Procedure of Chhath Puja in Mithila

Traditional procedure of Chhath ritual in Mithila region. It is explained by Mm. Rudradhara in his book Varshakrtitya. Some audio files also have been added here for promote this ritual.

छठि पूजा विधि एवं व्रतकथा

सन्ध्याकाल नदी अथवा पोखरिक कछेर पर जाए अपन नित्यकर्म कए अर्थात् सधवा महिला गौरीक पूजा कए आ विधवा विष्णुक पूजा कए पश्चिम मुँहें सूर्यक दिस देखैत कुश, तिल आ जल लए संकल्प करी-

नमोsद्य कार्तिकमासीयशुक्लपक्षीयषष्ठ्यां तिथौ अमुक (अपन गोत्र नाम) गोत्रायाः मम अमुकी (अपन नाम) देव्याः इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सकलदुःखदारिद्र्यसकलपातक-क्षयापस्मारकुष्ठादिमहाव्याधि-सकलरोगक्षय-चिरजीविपुत्रपौत्रादिलाभ-गोधनधान्यादि-समृद्धिसुखसौभाग्यावैधव्य-सकलकलकामावाप्तिकामा अद्य श्वश्च सूर्य्ययार्घमहं दास्ये।

ई संकल्प कए

नमो भगवन् सूर्य इहागच्छ इह तिष्ठ। ई आवाहन कए

तकर बाद दूबि, लाल चानन, अक्षत, घीमे बनल आ गुडक संग बनाओल पकवान लए तामाक अरघामे राखि एहि मन्त्रसँ अर्घ्य दी-

नमोस्तु सूर्याय सहस्रभानवे नमोस्तु वैश्वानरजातवेदसे।

त्वमेव चार्घ्यं प्रतिगृह्ण गृह्ण देवाधिदेवाय नमो नमस्ते।।

नमो भगवते तुभ्यं नमस्ते जातवेदसे।

दत्तमर्घ्यं मया भानो त्वं गृहाण नमोऽस्तु ते।।

ज्योतिर्मय विभो सूर्य तेजोराशे जगत्पते।

अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर।।

एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।

अनुकम्पय मां प्रीत्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर।।

एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।

गृहाणार्घ्यं मया दत्तं संज्ञयासहित प्रभो।।

ई मन्त्र पढि उठैत मुद्रामे अर्घ्य दी।

एहीकालमे जलमे जाए सभटा कोनिया लए हाथ उठाबी। सभ कोनिया पर गायक दूध खसएबाक परम्परा अछि। जेना तामाक अर्घा सँ पहिल बेर अर्घ्य देल गेल तहिना कोनिया वस्तुतः अर्घ्यपात्र थीक से बुझि सूर्यकें ओहिसँ अर्घ्य दी। एकरे हाथ उठाएब कहल जाइत अछि।

तकर बाद सूर्यक पूजा करी।

ललका चानन लए- इदं रक्तचन्दनं नमः सूर्याय नमः।

अक्षत लए- इदमक्षतं नमः सूर्याय नमः।

लाल फूल लए- इदं पुष्पं नमः सूर्याय नमः।

दूबि- इदं दूर्व्वादलं नमः सूर्याय नमः।

बेलपात- इदं बिल्वपत्रं नमः सूर्याय नमः।

वस्त्र- इदं वस्त्रं नमः सूर्याय नमः।

यज्ञोपवीत- इमे यज्ञोपवीते बृहस्पति दैवते नमः सूर्याय नमः।

धूप- एष धूपः नमः सूर्याय नमः।

दीप- एष दीपः नमः सूर्याय नमः।

अनेक प्रकारक नैवेद्य – एतानि नानाविधनैवेद्यानि नमः सूर्याय नमः।

आचमन- इदमाचमनीयं नमः सूर्याय नमः।

पान- इदं ताम्बूलम् नमः।

आधा प्रदक्षिणा- घाटे पर पसारक दूनूकात घुमी।

अन्तमे प्रणाम करी-

जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्

तमोरिसर्व पापघ्नं प्रणतोस्मि दिवाकरम्।।

एकर बाद विष्णु अथवा गौरीक विसर्जन करी।

भिनुसरक अर्घ्य

भिनसरमे पूर्वोक्त विधिसँ पूजा आ अर्घ्य दए कथा सुनी।

(मैथिली मे कथा वला पन्ना खोबाक लेल एतए दबाउ)

