन समाप्त भए चुकल अछि, मुदा एखनहुँ कर्णिका, केशर आ दल प्रत्यक्ष विद्यमान अछि। एहि तीनू टाक शुद्धता पर आइयो ध्यान राखब आवश्यक।
एतय शुद्धताक अर्थ ई जे कमसँ कम संख्याक पालन कएल जाए। टेढ-सोझ भए सकैत अछि, मुदा कर्णिकाक स्वरूप, केसरक संख्या आ दलक संख्या मे परिवर्तन नै होएबाक चाही। कारण जे मुख्यदेवताक परिजन आ परिकरक संख्या जखनि निर्धारित अछि तखनि ओहिमे कमी-वेशी कोनो प्रकारें उचित नै।
मिथिलामे देवीक पूजामे षट्दल आ पुरुषदेवताक पूजामे अष्टदलक प्रचलन अछि।

तैं सत्यनारायण भगवानक पूजामे अष्टदल देल जाइत अछि। एतबे नहिँ, महादेवक विशेष पूजामे, जेना रुद्राभिषेक आदि मे सेहो अष्टदलक निर्माण होएबाक चाही। एकर परम्परा मिथिलामे रहल अछि। गौरीशंकर, जमुथरिक महादेव आ हाजीपुरक गौरीशंकर आ आनोठाम महादेवक स्थापना अष्टदल पर भेल अछि। जँ घरोमे रुद्राभिषेक आदि विशेष पूजामे एकर व्यवहार कएल जाए तँ उत्तम।
अष्टदलक निर्माणक प्रथम चरणमे एकर कर्णिका सेहो आठकोण वला होएबाक चाही। एकर निर्माण विधि एना अछि। सभसँ पहिने चित्रानुसार एहन आकृति बनाबीः-

1st phase
1st phase

एकर बाद कर्णिका कें अष्टकोणीय बनबैत एक रेखा कें दोसरसँ मिलाबी जाहिसँ एहन आकृति बनि जाएत।

IInd phase
IInd phase

एकर बाद एकटा वृत्त बनाबी। एकरा लेल एक विन्दुसँ दोसर विन्दु कें मिलौला सँ बनि एना बनि जाएत।

Third phase
Third phase

तकर बाहर आठ टा दल बनाबी।

fourth phase
fourth phase

आब अरिपनक रेखांकन भए गेल। एहि मे कलाकारी भेल जे बीचक कर्णिका एहि प्रकारक देखाए।

Karnika
Karnika

अष्टदलमे एष्टकोणीय आ षट्दलमे षट्कोणक कर्णिका अनिवार्य अछि।
आब ध्यानसँ देखू जे कर्णिकाक बाहर दू चक्रमे आठ टा कें त्रिभुज बनि गेल अछि। ई दूनू आवरण थीक। एकरे केशर कहल जाइत अछि। दू आवरणमे केशर रहबाक चाही। तखनि ने भगवानक परिवार देवता आ परिजन देवताक लेल स्थान बनत। एको टा आवरण जँ छुटि जाएत तँ ओएह अशुद्धि भेल।
एकर बाद दू टा केशरक बीच जे स्थान अछि ओहिमे भगवानक अस्त्र-शस्त्र आ हुनक धारण करबाक वस्तु सभ लिखल जाएत। एकर अनेक परम्परा अछि। एतहि आबि अरिपन मे अंतर भए सकैत छैक। प्रत्येक देवताक लेल अलग अलग वस्तु रहैत अछि। एहिमे ध्यान राखी जे कोनो घर छुटए नै।
एहि प्रकारें शुद्धतापूर्वक अरिपन बनाबी। ई अरिपन देवताक संग हुनक अंगदेवता सभक स्थान होइत छनि।

पूजा करबाक लेल जे अरिपन देल जाएत ओहि मे कर्णिका पर दू टा पयर रहत। एहि दूनू पयरक अंगुरी सभ पूजा केनिहारक दिस रहबाक चाही। तखनि सम्मुख पूजा होएतैक। कल्पना करी जे भगवान् आगाँमे ठाढ छथि। तखनि हुनक पयरक अंगुरी पूजा केनिहार दिस रहबाक चाही।

प्राचीन कालमे एहि सभ दल पर मातृकावर्ण लिखल जाइत छल, मुदा आब ओ परम्परा समाप्त भए गेल अछि। शास्त्रीय ग्रन्थ सभमे आ स्थापित मूर्ति सभमे ई भेटैत अछि। जेना गौरीशंकरमे आठो टा दल पर अ सँ ह धरि अक्षर लिखल अछि।
पहिने मिथिलाक महिला एतेक पढलि-लिखलि रहथि जे अपनहिं सँ विधानपूर्वक यन्त्र बना लैत छलीह, मुदा बीचमे ई परम्परा विलुप्त भए गेल अछि। प्रसन्नताक विषय जे आब महिलालोकनि नीक पढल-लिखल छथि। हुनकासँ आशा जे परम्पराकें फेरसँ जगाबथि। कलाकारीक नाम पर एकर मूल रूपकें दूरि करबाक प्रवृत्ति उचित नै।
मिथिलामे गोसाउनिक सीर पर जे आरतक पात साटल जाइत अछि ओहि पर पहिने यन्त्र लिखल जाइत छल आ यन्त्रपूजाक विधान आ परम्परा छलैक। एहिना छठिक अर्घौती पर सेहो सूर्यक यन्त्र लिखाइत छल हैत से कल्पना कए सकैत छी। मुदा आब केबल कागज बचि गेल अछि। इहो जनबाक चाही जे पहिने तूरसँ कागज बनाओल जाइत छल। ओकरे घसाएल रूप आधुनिक आरतक पात थीक।

The Complete story of Sama-chakeba festival

The Complete story of Sama-chakeba festival.

This page is in Maithili language. Sama Chakeva or Sama Chakeba is one of the festivals in Mithila region. Here Sama stands for Samba, the son of Lord Krishna, born From Jambavati, the daughter of Jambavan. The word Chakeba is derived fron Sanskrit word Chakravaka ( a bird, a member of the swan or goose family.) 

The Complete story of Sama-chakeba festival.

[This page is in Maithili language. Sama Chakeva or Sama Chakeba is one of the festivals in Mithila region. Here Sama stands for Samba, the son of Lord Krishna, born from Jambavati, the daughter of Jambavan. The word Chakeba is derived from Sanskrit word Chakravaka (a bird, a member of the swan or goose family.]


