Chaturthichandra

चतुर्थीचन्द्र पूजा विधि

अथ भाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्रपूजाविधि

-भवनाथ झा

चौठचन्द्र मिथिलाक विशिष्ट पर्व थीक जे आनठाम कतहु नहिं होइत अछि। एहिमे पकमान आ दहीक विशेष महत्त्व अछि। सन्तानक उन्नतिक कामनासँ चन्द्रमाक आराधना एहि दिन कएल जाइत अछि। मिथिलामे प्रख्यात ज्योतिषी हेमाङ्गद ठाकुर ई पूजा आरम्भ कएल से साक्ष्य सभसँ सिद्ध होइत अछि। एकर विवरण नीचाँ देल गेल अछि।

ई चौठचन्द्र पूजा सन्ध्याकालिक चतुर्थी तिथिमे होइत अछि। जाहि सन्ध्यामे चतुर्थीक चन्द्रमा उदय हो ताहिमे पूजा करबाक चाही। जँ दूनू दिन चन्द्रोदय कालमे चतुर्थी तिथि पड़ए तँ दोसर दिन पूजा होएबाक चाही। पूजा पुरुष अथवा महिला दूनू करैत छथि। भरि दिन व्रत कए सन्ध्यामे पूजा करी।

भाद्र शुक्ल चतुर्थी तिथि कें व्रत-उपवास कए सन्ध्याकाल स्त्री अथवा पुरुष पूजा करथि।

तेकुशा, तिल एवं जल लए-

नमोऽस्यां रात्रौ भाद्रे मासि शुक्ले पक्षे चतुर्थ्यां तिथौ अमुकगोत्रायाः मम अमुकीदेव्याः सकलकल्याणोत्पत्तिपूर्वकधनधान्यसमृद्धिसकलमनोरथसिद्ध्यर्थं यथाशक्तिगन्धपुष्प-धूप-दीप-ताम्बूल-यज्ञोपवीत-वस्त्र-नानाविध-नैवेद्यादिभिः रोहिणीसहित-भाद्र- शुक्ल-चतुर्थीचन्द्र-पूजनमहं करिष्ये।।

(एतए महिलाक द्वारा कएल गेल पूजाक मन्त्र देल अछि। यज्ञोपवीतधारी नमो के स्थानमे ओंकारक उच्चारण करथि)

पञ्चदेवताक पूजा

अक्षत लए आवाहन- नमो गणपत्यादिपञ्चदेवताः इहागच्छत इह तिष्ठत।

अर्घ्य- एतानि पाद्यादीनि एषोsर्घ्यः नमो गणपत्यादिपञ्चदेवताभ्यो नमः।

चानन- इदमनुलेपनम् नमो गणपत्यादिपञ्चदेवताभ्यो नमः।

अक्षत- इदमक्षतम् नमो गणपत्यादिपञ्चदेवताभ्यो नमः।

फूल- इदं पुष्पम् नमो गणपत्यादिपञ्चदेवताभ्यो नमः।

बेलपात- इदं बिल्वपत्रम् नमो गणपत्यादिपञ्चदेवताभ्यो नमः।

दूबि- इदं दूर्वादलम् नमो गणपत्यादिपञ्चदेवताभ्यो नमः।

अरघीमे जल लए धूप, दीप, नैवेद्य, पान सुपारीक उत्सर्ग करी- एतानि गन्ध-पुष्प-धूप-दीप-ताम्बूल-यथाभाग-नानाविधनैवेद्यानि नमो गणपत्यादिपञ्चदेवताभ्यो नमः।

अरघीमे जल लए आचमन- इदमाचनीयं नमो गणपत्यादिपञ्चदेवताभ्यो नमः।।

एकर बाद विधवा स्त्री अथवा पुरुष विष्णुक पूजा करथि।

तिल लए- नमो भगवन् श्रीविष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ एना आवाहन कए

जल लए- एतानि पाद्यादीनि एषोऽर्घ्यः नमो भगवते श्रीविष्णवे नमः।

एहि तरहें पञ्चोपचारसँ पूजा करथि।

सधवा स्त्री विष्णुक स्थान मे गौरीक पूजा करथि।

गौरीक पूजा

अक्षत लए- नमो गौरि इहागच्छ इह तिष्ठ (आवाहन कए)