(संस्कृतमे कथाक लेल एतए दबाउ)

कथाक बाद सूर्य कें प्रणाम कए हुनक प्रसादमे देल अंकुरी सभ कोनियाँ पर दए दियैक।

तकर बाद गौरी वा विष्णुक  विसर्जन कए दक्षिणा करी-

नमोऽद्य कृतैतत् विवस्वत् षष्ठीव्रतकरणतत्कथाश्रवणप्रतिष्ठार्थमेतावद्-द्रव्यमूल्यकहिरण्यमग्नि-दैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे।

एकर बाद घर पर आबि ब्राह्मण भोजन कराए पारणा करी।


Read also : Chhath Puja       Importance of Chhath Puja    Sun Worship in India       Suryastavaraja    Worship of twelve Adityas in each month 

A list of Flesh-like inauspicious food in Mithila Theology

[पावनि-तिहार अबैत देरी बहुतो गोटे कें ई बुझबाक इच्छा रहैत छनि जे कोन वस्तु भक्ष्य थीक आ कोन अभक्ष्य। धर्मशास्त्रमें भक्ष्याभक्ष्यनिरूपणक नामसँ प्रसंग आएल अछि। मिथिलामे जे भक्ष्याभक्ष्यक विधान अछि तकर संकलन कृत्यसारसमुच्चयक सम्पादक पं. गङ्गाधर मिश्र नीक जकाँ कएने छथि। सहरसा जिलाक बनगामक वासी पं. गङ्गाधर मिश्र अपना कालक श्रेष्ठ विद्वान् रहथि। हुनक पुत्र डा. काशीनाथ मिश्र वर्तमानमे उद्भट विद्वानक रूपमे ख्यात छथि। पं. गङ्गाधर मिश्रक द्वारा टिप्पणी भागमे जे आमिष आ हविष्यान्नक विवेचन कएल गेल अछि से मैथिलीमे एतए प्रस्तुत अछि।]

निरामिष

(भोजनक लेल पवित्र वस्तुक सूची)

Read also>> A list of Auspicious Food for Offering to God and Ancestors>> हविष्य

This page is in Maithili language

[पावनि-तिहार अबैत देरी बहुतो गोटे कें ई बुझबाक इच्छा रहैत छनि जे कोन वस्तु भक्ष्य थीक आ कोन अभक्ष्य। धर्मशास्त्रमें भक्ष्याभक्ष्यनिरूपणक नामसँ प्रसंग आएल अछि। मिथिलामे जे भक्ष्याभक्ष्यक विधान अछि तकर संकलन कृत्यसारसमुच्चयक सम्पादक पं. गङ्गाधर मिश्र नीक जकाँ कएने छथि। सहरसा जिलाक बनगामक वासी पं. गङ्गाधर मिश्र अपना कालक श्रेष्ठ विद्वान् रहथि। हुनक पुत्र डा. काशीनाथ मिश्र वर्तमानमे उद्भट विद्वानक रूपमे ख्यात छथि। पं. गङ्गाधर मिश्रक द्वारा टिप्पणी भागमे जे आमिष आ हविष्यान्नक विवेचन कएल गेल अछि से मैथिलीमे एतए प्रस्तुत अछि।]

बहुतो गोटे कें ई सूची देखला पर अनेक प्रकारक जिज्ञासा होएतनि। ई किए आ ई किए नै- से प्रश्न उठतनि। हुनकालोकनिक लेल कोनो उत्तर नहिं। पं. मिश्र जे लिखने छथि से हम उतारि रहल छी।


