Shravan Kumar Awards instituted by Mahavir Mandir Trust

Shravan kumar

महावीर मन्दिर द्वारा संचालित श्रवण कुमार पुरस्कार योजना अनुशंसा के अभाव में बाधित

अनुशंसा आमन्त्रित>>

वृद्धों के हित के लिए महावीर मन्दिर द्वारा सार्थक प्रयास

यावद्वित्तोपार्जनशक्तस्तावद् निजपरिवारो रक्तः।

पश्चाद् जीवति जर्जरदेहे वार्ताम् कोऽपि न पृच्छति गेहे।।

-आदि शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य ने आज से करीब 1200 वर्ष पूर्व वृद्धों के विषय में जो बातें लिखी थीं, वह आज भी हम समाज में पाते हैं। वृद्ध होने पर अधिकांश लोगों की दशा दयनीय हो जाती है। संयुक्त परिवार की टूटती हुई अवधारणा ने तो उन्हें और चिन्तनीय स्थिति में खड़ा कर दिया है। पुत्रियाँ ससुराल चली जाती हए नौकरीपेशा पुत्र अपने ध्रुवीकृत परिवार को लेकर या तो दूर स्थान पर चले जाते हैं या एक ही साथ रहते हुए भी इतने आत्मकेन्द्रित हो जाते हैं कि माता-पिता के लिए उनके पास फुरसत नहीं रह जाती है। घर में रखे फालतू सामान की तरह माता-पिता के साथ होता हुआ व्यवहार आज का यथार्थ बनता जा रहा है, जो चिन्तनीय है।

लेकिन आज भी हम हताश नहीं है। ‘अन्धेरा अन्धेरा’ चिल्लाने के बजाय एक नन्हा-सा दीया भी जलाने का उपाय यदि शेष है तो हमें आशा की एक किरण देखनी होगी। हमारी सभ्यता ‘मातृ-देवो भव’, ‘पितृ-देवो भव’ की है। हमारे आदर्श श्रवण कुमार हैं। आज भी भारत पूर्णतः अपसंस्कृत नहीं हुआ है। हमें विश्वास है कि वर्तमान में भी अनेक ‘श्रवण कुमार’ सब कुछ छोड़कर, माता-पिता की सेवा कर रहे है। पुत्रियाँ भी इस कार्य में पीछे नहीं हैं। इनके कार्यों को सम्मान देकर, इनके कार्यों को प्रसारित करने की आज आवश्यकता है, ताकि समाज इनसे प्रेरणा ग्रहण करे और फिर से हमारे आदर्शों की स्थापना हो सके। समाज को एक दिशा मिले, इसके लिए सामाजिक संस्थाओं को आगे आना होगा, ताकि ऐसे पुत्रों और पुत्रियों के कार्यों को प्रचारित-प्रसारित उनके आदर्शों को महिमामण्डित करे।

बिहार के प्रसिद्ध महावीर मन्दिर, पटना के द्वारा ‘श्रवण कुमार पुरस्कार योजना’ की घोषणा इस दिशा में किया गया श्लाघ्य प्रयास है। 2010 ई. से यह योजना चल रही है। हनुमान् मन्दिर की न्यास समिति श्री महावीर स्थान न्यास समिति, पटना के द्वारा प्रत्येक वर्ष शारीरिक एवं आर्थिक दृष्टि से कमजोर माता-पिता की उत्कृष्ट सेवा करनेवाले पुत्रों एवं पुत्रियों को प्रोत्साहित करने के लिए श्रवण कुमार पुरस्कार की योजना चल रही है।