सामा-चकेबाक सम्पूर्ण कथा

सामा-चकेबाक सम्पूर्ण कथा कतहु ने तँ पुराण मे भेटैत अछि आ ने लोककथे मे। एकर मूलस्रोत भविष्य-पुराणक सूर्योपासनाक प्रसंग में अछि, मुदा मिथिलामें प्रचलित बहुत रास विधिक आलोकमे ओकर व्याख्या नहिं भए पबैत छैक, तें बुझाइत अछि जे कतहु ने कतहु ओ अंश छुटल अछि जे पारम्परिक विधि-विधानकें कथाक संग जोडैत हो। भविष्यपुराणक ब्राह्मपर्व मे साम्बक शापक कथा तँ अछि मुदा ओहिमे कुष्ठरोग होएबाक कथा आ सूर्यक उपासनासँ ओकर मुक्तिक कथा विस्तारसँ देल गेल अछि।

Siri Sama & Kachabachiya
Siri Sama & Kachabachiya : Photograph by Rakesh Kumar

एही विन्दुपर आबि कथाक दिशा बदलि जाइत अछि आ कुष्ठरोगक स्थान पर तिर्यक् योनिमे जन्म लेबाक बात आबि जाइत अछि आ साम्बाक द्वारा ओहि शापसँ मुक्त करएबाक कथा जुडि जाइत अछि। ई विशुद्ध लोककथा थीक आ शापक कारणें पशु-क्षीक .योनिमे जन्म लेबाक बात कहल गेल अछि। तें मिथिलामे प्रचलित कथा, ओकर विधि-विधानक तारतम्यता आ भविष्यपुराणक कथा, एहि तीनू कें एकठाम जोडि देला पर सम्पूर्ण कथाक स्वरूप बनैत अछि।

बाटो बहिनों आ कचबचिया : photograph by Rakesh Kumar
बाटो बहिनों आ कचबचिया : photograph by Rakesh Kumar

सम्पूर्ण कथा

जखनि भगवान् कृष्ण द्वारकाधीश छलाह तखनि हुनक पत्नी जाम्बवतीसँ जेठ बेटी साम्बाक जन्म भेल आ तकर बाद हुनक छोट भाए साम्बक जन्म भेल। एक दिन भगवान् कृष्ण कनात लगाए अपन रानी सभक संग रास रचबैत रहथि। साम्ब बच्चा रहथि तें ओ किछु बुझैत नहिं छलाह। ओ कनात हटाए भीतरक दृश्य देखि लेलनि। ई बात खृष्ण कें चुगिला कहि देलक। एहि पर क्रोधित भए ओ साम्बकें पशु-पक्षीक रूपमे तिर्यक् योनिक शरीर धारण करबाक शाप देलनि। ओकर प्रभावसँ साम्ब पशु अथवा पक्षी भए गेला।

Samma.Chakeba
चकेबा

हुनक बहिन साम्बा अपन भाइक एहि शापसँ मर्माहत भेलीह आ हुनका पुनः मानव शरीरक रूपमे अनबाक लेल वृन्दावन जाए सप्तर्षिक सेवा करए लगलीह। हुनका भरोस रहनि जे मुनि जखनि प्रसन्न हेताह, तखनि हुनकासँ वरदानक रूपमे अपन भाइक शाप-मुक्तिक उपाय पूछब।

वनतीतिर
वनतीतिर

इहो समाचार चुगिला कृष्ण कें कहि देलक जे सामा वृन्दावन भागि गेलीह आ एक मुनिक आश्रममे रहैत छथि। ओ ताहि स्वर मे कहलक जाहिसँ सामा पर कलंक लागल आ कृष्ण फेर सामा कें सेहो तिर्यक् योनि अर्थात् पशु-पक्षीक योनिमे चल जेबाक शाप देलनि। सामाक पति सेहो भगवान् शिवक कृपासँ पक्षी योनिमे स्वेच्छासँ चल गेलाह, जाहिसँ ओ अपन पत्नीक संग सुखभोग कए सकथि।

सामाक पौती
सामाक पौती

आब सामा साम्ब आ सामाक पति पशु-पक्षी भए गेलाह। एक दोसरा कें बुझलो नै रहनि जे कोन रूपमे ओ जन्म नेने छथि। सामा मुनिक सेवा करिते रहलीह, मुदा अपन भाइक खोज सेहो करैत रहलीह। सुगा, मैना, चकबा, गाय, वरद, सभक ध्यान राखए लगलीह जे एहि रूप मे हमर भाए भए सकैत छथि। साम्ब सेहो अपन बहिन आ बहिनोय कें तकैत रहलाह। एहिना कतोक वर्ष बीति गेल।

कुम्हार द्वारा निर्मित
कुम्हार द्वारा निर्मित

एक दिन वृन्दावनमे आगि लागि गेल। साम्ब एतबा जनैत रहथि जे हमर बहिन-बहिनोय कोनो ने कोनो रूपमे एही वृन्दावन मे छथि तें ओ हुनका दूनू कें बचएबाक लेल वृन्दावनक आगि मिझौलनि। तैयो सामा नै भेटलथिन।

कुम्हार द्वारा निर्मित सामा
कुम्हार द्वारा निर्मित सामा

मुदा दूनू भाइ-बहिनक एहन स्नेह आ एक दोसराक लेल अनुराग देखि कृष्णकें दया भेलनि। ओ अपन शाप कार्तिक पूर्णिमाके आपस लए लेलनि। तखनि दूनू भाइ-बहिन अपन अपन स्वरूपमे आबि गेलीह। जाहि चुगिलाक कारणें ई सभटा घटना घटल, ओकरा फाँसी देल गेल।  साम्ब आ साम्बा एक दोसरक संग रहए लगलीह।

सामा, ढौरबासँ पहिने आ बादमे
सामा, ढौरबासँ पहिने आ बादमे

कथाक विवेचन आ विधि-विधानक संग ओकर सम्बन्ध

एही शाप-विमोचनक उपलक्ष्यमे सामा-चकेबाक पाबनि मनाओल जाइत अछि। तें एहिमे माँटिक पशु-पक्षीक आकृति बनाए ओकरा एहि दिन तोडल जाइत अछि। शापक अवधिमे सामा आ साम्ब जाहि जाहि स्वरूपमे रहल होएताह ओकरा तोडि देल जाइत अछि। ओहि अवधिक स्मृतिकें बिसरि जेबाक ई विधि थीक।

चुगिलाक मोंछमे आगि लगाओल जाइत अछि। ई ओकरा देल गेल दण्डक प्रतीक थीक।

वृन्दावन मे आगि लगबाक घटनाक झाँकी देखाओल जाइत अछि।

चुगिला आ वृन्दावन
चुगिला आ वृन्दावन

सामाक स्वरूप सभमे कचबचिया, बाटो-बहिनो, सिरी-सामा (श्रीसाम्ब) सतभैंया, हाँस-चकेबा, सुगा, ढोलिया-बजनियाँ, बन-तितर, पौती, चुगिला, वृन्दावन आदि नामकरण कए मूर्ति सभ बनाओल जाइत अछि। चकबा आ सिरी सामा एकर मुख्य सामा थीक।

चकेबा
चकेबा

सामाक कथाक सभसँ प्रामाणिक आ लिखित रूप हमरालोकनिकें पं. सीताराम झाक पर्वनिर्णय नामक ग्रन्थ मे भेटैत अछि। चौगामा गामक वासी पं. झा 20म शतीक मिथिलाक प्रख्यात ज्योतिषी रहथि। हुनका द्वारा लिखल ई कथा निःसन्देह प्रामाणिक अछि। (एतए ई कथा शेखर प्रकाशन पटना सँ प्रकाशित पर्व-निर्णय, द्वितीय संस्करण, 2009 ई. क पृ. सं. 33-34सँ साभार लेल गेल अछि।)

पण्डित सीताराम झाक द्वारा कहल गेल सामा चकेबाक कथा

कार्तिक में स्त्रीवर्ग-सामा-चकैबाक खेलि करै छथि तकर कथा पद्मपुराणमे एहि प्रकार अछि जे -भगवान् श्रीकृष्ण कैं जाम्बवती स्त्री मे साम्ब नामक पुत्र ओ सामा नामक कन्या छलथिन्हि- जनिक विवाह चारुवक्त्र सँ भेल छलन्हि। सामा कें वृन्दावनमे अधिक स्नेह छलन्हि ते ओ गुप्तरूप सँ नित्य वृन्दावनमे आबि सप्तर्षि लोकनिक स्थान मे कथा-पुराण सुनि पुन: अपना घर जाइ छली।

