आज हम छपी हुई किताबें खरीदते हैं और पढ़कर अनेक तरह की जानकारी पाते हैं। आधुनिक काल में पुस्तकों का प्रकाशन डिजिटल प्रिंटिंग, ऑफसेट प्रिंटिंग आदि के द्वारा होता है लेकिन कम्प्यूटर के आने से पहले सभी अक्षर लोहे से बनते थे, जिन्हें एक दूसरे से जोड़कर एक-एक पृष्ठ का एक ब्लॉक बनता था और उससे छपाई होती थी। उससे भी पहले लीथो प्रिंटिंग की विधि से हाथ से लिखी हुई सामग्री को छापा जाता था। भारत में लीथो प्रिटिंग की शुरुआत 18वीं शती में आरम्भ हुई। इससे पहले हाथ से लिखी पुस्तकों का व्यवहार होता था। इन्हीं हस्तलिखित पुस्तकों को हम पाण्डुलिपि, हस्तलेख या मातृका कहते हैं जो ज्ञान-पाठ्य के वितरण का साधन रही है।
आज कम्प्यूटर के युग में बहुत सारे लेखक हैं जो सीधे कम्प्यूटर पर अपनी पुस्तकें लिखते हैं, बहुत लेखक हाथ से लिखकर फिर टाइपिस्ट से कम्प्यूटर पर टाइप कराकर उसे संशोधित कर प्रकाशन के लिए देते हैं। वर्तमान काल में इन्हें हम पाण्डुलिपि कहते हैं। लेकिन कम्प्यूटर के आने से पहले तक लेखक एक प्रति स्वयं हाथ से लिखते थे और उसकी कंपोजिंग होती थी। इस समय तक लेखक के हाथ की लिखी प्रति को पाण्डुलिपि कहते थे, जो एक ही प्रति होती थी।
लेकिन मुद्रण की व्यवस्था आरम्भ होने से पहले जब लेखक के हाथ की लिखी प्रति से नकल कर अनेक प्रतियाँ तैयार कर, फिर उन प्रतियों से भी एक साथ कई लिपियों में पुस्तकें तैयार कर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वितरित की जाती थी, तो एक पुस्तक की सैकड़ों प्रतियाँ बनती जाती थी। ये प्रतियाँ विभिन्न कालों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी लिखी जाती थी। ऐसी स्थिति में हम इन सभी हस्तलिखित प्रतियों को पाण्डुलिपि, मातृका या हस्तलेख कहते हैं। इन्हीं पाण्डुलिपियों के आधार पर पुस्तकों का सम्पादन और प्रकाशन किया जाता रहा है और हम प्राचीन भारत की ज्ञान-परम्परा से परिचित होते जा रहे हैं।

हालाँकि 19वीं शती से छपाई की सुविधा उपलब्ध हो जाने के बाद यूरोपियन तथा भारतीय विद्वानों के द्वारा हजारों की संख्या में भारतीय पुस्तकों का सम्पादन हो चुका है लेकिन आज भी पाण्डुलिपियों के सर्वेक्षण के क्रम में हमें ऐसे बहुत सारे ग्रन्थ मिल रहे हैं, जो अप्रकाशित हैं आज उनके सम्पादन और प्रकाशन की आवश्यकता है ताकि हम भारत ज्ञान-परम्परा का प्रकाश चारों ओर फैल सके।
इस सम्पादन और प्रकाशन के लिए जो भी हस्तलिखित आधार सामग्री हमें मिल जाती है, चाहे वह मूल लेखक के हाथ की लिखी हो या न हो, किसी भी लिपि में, किसी काल में प्रतिलिपि की हुई हो, उन्हें भी हम पाण्डुलिपि, हस्तलेख या मातृका कहते हैं, क्योंकि वहाँ हमें मूल ग्रन्थ का पाठ मिल जाता है।
इस प्रकार पाण्डुलिपियाँ मुख्य रूप से प्राचीन ज्ञान-पाठ्य के एकमात्र स्रोत हैं। हालाँकि बहुत सारी पाण्डुलिपियों पर विषयवस्तु को समझाने के लिए रेखांकन तथा चित्रांकन मिलते हैं। साथ ही, पाण्डुलिपि की सुन्दरता बढ़ाने के लिए भी उन पर प्राचीन काल के चित्र मिल जाते हैं, जो चित्रकला एवं संस्कृति का इतिहास बतलाते हैं। इस दृष्टि से ऐसी पाण्डुलिपियों का पुरातात्त्विक महत्त्व भी हो जाता है।
भारत में विशेष प्रकार के ताड़ के पत्ते पर लिखी पाण्डुलिपियों का प्रचलन अधिक रहा है। इस तालपत्र की आयु बहुत अधिक होती है। आज भी 1500 वर्ष पुरानी पाण्डुलिपियाँ तालपत्र पर लिखी मिल जाती है। भारत के समुद्र तटवर्ती इलाकों में इसका प्रचलन 19वीं शती तक रहा है, क्योंकि वहाँ ये आसानी से मिल जाते हैं।
हिमालयीय क्षेत्रों में भूर्जपत्र का अधिक प्रचलन रहा है क्योंकि वहाँ ये आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं लेकिन तन्त्रशास्त्र के ग्रन्थों के लिए भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में इसका प्रयोग देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त कपास से बना कागज- तूलपट, बाँस से बना बँसहा कागज, पेड़ की छाल से बना हस्तनिर्मित कागज आदि का भी व्यवहार होता रहा है। लगभग 1750 ई. से यूरोपीयन कम्पनी का कागज भी भारत में मिलने लगा है और उस पर भी लिखी पाण्डुलिपियाँ हमें मिलती हैं।