यह पुरस्कार ऐसे लोगों को दिया जाता है, जो स्वयं शारीरिक एवं आर्थिक रूप में आस्थापूर्वक निःस्वार्थ भाव से अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा कर रहे हैं तथा समाज में चर्चा का विषय बन चुके हैं, एवं जिनका आदर्श अन्य लोगों के लिए भी प्रेरणाप्रद बन गया है। इस प्रकार माता-पिता की निःस्वार्थ सेवा वस्तुतः व्यक्तिगत रूप से की गयी सेवा मानी जायेगी, न कि वृद्धाश्रम के माध्यम से। इस पुरस्कार के लिए महावीर मन्दिर न्यास समिति के द्वारा राज्य मानवाधिकार आयोग के वर्तमान अध्यक्ष, अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति एस. एन. झा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी है।

इस पुरस्कार के लिए कोई पदाधिकारी, चिकित्सक, स्वयंसेवी संस्थाएँ, मुखिया, सरपंच या कोई जिम्मेदार व्यक्ति नाम की अनुशंसा निःस्वार्थ सेवा सम्बन्धी विभिन्न साक्ष्यों को संलग्न करते हुए महावीर मन्दिर के कार्यालय में भेज सकते हैं। इसके तहत प्रथम पुरस्कार 1 लाख, द्वितीय पुरस्कार 50 हजार, तृतीय पुरस्कार 25 हजार एवं 5 व्यक्तियों को सान्त्वना पुरस्कार 5 हजार रुपये देने की घोषणा की गयी है।

प्रथम बार 2010 ई. में जानकी नवमी के अवसर पर दिनांक 23 मई को इस पुरस्कार का वितरण किया गया। इस वर्ष एक लाख के प्रथम पुरस्कार के लिए किसी को भी उपयुक्त नहीं पाया गया। द्वितीय पुरस्कार के लिए श्रीमती किरण देवी, ग्राम-पो.- मड़वा, प्रखण्ड- बिहपुर, जिला- भागलपुर को उपयुक्त पाया गया। वे अपने लकबाग्रस्त माँ की सेवा 20 वर्षों तक करती रहीं। इनके लिए जिला प्रशासन की भी अनुशंसा मिली थी। इन्हें 50,000 रुपये की राशि एवं प्रशस्ति-पत्रा से पुरस्कृत किया गया। तृतीय पुरस्कार निम्नलिखित दो व्यक्तियों को दिया गया। इनमें से प्रत्येक को 25,000 रुपये की राशि एवं प्रशस्ति-पत्र पुरस्कार स्वरूप दिया गया। इन दोनों के नाम हैं-

(1) श्री सुनील उपाध्याय, ग्राम-सदाबेह, थाना-दुल्हिन बाजार, बिक्रम, पटना।

(2) श्री पंकज कुमार, ग्राम-कुरौनी, पंचायत-मेहुस, जिला- शेखपुरा। प्रोत्साहन पुरस्कार छः व्यक्तियों को देने का निर्णय लिया गया।

इसके बाद अगले वर्ष 2011 में भी 11 मई को एक लाख के प्रथम पुरस्कार के लिए श्री शिव कुमार का चयन किया गया। ग्राम+पो.- धनगाँवा, जहानाबाद के मूल निवासी एवं पेशा से  प्राइवेट शिक्षक श्री शिव कुमार अपनी लाचार माँ को बँहगी पर लादकर तीर्थाटन कराते रहे हैं, जिसकी चर्चा समाचार पत्रों में भी हुई है।

द्वितीय पुरस्कार ग्राम- इसहपुर, रामनगर, सनकोर्थु सरिसब-पाही, जिला मधुबनी के निवासी श्री उदय कुमार झा को दिया, जो 10-12 वर्शों से रोगग्रस्त, उठने-बैठने में भी असमर्थ 97 वर्षीय पिता तथा अन्धी माता की सेवा पति-पत्नी मिलकर करते रहे हैं। इन्हें 50,000 रुपये की राशि एवं प्रशस्ति-पत्र से पुरस्कृत किया गया।

