आई मिथिले टा नहिं सम्पूर्ण भारतमे हमरालोकनिक सनातन संस्कृतिक ह्रासक एकटा महत्त्वपूर्ण विन्दु अछि- पितृकर्म। माता-पिताक मृत्युक उपरान्त सभ दिन एतेक कर्म हमरालोकनिक संस्कृतिमे अछि। श्राद्ध, प्रतिवर्ष एकोद्दिष्टश्राद्ध, पार्वण, प्रतिदिन तर्पण आ विशेष रूपसँ पितृपक्षमे तर्पण, दीपावलीक दिन उल्काभ्रमण आ ब्राह्मणभोजन, गया-श्राद्ध आ अन्य पवित्र तीर्थमे श्राद्ध।

एतय एकटा स्पष्ट कए देब आवश्यक थीक जे श्राद्धकर्म नाम लैतहिं तथाकथित आधुनिकतावादी लोकनिक मुँहसँ निकलि पड़ैत छनि- श्राद्धभोज। षड्यन्त्र एतहिसँ आरम्भ होइत अछि। 19म शतीक अन्तमे दयानन्द सरस्वती आर्यसमाजक स्थापना कएलनि आ सत्यार्थप्रकाशमे गरुड़पुराणक कथाक हास्यास्पद विधिसँ खण्डन करैत श्राद्धक प्रति लोकमे दुर्भावना जगौलनि जे पितृकर्मक प्रति लोकमे अविश्वास उत्पन्न केलक जे सनातन धर्मक हानिक कारण बनल। सत्यार्थप्रकाशमे पोपजी आ जाटजीक संवाद, चित्रगुप्तक कथाकें बुढियाक फूसि कहि ओकर हँसी उडाएब, जाटजीक द्वारा दान मे देल गेल गायकें लाठी हाथें पोपजीक घरसँ जबरदस्ती हाँकि आनब- एहिसभ खिस्साकें जन-सामान्य वास्तविकताक रूपमे ग्रहण कएलनि। बादमे आर्यसमाजक द्वारा श्राद्धक विरोधमे सामाजिक आन्दोलन कएल गेल आ स्टीकर धरि छापि बाँटल गेल। मधुबनीमे आइसँ 25 वर्ष पहिने एकटा घरक दुआरि पर एहने स्टीकर साटल हम देखने छी।

फलतः पितृकर्म आइ क्रमशः लुप्त भेल जा रहल अछि। मिथिलाक गाममे तँ बचल अछि मुदा शहरमे अनेक लोक एहन छथि जे आर्यसमाजक विधिसँ श्राद्ध कए तेसर दिन फुरसति पाबि लैत छथि। वस्तुतः आर्यसमाजमे श्राद्धक कोनो परिकल्पने नै अछि तें तेसरा दिन सेहो श्राद्धकर्म नै, शुद्धीकरणक नाम पर आर्यसमाजमे प्रचलित दैनिक हवन मात्र होइत अछि। हँ, ब्रह्मभोज धरि होइते अछि, जाहिमे मृत व्यक्तिक एकटा फोटो लगाकए कातमे किछु फूल राखल रहैत अछि। भोज खेनिहार अबैत छथि आ ओहि फोटो पर फूल चढाए वफ सिस्टमसँ खूब दकरैत छथि।

मृत व्यक्तिक पुत्र तर्क दैत छथिन्ह जे बारह-तेरह दिन बाझल रहब से फुरसति नै अछि तें जल्दीसँ तेसरे दिन सभटा काज सम्पन्न करैत छी। सनातन पद्धतिसँ करब तँ अनेरे 13 दिन बरदाएब। शहरमे आर्यसमाजी पुरोहित अपन जाल पसारने छथि आ अपन पद्धतिकें “विशुद्ध वैदिक पद्धति” कहैत छथिन्ह। हवनक सभटा सामग्री झोड़ामे नेने, हाथमे टिनही हवनकुण्ड लटकौने ई आर्यसमाजी पुरहित पटना सन शहरमे आसानीसँ भेटि जेताह। ई लोकनि वस्तुतः गगाक घाट पर मुस्तैद रहैत छथि आ जखनहिं कोनो शब संस्कारक लेल आएल, कि पूजा-पाठक नाम पर शवक मुखमे सड़र, तिल चाउर आ घीसँ हवन आरम्भ कए दैत छथि। ओतहि हिनकालोकनिकें पता लागि जाइत छनि जे ई व्यक्ति आर्यसमाजी विधिसँ शुद्धीकरण करौताह। ओतहि फोन न.क आदान प्रदान होइत अछि आ तोसरा दिन ओ सभ सामग्री लए जुमि जाइत छथि।

ई विधि सम्पूर्ण वैदिक परम्पराक हत्या कए रहल अछि। अन्त्येष्टि आ श्राद्धकर्म विशुद्ध वैदिक विधि थीक, जेकर ज़ड़ि ऋग्वेदक पितृसूक्तमे अछि।

दयानन्द सरस्वती सेहो गरुड-पुराणक कथासभकें हास्यास्पद बनौने छथि। बादमे पुनर्जन्मक प्रसंग ओ भस्मान्तः शरीरम् के अवधारणाक आधार पर पिण्डदानसँ पितरकें सन्तुष्टिक बात नकारैत छथि। वस्तुतः उपनिषद् कें प्रमाण नामि कर्मकाण्डक खण्डन करब अनुचित छल। हमरालोकनि जनैत छी जे उपनिषद् ज्ञानकाण्ड थीक, दर्शनक विषय थीक। मुदा ओही वैदिक परम्परामे जे गृह्यसूत्र अछि ओहिमे जे विधान कएल गेल अछि तकर खण्डन अन्य काण्डक आधार पर केना होएत। जेना आयुर्वेद पद्धतिक अनुसार कारणक पता लगाए जँ एलोपैथ-पद्धतिसँ चिकित्सा कएल जाए तँ रोगीक की गति हेतैक से सभ जनैत छी। तें जतय कर्मकाण्डक प्रसंग अछि ओतए हमरालोकनिक लेल दिशा-निर्देशक ग्रन्थक रूपमे ब्राह्मण-ग्रन्थक परम्परा विद्यमान अछि। दूनूक परम्परा भिन्न अछि तें कर्मकाण्डक प्रसंग ज्ञानकाण्डक सिद्धान्तक कोनो चर्च नहिं होएबाक चाही। प्रायः एहू कारणें श्राद्धकालमे संन्यासीक प्रवेश वर्जित अछि।

श्राद्धकर्मक गृहस्थक परम कर्तव्य थीक। पितरलोकनि ईश्वरसँ सम्बन्ध जोडनिहार प्रजातन्तुक रूपमे छथि आ सभ दिन रहताह। प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ई वेदक ओहने आदेश अछि जेहन आदेश छैक- सत्यं वद। धर्मं चर आदि। एहि श्राद्धकर्म पर वैदिक गृह्यसूत्रमे विधान कएल गेल अछि आ तेकरे आधार पर मिथिलामे एहि विषय पर विद्वान् लोकनि पद्धति लिखने छथि।

कहैत छैक- महाजनो येन गतः स पन्थाः। हमरालोकनिक पूर्वज जे कए गेल छथि सैह कर्तव्य थीक। मिथिलाक प्राचीन पद्धतिकार जे लीखि गेल छथि ओ हमरालोकनिक परम्परा थीक, मैथिल कहएबाक धर्म थीक।

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