ई बात चूड़क नामक एक शूद्र श्रीकृष्णक ओते चुगली कै देलक जे “महाराज, अपनेक कन्या (सामा) नित्य रातिकऽ वृन्दावन जाइ छथि”। ई कथा सूनि भगवान् कृष्ण सामा केँ शाप देलथिन्हि जे- “तों हमरा लोकनिक आज्ञा विना वृन्दावन जाइ छें तें पक्षी रूप भै वृन्दावन मे वास कर।”

एहि प्रकार कृष्णक शाप (सराप) सँ सामा चकावाकी (चकबी) पक्षीक रूप भै वृन्दावन मे रहै लगलीह। हुनक स्वामी (चारुवक्त्र) बहुत दुखी भै तपस्या सँ महादेव के प्रसन्न कै वर मङ्गलन्हि जे- ”हे शंकर, हमर परम प्रिया स्त्री कृष्णक शाप सँ पक्षी रूप भै गेल छथि तै हमरहु पक्षीक रूप बनाय देल जाय जाहि सँ हम अपन स्त्रीक संग वृन्दावन में सुखभोग करी।” महादेव प्रसन्न भै हुनका चक्रवाक (चकवा) पक्षीक रूप बनाय वृन्दावन पठाए देलथिन्हि।

एम्हर साम्ब अपन प्रिय बहिन ओ बहिनोयक ई समाचार सूनि हुनक उद्धारक हेतु भगवान् कृष्णक आराधना करै लगलाह। किछु दिन मे साम्बक सुश्रुषा देखि कृष्ण कहलथिन्हि जे “अहाँ की चाहै छी?’

ई सूनि साम्ब कहलथिन्हि- ” पिताजी, अपनेक शाप सँ हमर बहिन पक्षीक रूप मे भेलि छथि। जाहिसँ हम अत्यन्त दुखी भी छी, तेँ कृपा कै हमर बहिन ओ बहिनोय शाप सँ मुक्त भै पूर्वरूप होथि से कैल जाय”।

साम्बक ई कथा सुनि कृष्ण कहलथिन्हि जे हम एक चुगिलाक बात सुनि सामा कै शाप देल, वास्तवमे ओकर अपराध तेहन नहिं छलै।

आब शाप सँ छुटबाक उपाय ई अछि जे कार्तिक मास हमर परम प्रिय थिक। तैं कार्तिक कृष्णपक्षक पडिबा मेँ खढ़क वृन्दावन ओ सप्तर्षिक तथा सामा, चकबा ओ अहाँक माँटिक मूर्ति बनाए नित्य पूंजा कै तथा एक चुगिला (चूड़क) क मूर्ति बनाए नित्य ओकर मुँह झरकाय स्त्रीगण राति में गामक बहार खेत-खेत घुमाय खेलि करथि तथा कार्तिकी पूर्णिमा में विसर्जन कै अपना अपना भाइ कै मिष्ठान्न (दही चूड़ा चीनी आदि) भोजन कराबथि तँ सामा शापसँ मुक्त भै पूर्ववत् स्वरूप मे सुख भोग कै सकैछ।

भगवान् कृष्णक ई कथा सूनि साम्ब अपना देश भरिक स्त्रीगण सँ एहि प्रकार कार्तिक भरि सामा चकबाक खेलि करौलन्हि जाहिसँ सामा दूनू व्यक्ति शाप सँ मुक्त भै पूर्वरूप पाबि भाइ कें आशीर्वाद दै कहलन्हि जे- ” अहॉक आज्ञा सँ जे क्यो चुगिलाक मुँह डाहि, सप्तर्षि ओ हमर पूजा कैलन्हि ओ प्रति कार्तिक में करतीहि से अहीक सन भाए तथा सोहाग ओ सन्तान सँ भरल पूरल रहतीहि।

          सामाक ई कथा सुनबाक चाही।

सामा, रंगलाक बाद आ शीत चटैत सामा
सामा, रंगलाक बाद आ शीत चटैत सामा

All photographs are attributed to Rakesh Kumar

Devotthan Ekadashi

देवोत्थान एकादशी

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कार्तिक शुक्ल एकादशी कें देव उठान, हरिबोधिनी, देवोत्थान, प्रबोधिनी एकादशी सेहो कहल जाइत अछि। मिथिलामे एकर बड महत्त्व अछि। भारतवर्षमे ई एकटा प्रसिद्ध दिन रहल अछि। कालिदास सेहो मेघदूतमे एहि दिनक उल्लेख कएने छथि। मेघदूतमे यक्षक शापक अन्त होएबाक यैह दिन कहल गेल अछि- शापान्तो मे भुजगशयनादुत्थिते शार्ङ्गपाणौ।

मान्यता अछि जे आषाढ शुक्ल एकादशी कें भगवान् लक्ष्मीक संग क्षीरसागरमे शयन करैत छथि। एहि चारि मासकें चातुर्मास्य कहल जाइत अछि। दीपावलीक दिन लक्ष्मी उठैत छथि आ ओकर एगारह दिनक बाद एकादशी कें भगवान् कें उठाओल जाइत अछि।

मिथिलाक परम्परामे ई पूजा सन्ध्या कालमे आँगनमे तुलसीक वृक्ष लग होइत अछि। एतए घरक समस्त उपयोगी वस्तुक अरिपन देल जाइत अछि- जेना, बखाड़, पलंग, हर-हरवाह, खडाँउ, उखडि, ढेकी आदि बखाडक अरिपन पर पानक पात आ धान देल जाइत अछि। अष्टदल कमलक अरिपन पर पीढी राखि ओहि पर गोसाउनिक (तामामे राखल धान जाहि पर लक्ष्मीक नित्य पूजन होइत अछि,) संग विष्णुक पूजा होइत अछि। एहि लेल गोसाउनिक सीर पर राखल ओहि तामाकें बाहर आनल जाइत अछि। तें गोसाउनिक सीरसँ आँगनक पूजास्थान धरि अरिपन पडैत अछि। ओ अरिपन आँगनक पूजास्थल पर बनाओल गेल अष्टदलकमलक अरिपनक संग जुडल रहैत अछि। एकर ई अर्थ थीक जे गोसाउनिक सीर पर सँ तामामे राखल ओहि लक्ष्मीकें पूजास्थल धरि आनल जाइत अछि आ विष्णुक संग हुनक पूजा कएल जाइत अछि।

खडाम आ पलंग

भगवानक पूजाक लेल कुसियारक छीप वला पाँच टा भागक उपयोग होइत अछि। ओही दिन काटल खढसँ लपेटि पाँच खुट्टावला घर बनैत अछि। एक खुट्टा बीचमे आ चारि टा चारू कोन पर लगाए सभटाकें ऊपर बान्हि देल जाइत अछि। पीढी पर ई घर राखि ओहिमे पूजा होइत अछि।

नैवेद्य-

एहिमे अन्नक व्यवहार एकदम वर्जित अछि। अल्हुआ, भेंटक चाउर, सिंहार, आरु, खम्हारु, आदि कन्द-मूल-फल, मखान, दूध, दही एवं सामयिक फल नैवेद्य होइत अछि।

पूजाविधि-

विष्णु आ लक्ष्मीक पूजा कए तथासम्भव उपचार सँ होइत अछि। एकर पूजाविधिमे कोनो विशेष विधान नहिं छैक। मुदा एहि पूजामे तिलक व्यवहार नहिं होइत अछि से वृद्ध-परम्परासँ देखैत आबि रहल छी।

पूजा कए पीढीक चारू कोन पर दीप जराओल जाइत अछि।  भगवान कें आरो व्रत कएनिहारक संग निम्नलिखित मन्त्र पढैत तीन बेर उठाबी।