तृतीय पुरस्कार के लिए ग्राम इनरवा, डाकघर औरैया, थाना आदापुर, पूर्वी चम्पारण के मूल निवासी मो. तुफैल अहमद को दिया गया है। इनकी माँ का देहान्त बहुत पहले हो गया है। इनके पिता 80 वर्ष के हैं, जिनका दिमागी सन्तुलन ठीक नहीं है और नित्यकर्म भी बिना सहायता के नहीं कर सकते हैं। श्री तुफैल अहमद अपनी पत्नी के साथ पिता की सेवा अपने हाथों करते रहे हैं। इन्हें 25,000 रुपये की राशि एवं प्रशस्ति-पत्र पुरस्कार स्वरूप दिया गया। प्रोत्साहन पुरस्कार तीन व्यक्तियों को दिया गया।

फिर 29 अगस्त 2013 को प्रथम पुरस्कार के लिए श्री कृष्णानन्द भारती, तोपखाना बाजार, कटघर, जिला- मुंगेर का चयन किया गया।

द्वितीय पुरस्कार के लिए श्री गौतम कुमार, ग्राम-पो.- सरसई, जिला- वैशाली को उपयुक्त पाया गया। इन्हें, 50,000 रुपये की राशि एवं प्रशस्ति-पत्र से पुरस्कृत किया गया।

तृतीय पुरस्कार के लिए चयन-समिति के द्वारा श्री राजेश कुमार सिंह, विद्यापुरी मुहल्ला, जिला- मधेपुरा को चयनित किया गया है। इसके अतिरिक्त प्रोत्साहन पुरस्कार तीन व्यक्तियों को देने का निर्णय लिया।

महावीर मन्दिर की ओर से ऐसा सार्थक प्रयास करने के बाद भी इस योजना के साथ विडम्बना रही है कि समाज की ओर से अनुशंसा नहीं मिल रही है। अनेक बार समाचार-पत्रों के माध्यम से विज्ञापन दिये जाने पर आवेदन तो मिलते हैं, किन्तु दूसरे लोग अनुशंसा नहीं भेजते हैं।

प्रत्येक वर्ष सभी जिलाधिकारियों को पत्र लिखे जाते है कि वे भी अपने तन्त्र के माध्यम से ऐसे आदर्श पुत्रों और पुत्रियों के नाम की अनुशंसा करें, किन्तु उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया नहीं मिलती। फलतः कई वर्ष इस पुरस्कार को स्थगित कर देने की स्थिति भी आ रही है। यह भी एक चिन्तनीय विषय है कि क्या समाज अपने किसी ऐसे पड़ोसी श्रवण कुमार के प्रति आस्थावान् नहीं है?

महावीर मन्दिर की ओर से वृद्धों के लिए अन्य सुविधएँ भी अपने अस्पतालों में दी जी रहीं है। उन्हें शुल्कों में विशेष छूट दी जा रही है।

Bhavanath Jha

Associates

पं. भवनाथ झा


  • पिता- पं. अमरनाथ झा
  • माता- योगेश्वरी देवी
  • जन्म-तिथि- सितम्बर, 1968 ई.
  • स्थायी निवास ग्राम- हटाढ़ रुपौली, डाकघर- हटाढ़ रुपौली भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, बिहार।
  • वर्तमान पत्राचार संकेत-  प्रकाशन विभाग, महावीर मन्दिर,  पटना, 800001
  • फोन नं.- 9430676240, 7766055128
  • वर्तमान निवास खासमहल मोड़, पोस्टल पार्क रोड, पटना-800020

  • शिक्षा-  
  • एम.ए. (संस्कृत) ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, 1992 ई.
  • साहित्याचार्य, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा, 1995.