अर्घ्य- एतानि पाद्यादीनि नमो गौर्यै नमः।

चानन- इदमनुलेपनम् नमो गौर्यै नमः।

सिन्दूर- इदं सिन्दूरम् नमो गौर्यै नमः।

अक्षत- इदमक्षतम् नमो गौर्यै नमः।

लाल फूल- इदं पुष्पं नमो गौर्यै नमः।

दूबि- इदं दूर्वादलं नमो गौर्यै नमः।

बेलपात- इदं बिल्वपत्रं नमो गौर्यै नमः।

अरघीमे जल लए धूप, दीप, नैवेद्य, पान-सुपारीक उत्सर्ग करी-

एतानि गन्ध-पुष्प-धूप-दीप-ताम्बूल-यथाभाग-नानाविधनैवेद्यानि नमो गौर्यै नमः।

अरघी मे जल लए- इदमाचमनीयम् नमो गौर्यै नमः।

चतुर्थीचन्द्रक पूजा

एकर बाद अक्षत लए- नमो रोहिणीसहित-भाद्रशुक्ल-चतुर्थीचन्द्र इहागच्छ इह तिष्ठ। एना आवाहन कए

उज्जर फूल लए चन्द्रमाक ध्यान करी

श्वेताम्बरं स्वच्छतनुं सुधांशुं चतुर्भुजं हेमविभूषणाढ्यम्।

वरं सुधां दिव्यकमण्डलुञ्च करैरभीतिञ्च दधानमीडे।।

एष पुष्पाञ्जलिः नमो रोहिणीसहित-भाद्रशुक्ल-चतुर्थीचन्द्राय नमः।

एकर बाद अरघीमे जल, चानन आ फूल लए-

सोमाय सोमेश्वराय सोमपतये सोमसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।।

एतानि पाद्यादीनि एषोऽर्घ्यः नमो रोहिणीसहित-भाद्रशुक्ल-चतुर्थीचन्द्राय नमः।

उजरा चानन लए-

मलयाद्रिसमुद्भूतं श्रीखण्डं त्रिदशप्रियम्।

सर्वपापहरं सौख्यं चन्दनं मे प्रगृह्यताम्।।

इदमनुलेपनं नमो रोहिणीसहितभाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्राय नमः।

अक्षत– इदमक्षतं नमो रोहिणीसहितभाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्राय नमः।

उजरा फूल-

त्रैलोक्यमोदकं पुण्यं शुक्लपुष्पं मनोहरम्।

दिव्यौषधिक्षपानाथ गृह्यतां च प्रसीद मे।।

एतानि पुष्पाणि नमो रोहिणीसहितभाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्राय नमः।

बेलपात- इदं बिल्वपत्रम् नमो रोहिणीसहितभाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्राय नमः।

दूबि- इदं दूर्वादलम् नमो रोहिणीसहितभाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्राय नमः।

जनेउ- सुसंस्कृतं चतुर्वेदैर्द्विजानां भूषणं वरम्।

यज्ञोपवीतं देवेश कृपया मे प्रगृह्यताम्।।

इमे यज्ञोपवीते बृहस्पतिदैवते नमो रोहिणीसहितभाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्राय नमः।

वस्त्र- तन्तुसन्तानसम्भूतं कलाकोशलकल्पितम्।

सर्वाङ्गभूषणं श्रेष्ठं वसनं परिधीयताम्।।

इदं वस्त्रं बृहस्पतिदैवतं नमो रोहिणीसहितभाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्राय नमः।

अरघी मे जल लए धूप, दीप, डाली, दहीक उत्सर्ग करी-

नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्ति मे ह्यचलां कुरु।

ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च पराङ्गतिम्।।

एतानि गन्ध-पुष्प-धूप-दीप-सदधि-पक्वापक्वान्नादि-नानाविधनैवेद्यानि नमो रोहिणीसहित-भाद्रशुक्ल-चतुर्थीचन्द्राय नमः।