मन्त्र-

ब्रह्मेन्द्ररुद्रैरभिवन्द्यमानो भवानृषिर्वन्दितवन्दनीयः।

प्राप्ता तवेयं किल कौमुदाख्या जागृष्व जागृष्व च लोकनाथ।।

मेघा गता निर्मलपूर्णचन्द्रशारद्यपुष्पाणि मनोहराणि।

अहं ददानीति च पुण्यहेतोर्जागृष्व जागृष्व च लोकनाथ।।

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते।

त्वया चोत्थीयमानेन   उत्थितं भुवनत्रयम्।।

तकर बाद भरि राति नृत्य-गीतादिक संग जागरण कए प्रातःकाल नित्यक्रिया कए तुलसीदलसँ पारणा करी।

बहुत गोटे नक्त व्रते करैत छथि। अर्थात् सन्ध्याकालमे पूजा सम्पन्न कए रातिएमे एके बेर भगवान् कें अर्पित फल-मूल आदिसँ पारणा करैत अछि। एतए वृद्ध-परम्परासँ देखैत छी जे पारणा करबाक आसन पर बैसि चरणोदक लेल जाइत अछि, पूजा-स्थान पर नहिं।

एकर अगिला दिन द्वादशीकें तुलसी-विवाह होइत अछि जे मिथिलामे प्रचलित नहिं अछि, मुदा विभिन्न ठाकुरबाडीमे एकर आयोजन होइत अछि।

Procedure of Chhath Puja in Mithila

Traditional procedure of Chhath ritual in Mithila region. It is explained by Mm. Rudradhara in his book Varshakrtitya. Some audio files also have been added here for promote this ritual.

छठि पूजा विधि एवं व्रतकथा

सन्ध्याकाल नदी अथवा पोखरिक कछेर पर जाए अपन नित्यकर्म कए अर्थात् सधवा महिला गौरीक पूजा कए आ विधवा विष्णुक पूजा कए पश्चिम मुँहें सूर्यक दिस देखैत कुश, तिल आ जल लए संकल्प करी-

नमोsद्य कार्तिकमासीयशुक्लपक्षीयषष्ठ्यां तिथौ अमुक (अपन गोत्र नाम) गोत्रायाः मम अमुकी (अपन नाम) देव्याः इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सकलदुःखदारिद्र्यसकलपातक-क्षयापस्मारकुष्ठादिमहाव्याधि-सकलरोगक्षय-चिरजीविपुत्रपौत्रादिलाभ-गोधनधान्यादि-समृद्धिसुखसौभाग्यावैधव्य-सकलकलकामावाप्तिकामा अद्य श्वश्च सूर्य्ययार्घमहं दास्ये।

ई संकल्प कए

नमो भगवन् सूर्य इहागच्छ इह तिष्ठ। ई आवाहन कए

तकर बाद दूबि, लाल चानन, अक्षत, घीमे बनल आ गुडक संग बनाओल पकवान लए तामाक अरघामे राखि एहि मन्त्रसँ अर्घ्य दी-

नमोस्तु सूर्याय सहस्रभानवे नमोस्तु वैश्वानरजातवेदसे।

त्वमेव चार्घ्यं प्रतिगृह्ण गृह्ण देवाधिदेवाय नमो नमस्ते।।

नमो भगवते तुभ्यं नमस्ते जातवेदसे।

दत्तमर्घ्यं मया भानो त्वं गृहाण नमोऽस्तु ते।।

ज्योतिर्मय विभो सूर्य तेजोराशे जगत्पते।

अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर।।

एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।

अनुकम्पय मां प्रीत्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर।।

एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।

गृहाणार्घ्यं मया दत्तं संज्ञयासहित प्रभो।।

ई मन्त्र पढि उठैत मुद्रामे अर्घ्य दी।

एहीकालमे जलमे जाए सभटा कोनिया लए हाथ उठाबी। सभ कोनिया पर गायक दूध खसएबाक परम्परा अछि। जेना तामाक अर्घा सँ पहिल बेर अर्घ्य देल गेल तहिना कोनिया वस्तुतः अर्घ्यपात्र थीक से बुझि सूर्यकें ओहिसँ अर्घ्य दी। एकरे हाथ उठाएब कहल जाइत अछि।

तकर बाद सूर्यक पूजा करी।

ललका चानन लए- इदं रक्तचन्दनं नमः सूर्याय नमः।

अक्षत लए- इदमक्षतं नमः सूर्याय नमः।

लाल फूल लए- इदं पुष्पं नमः सूर्याय नमः।

दूबि- इदं दूर्व्वादलं नमः सूर्याय नमः।

बेलपात- इदं बिल्वपत्रं नमः सूर्याय नमः।

वस्त्र- इदं वस्त्रं नमः सूर्याय नमः।

यज्ञोपवीत- इमे यज्ञोपवीते बृहस्पति दैवते नमः सूर्याय नमः।

धूप- एष धूपः नमः सूर्याय नमः।

दीप- एष दीपः नमः सूर्याय नमः।

अनेक प्रकारक नैवेद्य – एतानि नानाविधनैवेद्यानि नमः सूर्याय नमः।

आचमन- इदमाचमनीयं नमः सूर्याय नमः।

पान- इदं ताम्बूलम् नमः।

आधा प्रदक्षिणा- घाटे पर पसारक दूनूकात घुमी।

अन्तमे प्रणाम करी-

जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्

तमोरिसर्व पापघ्नं प्रणतोस्मि दिवाकरम्।।

एकर बाद विष्णु अथवा गौरीक विसर्जन करी।

भिनुसरक अर्घ्य

भिनसरमे पूर्वोक्त विधिसँ पूजा आ अर्घ्य दए कथा सुनी।

(मैथिली मे कथा वला पन्ना खोबाक लेल एतए दबाउ)

(संस्कृतमे कथाक लेल एतए दबाउ)

कथाक बाद सूर्य कें प्रणाम कए हुनक प्रसादमे देल अंकुरी सभ कोनियाँ पर दए दियैक।

तकर बाद गौरी वा विष्णुक  विसर्जन कए दक्षिणा करी-

नमोऽद्य कृतैतत् विवस्वत् षष्ठीव्रतकरणतत्कथाश्रवणप्रतिष्ठार्थमेतावद्-द्रव्यमूल्यकहिरण्यमग्नि-दैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे।

एकर बाद घर पर आबि ब्राह्मण भोजन कराए पारणा करी।


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A list of Flesh-like inauspicious food in Mithila Theology

[पावनि-तिहार अबैत देरी बहुतो गोटे कें ई बुझबाक इच्छा रहैत छनि जे कोन वस्तु भक्ष्य थीक आ कोन अभक्ष्य। धर्मशास्त्रमें भक्ष्याभक्ष्यनिरूपणक नामसँ प्रसंग आएल अछि। मिथिलामे जे भक्ष्याभक्ष्यक विधान अछि तकर संकलन कृत्यसारसमुच्चयक सम्पादक पं. गङ्गाधर मिश्र नीक जकाँ कएने छथि। सहरसा जिलाक बनगामक वासी पं. गङ्गाधर मिश्र अपना कालक श्रेष्ठ विद्वान् रहथि। हुनक पुत्र डा. काशीनाथ मिश्र वर्तमानमे उद्भट विद्वानक रूपमे ख्यात छथि। पं. गङ्गाधर मिश्रक द्वारा टिप्पणी भागमे जे आमिष आ हविष्यान्नक विवेचन कएल गेल अछि से मैथिलीमे एतए प्रस्तुत अछि।]