  • सेवा-  प्रकाशन पदाधिकारी, प्रकाशन विभाग, महावीर मन्दिर न्यास, 2003 ई. से अद्यतन।

  • अध्यापन-  व्याख्याता, साहित्य विभाग, अजित कुमार मेहता संस्कृत शिक्षण संस्थान, लदौरा, कल्याणपुर, समस्तीपुर, 1998-2003 तक। ;मानव संसाधन विभाग, भारत सरकार से सम्बद्ध राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान से स्वीकृत।)

  • मनोनयन- समानित सदस्य, बिहार राज्य धर्मिक न्यास पर्षद् (राज्य सरकार की संस्था), 2010 ई. से मार्च 2016 तक।

  • भाषा-ज्ञान- मैथिली (मातृभाषा), संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी।

  • प्राचीन लिपि-ज्ञान- मिथिलाक्षर, देवनागरी, कैथी, बंगला, ब्राह्मी।

  • विशेष दक्षता-  पाण्डुलिपि-विज्ञान एवं शिलालेख-विज्ञान।

  • सम्मान
  •  विशिष्ट संस्कृतसेवी सम्मान,  संजीवन समाज, पटना, 2016
  • दिव्यरश्मि सम्मान, 2016, पवनसुत सर्वागीण विकास केन्द्र, पटना 2016,
  • साहित्य लेखन के क्षेत्र में ‘केवल सच’ मासिक पत्रिका, पटना द्वारा चम्पारण सत्याग्रह सम्मान, 2017

  • ग्रन्थ लेखन
  1. बुद्धचरितम्- (संस्कृत पद्यानुवाद) महाकवि अश्वघोष कृत प्रसिद्ध महाकाव्य के अनुपलब्ध अंश का तिब्बती एवं चीनी अनुवाद के आधार पर मूल शैली में संस्कृत श्लोकों में रूपान्तरण, महावीर मन्दिर प्रकाशन, 2013 ई.
  2. भ्रूणपञ्चाशिका- (मौलिक संस्कृत काव्यरचना), महावीर मन्दिर प्रकाशन, पटना, 2013 ई.

  • सम्पादन-
  1. यक्षसमागमम्- म.म. परमेश्वर झा कृत संस्कृत काव्य की संस्कृत व्याख्या एवं हिन्दी अनुवाद, 1996
  2. अगस्त्य-संहिता- वैष्णव आगमशास्त्रीय ग्रन्थ का पाण्डुलिपि से सम्पादन एवं हिन्दी अनुवाद, महावीर मन्दिर प्रकाशन, पटना, 2009 ई.
  3. दुर्गासप्तशती- स्व. कृष्णचन्द्रमिश्र द्वारा संकलित प्राचीन संस्कृत टीकाओं पर आधारित हिन्दी में विशेष व्याख्या एवं टिप्पणी के साथ, महावीर मन्दिर प्रकाशन, 2005 से 2017 तक कुल 5 संस्करण
  4. रुद्रार्चन-पद्धति- वैदिक साहित्य में रुदिर  सम्बद्ध सूक्तों का संकलन, (सह सम्पादन एवं हिन्दी अनुवाद) महावीर मन्दिर प्रकाशन, पटना, 2004 ई.
  5. रामार्चन-पद्धति- रामानन्दाचार्य कृत रामार्चन-पद्धति, हिन्दी अनुवाद सहित सह सम्पादन, महावीर मन्दिर प्रकाशन, 2004 ई.
  6. Mundeshvari: The oldest Recorded Temple in the Country पुस्तक के हिन्दी भाग का सम्पादन, 2008 ई.
  7. पुष्पमाला- म.म. रुद्रधर कृत पुष्पमाला का पाण्डुलिपि से प्रथन सम्पादन एवं मैथिली अनुवाद, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के व्याकरण विभाग की स्मारिका, 2011 ई.
  8. नाह्निदत्तपञ्चविंशतिकाविवरणम्- म.म. नाह्निदत्तकृत पञ्चविंशतिका की म.म. रुचिपति कृत विवरण नामक व्याख्या के साथ हिन्दी अनुवाद सहित सम्पादन, शास्त्रार्थ शोधपत्रिका, मिथिला शोध संस्थान, दरभंगा, 2014 ई.
  9. व्यवहार रत्नावली- म.म. पशुपतिकृत वियवहाररत्नावली का पाण्डुलिपि से सम्पादन, शास्त्रार्थ शोधपत्रिका, मिथिला शोध संस्थान, दरभंगा, 2014 ई.
  10. सोमवारी व्रतकथा- पाण्डुलिपि से सम्पादन। पूर्व-प्रकाशित प्रतियों में बहुत सारे श्लोक अनुपलब्ध होने कारण पुनः सम्पादन की आवश्यकता हुई।  हिन्दी अनुवाद के साथ संशोधित रूप में प्रकाशन। धर्मायण, महावीर मन्दिर की पत्रिका, अंकसंख्या  78, अप्रैस-सितम्बर, 2009ई.
  11. वैष्णवमताब्जभास्कर (पदच्छेद एवं हिन्दी अनुवाद) आचार्य किशोर कुणाल का ग्रन्थ आचार्य रामानन्द एवं उनका वैष्णवमताब्जभास्कर के साथ प्रकाशित, महावीर मन्दिर प्रकाशन, पटना, 2014
  12. मैथिली क्रियापदकोष (व्याकरण ग्रन्थ), म. वै. दीनबन्धु झा कृत, ब्राह्मी प्रकाशन, मधुबनी, 2016
  13. मिथिलातीर्थप्रकाश (संस्कृत ग्रन्थ का सह-सम्पादन) मूल लेखक- श्रीकृष्ण ठाकुर, मिथिला शोध संस्थान, (बिहार सरकार के उच्च शिक्षा विभाग की ईकाई, दरभंगा, 2017
  14. मैथिलभक्तिप्रकाश, (मैथिली प्राचीन गीत संग्रह) ललितेश्वर सिंह द्वारा संकलित, ब्राह्मी प्रकाशन, 2017
  15. मांसपीयूषलता- (सम्पादन एवं हिन्दी अनुवाद) म.म. मदन उपाध्याय कृत ग्रन्थ का पाण्डुलिपि से प्रथम सम्पादन, प्रकाशनाधीन।