पान-सुपारी-

पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्।

कर्पूरादिसमायुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्।।

एतानि ताम्बूलानि नमो रोहिणीसहित-भाद्रशुक्ल-चतुर्थीचन्द्राय नमः।

धूप-

गन्धभारवहं दिव्यं नानावस्तुसमन्वितम्।

सुरासुरनरानन्दं धूपं देव गृहाण मे।।

एष धूपः नमो रोहिणीसहितभाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्राय नमः।

कलश पर राखल दीप उत्सर्ग करी

मार्तण्डमण्डलाखण्डचन्द्रबिम्बाग्निदीप्तिमान्।

विधात्रा देवदीपोऽयं निर्मितस्तेऽस्तु भक्तितः।।

एष कलशदीपः नमो रोहिणीसहित-भाद्रशुक्ल-चतुर्थीचन्द्राय नमः।

शंखमे दूध, उजरा फूल आ चानन लए-

अत्रिनेत्रसमुद्भूत क्षीरोदार्णवसम्भव।

गृहाणार्घ्यं मया दत्तं रोहिण्या सहितप्रभो।।

इदं दुग्धार्घ्यम् नमो रोहिणीसहित-भाद्रशुक्ल-चतुर्थीचन्द्राय नमः।

एकर बाद बेरा-बेरी डाली आ दहीक छाँछी हाथमे लए-

दर्शन-मन्त्र-

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मा रोदीः तव ह्येष स्यमन्तकः।।

प्रणाम-मन्त्र-

नमः शुभ्रांशवे तुभ्यं द्विजराजाय ते नमः।

रोहिणीपतये तुभ्यं लक्ष्मीभ्रात्रे नमोऽस्तु ते।।

प्रार्थना-मन्त्र-

मृगाङ्करोहिणीनाथ शम्भोः शिरसि भूषण।

व्रतं सम्पूर्णतां यातु सौभाग्यं च प्रयच्छ मे।।

रूपन्देहि यशो देहि भाग्यं भगवन् देहि मे।

पुत्रान्देहि धनन्देहि सर्वान् कामान् प्रदेहि मे।।

विसर्जन

चन्द्रमाक– नमो रोहिणीसहित भाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्र पूजिसोऽसि प्रसीद क्षमस्व स्वस्थानं गच्छ।

गौरीक- नमो गौरि पूजितासि प्रसीद क्षमस्व।

पञ्चदेवताक- नमो गणपत्यादिपञ्चदेवताः पूजिताः स्थ क्षमध्वं स्वस्थानं गच्छत।

दक्षिणा

दक्षिणाक रुपया कें भूमि पर राखि जल सँ सिक्त कए तेकुशा, तिल एवं जल लए

नमोsस्यां रात्रौ कृतैतद् रोहिणीसहितचतुर्थीचन्द्रपूजनकर्मप्रतिष्ठार्थं एतावद् द्रव्यमूल्यहिरण्यम् अग्निदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणाम् अहं ददे।

पूजा सम्पन्न भएलाक बाद घरक आन सदस्य एक एक टा फल हाथमे लए चन्द्रमाक दर्शन करैत काल निम्नलिखित मन्त्र पढथि। यद्यपि एहि सन्ध्यामे चन्द्रमाक उदय पश्चिम-दक्षिण कोणमे होइत अछि, आ धात्रेयिकावाक्य उत्तरमुख अथवा पूर्व मुहें ठाढ भए पढबाक थीक, तें चन्द्रमाक दर्शन कए उत्तराभिमुख भए ई दूनू मन्त्र पढि पुनः चन्द्रमाक दर्शन करबाक परम्परा देखैत छी।

हाथ में फल लए चन्द्रमाक स्तुति-

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मा रोदीः तव ह्येष स्यमन्तकः।।

दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्।

नमामि शशिनं भक्त्या शम्भोर्मुकुटभूषणम्।

अत्रिनेत्रसमुद्भूतं क्षीरोदार्णवसम्भवम्।

नमामि शशिनं भक्त्या शम्भोर्कुटभूषणम्।।

चतुर्थीचन्द्र पूजा निर्णय विधि एवं कथा

मिथिलामे चौठचन्द्रक सम्बन्धमे चण्डेश्वरक (14म शती) कृत्यरत्नाकरमे सेहो उल्लेख भेटैत अछि। ओतए ई कहल गेल अछि जे भाद्र शुक्ल चतुर्थीक चन्द्रमाक दर्शन कएला सँ मिथ्या कलंक लगैत अछि तें ओहि दिन चन्द्रमाक दर्शन नहिं करी। एहि पंक्तिक मूल ओ नहिं कहि एकरा शिष्टवचनक रूपमे लिखैत छथि। संगहि ब्रह्मपुराणक कथा सेहो उद्धृत करैत छथि जे एही राति स्वयं नारायण पर सेहो एही चन्द्रमाक इजोरियामे कलंक लागल रहनि तें ओ कलंक मनुष्यो कें लागत। तें धोखा सँ जँ चन्द्रमाक दर्शन भए जाए तँ ई धात्रेयिका वाक्य पूव मुँहें अथवा उत्तर मुँहें ठाढ़ भए पढी़। ई धात्रेयिका वाक्य विष्णुपुराण सँ उद्धृत करैत छथि- सिंहः प्रसेनमवधीत् इत्यादि।

चण्डेश्वर कृत कृत्यरत्नाकरक संगत अंश कृत्यरत्नाकरक एहि अंशसँ स्पष्ट नहिं होइत अछि जे चौठचन्द्रक वर्तमान स्वरूप कहियासँ प्रारम्भ भेल। एहि सम्बन्धमे मुकुन्द झा बख्शीक मिथिलाभाषामय इतिहास कें उद्धृत करैत पर्वनिर्णयक सम्पादक कुशेश्वर शर्मा एकर प्रचारक तिथि निर्धारित करैत छथि जे-

मिथिलाराज्योपार्जकबुधवरठक्कुरमहेशसूनुः।

करविगणनातिकालाद् दिल्लीकारागृहे रुद्धः।।

हेमाङ्गदो नरेशो ज्यौतिषशास्त्राब्धिपारगो विद्वान्।

राहूपरागपञ्जीं कृत्वा तत्रालिखत् कुड्ये।।

अनुपदमेतं सम्राडकबर आदृत्य विससर्ज।

राज्ञाऽऽगतेन देशे प्रवर्तिता नभस्यसिततुर्येन्दोः।

कुगजग्रह(981) यवनाब्दात् दिल्ल्यामङ्गीकृता पूजा।।

अर्थात् मिथिला राज्यक उपार्जक महेश ठाकुरक बेटा समय पर कर नहिं देबाक कारणें दिल्लीक कारागारमे बन्द कएल गेलाह। ओ ज्योतिष शास्त्रक उद्भट विद्वान् राजा हेमाङ्गद ठाकुर रहथि। ओ ओहि कारागारक दिवाल पर ग्रहणक तालिका (ग्रहणमाला नामसँ प्रकाशित ग्रऩ्थ) बनाए लिखलनि। एकर परिणामस्वरूप सम्राट् अकबर हुनका आदरपूर्वक छोडि़ देलकनि। ओ राजा जखनि अपन घर घुरलाह तँ भाद्र शुक्लक चतुर्थी तिथि कें चन्द्रमाक पूजा प्रारम्भ कएलनि। 981 हिजरीमे ओ दिल्लीमे ई पूजा कएने रहथि।

981 हिजरीक भादव मासक समय 1573 ई.मे पडै़त अछि। तें एहि आधार पर मिथिलामे 1573 ई. सँ ई पूजा आरम्भ भेल होएत।

पूजाक दिनक निर्णय

म.म. अमृतनाथक कृत्यसारसमुच्चय मे एकर वर्तमान रूपक उल्लेख नहिं भेटैत अछि। मुदा एकर सम्पादक पं. गङ्गाधर मिश्र टिप्पणी मे एकर उल्लेख करैत छथि-

