Brahmi PublicationArt, Culture and History of Mithila
मिथिलाक इतिहास, संस्कृति, कर्मकाण्ड, लिपि एवं कला पर शोधपरक आलेखक प्रकाशन ।
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ravana-vadha

दुर्गापूजामे रावण-वध किएक?

(मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परा आ रावण-वधक औचित्य)

रावण सीताक अपहरण केलक, ओ अपहर्ता थीक तें ओकर कार्य निन्दनीय तें विरोध प्रदर्शित करबाक लेल रावण-वध होएबाक चाही।

कौटिल्य सेहो अर्थशास्त्रमे रावणक एही कृत्यक चर्चा कए रावणक दुराचार प्रकट केने छथि आ राजाक लेल शिक्षा दैत छथि जे दोसरक पत्नीक अपहरणक कारणें रावणक नाश भेल आ दोसरक धनक अपहरण करबाक कारणें दुर्याधन मारल गेल। तें राजा कें एहि दूनू दोषसँ बचल रहबाक चाही।

होलिका सेहो अपन भातिज विष्णुभक्त कें डाहबाक दुष्कर्म करए लागलिं तें होलिका-दहन हमरालोकनि करिते छी। रावण-वधक प्रतीक थीक ओकर पुतला-दहन।

मुदा एतए हमर प्रश्न अछि जे दुर्गापूजाक विजयादशमीमे किएक?

दुर्गाक पूजा शक्ति उपासनाक परम्परा थीक, रावण-वधक सम्बन्ध रामकथासँ छैक, माने वैष्णव परम्परासँ छैक। ई केना मीलि गेल? की राम एही दिन रावण कें मारलनि? कथा छैक एहन, मुदा पुरान उल्लेख नै। रामायणक उल्लेखसँ कतहु ई सिद्ध नहिं होइत अछि जे राम विजयादशमीक दिन रावणकें मारलनि। चातुर्मास्य बितलाक बाद तँ सीताकें तकबाक उद्योगे आरम्भे भेल। हमुमान् जखनि लंकामे छथि तखनहिं हुनका शरद् ऋतुक चन्द्रमाक दर्शन होइत छनि।

मुदा परवर्ती कालमे ई का गढल गेल जे राम दश दिन दुर्गाक आराधना कएलनि आ विजयादशमीकें रावणक वध कएलनि। कालिकापुराण एहि कथाक मूल स्रोत थीक जकरा विद्यापति सेहो दुर्गाभक्तितरङ्गिणीमे उद्धृत कएलनि-

कालिकापुराण अध्याय- 60

सम्पूजयेन्महादेवीमष्टपुष्पिकया नरः।
रामस्यानुग्रहार्थाय रावणस्य वधाय च।। ६०.२५ ।।
रात्रावेव महादेवी ब्रह्मणा बोधिता पुरा।
ततस्तु त्यक्तनिद्रा सा नन्दायामाश्विने सिते।। ६०.२६ ।।
जगाम नगरीं लङ्कां यत्रासीद्राघवः पुरा।
तत्र गत्वा महादेवी तदा तौ रामरावणौ।। ६०.२७ ।।
युद्धं नियोजयामास स्वयमन्तर्हिताम्बिका।
रक्षसां वानराणां च जग्ध्वा सा मांसशोणिते ।। ६०.२८ ।।
रामरावणयोर्युद्धं सप्ताहं सा न्ययोजयत्।
व्यतीते सप्तमे रात्रौ नवम्यां रावणं ततः।। ६०.२९ ।।
रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी।
यावत्तयोः स्वयं देवी युद्धकेलिमुदैक्षत।। ६०.३० ।।
तावत् तु सप्तरात्राणि सैव देवैः सुपूजिता।
निहते रावणे वीरे नवम्यां सकलैः सुरैः।। ६०.३१ ।।
विशेषपूजां दुर्गायाश्चक्रे लोकपितामहः।
ततः सम्प्रेषिता देवी दशम्यां शार्वरोत्सवैः।। ६०.३२ ।।
शाक्रोऽपि देवसेनाया नीराजनमथाकरोत्।
शान्त्यर्थं सुरसैन्यानां देवराज्यस्य वृद्धये।। ६०.३३ ।।
रामरावणबाणेन युद्धं चावेक्ष्य भीतिदम्।
तृतीयायां तु लङ्कायाः पूर्वोत्तरदिशि स्थितम्।। ६०.३४ ।।
स्वातीनक्षत्रयुक्तायां भीतं सुरबलं महत्।
शान्त्यर्थं वरयामास देवेन्द्रो वचनाद् हरेः।। ६०.३५ ।।
ततस्तु श्रवणेनाथ दशम्यां चण्डिकां शुभाम्।
विसृज्य चक्रे शान्त्यर्थं बलनीराजनं हरिः।। ६०.३६ ।।
नीराजितबलः शक्तस्तत्र रामं च राघवम्।
सम्प्राप्य प्रययौ स्वर्गं सह देवैः शचीपतिः।। ६०.३७ ।।