  • शोध-आलेख
  • “वाल्मीकि-रामायणे ज्यौतिस्तत्त्वम्”, डा. उमारमण झा अभिनन्दनग्रन्थ, लखनउ, 2006
  • “मधुबनी में तिरहुता लिपि का अस्तित्व” ये मधुबनी है, मधुबनी जिला गजेटियर, जिला प्रशासन, मधुबनी, 2003 ई.
  • “रुद्रयामलक प्रक्षिप्त अंशमे मिथिलाक इतिहास”, मिथिला भारती, मैथिली साहित्य परिषद्, पटना, 2014
  •  “अठारहम शताब्दीक एकटा पत्र: मिथिलाक ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक तथ्य”, मिथिला भारती, मैथिली साहित्य परिषद्, पटना, 2015
  •  “मिथिला सँ उपलब्ध कतिपय नव शिलालेख”, मिथिला भारती, मैथिली साहित्य परिषद्, पटना, 2016 ई.
  • इनके अतिरिक्त पाँचवाँ-स्तम्भ, युगधारा, दिव्यरश्मि आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में शोधपरक आलेख।

  • भूमिका-लेखन
  • साम्ब-पुराणम्, सम्पादक- पं, गौरीनाथ झा
  • पञ्जीप्रबन्ध– डा. योगनाथ झा की पुस्तक पर ऐतिहासिक विवेचन, अंकित प्रकाशन, दरभंगा, 2010 ई.