कृत्यसारसमुच्चयक संगत पृष्ठ पर्वनिर्णय मे पृष्ठ संख्या 70 पर पण्डित जीवनाथ (राय) शर्माक लिखल चतुर्थीचन्द्रादर्शनम् शीर्षकसँ एकटा निबन्ध अछि, जाहिमे विस्तृत रूपसँ एहि पर्वक तिथि निर्णय देल गेल अछि। ई जीवनाथ शर्मा विरसायर ग्रामक निवासी रहथि आ 1930-35 ई. मे लहेरियासरायक नौर्थब्रुक हाइस्कूलमे संस्कृतक अध्यापक रहथि। हुनक ई निबन्ध मूल रूपसँ एना अछि-

भाद्रशुक्लचतुर्थ्यां चन्द्रदर्शनं द्रष्टुर्मिथ्याभिशापजनकम् ततो वर्जनीयम् तथा च मार्कण्डेयः-

सिंहादित्ये शुक्लपक्षे चतुर्थ्यां चन्द्रदर्शनम्।

मिथ्याभिशापं कुरुते तस्मात् पश्येन्न तं सदा।

तदेति- चतुर्थ्यामित्यर्थः।

इयं चतुर्थी चन्द्रोदयव्यापिनी ग्राह्या।

कर्मणो यस्य यः कालस्तत्कालव्यापिनी तिथिः।

इति वचनात्। उभयदिने चन्द्रोदयव्याप्तौ पञ्चमीयुतैव ग्राह्या।

मुन्यग्निक्रतुभूतानि षड्मुन्योर्वसुरन्ध्रयोः।

इत्यादिनिगमात्।

तेन तृतीयायामुदितस्य चन्द्रस्य चतुर्थ्यां दर्शने चतुर्थ्यामुदितस्य पञ्चम्यां दर्शने च न दोषः। पूर्वदिने चतुर्थ्यामुदितस्य चतुर्थ्यामपि दर्शने दोषाभाव एवं, उभयदिनव्याप्तौ पूर्वदिनैकादश्यामन्नाद्याहारवत्। चतुर्थ्यामुदितस्य तु चतुर्थ्यां प्रमादाद् दर्शने स्यमन्तकोपाख्यानस्मरणेन तदन्तर्गतधात्रेयिकामात्रपाठेन वा तद्दोषशान्तिः। तदुक्तं ब्रह्मपुराणे-

नारायणोऽभिशप्तस्तु निशाकरमरीचिषु।

स्थितश्चतुर्थ्यामद्यापि मनुष्यानारतेच्च सः।।

अतश्चतुर्थ्यां चन्द्रन्तु प्रमादाद् वीक्ष्य मानवः।

पठेद् धात्रेयिकावाक्यं प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुखः।।

नारायणः श्रीकृष्णः। अभिशप्तः मिथ्यापरीवादाभिभूतः।

सः अभिशापः। धात्रेयिकावाक्यं तु-

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।

इति स्यमन्तकोपाख्यानस्मरणेन चतुर्थीचन्द्रदर्शनदोषक्षालनं विष्णुपुराणे तदुपाख्यानान्त एवोक्तम्। तद् यथा-

इत्येतद् भगवतो मिथ्याभिशस्तिक्षालनं यः स्मरति न तस्य कदाचिदल्पापि मिथ्याभिशस्तिर्भवति, अहताखिलेन्द्रियश्चाखिलपापमोक्षमवाप्नोति। इति

पूर्वोक्तधात्रेयिकावाक्यपाठोऽप्येतदुपाख्यानस्मरणार्थं एवं मिथिलायां शिष्टजनपरिगृहीतलोकाचारनुमोदितभाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्रपूजने धात्रेयिकावाक्येन चन्द्रदर्शनं कृत्वा स्यमन्तकोपाख्यानञ्च श्रूयते।

यद्यपि पूर्वोक्तब्रह्मपुराणवचनात् स्कन्दपुराणोक्तस्यमन्तकोपाख्यानाच्च भगवतो गणेशस्य शापेन सर्वमासीय शुक्लचतुर्थीचन्द्रस्य दर्शनानर्हता तस्यैव च शापानुग्रहेण द्वितीयासु तद्दर्शनोत्तरं चतुर्थीषु तद्दर्शनदोषाभावश्च प्रतीयते तथापि पूर्वोक्तमार्कण्डेयवचनात् ब्रह्मपुराणवचनाच्च भाद्रशुक्लचतुर्थ्यां धात्रेयिकावाक्यपाठमन्तरेण चन्द्रदर्शनं नोचितमितियवसेयम्।।