एहि उल्लेखक अनुसार महामाया भगवती रामक हाथें रावणकें मरबौलनि। एहिसँ पहिने सात राति धरि देवी राम आ रावणक युद्धक निरीक्षण करैत रहलीह।

वाल्मीकि-रामायणमे एहन कथा नै अछि। ओतए सूर्यक आराधनाक बात अछि आ तें आदित्यहृदय स्तोत्र महिमामण्डित भेल।

तें एहि प्रकारक कथासँ ओहि कालक थीक जहिया वैष्णव, शैव आ शाक्त आपसमे लडैत रहथि ओहि समयमे जे समन्वयवादक प्रवृत्ति जगलैक ताहि कारणें शक्ति-परम्पराक कथामे रामकथाकें घोंसियाओल गेल। हमरा जेनैत ई कथा सभ 11म शतीसँ 15 शती धरि खूब लिखाएल आ प्रचलित भेल।

महाभारतक कथाक संग दुर्गापूजाक सम्बन्ध

महाभारतक कथाक अनुसार कृष्णक द्वारा गीताक उपदेशसँ अर्जुन युद्ध करबाक लेल तैयार तँ भेलाह मुदा दुर्योधनक विशाल सेनाकें देखलनि तँ हुनका भय भेलनि। एहि पर कृष्ण कहलनि जे- डेराउ नै, दुर्गाक उपासना करू। कृष्णक एहि कथन पर अर्जुन दुर्गाक उपासना केलनि आ हुनकासँ विजयक वरदान पाबि युद्ध मे पैसलाह। महाभारत, भाष्मपर्व, अध्याय-23

सञ्जय उवाच -
धार्तराष्ट्रबलं दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ।
अर्जुनस्य हितार्थाय कृष्णो वचनमब्रवीत् ॥ १॥

श्रीभगवानुवाच
शुचिर्भूत्वा महाबाहो सङ्ग्रामाभिमुखे स्थितः ।
पराजयाय शत्रूणां दुर्गास्तोत्रमुदीरय ॥ २॥

सञ्जय उवाच -
एवमुक्तोऽर्जुनः सङ्ख्ये वासुदेवेन धीमता ।
अवतीर्यं रथात् पार्थः स्तोत्रमाह कृताञ्जलिः ॥ ३॥)

अथ दुर्गादेवीस्तवम् ।
श्रीअर्जुन उवाच -
नमस्ते सिद्धसेनानि आर्ये मन्दरवासिनि ।
कुमारि कालि कापालि कपिले कृष्णपिङ्गले ॥ १॥ इत्यादि स्तोत्रसँ अर्जुन दुर्गाक आराधना केने रहथि।

महाभारतमे दोसरो ठाम दुर्गाक आराधनाक स्पष्ट उल्लेख भेल अछि। जखनि युधिष्ठिर अज्ञातवासक लेल विराटक नगरी दिस बिदा भेलाह तँ कार्यक सफलता लेल मनहि मन दुर्गाक स्मरण कएलनि। एतय दुर्गाक स्तोत्र बड महत्त्वपूर्ण अछि।

विराटनगरं रम्यं गच्छमानो युधिष्ठिरः ।
अस्तुवन् मनसा देवीं दुर्गां त्रिभुवनेश्वरीम् ॥ १॥

एहि प्रकारें रावण-वधक कथा दुर्गापूजासँ जुडल आ नवमीक दिन रावणक वधक पश्चात् अगिला दिन विजय-उत्सव मनाओल गेल। एहि प्रकारें रावणक वध-नवमीक दिन होएबाक चाही अन्यथा ई एक उत्सव मात्र थीक।

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