Brahmi Publication

Mithila, History, Literature and Art

Veda Sań Loka Dhari [From Sacred to Mundane]

वेद सँ लोक धरि

Veda Sań Loka Dhari 

[From Sacred to Mundane]

by

Govinda Jha in Maithili language.

लेखक- गोविन्द झा

सम्पर्क: 9334102305; 9431460793

© गोविन्द झा

प्रथम संस्करण 2016

प्रति 200 (दू सए मात्र)

मूल्य- रु.175 (एक सए पचहत्तरि टाका मात्र)

प्रकाशक- ब्राह्मी प्रकाशन, द्वारा- भवनाथ झा, हटाढ़ रुपौली, झंझारपुर, मधुबनी, 847404

Email: bhavanathjha@gmail.com,  Phone : 9430676240

आदिकथा

प्रस्तुत पुस्तक वर्तमान स्थितिक वर्णन थिक। अतीत दिस तकैत छी तँ देश मे, विशेष कए विदेह मे, दू समाजक अद्भुत सगम लक्षित होइछ। पहिल आदिम आ दोसर वैदिक। दूनूक प्रतीक थिक मैथिलीक प्रसिद्ध युग्मशब्द लोकवेद। लोक थिक नाना जाति-प्रजातिक बहुरंगी विशाल समुदाय। सभक अपन-अपन कर्म, धर्म, संस्कृति आ शासन। वेद थिक चारि वर्णवाला वैदिक समाज। चारूक धर्म आ शासन एक, किन्तु कर्म भिन्न-भिन्न। पहिल अर्थात् आदिम समाजक सर्वसामान्य धर्म छल तान्त्रिक-सह-शैव। ई सम्प्रदाय अफगानिस्तान मे किरातजन बीच जन्म लेलक तहिं शिव कर्पूर-सन गोर आ पार्वतीक नाम गौरी। काश्मीर एहि धर्म कें दर्शन बनाए देलक- पाशुपत दर्शन वा काश्मीरी शैव दर्शन। पौराणिक त्रिदेव मे शिव तँ रहि गेलाह, हुनक गौरी नारी सँ नर ब्रह्मा भए गेलीह परन्तु काज ओएह रहलनि सृष्टि करब। काश्मीर सँ चलल ई तान्त्रिक-सह-शैव सम्प्रदाय भुटान, नेपाल होइत भारत पहुँचल तँ गौरी कें भेटलथिन कोलजनक एक सखी। देहक वर्ण पर नाम भेलनि काली। हिनका संग बहुत रास डाइनि-जोगिनि (डाक-डाकिनी, शाकिनी, योगिनी) आ ओझा-गुनी छलथिन। ई लोकनि नाना तरहक यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र (धार्मिक जादू), टोना-टापर (लौकिक जादू) जनैत छलाह। ई तान्त्रिक-सह-शैव सम्प्रदाय कोनो वर्गविशेषक नहि,पूर्ववर्णितसकल कर्मजीवी समाजक छल। एकरा लोकधर्म कहि सकैत छी, जेना लोकाचार।

ई लोकधर्म कालक्रमें एक ठाम रहैत-रहैत वैदिक समाज मे सेहो सन्हिआए गेल। एहि दूनूक संगम सँ वैदिक समाज, विशेष कए मिथिला पंचदेवोपासक भए गेल- शक्ति, शिव, सूर्य, अग्नि आ विष्णु। एहि प्रकारें समन्वित धर्मक नाम भेल सनातन धर्म। शिव-पार्वतीक दिव्य दाम्पत्य नर-नारीक लौकिक दाम्पत्यक प्रतिमान भए गेल आ अन्ततः नर-नारीक ई मधुर संगम सिद्धिक एक नव पन्थ भए गेल जकर मूर्धन्य साधक आ मार्गदर्शक भेलाह चैतन्य महाप्रभु।

फेर आउ पूर्वक प्रसंग पर। आचार्य बुद्धदेव वैदिक परम्परा कें हिंसा सँ मुक्त कए कालक्रमें दशम अवतार होएबाक महान् प्रतिष्ठा प्राप्त कएल – केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे। जन्मस्थान विदेह मे नैष्ठिक लोकनि कें अहिंसा आ सदाचारक पाठ पढ़ाए अपन नव धर्मक प्रचार करए गंगाक ओहि पार चलि गेलाह।

कालक्रमें बुद्धदेवक संघ दू फाँक भए गेल। बहुसंख्य फाँक महायान कहओलक आ तत्काल लोक बीच प्रचलित तान्त्रिक-सह-शैव धर्महि कें बौद्ध धर्म बनाए लेलक। शिवक नव नाम भेल म×जुश्री, गौरीक नाम तारा। बुद्ध साक्षात् ईश्वर मानल जाए लगलाह आ नैष्ठिक लोकनिक नाना देवी-देवता नाम बदलि-बदलि विविध बोधिसत्व बनैत गेलाह।

संघक अल्पसंख्यक फाँक हीनयान बुद्धदेव कें ईश्वर नहि, आदर्श महापुरुष मानल आओर हुनक उपदेश आ दर्शन कें आदर्श धर्म। हीनयान ठामहि रहल। महायान तिब्बत पहुँचि ओहि ठामक तान्त्रिक-सह-शैव सम्प्रदाय कें बौद्ध धर्मक नामें प्रचारित करैत, नेपाल, भूटान, भारत, चीन होइत जापान धरि पहुँचल। अनेक शतकक एहि महा(अभि)यान मे गौरी तारा भए गेलीह आ हुनक स्थान लेलनि एक नव देवता ब्रह्मा। नव दर्शन विकसित भेल- तीन गुण आ तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश। ई महायान पूर्वी द्वीप पहुँचल तँ एक द्वीपक नाम भेल बर्मा (आजुक म्याङ मेर)। एही संग दूनूक बीच मे वैदिक विष्णु आसन पाओल। 

अन्ततः देश मे ने वैदिक धर्म रहल, ने बौद्ध धर्म, दूनूक स्थान लेलक सनातन धर्म (जकरा मुसलमान सभ हिन्दू धर्म कहए लागल)। सम्प्रति मिथिला मे गौरी-शंकर लोकक देवता छथि आ लक्ष्मी-नारायण वेदक देवता। सार रूप मे इएह भेल वेद सँ लोक धरिक आदिकथा। 

04.07.2016                                                                           गोविन्द झा

 

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