भाग 1

आज प्राचीन ग्रन्थों में प्रक्षेप और पाठान्तर को लेकर काफी बाबेला मचा हुआ है। लोग कहते हैं कि यह पंक्ति प्रक्षिप्त है, यह पाठांतर है, इसे हटा देना चाहिए, इसे बदल देना चाहिए। लोग एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते रहते हैं कि इस समुदाय ने जोड़ दिया, इसने हटा दिया, इसने जान-बूझकर बदल दिया आदि आदि।

पर हमें विचार करना चाहिए कि ऐसा कुछ नहीं है, जैसा लोग सोच रहे हैं। पाण्डुलिपियों में प्रक्षेप और पाठान्तर आने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसे जानने के बाद हम यह भी निर्धारित कर सकते हैं कि कौन-सा अंश मूल है तथा कौन-से अंश बाद में जोड़ा गया है या बदला गया है।

आइए सबसे पहले हम पाण्डुलिपि को जानें। भारत में छपाई की सुविधा से पहले सारे ग्रंथ हाथ से लिखे जाते थे। ये लिखे हुए सभी ग्रंथ आज पाण्डुलिपि कहलाते हैं। भ्रमवश आज पाण्डुलिपि शब्द से लोग केवल रचयिता के हाथ की लिखी सामग्री का अर्थ लेते हैं, जो उचित नहीं है। पाण्डुलिपि का यह आधुनिक अर्थ है। प्राचीन काल में हाथ से लिखी सारी सामग्री, जो किसी ग्रंथ से सम्बन्धित हैं, पाण्डुलिपि कहलाती है।

आदर्श मातृका

वास्तविकता है कि आज किसी प्राचीन ग्रन्थ की मूल पाण्डुलिपि जो उसके रचनाकार के हाथ की लिखी हो, उपलब्ध नहीं हैं। एक प्रति से दूसरी प्रति फिर उससे से विभिन्न काल तथा क्षेत्र में तैयार की गयी तीसरी, चौथी पाँचवीं प्रति हजारों की संख्या में लिखी जाती थी इसी के माध्यम से ग्रन्थ का प्रसार होता था। जिस पाण्डुलिपि से लोग दूसरी प्रति बनाते थे, वह आदर्श मातृका कही गयी है। इस आदर्श मातृका को सामने रखकर लोग यथासम्भव शुद्ध-शुद्ध प्रतिलिपि बनाते थे।

श्रुति-लेखन की विधि

जब दूसरी लिपि में लिखा हुआ कोई ग्रंथ दूसरे क्षेत्र में खरीदा जाता था तो उसके साथ ग्रंथ की लिपि पढनेवाले व्यक्ति भी जाते थे। वहाँ जाकर वे उस ग्रंथ का वाचन करते थे और उसे सुनकर उस शास्त्र के विद्वान् उसकी प्रतिलिपि बनाते थे। उदाहरणार्थ दक्षिण भारत का कोई ग्रंथ यदि उत्तर भारत में खरीदा जाए तो उसकी लिपि को पढनेवाले उत्तर भारत में नहीं मिलेंगे और उत्तर भारत की लिपि में लिखनेवाले दक्षिण भारत में नहीं मिलेंगें। ऐसी स्थिति में वाचन तथा श्रुति-लेखन की विधि मिलती है। उस विषय के विद्वान् सुनकर ग्रंथों को लिखा करते थे, इस प्रकार क्षेत्रीय लिपि में पाण्डुलिपि तैयार की जाती थी।

पाण्डुलिपियों के प्रकार

पाण्डुलिपियों का निर्माण तीन प्रकार के उद्देश्य से होता था- अपने लिए, किसी दूसरे को पढ़ने के लिए तथा विक्रय के लिए। अपने लिए लिखी गयी पाण्डुलिपि में अशुद्धि की कम संभावना रहती है लेकिन अक्षरों की अस्पष्टता हमें मिलती है। दूसरे के अध्ययन के लिए जब कोई विद्वान् लिखते थे तो थोड़ा अक्षर भी स्पष्ट होता था और पाठ की शुद्धता रहती थी। लेकिन विक्रय के लिए पुस्तक लेखन में अक्षर तो सुडौल होते थे, सुंदर होते थे, किन्तु पाठ की शुद्धता की कोई गारंटी नहीं थी, क्योंकि विक्रय के लिए पाण्डुलिपि निर्माण अक्सर विद्वानों के हाथ से न होकर व्यवसायी लिपिकार, जो कायस्थ होते थे, उनके हाथों होता था।

अब आप सोच सकते हैं कि प्राचीन काल में पोथियाँ कैसे लिखी जाती थी? कितना परिश्रम का काम था!

(प्रक्षेप तथा पाठान्तर पर अगले पोस्ट में)>>>

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