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Brahmi Publication

Art, Culture and History of Mithila

मिथिलाक इतिहास, संस्कृति, लिपि एवं कला पर शोधपरक आलेखक प्रकाशन।
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10/20/18
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भवनाथ झा
A newly found fragment of an Inscription

सिमरौनगढ़ से प्राप्त नवीन खण्डित शिलालेख

Karnat Inscription

दिनांक 15 मई, 2018 ई.को सोसल मीडिया फेसबुक के माध्यम से श्री डी. के. सिंह से सूचना दी कि सिमरौन गढ कोल्डस्टोर से पश्चिम स्थित तालाब की खुदाई के दौरान एक शिलालेख का टुकडा मिला है। उन्होंने इसी पोस्ट के माध्यम से लोगों से इसे पढने का भी आग्रह किया। यह अभिलेख तीन ओर से खण्डित है, केवल नीचे का भाग सुरक्षित है। इस खण्डित शिलालेख की लंबाई एवं चौड़ाई क्रमशः 29.5 से.मी. तथा 15 से.मी.है।

मिथिलाक्षर पर दीर्घकाल से कार्य करने के कारण लिपि एवं लेखन शैली देखते ही पहचान गया कि 1992 ई. में सिमरौनगढ से मिले एक खण्डित शिलालेख का यह दूसरा टुकडा है। ध्यातव्य है कि मार्च 1992 ई. में 12.3से.मी. चौडा एवं 16सें.मी. लम्बा एक टुकडा स्थानीय विद्यालय के शिक्षक के सौजन्य से मैसिमो विडाले नामक इटालियन पुरातत्त्वविद् को मिला था जो उन दिनों नेपाली एवं इटली के पुरातत्त्ववेत्ताओं के संयुक्त अभियान के तहत सिमरौनगढ पर शोध कर रहे थे। इस शिलालेख के इंक स्टम्पेज के आधार पर रिकार्डो गार्विनी ने इसका अध्ययन किया था। यह आलेख नेपाल पुरातत्त्व विभाग की पत्रिका Ancient Nepal, के 1993 ई. में अक्टूबर-नवम्बर अंक में A Fragmentary Inscription From Simraongarh, The Ancient Maithila Capital शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित हुआ था। इसमें 7 पंक्तियाँ खण्डित रूप में मिली थी जो चारो ओर से अपूर्ण थी। चूँकि पहली पंक्ति के आरम्भ मे किसी देवी की स्तुति की गयी है, जिसमें बायीं ओर अक्षर घिसे हुए हैं, फिर भी छन्द की दृष्टि से पूर्ण है. अतः हम अनुमान लगा सकते हैं कि 7 पंक्तियों का यह टुकडा बायीं ओर ऊपर का अंश है, जिसमें बायीं ओर से एक या दो अक्षर ही खण्डित हैं। चूँकि इस टुकडे की छायाप्रति मेरे पास उपलब्ध नहीं है, मैंने इस अंश को पढने के लिए उक्त शोध पत्रिकामें प्रकाशित छायाप्रति का ही उपयोग किया है तथापि कुछ स्थानों पर पाठभेद के बावजूद रिकार्डो गार्विनी द्वारा दिया गया पाठ समुचित प्रतीत होता है।

शिलालेख के टुकडे की छाया। छाया- डी. के. सिंह, साभार वर्तमान उपलब्ध शिलालेख का अंश में 11 पंक्तियाँ है। नीचे का भाग सुरक्षित है, किन्तु ऊपर से खण्डित है अतः हम कह नहीं सकते कि इसके ऊपर भी पंक्तियाँ थीं अथवा नहीं। इस अभिलेख का पाठ इस प्रकार है-

देवनागरी लिप्यन्तरण

……………………………….………………………………ग्रामशो……

……………………………………………………….[मा]याः पयः।। सी……

………………………………….माध्वीकामृतमत्तकोकिलकुल….

…………………….साहङ्कारबीजादयं कल्पान्तावधिवारिधिप्रि….

………………………सहस्रसत्कामः कामधेनुं त्रिभुवनतिलकः काञ्चनीं क….

…………………………..[कै]लासमावासं यः कपालिनः।। वाराणसीतिलकमम्बरशेखरा….

……………………….[ध]त्ते ध्वजप[श्श्रि]यम्।। काश्यामयं कृतमतिर्वितरत्यजस्रमश्रान्तदान….

……………[मथि]तांगवदिन्दुकुन्दमन्दारगौरी[वद]ने यशःश्रीः।। मुरं मुरारिस्त्रिपुरं पुरारिः….

……………स्तल[प्रा]प्तरुषाद् नयेन।। यस्याहवप्रचुरतूर्य्यविकीर्य्यमाणकीर्तिच्छटाःप्रतिभटाः…

……दास्त्रीप्राप्तैरेते खलु यत् स्फुलिङ्गाः।। शीतांशुर्म्मुखमध्यवागपि सुधा बाह्वश्वकल्पद्रुम…..