  • सेमिनार एवं कार्यशाला-
  1. शोधपत्र वाचन- बोधगया एवं पटना में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संमिनार में Emperor Ashoka and Buddhism विषय पर बौद्ध महोत्सव, 2013.
  2. संसाधन-पुरुष- स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, ‘भारतीय वाङ्मय में वर्णित कृष्णचरित की प्रासंगिकता’ विषय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित संगोष्ठी, 2012ई.
  3. Resource person- National Translation Mission, National Seminar on “Knowledge text Translation in Maithli”, 23-24 Nov., 2010.
  4.  Resource person- National Translation Mission, Workshop for translation into Sanskrit of the web-content of The Indian Institute of Languages, Mysore, February, 2015.
  5. Resource person- National Manuscript Mission, Workshop scripts training, (On Mithilakshar Script) Bhagalpur University, June, 2015.
  6. Resource person- Nalanda Open University, Workshop scripts training, Patna, 23 January, 2016.
  7. संसाधन-पुरुष- महावीर मन्दिर द्वारा आयोजित, कर्मकाण्ड प्रशिक्षण कार्यशाला, कोनहार घाट, हाजीपुर, अगस्त-सितम्बर, 2016 ई.
  8. Center for Development of Advance Computing (C-DAC) पूना में त्रिदिवसीय कार्यशाला (दिनांक 1 अगस्त से 3 अगस्त, 2017) में मिथिलाक्षर/तिरहुता Unicode font का मानक स्वरूप-निर्धारण। 
  9. Shankar Sikshayatan, New Delhi एवं कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित चक्रवर्ति पं. मधुसूदन ओझा के व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व पर आयोजित द्विदिवसीय सेमिनार (दिनांक 04-05 नवम्बर, 2017) में पुराणनिर्माणाधिकरणम् ग्रन्थ की समीक्षा पर शोध-पत्र का वाचन

Manuscriptology

Mithila Manuscripts and its manuscriptology along with some books published from Manuscripts

Manuscripts preserved

Description of Available Sanskrit Manuscripts in personal Possession

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Simaria and Chamtha Ghat in Begusarai District: A Religious Annotation मिथिला की गंगा के तट का माहात्म्य, चौमथ घाट एवं सिमरिया के सन्दर्भ में

हाल के कुछ वर्षों में पाण्डुलिपियों के अध्ययन एवं प्रकाशन के क्रम में इन पंक्तियों के लेखक को  रुद्रयामल तन्त्र के एक अंश के नाम पर परवर्ती काल में लिखी दो रचनाएँ मिलीं हैं, जिनमें मिथिला के इतिहास एवं भूगोल पर कुछ सामग्री है। एक रचना रुद्रयामलसारोद्धारे तीर्थविधिः के नाम से है जिसका प्रकाशनमैथिली साहित्य संस्थान की शोधपत्रिका मिथिला भारती के नवांक 1 में हुआ है। इसमें कुल 98 श्लोक हैं। इसमें अधिकांश वर्णन मिथिला से बाहर के तीर्थों काशी प्रयाग, गंगा-सरयू संगम क्षेत्र आदि का है, किन्तु घटना चक्र के केन्द्र में मिथिला का गंगातट है, जो बेगूसराय जिला में अवस्थित चमथा घाट है। continue reading>>


पुस्तकक नाम- पण्डित गणनाथ झा रचनावली । सम्पादक- प्रो. यशोदानाथ झा । प्रकाशक- श्री यशोदानाथ झा, आनन्द कुटीर, पाहीटोल, पो. सरिसब-पाही, मधुबनी-847424 (बिहार)। प्रकाशन वर्ष- 2017 ई., प्राप्तिस्थान- उपरिवत्। मूल्य– 200.00. मुद्रक- एकेडमी प्रेस, 602, दारागंज, इलाहाबाद। पृष्ठ संख्या– 278।. सजिल्द। continue reading>>

Indian Philosophy

Some articles on Indian Philosophy

Buddhacharitam restored by Pt. Bhavanath Jha

‘Buddhacharitam’, an epic in the tradition of classical Sanskrit language and literature composed by the great Buddhist scholar Ashvaghosh is highly respected in Asian Buddhism. This epic describes the Life, Acts and Sermons of Lord Buddha in poetic way with a musical softness. Continue reading>>