निरामिष

(भोजनक लेल पवित्र वस्तुक सूची)

Read also>> A list of Auspicious Food for Offering to God and Ancestors>> हविष्य

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[पावनि-तिहार अबैत देरी बहुतो गोटे कें ई बुझबाक इच्छा रहैत छनि जे कोन वस्तु भक्ष्य थीक आ कोन अभक्ष्य। धर्मशास्त्रमें भक्ष्याभक्ष्यनिरूपणक नामसँ प्रसंग आएल अछि। मिथिलामे जे भक्ष्याभक्ष्यक विधान अछि तकर संकलन कृत्यसारसमुच्चयक सम्पादक पं. गङ्गाधर मिश्र नीक जकाँ कएने छथि। सहरसा जिलाक बनगामक वासी पं. गङ्गाधर मिश्र अपना कालक श्रेष्ठ विद्वान् रहथि। हुनक पुत्र डा. काशीनाथ मिश्र वर्तमानमे उद्भट विद्वानक रूपमे ख्यात छथि। पं. गङ्गाधर मिश्रक द्वारा टिप्पणी भागमे जे आमिष आ हविष्यान्नक विवेचन कएल गेल अछि से मैथिलीमे एतए प्रस्तुत अछि।]

बहुतो गोटे कें ई सूची देखला पर अनेक प्रकारक जिज्ञासा होएतनि। ई किए आ ई किए नै- से प्रश्न उठतनि। हुनकालोकनिक लेल कोनो उत्तर नहिं। पं. मिश्र जे लिखने छथि से हम उतारि रहल छी।


आमिष शब्दक सामान्य अर्थ अछि माँस। जे आमिष नहिं कहल जाइत अछि से भेल निरामिष। मुदा शास्त्रमे आमिष शब्द पारिभाषिक थीक। किछु खाएवला वस्तु कें आमिषक संज्ञा देल गेल अछि। एहिमे किछु अन्न, फल, मूल आदि सेहो छैक तें शास्त्र मे जे जे वस्तु आमिष अथवा सामिष मानि लेल गेल अछि, तकर भिन्न वस्तु भेल निरामिष।

तें एतए हम आमिषक अन्तर्गत राखल वस्तुक सूची दैत छी। जतए जतए निरामिष भोजनक चर्चा छैक ओतए एतेक वस्तु वर्जित बूझल जाए।

  1. कोनो जीव-जन्तुक हड्डी मिश्रित अथवा सूडा, पीलू आदि लागल कोनो वस्तु।
  2. डोका, सितुआ सँ बनाओल चून।
  3. चमडाक बनाओल बासन में राखल जल, जे विशेष रूपसँ मरुस्थल में व्यवहार होइत छल।
  4. जम्बीरी नेबो। एकरासँ भिन्न कमला, कागजी आदि नेबो पवित्र होइत अछि।
  5. बीजपूरक टाभ नेवो रूपमे प्रसिद्ध।
  6. उडीद। मुदा जँ ओ उडीद देवता अथवा पितर कें चढाओल गेल अछि आ ओकर शेष भाग बचि गेल अछि तँ ओ आमिष नहिं कहाओत। तें यज्ञसँ बँचल जे शेष उडीद से खाएल जा सकैत अछि।
  7. जे कोनो वस्तु आमिष कहल गेल अछि सेहो जँ विष्णु कें निवेदित कए देल जाए तँ ओहो निरामिष भेल।
  8. कोनो निरामिषो वस्तु जँ विष्णु कें निवेदित नहिं कएल गेल अछि तँ ओहो आमिष भेल।
  9. बदाम, गहूम आदिक ओरहा सेहो आमिष थीक। जेना केराव, बदाम आदि कें जँ लत्ती अथवा गाछक संगहिं आगिमे झाडकाए देल जाए तँ ओकरा आमिष मानल गेल अछि।
  10. जौ के ओरहा।
  11. मसुरी
  12. गाभिन गायक दूध।
  13. जाहि गायक बच्चा मरि गेल गेल हो।
  14. महिंसक दूध, दही घी इत्यादि सभ वस्तु।
  15. बकरी आ भेडीक दूध इत्यादि सभ वस्तु।
  16. जे गाय अपन बच्चा कें दूध पियबैत हो, अपवित्र वस्तु नहिं खाइत हो, दोसराक बच्चा कें दूध नै पियाबैत हो, ओकरा थनमे कोनो नै रहैक रोग रहैक ओकरे दूध आदि हविष्य थीक। एहिसँ भिन्न गायोक दूध आमिष थीक।
  17. मनुष्यक दूध।
  18. उसना चाउर।
  19. मूर (लहसुन, पियाजु, गाजर आ मूर सभकें एके कोटिमे राखल गेल अछि।)
  20. बोडा, कुरथी, कोदो, मडुआ, आंसु धान, ई सभ आमिष थीक।
  21. गुड़। प्राचीन काल मे कुसियारक रस दए पकवान आदि बनैत छल। जेना कृत्यकल्पतरु आदिमे सूर्यक प्रसादक रूपमे कासार आ सितासार आदिक निर्माण विधिमे देल अछि। बादमे गुडक व्यवहार होमए लागल। गुड जँ अपना ओतए पवित्रतापूर्वक बनाओल जाए तँ व्यवहार कएल जा सकैत अछि। वर्तमान मे चीनी अपवित्र तथा गुड पव्त्र मानि लेल गेल अछि।

Procedure of  Bhai dooj in Mithila


मिथिलाक परम्परामे भ्रातृद्वितीयाक स्वरूप

⇐ एकर पौराणिक महत्त्व आ विवेचन

एहि दिन मिथिलामें सभसँ पहिने आँगनसँ दरुखा धरि बाट निपबाक प्रथा अछि। भाव ई छैक जे भाइ बाहरसँ औताह तँ हुनका लेल बाट नापि राखल जाए।

अरिपन

आँगनमे अरिपन देल जाइत अछि, आ ओकर पश्चिम मे अरिपन देल पीढी राखल जाइत अछि। अरिपनक बीच  अढिया मे पानक पात, लवंग इलायची, कुम्हरक फूल, सुपारी देल रहैत अछि। आ एक लोटामे अच्छिन्न जल (जाहि लोटासँ जल लए आन काजमे व्यवहार नहिं भेल हो) आ सिन्दूर पिठार राखल रहैत अछि। भाइक अएला पर ओ धुरिआएले पएरें (अर्थात् पयर धोनहिं बिना) तौनी-पाग नेने पिढी पर पूव मुँहें आँजुर बान्हि बैसैत छथि। बहिन हुनक दुनू हाथ आ पयरमे पिछार आ सिन्दूर लगाए हुनक अंजलि मे ओ पान आदि अढियामे राखल वस्तु दैत छथि। तखनि ठाढ भए निहुरि ओहि भायक आँजुर मे जल खसबैत मन्त्र पढैत छथि-

भ्रातस्तवाग्रजाताहं भुङ्क्ष्व भक्तमिदं शुभम्।

प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः।।

अर्थात् हे भाइ हम अहाँक जेठ बहिन छी। अहाँ यमराज आ विशेष रूपसँ यमुनाक प्रसन्नता लेल एहि भातक भोजन करू।

एहि मन्त्रसँ बहिन भाइ कें भोजन करबाक निमित्त आमन्त्रण दैत छथिन। एकरा नोंत लेब कहल जाइत अछि।