आमिष शब्दक सामान्य अर्थ अछि माँस। जे आमिष नहिं कहल जाइत अछि से भेल निरामिष। मुदा शास्त्रमे आमिष शब्द पारिभाषिक थीक। किछु खाएवला वस्तु कें आमिषक संज्ञा देल गेल अछि। एहिमे किछु अन्न, फल, मूल आदि सेहो छैक तें शास्त्र मे जे जे वस्तु आमिष अथवा सामिष मानि लेल गेल अछि, तकर भिन्न वस्तु भेल निरामिष।

तें एतए हम आमिषक अन्तर्गत राखल वस्तुक सूची दैत छी। जतए जतए निरामिष भोजनक चर्चा छैक ओतए एतेक वस्तु वर्जित बूझल जाए।

  1. कोनो जीव-जन्तुक हड्डी मिश्रित अथवा सूडा, पीलू आदि लागल कोनो वस्तु।
  2. डोका, सितुआ सँ बनाओल चून।
  3. चमडाक बनाओल बासन में राखल जल, जे विशेष रूपसँ मरुस्थल में व्यवहार होइत छल।
  4. जम्बीरी नेबो। एकरासँ भिन्न कमला, कागजी आदि नेबो पवित्र होइत अछि।
  5. बीजपूरक टाभ नेवो रूपमे प्रसिद्ध।
  6. उडीद। मुदा जँ ओ उडीद देवता अथवा पितर कें चढाओल गेल अछि आ ओकर शेष भाग बचि गेल अछि तँ ओ आमिष नहिं कहाओत। तें यज्ञसँ बँचल जे शेष उडीद से खाएल जा सकैत अछि।
  7. जे कोनो वस्तु आमिष कहल गेल अछि सेहो जँ विष्णु कें निवेदित कए देल जाए तँ ओहो निरामिष भेल।
  8. कोनो निरामिषो वस्तु जँ विष्णु कें निवेदित नहिं कएल गेल अछि तँ ओहो आमिष भेल।
  9. बदाम, गहूम आदिक ओरहा सेहो आमिष थीक। जेना केराव, बदाम आदि कें जँ लत्ती अथवा गाछक संगहिं आगिमे झाडकाए देल जाए तँ ओकरा आमिष मानल गेल अछि।
  10. जौ के ओरहा।
  11. मसुरी
  12. गाभिन गायक दूध।
  13. जाहि गायक बच्चा मरि गेल गेल हो।
  14. महिंसक दूध, दही घी इत्यादि सभ वस्तु।
  15. बकरी आ भेडीक दूध इत्यादि सभ वस्तु।
  16. जे गाय अपन बच्चा कें दूध पियबैत हो, अपवित्र वस्तु नहिं खाइत हो, दोसराक बच्चा कें दूध नै पियाबैत हो, ओकरा थनमे कोनो नै रहैक रोग रहैक ओकरे दूध आदि हविष्य थीक। एहिसँ भिन्न गायोक दूध आमिष थीक।
  17. मनुष्यक दूध।
  18. उसना चाउर।
  19. मूर (लहसुन, पियाजु, गाजर आ मूर सभकें एके कोटिमे राखल गेल अछि।)
  20. बोडा, कुरथी, कोदो, मडुआ, आंसु धान, ई सभ आमिष थीक।
  21. गुड़। प्राचीन काल मे कुसियारक रस दए पकवान आदि बनैत छल। जेना कृत्यकल्पतरु आदिमे सूर्यक प्रसादक रूपमे कासार आ सितासार आदिक निर्माण विधिमे देल अछि। बादमे गुडक व्यवहार होमए लागल। गुड जँ अपना ओतए पवित्रतापूर्वक बनाओल जाए तँ व्यवहार कएल जा सकैत अछि। वर्तमान मे चीनी अपवित्र तथा गुड पव्त्र मानि लेल गेल अछि।