History of Mithila

Articles on the History of Mithila

हरिसिंहदेवक पराजय आ हिमालयक जंगल दिस भागि जेबाक तिथिक सम्बन्धमे जे परम्परागत श्लोक वर्तमानमे उपलब्ध अछि से भाषाक दृष्टिसँ ततेक अशुद्ध भए गेल अछि जे ओहि पर विश्वास करब कठिन। एतेक धरि जे प्रो. राधाकृष्ण चौधरी सेहो अशुद्ध रूप मे उद्धृत कए देने छथि- “वाणाब्धि बाहु सम्मित शाकवर्षे पौषस्य शुक्ल दशमी क्षितिसूनुवारे। त्यक्त्वा स्व–पट्टन पुरी हरिसिंह देओ दुर्दैव देशित पथे गिरिमाविवेश”। continue reading>>


लोहना गाँव झंझारपुर प्रखण्ड अंचल में अवस्थित एक विशाल गाँव है। यह उत्तर बिहार में मुजप्फरपुर-फारविसगंज राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 57 पर दरभंगा से 40 कि.मी. पूर्व अवस्थित है। इस गाँव के उत्तर में हटाढ रुपौली, जमुथरि, कथना, रैमा, हैंठी बाली आदि गाँव हैं, पूर्वमे नरुआर, सर्वसीमा, दक्षिण में उजान तथा पश्चिम मे, सरिसब, लालगंज, खडरख आदि गाँव हैं। continue reading>>


History of Chikna village by Arjun Jha ‘Nirala’ “चिकना गामक इतिहास ओ वंशावली”,  लेखक  श्री अर्जुन झा ‘निराला’

वयोवृद्ध लेखक श्री निरालाजी जनसंसाधन विभाग, बिहार सरकारमे विभिन्न पद पर कार्य करैत प्रभारी राजस्व उप-समाहर्ता पद सँ 1994 ई. मे निवृत्त भेलाह। चिकना वासी रहबाक कारणें अपन गामसँ पूर्ण परिचिति हिनक एहि लेखनक प्रामाणिकता स्पष्ट करैत अछि। लेखक सूचना दैत छथि जे ओ आरम्भमे “सुप्रभात” नामक हस्तलिखित मासिक पत्रिकामे कविता आ कथा सेहो लिखैत रहथि। ई राजनीतिसँ सेहो जुडल रहलाह आ स्व. ललित नारायण मिश्रक राजनीतिक-यात्रामे सहायक भेल रहथिन। चिकना गाममे गठित “विश्वभारती वाग्वर्द्धिनी सभा”क संचालनमे सेहो हिनक स्मरणीय योगदान रहल अछि। continue reading>>


  • The site of ancient Mithila  प्राचीन काल की मिथिला नगरी का स्थल-निर्धारण (जानकी-जन्मभूमि की खोज)

Goddess Sita, or janki, was born in a furrow ploughed on the present site of Sita-Marhi by her father, whose name was Raja Janak, hence Sita is sometimes called Janaki, or “daughter of janak.

मिथिला क्षेत्र की मिट्टी बहुत कोमल है और यहाँ बाढ के कारण बहुत तबाही हुई है। पहाड नहीं होने के कारण कच्ची मिट्टी, लकड़ी घास-फूस से यहाँ घर बनाने की परम्परा रही है अतः यहाँ अधिक पुराने अवशेष पुरातात्त्विक साक्ष्य के रूप में मिलना असंभव है। अतः किसी स्थान के निर्धारण के लिए हमे साहित्यिक स्रोतों और किसी स्थान के प्रति लोगों की श्रद्धा को ही स्रोत मानने की मजबूरी है। ये दोनों स्रोत जहाँ एक दूसरे से मेल खाते हैं उसे ऐतिहासिक साक्ष्य माना जा सकता है। continue reading>>