जँ बहिन छोट रहथि तँ मन्त्र एना होएत-

भ्रातस्तवानुजाताहं भुङ्क्ष्व भक्तमिदं शुभम्।

प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः।।

अर्थात् हे भाइ, हम अहाँक छोट बहिन छी। अहाँ यमराज आ विशेष रूपसँ यमुनाक प्रसन्नता लेल एहि भातक भोजन करू।

संस्कृतमे जँ नहिं पढि सकी तँ मैथिलीमे कही-

यमुना नोतलनि यमकें हम नोतै छी भाइकें।

हमरा नोतने भाइक अरुदा बढै।

ई  तीन बेरि प्रक्रिया कएल जाइत अछि। अन्तमे पयर पर लागल सिन्दूर-पिटार पोछि देल जाइत अछि आ भाइक माथमे सिन्दूरक ठोप कए देल जाइत अछि।

भरदुतियाक अरिपन
भरदुतियाक अरिपन

बहिन अथवा भाइ मे सँ जे छोट रहैत छथि से दोसर कें गोड़ लगैत छथिन्ह।

एकर बाद भाई कें यथास्थान घरमे बैसाए डालीमे केरा, मखान, मेवा, फल, मधुर आदि बिगजी (भेषजी) क रूप मे दैत छथिन जाहिमे अंकुरी अवश्य रहैत अछि। अंकुरी सामान्यतः केरावक होइत अछि, मुदा कतहु कतहु बदामक सेहो व्यवहार सुनबामे आएल अछि। ई अन्न थीक जे बहिन अपना हाथसँ भाइक हाथमे दैत छथि।

एकर बाद सुविधानुसार भाइ बहिनक घरमे ठाम अन्न खाइत छथि आ अपना दिस सँ आनल सनेस वस्त्र, आभूषण अथवा नगदी रुपैया दैत छथिन्ह।

Bhai dooj

भ्रातृ-द्वितीया

भ्रातृ द्वितीया यानी भैयादूज भाई-बहन के लिए मुख्य पर्व है। इसमें बहन अपने भाई की लम्बी आयु के लिए प्रार्थना करती है। कहा गया है कि इससे बहन का भी सुहाग बढता है।

कहा जाता है कि सूर्य के पुत्र यमराज इस दिन अपनी बहन यमुना के पास जाते हैं और उनके घर अन्न ग्रहण करते हैं। अतः इस दिन जो भाई बहन के घर खाना खाता है उसकी लम्बी उम्र होती है तथा बहन का भी भाग-सुहाग बढता है। इस प्रकार यह पर्व भारत में प्राचीन काल से मनाया जाता है।

भ्रातृ-द्वितीया

Read also>> Procedure of  Bhai dooj in Mithila>>

भ्रातृ द्वितीया यानी भैयादूज भाई-बहन के लिए मुख्य पर्व है। इसमें बहन अपने भाई की लम्बी आयु के लिए प्रार्थना करती है। कहा गया है कि इससे बहन का भी सुहाग बढता है।

कहा जाता है कि सूर्य के पुत्र यमराज इस दिन अपनी बहन यमुना के पास जाते हैं और उनके घर अन्न ग्रहण करते हैं। अतः इस दिन जो भाई बहन के घर खाना खाता है उसकी लम्बी उम्र होती है तथा बहन का भी भाग-सुहाग बढता है। इस प्रकार यह पर्व भारत में प्राचीन काल से मनाया जाता है।

हेमाद्रि ने चतुर्वर्गचिन्तामणि के व्रतखण्डमे इसके सम्बन्ध में उद्धृत करते हुए लिखा है कि

कार्तिके शुक्लपक्षस्य द्वितीयायां युधिष्ठिर।

यमो यमुनया पूर्वं भोजितः स्वगृहे सदा।

द्वितीयायां महोत्सर्गे नारकीयाश्च तर्पिताः।।

पापेभ्योपि विमुक्तास्ते मुक्ताः सर्वनिबन्धनात्।

भ्रंशिताश्चातिसन्तुष्टाः स्थिताः सर्वे यदृच्छया।

तेषां महोत्सवो वृत्तो यमराष्ट्रसुखावहः।

हे युधिष्ठिर, कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को यमुना ने पूर्व काल में यम को भोजन कराया था जिसके कारण प्रलय के कालमे नरक में वास करनेवाले सभी तृप्त हो गये थे तथा पापों से मुक्त होकर सभी बन्धनों से मुक्त हो गये थे और नरक से गिरकर प्रसन्न होकर अपनी इच्छानुसार रहने लगे थे यम के राज्य में उनके लिए सुख देने वाला महान् उत्सव हुआ था।

अतो यमद्वितीया सा प्रोक्ता लोके युधिष्ठिर!

अस्यां निजगृहे पार्थ! न भोक्तव्यमतो बुधैः।

स्नेहेन भगिनीहस्ताद्भोक्तव्यं पुष्टिवर्द्धनम्”। 

हे युधिष्ठिर, इसलिए यह यम-द्वितायी कहलाती है। इस दिन बुद्धिमान लोगों अपने घर में भोजन नहीं करना चाहिए। वे स्नेहपूर्वक बहन के घर भोजन करे, जिससे उनकी वृद्धि होगी।

वर्तमान में यह अंश पद्मपुराण के उत्तर खण्ड के कार्तिक माहात्म्य में 122वें अध्याय में इस प्रकार उपलब्ध है। यहाँ यमपूजा का भी उल्लेख है, जो अब अप्रचलित हो गयी है।

कार्तिके च द्वितीयायां पूर्वाह्णे यममर्चयेत्

भानुजायां नरः स्नात्वा यमलोकं न पश्यति ९२

अर्थात् कार्तिक द्वितीया को पूर्वाह्ण में यानी लगभग 10.30 बजे से पहले यमराज की पूजा करनी चाहिए। यमुना नदी मे स्नान कर वे यमलोक नहीं देखते, अर्थात् मुक्त हो जाते हैं।

हेमाद्रि के चतुर्वर्गचिन्तामणि में उर उद्धृत पंक्तियों के बाद मूल पुराण में भ्रातृद्वितायी के दिन भाई के कर्तव्यों का विधान किया गया है-

दानानि च प्रदेयानि भगिनीभ्यो विधानतः ९७

स्वर्णालंकारवस्त्राणि पूजासत्कारसंयुतम्

भोक्तव्यं सहजायाश्च भगिन्या हस्ततः परम् ९८

सर्वासु भगिनीहस्ताद्भोक्तव्यं बलवर्द्धनम्।।

भाई को चाहिए कि वह बहन को विधानपूर्वक सोना, गहना, वस्त्र आदि आदरपूर्वक दे और सगी बहन के हाथ का दिया हुआ भोजन करे। सभी तिथियों में बहन के हाथ का भोजन पुष्टि देता है।

आगे यमराज को प्रणाम करने का मन्त्र दिया गया है-

ऊर्जे शुक्लद्वितीयायां पूजितस्तर्पितो यमः ९९

महिषासनमारूढो दंडमुद्गरभृत्प्रभुः

वेष्टितः किंकरैर्हृष्टैस्तस्मै याम्यात्मने नमः 6.122.100

अर्थात् कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया को पूजित एवं सन्तुष्ट किये गये यमराज जो महिष के आसन पर बैठे हुए हैं और हाथ में दण्ड धारण किये हुए हैं, वे प्रभु यमराज अपने प्रन्न सेवकों से घिरे हुए हैं उन्हें प्रणाम।
यैर्भगिन्यः सुवासिन्यो वस्त्रदानादि तोषिताः।