………दातरि दक्षिणे नयनिधौ विद्याविवेकाश्रये प्राक् प्रत्यक् सुरताणविक्रमहरेस्त………

अभिलेख में एक भी श्लोक पूर्ण नहीं है। अतः इसका अनुवाद स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। तथापि प्रत्येक पंक्ति से प्राप्त सूचना इस प्रकार है-

इसका अनुवाद होगा- गाँव गाँव (में)। राजा के यश का वर्णन हो सकता है कि उनका यश गाँव गाँव तक फैला हुआ है।

यहाँ दूध अथवा जल की बात है। उमायाः पयः हो सकता है। हिमालय से निःसृत नदियों के जल की उपमा देवी पार्वती के स्तन से निःसृत दूध से दी गयी हो।

महुआ के रस के कारण मत्त कोयलों का वर्णन है।

अहङ्कार रूपी बीज से उत्पन्न यह, जो कल्प के अन्तकाल में उत्पन्न होने वाले समुद्र से प्रेम करे….।

हजारों अच्छे कार्य करने की इच्छा रखनेवाले, तीनों लोकों के तिलक स्वरूप (राजा) ने कामधेनु को स्वर्णाभूषणों से लाद दिया।

जिन्होंने कपाली शिव के आवास कैलास को (पृथ्वी पर उतार दिया)। यह राजा के यश का वर्णऩ हो सकता है, जिसकी शुभ्रता से पूरी पृथ्वी ही कैलास के समान शुभ्र हो गयी हो।(यहाँ अनुष्टुप् छन्द का एक श्लोक है।)

ध्वज (राष्ट्रध्वज) की रक्षा करनेवाले राजा, मन्त्री अथवा सैनिक लक्ष्मी को धारण करते हैं। इन्होंने काशी में मन में संकल्प लेकर प्रचुर एवं विना रुके हुए दान का वितरण किया। (यह राजा के लिए है।

मथितांग अर्थात् जिनके अंगका मन्थन किया गया हो अर्थाते राजा मिथि, जिनके नाम पर मिथिला है उसी राजा के समान चन्द्रमा, कुन्द फूल एवं मन्दार फूल के समान गौर कान्ति वाली यशरूपी लक्ष्मी है। मुर राक्षस को मुरारि श्रीकृष्ण ने मारा तथा त्रिपुरासुर को भगवान् शंकर ने मारा……।

(यहाँ छन्दोयोजना की दृष्टिसे एक अक्षर प्र छूटा हुआ प्रतीत हो रहा है। अतः ला अक्षर को लप्रा पढा गया है।) किसी स्तर से प्राप्त क्रोध एवं नीति के द्वारा अर्थात् दण्ड एवं नीति के द्वारा शासन किया गया। जिनके युद्ध में बहुत सारे तूर्य (एक प्रकार का वाद्य यन्त्र- तुरही) से बिखरती हुई कीर्ति की छटा एवं प्रत्येक सैनिक …..(चारों दिशाओं को घेर लेते हैं।)

(इस प्रकार …..) जिस प्रकार भोग देनेवाली स्त्री से प्राप्त इन (पुत्रों के) द्वारा ये अग्निकण के समान तेजस्वी हुए। मुख के वाणी तो अमृत के समान थी अतः वे चन्द्रमा की तरह थे। बाहु एवं अश्व से वे कल्पतरु के समान थे।

इस दान करनेवाले में, नीति के खजाने में, दाक्षिण्य अर्थात् कोमल गुण से भरे हुए व्यक्ति में, तथा विद्या एवं विवेक के आश्रयभूत इस व्यक्ति में तथा पूर्व एवं पश्चिंम दिशाओं के सुलतान के पराक्रम का हरण करने वाले इस व्यक्ति में…..

इन 11 पंक्तियों में किसी राजा अथवा अन्य व्यक्ति का नाम नहीं है। किन्तु पूर्वप्राप्त शिलालेख अंश में दूसरी पंक्ति में नरपतिः तथा चौथी पंक्ति में राम तथा 7वीं पंक्ति में कर्म्मादित्य का नाम आया है। यदि हम इस अंश के साथ अन्वय करते हें तो अनुमान लगा सकते हैं कि यह शिलालेख रामसिंह देव के काल का है, जिसमे कर्म्मादित्य के नाम का उल्लेख अभूत् कर्म्मादित्यः के रूप में आया है। यह भी असम्भव नहीं कि कर्म्मादित्य के जन्म की बात लिखकर आगे के किसी श्लोक में उनके ज्येष्ठ पुत्र देवादित्य का नामोल्लेख किया गया हो तथा अंतिम पंक्तियाँ मन्त्री देवादित्य से सम्बद्ध हो।

जबतक इस शिलालेख के अन्य टुकडे उपलब्ध नहीं होते तबतक इससे अधिक कुछ कहना अनुमानमात्र होगा।

अनुमान को आधार पर इस सम्पूर्ण शिलालेख का निम्नलिखित रूप होना चाहिए, जिनमें से हमें दो टुकडे मिले हैं, शेष टुकडों के लिए प्रयत्न आवश्यक है।

 


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