  • Ganga-worship मिथिला के धर्मशास्त्रीय-ग्रन्थों में गंगा

गंगा भारत की नदियों में श्रेष्ठ मानी गयी है। ऋग्वैदिक काल से आजतक इसकी महिमा गायी जाती रही है। यहाँ तक कहा गया है कि गंगा के जल को स्पर्श करनेवाली वायु के स्पर्श से भी सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। धर्मशास्त्र की परम्परा में भी गंगाजल को अत्यन्त पवित्र मानकर उसे सदापुण्या कहा गया है। continue reading>>


Remains of an old Shiva temple at Lohna village लोहना गाँव में प्राचीन शिवमन्दिर के अवशेष

मधुबनी जिला के झंझारपुर प्रखण्ड के अन्तर्गत लोहना गाँव में प्राचीन शिवलिंग एवं मन्दिर के अवशेष बिखरे पडे हैं। यह स्थान लखनदेई नदी की प्राचीन धारा के पूर्वी तट पर अवस्थित एक पुराने टीले पर है। वर्तमान में यहाँ एक नीम का पेड है, जिसके नीचे लोक देवता सलहेस का प्राचीन स्थान है। यह स्थान मकसूदन बाबा के थान के नाम से प्रख्यात है। continue reading>>

 

Hindi Literature

पुस्तकक नाम- पण्डित गणनाथ झा रचनावली । सम्पादक- प्रो. यशोदानाथ झा । प्रकाशक- श्री यशोदानाथ झा, आनन्द कुटीर, पाहीटोल, पो. सरिसब-पाही, मधुबनी-847424 (बिहार)। प्रकाशन वर्ष- 2017 ई., प्राप्तिस्थान- उपरिवत्। मूल्य– 200.00. मुद्रक- एकेडमी प्रेस, 602, दारागंज, इलाहाबाद। पृष्ठ संख्या– 278।. सजिल्द। इस पुस्तक में मैथिली के साथ हिन्दी की रचनाएँ भी सम्पादित की गयी हैं। continue reading>>

Sanskrit Literature

Some articles from Sanskrit literature

Buddhacharitam restored by Pt. Bhavanath Jha

 

‘Buddhacharitam’, an epic in the tradition of classical Sanskrit language and literature composed by the great Buddhist scholar Ashvaghosh is highly respected in Asian Buddhism. This epic describes the Life, Acts and Sermons of Lord Buddha in poetic way with a musical softness. continue reading>>


Buddhacharitam restored by Pt. Bhavanath Jha

‘Buddhacharitam’, an epic in the tradition of classical Sanskrit language and literature composed by the great Buddhist scholar Ashvaghosh is highly respected in Asian Buddhism. This epic describes the Life, Acts and Sermons of Lord Buddha in poetic way with a musical softness. According to I-tsing, the Chinese Buddhist monk, who travelled India in the seventh century, had found the daily recital of this Sanskrit-epic in Indian Buddhist temples. The author Ashvaghosh also had been respected as Bodhisattva i.e. an incarnation of Lord Buddha and the Sermons composed in this epic had been regarded as canonical texts in the Chinese tradition. continue reading>>


  • Ganga-worship मिथिला के धर्मशास्त्रीय-ग्रन्थों में गंगा
Ganga Worship

 

गंगा भारत की नदियों में श्रेष्ठ मानी गयी है। ऋग्वैदिक काल से आजतक इसकी महिमा गायी जाती रही है। यहाँ तक कहा गया है कि गंगा के जल को स्पर्श करनेवाली वायु के स्पर्श से भी सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। धर्मशास्त्र की परम्परा में भी गंगाजल को अत्यन्त पवित्र मानकर उसे सदापुण्या कहा गया है।continue reading>>


हाल के कुछ वर्षों में पाण्डुलिपियों के अध्ययन एवं प्रकाशन के क्रम में इन पंक्तियों के लेखक को  रुद्रयामल तन्त्र के एक अंश के नाम पर परवर्ती काल में लिखी दो रचनाएँ मिलीं हैं, जिनमें मिथिला के इतिहास एवं भूगोल पर कुछ सामग्री है। continue reading>>