न तेषां वत्सरं यावत्कलहो न रिपोर्भयम् १०१।।

धन्यं यशस्यमायुष्यं धर्मकामार्थसाधनम्।

व्याख्यातं सकलं पुत्र सरहस्यं मयानघ।। १०२।।

जो घर की सुवासिनी बहनों को वस्त्र आदि से प्रसन्न करते हैं उनके घर में न तो कभी कलह होता है न उन्हें शत्रु का भय रहता है। इससे धन, यश, आयु की वृद्धि होती है तथा यह धर्म अर्थ एवं काम इन तीनों की प्राप्ति कराता है। हे पवित्र मनवाले युधिष्ठिर मेंने रहस्यें के साथ आपको सारी बातें सुना दी।
यस्यां तिथौ यमुनया यमराजदेवः संभोजितः प्रतितिथौ स्वसृसौहृदेन।

तस्मात्स्वसुः करतलादिह यो भुनक्ति प्राप्नोति वित्तशुभसंपदमुत्तमां सः।। १०३

इति श्रीपाद्मेमहापुराणे पंचपंचाशत्ससहस्रसंहितायामुत्तरखंडे कार्तिकमाहात्म्ये द्वाविंशत्यधिकशत-तमोऽध्यायः १२२

जिस दिन यमुना ने यमराज को बहन होने के स्नेह के साथ भोजन कराया था अथवा दिस किसी भी दिन यमुना ने भोजन कराया उस दिन से जो व्यक्ति बहन के हाथ का दिया हुआ भोजन करता है, वह धन एवं उत्तम संपदा पाता है।


“पितृव्यभगिनीहस्तान् प्रथमायां युधिष्ठिर । 

मातुलस्य सुताहस्ताद् द्वितीयायां तथा।।

चचेरी बहन के यहाँ प्रतिपदा के दिन भोजन करना चाहिए तथा ममेरी बहन के घर द्वितीया के दिन।


कृत्यरत्नाकर में चण्डेश्वर ने शिष्ट वचन के अनुसार कार्तिक शुक्ल द्वितीया के कर्तव्यों के सम्बन्धमें कहा है। यहाँ मैथिल परम्परा का उल्लेख करते हुए विशेष बात कही गयी है कि यदि सम्बन्ध से बहन न रहे तो किसी भी स्त्री को बहन बनाकर उनका आदर सत्कार करना चाहिए और उनके घर जाकर भोजन करना चाहिए।

शिष्टाः

कार्तिकेशुक्लपक्षस्य द्वितीयायां युधिष्ठिर।

यमो यमुनया पूर्व्वे भोजितः स्वगृहे तदा।।

अतो यमद्वितीया सा ख्याता लोके युधिष्ठिर।

तस्यां निजगृहे पार्थ न भोक्तव्यं बुधैरतः।।

यत्नेन भगिनीहस्ताद् भोक्तव्यं पुष्टिवर्द्धनम्।

स्वर्णालङ्कारवस्त्रादि पूजासम्भारभोजनैः।।

सर्वाः भगिन्यः सम्पूज्यास्त्वभावे प्रतिपन्निकाः।।

प्रतिपन्निका भगिन्यभावे प्रतिपन्नात्मानः।।

(पृ. 413. कोलकाता संस्करण, पं. कमलाकृष्ण स्मृतितीर्थ, 1925)


कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि व्रत-पर्व की दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है। इस दिन अनेक व्रतों का उल्लेख हुआ है।


सरस्वती पूजा

पद्मपुराण में ही कार्तिक माहात्म्य में इस दिन अनेक व्रतों का उल्लेख हुआ है, जिनमें एक सरस्वतीपूजा का भी विधान है। यहाँ कहा गया है कि प्रतिपदा तिथि को, जिस दिन अध्यायन करने का निषेध किया गया है, उस दिन भूल से छात्रों को पढाने के पापों से मुक्ति के लिए कार्तिक शुक्ल द्वितीया को सरस्वती पूजा करनी चाहिए।


चित्रगुप्त पूजा-

इस दिन कायस्थ लोग जो अपने को यमराज के मन्त्री चित्रगुप्त महाराज की संतति मानते हैं वे चित्रगुप्त की पूजा करते हैं, जिसमें लेखन सामग्री की विशेष पूजा होती है। मिथिला की परम्परा में रुद्रधर ने भविष्य-पुराण से चित्रगुप्त पूजा की विधि दी है।


इस प्रकार हमारी परम्परा में भाई-बहन से सम्बन्धित पर्व भैया दूज है। बादमे चलकर मुगलकाल में भाई को राखी बाँधकर बहन अपनी रक्षा के लिए गुहार लगाने लगी। रक्षाबन्धन यानी राखी की परिकल्पना में बहन को कमजोर मान लिया गया। जबकि भैया दूज की परम्परा में बहन के आत्म-सम्मान एवं आध्यात्मिक शक्ति-सम्पन्न होने की बात कही गयी है। भैयादूज के सन्दर्भ में बहन कही से भी कमजोर नहीं है। बह अपनी आध्यात्मिक शक्ति से भाई का कल्याण करती है। इसलिए हमें फिर से विचार करना होगा कि सनातन परम्परा में बहन को या कतिसी भी महिला को हम कितना सम्मान एवं महत्त्व देते रहे हैं। हमारे पर्व-त्योहारों के स्वरूप को बदलकर आज हमें विकृत कर दिया गया है। हमारी आवश्यकता है कि अपने पर्वों और त्योहारों को मूल रूप में अपनाएँ, उसका मूल स्वरूप देखें और तब कोई निर्णय लें।

Dhanteras, the Dhanvantari Jayanti

Dhanvantari Jayanti

धनतेरस का वास्तविक स्वरूप

आधुनिक बाजारवाद के कारण धन्वन्तरि त्रयोदशी को धनतेरस से जोडकर उसे सामानों की खरीद-बिक्री का दिन बना दिया गया है। जबकि पुराणों के अनुसार वह दिन अमृत कलश के साथ भगवान् धन्वन्तरि की उत्पत्ति का दिन है। इस दिन लोग, विशेष रूप से वैद्य भगवान् धन्वन्तरि की उपासना करते हैं और उनकी कृपा से सभी लोगों के स्वस्थ रहने की प्रार्थना करते हैं।

तिजौरी की पूजा करने का उल्लेख

19वीं शती के अन्त में गुजरात मे इस पर्व का सम्बन्ध व्यापारियों से भी देखा जाता है। उस काल में व्यापारीगण अपनी तिजौरी की पूजा करते थे तथा धन की देवी की पूजा करते थे तथा धन की कमी न होने की प्रार्थना करते थे-

Dhana Terasa And Kali Chaoodasa.

