Chhath Puja

2017 ई. में छठ पर्व इस प्रकार होगा-

दिनांक 23 अक्टूबर, सोम-   निरामिष भोजन- माँछ-मडुआ बारब।

दिनांक 24 अक्टूबर, मंगल- संयम- नहा-खाए।

दिनांक 25 अक्टूबर, बुध-    एकभुक्त आदि- खरना।

दिनांक 26 अक्टूबर, बृहस्पति- सायंकालिक अर्घ्य

दिनांक 27 अक्टूबर, शुक्र-    प्रातःकालिक अर्घ्य एवं पारणा।


छठ-पर्वः शास्त्र एवं लोक-परम्परा

भवनाथ झा

इस पर्व के अनेक नाम

छठ पर्व में भगवान् सूर्य की उपासना के साथ स्कन्द की माता षष्ठिका देवी एवं स्कन्द की पत्नी देवसेना इन तीनों की पूजा का महत्त्वपूर्ण योग है। इसी दिन कुमार कार्तिकेय देवताओं के सेनापति के रूप में प्रतिष्ठित हुए थे अतः भगवान् सूर्य के साथ-साथ इन सभी देव-देवियों के नाम इस पर्व के साथ जुड़ गये हैं और कालान्तर में इसका स्वरूप बृहत् हो गया है। धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में इसे स्कन्दषष्ठी, विवस्वत्-षष्ठी इन दोनों नामों से कहा गया है।

Read More>>

Continue reading “Chhath Puja”

Kojagara, the full moon day of Ashvin Month

कोजागरा

आश्विन पूर्णिमा कें सन्ध्याकाल चन्द्रमाक उदय भेला पर लक्ष्मीक पूजा करी।

ब्रह्मपुराणमे कहल गेल अछि-

प्रदोषे पूजयेल्लक्ष्मीमिन्द्रमैरावतस्थितम्।

निशीथे वरदा लक्ष्मी को जागर्तीति भाषिणी।

तस्मै वित्तं प्रयच्छामि अक्षैः क्रीडां करोति यः।

अर्थात् प्रदोष कालमे लक्ष्मी आ ऐरावत हाथी पर चढल इन्द्रक पूजा करी।

एकरे अधरतियामे वर देनिहारि लक्ष्मी घुमि घुमि कहैत छथि- के जागल छथि? आ जे पासा सँ खेलाइत छथि हुनका हम धन देबनि।

एह दिन व्रत करबाक विधान सेहो आएल अछि।

घर आ ओकर चारूकात सफाई करबाक चाही। अपन घरक लग जे रास्ता अछि ओकरो साफ-सुथरा करी। शरीर कें सुगन्धित द्रव्य- चन्दन आदिसँ सुसज्जित करी।

लक्ष्मीपूजाक संकल्प- ॐ अस्यां रात्रै आश्विने मासि शुक्ले पश्रे पञ्चदश्यां तिथौ अमुक गोत्रस्य अमुकशर्मणो मम सकल दुःखदारिद्र्यनिरासपूरव्क-दीर्घायुरारोग्यपुत्रपौत्रमहैश्वर्यसुखसंपदभिवृद्धि-कुलाभ्युदयाद्यभीष्टसिद्धिपूर्वकलक्ष्मीन्द्रप्रीतिकामन. द्वारोर्ध्वभित्त्यादिपरिवारदेवतापूजनपूर्वकलक्ष्मीन्द्रकुबेरपूजनमहं करिष्ये।

एहि मे दुआरि पूजाक विधान कएल गेल अछि-

ॐ द्वारोर्ध्वभित्तिभ्यो नमः।

ॐ द्वारदेवताभ्यो नमः।

एहि प्रकारें द्वारपूजा कए पूजाक स्थान पर आबि-

ॐ वास्तुपुरुषाय नमः।

ॐ ब्रह्मणे नमः।

ॐ हव्यवाहनाय नमः।

ॐ पूर्णेन्दवे नमः।

ॐ सभार्य्यरुद्राय नमः।

ॐ स्कन्दाय नमः।

ॐ गोमत्यै नमः। गोमती कें उडीद, तिल आ चाउर भोग लगाबी।

ॐ सुरभ्यै नमः।

ॐ निकुम्भाय नमः।

ॐ छागवाहनाय हुताशनाय नमः।

ॐ मेषवाहनाय वरुणाय नमः।

ॐ हस्तिवाहनाय विनायकाय नमः।

ॐ अश्ववाहनाय रेवन्ताय नमः।

एतेक देवता लोकनिकें पंचापजारसँ पूजा कए लक्ष्मीक पूजा करीः

ध्यान-

या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायतांक्षी

गम्भीरावर्तनाभि : स्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया ।

या लक्ष्मीर्दिव्यरूपैर्मणिगणखचितै: स्नापिता हेमकुम्भै: ।

सा नित्यं पद्महस्ता मम वसतु गुहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता ॥

आवाहन- ॐ भूर्भुवः स्वर्लक्ष्मि इहागच्छ इह तिष्ठ।

एहि प्रकारें पद्धतिक अनुसार लक्ष्मीक पूजा करी।

तकर बाद इन्द्रक पूजा करी।

अन्तमे कुबेरक पूजा कए नारिकेलक जल आदि नैवेद्यक रूपमे अर्पित कए रातिमे जागरण करी।

लक्ष्मीक विशेष नैवेद्य- नारिकेल, नारिकेलक जल, मखान, उज्जर रंगक कोनो अन्य फल, बताशा, केरा आदि।


Continue reading “Kojagara, the full moon day of Ashvin Month”