(ध्यातव्य जे 1934 ई. में दरभंगामे धर्मशास्त्रीय निर्णयक लेल एकटा विशाल परिषदक गठन भेल छल। ओ विद्वान् लोकनि भरि सालक पाबनि-तिहार पर 83 टा विस्तृत निबन्ध लिखलनि। एक विद्वान् के एक विषय पर निबन्ध लीखि अपन निर्णय देबाक आग्रह कएल गेल छल। ओहिमे सँ किछु विद्वान् दू-तीन विषय पर अपन निर्णय देल, मुदा अधिकांश विद्वान् एक एक विषय पर लिखलनि। एकर सम्पादक छलाह कुशेश्वर कुमर शर्मा, आ 16 विद्वानक समिति एहि सभ निबन्धक पुनरीक्षण कएलनि। एहिमे विशेष रूपसँ महावैयाकरण दीनबन्धु झाक सहयोग रहलनि। ई ग्रन्थ बहुत दिन धरि अप्रकाशिते रहल। 1985 ई. में पं. गोविन्द झाक अथक परिश्रमसँ तिरहुतामे लिखल सभटा निबन्ध देवनागरीमे उतारल गेल आ ओकर प्रकाशक भेलाह नगेन्द्र कुमार शर्मा। एहि ग्रन्थ पर भूमिका लिखलनि भारतक प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती। मिथिला मे एहि ग्रन्थ कें धर्मशास्त्रीय निर्णयक लेल प्रामाणिक मानल गेल। आब तँ ई अनुपलब्ध भए गेल अछि।)

स्यमन्तक मणिक कथा एहि प्रकारें अछि- कृष्ण दखनि द्वारकाक राज रहथि तँ सत्राजित् नामक एकटा सामन्त सूर्यक उपासना कए एकटा एहन मणि प्राप्त कएल जाहिसँ आठ भार सोना बनैत छल। एक बेर वार्ताक प्रसंगमे कृष्ण सत्राजित् सँ ओ स्यमन्तक मणि माँगि लेलनि मुदा सत्राजित् ओ मणि कृष्ण कें नहिं दए अपन सोदर भाए प्रसेनदित् कें देल। प्रसेनजित् ओ लए एक दिन वनमे शिकार खेलाए गेलाह जतए हुनका सिंह मारि देलक। जखनि प्रसेनजित् बहुत दिन धरि नहिं घुरलाह तँ सत्राजित् प्रजामे दुष्प्रचार करए लगलाह जे कृष्ण हमर भाए कें मारि स्यमन्तक मणि चोरा लेलनि। ई मिष्या कलंक कृष्ण पर लागि गेल। एकर परिमार्जनक लेल कृष्ण अपन सेनाक संग वन गेलाह तँ ओतए स्पष्ट भए गेलनि जे प्रसेनजित् कें सिंह मारलक आ ओहि सिंहकें जाम्बवान् मारल। कृष्ण जाम्बवानक गुफा धरि पहुँचलाह थँ ओतए जाम्बवती कें ओहि मणि सँ खेलाइत देखलनि। एकर बाद जाम्बवानक संग कृष्णक युद्ध आरम्भ भएल। कतोक दिन बीति गेल तखनि केओ कमजोर नहिं पडलाह तखनि जाम्बवान् के स्मरण भेलनि जे त्रेतामे रामचन्द्र जे अपन अवतारक प्रसंग कहने रहथि से यैह कृष्ण थिकाह। तखनि जाम्बवान् युद्ध करब छोडि अपन पुत्री जाम्बवतीक संग कृष्णक विवाह कराओल आ स्यमन्तक मणि कृष्ण के देल। ई प्रसंग बूझि सत्राजित् सेहो लज्जित भेलाह आ अपन पुत्रीक संग श्रीकृष्णक विवाह कराए देल आ श्रीकृष्ण मिथ्या कलंक सँ मुक्त भेलाह।