Twenty days after Dasara is Diwa’li. It commences on the 12th of the dark part of the month. That day is Vagha Barasa or Guru Dwddashi. The day after Barasa is Dhan Teras or Dhan Trayodashi, when the merchant brings together his hoards into one room, and after gloating over the heap, offers prayers to it, sprinkles it with red ochre, and kneeling, requests the presiding deity not to take unto her wings. The deity presiding over wealth is Lakshmi. Then comes Kali Chaoodasa or Narlca Ghaturdashi, observed in honour of Vishnu’s victory over Narakasura. The most effective illumination is on this or the following day. The housewife gets up early in the morning, sets a lamp burning in each nook and corner of the house, rubs herself and children, and even her lord, with ointment, and performs hot-water ablutions. The hotter the liquid the greater the efficacy of the prayer following. No little urchin in the bouse can escape a good smothering bath, and happy he whose skin does not peel off under the operation. The mistress of the house then performs drti with a lamp in a brass plate in her hand, and receives various presents. (Gujarát and the Gujarátis: Pictures of Men and Manners Taken from Life By Behramji Merwanji Malabari, Calcutta, 2nd edition, 1884. p. 344

लेकिन आज स्थिति यह हो गयी है कि पूजा-पाठ पर से लोग हँटकर केवल भौतिक फायदे की बात देखने लगे हैं।


अमृत की उत्पत्ति-

समुद्रमन्थन की कथा के अनुसार भगवान् धन्वन्तरि इसी दिन अमृत-कलश के साथ उत्पन्न हुए थे-

अथोदधेर्मथ्यमानात्काश्यपैरमृतार्थिभिः।
उदतिष्ठन्महाराज पुरुषः परमाद्भुतः।।३२।।

अमृत की चाहत रखनेवाले देवों और दैत्यों को द्वारा आगे मथे जाने पर समुद्र से परम अद्भुत पुरुष की उत्पत्ति हुई।

दीर्घपीवरदोर्दण्डः कम्बुग्रीवोऽरुणेक्षणः।

श्यामलस्तरुणः स्रग्वी सर्वाभरणभूषितः।।३३।।

उनकी बड़ी-बड़ी स्थूल भुजाएँ थीं, गला शंख के समान सुन्दर था तथा उनकी आँखें लाल थीं। माला एवं सभी आभूषणों को धारण किये हुए वे साँवले रंग के युवा पुरुष थे।

पीतवासा महोरस्कः सुमृष्टमणिकुण्डलः।

स्निग्धकुञ्चितकेशान्त सुभगः सिंहविक्रमः।।३४।।

उनके वस्त्र पीले थे, चौडी छाती, अच्छी तरह से तराशे गये मणि सहित कुण्डल उनके कानों में थे। कोमल एवं घुघराले बाल थे जो सुन्दर दीख रहे थे। उऩका पराक्रम सिंह के समान था।

अमृतापूर्णकलसं बिभ्रद्वलयभूषितः।

स वै भगवतः साक्षाद्विष्णोरंशांशसम्भवः।। ३५।।

अमृत से भरा हुआ घड़ा लिये हुए तथा कंगन पहने हुए वे साक्षात् भगवान् विष्णु के अंश के रूप में उत्पन्न हुए थे।

धन्वन्तरिरिति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक्।

तमालोक्यासुराः सर्वे कलसं चामृताभृतम्।।३६।।

लिप्सन्तः सर्ववस्तूनि कलसं तरसाहरन्। (भागवत- 8.8)

उनका नाम धन्वन्तरि था जो आयुर्वेद के द्रष्टा, ऋग्वेद, एवं यजुर्वेद के ज्ञाता थे। उन्हें तथा अमृत भरे हुए कलश को देखकर सभी दैत्यों ने  सारी वस्तुए पाने की इच्छा से उस कलश को झपट लिया।

भगवत पुराण के उपर्युक्त मन्त्र से प्रणाम करें।

धनतेरस के दिन अमृतीकरण प्रयोग>>

Tradition of Diwali in Mithila

मिथिलामे दीपावलीक दिन ऊक फेरबाक परम्परा

भवनाथ झा

तीन प्रकारक जे रात्रि कालरात्रि, महारात्रि आ मोहरात्रि कहल गेल अछि ताहि में पहिल कालरात्रि दीपावली थिक। मिथिलामे ई गृहस्थक लेल महत्त्वपूर्ण अछि। आई जखनि बहुत मैथिल बन्धु बाहर रहैत छथि, बहुतो गोटे परम्परा सँ अनभिज्ञ छथि तखनि हुनका लोकनिक लेल एतए हम मिथिलाक परम्पराक उल्लेख करैत छी। परदेसमे एकर निर्वाह तँ कठिन अछि मुदा जानकारी अधलाह नहिं। बहुत विधि छैक जे कएल जा सकैत अछि।
मिथिलामे दीपावली कें सुखराती कहल जाईत अछि। सन्ध्याकाल गोसाउनिक पूजा कए दुआरि पर अरिपन दए चौखटि पर दीप जराओल जाइछ। दुआरिक वामाकात उनटल उखरि पर सूपमें पानक पात आ धान राखल जाइत अछि। पुरुष गण ऊक हाथ में लए दुआरि पर आबि ओ धान तीन बेर घरक भीतर छीटैत छथि आ कहैत छथिन :-
धन-धान्य लए लक्ष्मी घर जाउ, दारिद्र्य बहार होउ।’
एकर बाद चौकठि पर बाड़ल दीप सँ ऊक में आगि लगाए अपन आलय में ऊक फेरैत छथि। एहि ऊकमे मात्र 5 बंधन रहैत अछि आ बीच में एकटा संठी देल जाइत अछि। ऊक फेरैत काल परम्परा सँ प्राप्त ई मन्त्र पढ़ल जाइत अछि : (देखू – कृत्यसारसमुच्चय
ऊक के हाथमें लेबाक मन्त्र-
शस्त्राशस्त्रहतानाञ्च भूतानां भूतदर्शयो:।
उज्ज्वलज्योतिषा देहं निर्दहे व्योमवह्निना।
ऊक फेरबाक मन्त्र-
अग्निदग्धाश्च ये जीवा: येऽप्यदग्धाः कुले मम।
उज्ज्वलज्योतिषा दग्धास्ते यान्तु परमां गतिम्।
ऊक विसर्जित करबाक मन्त्र मन्त्र-
यमलोकं परित्यज्य आगता ये ममालये
उज्ज्वलज्योतिषा वर्त्म प्रपश्यन्तो व्रजन्तु ते॥
ई उल्काभ्रमण अपन पूर्वज लोकनिक प्रति पितृकर्म थिक। एहि मन्त्रसभक भाव अछि जे हमर कुल मे जे केओ शस्त्र सँ अथवा आन तरहें मारल गेलाह, हुनक दाहसंस्कार ठीक सँ नहिं भेलनि अथवा यमलोक के छोड़ि जे हमर आलय मे आएल होथि ओ परम गति कें प्राप्त करथि।’
एकर बाद कुमारिमे भगवतीक ध्यान करैत वस्त्र आदि दए भोजन कराओल जाईत अछि। ओहि ऊक सँ अधजरल संठी सभ केओ आनि गोसाउनिक सीर पर रखैत छथि आ भगवतीक विविध प्रकारें स्तुति कए चाँदी अथवा सोना हाथ में धरैत छथि। एकर बाद नैवेद्य खाइत छथि। ओहि राति भात खएबाक परम्परा अछि।
बहुत दिन पहिने नव विवाहित दम्पती कें एकठाम सुताए कम्बल सँ झाँपि सुखरातीक चुमाओन होइत छल, मुदा आब ई समाप्त भए गेल अछि।
रातिमे सुखद शयन करी। राति बितला पर अन्हरोखे घरक प्रधान महिला द्वारा पुरान सूपके गोसाउनिक सीर पर राखल गेल संठीक खोरनाठ सँ डेङबैत आलय में घुमबाक परम्परा अछि। अन्तमे ओ सूप आ संठी आलय सँ बाहर फेकि देल जाइछ। ई ‘दरिद्रापसारण’ थिक।
एहि राति केओ केओ साधक उड़ीद उसनि ओहिमे दही मिलाए अपन आलयक पश्चिम-उत्तर कोणमे ‘शिवाबलि’ गीदड़-गिदड़नीक भोजन दैत छलाह। जँ गीदड-गिदरनी भोजन ग्रहण नहिं कएलक तँ अनिष्टक आशंक होइत छल।