भारत की पाण्डुलिपियाँ जहाँ एक ओर पुस्तकालयों, संग्रहालयों तथा शिक्षण संस्थानौं में संकलित हैं वही इनकी पर्याप्त संख्या व्यक्तिगत संग्रहों में में भी मिलती हैं। जिस घर में पूर्वज विद्वान् हो चुके हैं वहाँ भी ये अधिक संख्या में पायी जातीं हैं, लेकिन अधिकांश घरों में इनका रख-रखाव ठीक से नहीं हो पाने के कारण ये नष्ट हो रही हैं। ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों के छोटे-बड़े पुस्तकालयों में भी इनकी स्थिति अच्छी नहीं हैं, ये धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं।
अतः इन पाण्डुलिपियों से ज्ञान-पाठ्य प्राप्त करने से के क्रम में सबसे पहले इनके वैज्ञानिक संरक्षण की आवश्यकता है। आज रसायनों के प्रयोग से, टिशू-पेपर की परत चढाने से लेकर अनेक प्रकार की संरक्षण विधियाँ अपनायी जा रही हैं। साथ ही, हम इन्हें डिजिटाइज्ड कर पाठ को सुरक्षित करने की विधि भी अपना रहे हैं ताकि यह आसानी से संपादकों तक पहुँच सके और उनमें लिखे गये ज्ञान से हम आलोकित हो सकें।
हमारे वर्तमान प्रधानमन्त्री माननीय नरेन्द्र मोदीजी ने भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय के अन्तर्गत ज्ञानभारतम् की स्थापना की है। साथ ही, उसे हर प्रकार से साधन-सम्पन्न कर भारतीय ज्ञान को उजागर करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहरायी है तो हमारा भी कुछ दायित्व बनता है।
यदि आपके घर में कोई पाण्डुलिपि हो तो,
16 मार्च 2026 से प्रारम्भ हुआ “ज्ञान भारतम्” के अंतर्गत राष्ट्रीय पाण्डुलिपि सर्वेक्षण, माननीय प्रधानमंत्री का एक ड्रीम प्रोजेक्ट, भारत की सनातन ज्ञान-परंपरा के पुनर्जागरण का एक विराट महायज्ञ है।
इस अभियान का उद्देश्य पाण्डुलिपियों का व्यापक अन्वेषण, सुव्यवस्थित प्रलेखन एवं वैज्ञानिक संरक्षण सुनिश्चित करना है।
यह भारत की प्राचीन विद्या, विज्ञान, दर्शन, साहित्य और संस्कृति के दिव्य प्रकाश को पुनः समाज में स्थापित करने का संकल्प है।
सहस्राब्दियों से मठों, मंदिरों, पुस्तकालयों, शिक्षण संस्थानों तथा गृह-गृह में सुरक्षित पाण्डुलिपियाँ हमारी अमूल्य धरोहर हैं।
इनमें ऋषियों की तपश्चर्या और लोककल्याण का अमृत ज्ञान निहित है।
यह अभियान केवल संग्रह नहीं, बल्कि भारत की आत्मा के पुनर्स्थापन का राष्ट्रीय प्रयास है।
इस पुनीत कार्य में प्रत्येक नागरिक की सहभागिता अत्यंत आवश्यक है।
“Gyan Bharatam Survey” ऐप को Google Play Store से डाउनलोड कर इस महायज्ञ के सहभागी बनें।
सम्भव है कि आपके घर में जो संग्रह है, उसमें आपके पूर्वज का लिखा कोई अप्रकाशित ग्रन्थ हो, तो उसके प्रकाश में आने पर आपका भी यश बढ़ेगा।
आज कम्प्यूटर के बढ़ते प्रभाव के कारण लोग हाथ से लिखना भी भूलते जा रहे हैं ऐसी स्थिति में पाण्डुलिपियों के पाठ को पढना कठिन होता जा रहा है। अतः इसके लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है ताकि कम से कम जिस लिपि के वर्तमान रूप को हम जानते हैं उस लिपि की पुरानी पाण्डुलिपियों को हम पढ़ सकें। इसके लिए यदि हम आधुनिक काल की लिखावट से आरम्भ कर धीरे-धीरे प्राचीन काल की ओर बढ़ते जायेंगे तो कुशलता आती जाएगी।
इस क्षेत्र में रोजगार के भी अवसर तलाशे जा रहे हैं। हम भारत के किसी भी भू-भाग में रहते हों, कम से कम एक भारतीय लिपि तो बचपन से जानते हैं। यदि हम अपनी ज्ञात लिपि के विकास को देखेंगे तो पायेंगे कि लिपियों का भी एक परिवार है, जिनकी सभी लिपियों में एक सामान्य विशेषता है। थोड़ा प्रयास करने पर हम उस परिवार की सभी लिपियों में लिखी पाण्डुलिपियों को पढ़ने में कुशल हो सकते हैं।
ब्राह्मी लिपि से विकसित भारतीय लिपियों को मुख्यतः दो परिवारों में बाँटा जा सकता है- उत्तर भारतीय लिपियाँ तथा दक्षिण भारतीय लिपियाँ। उत्तर भारतीय लिपियों में तिब्बती, शारदा, देवनागरी तथा कुटिल लिपियाँ हैं। देवनागरी तथा कुटिल परिवार की लिपियों को क्रमशः उत्तर लिच्छवि तथा पूर्व लिच्छवि भी कहा गया है। देवनागरी परिवार में जहाँ अक्षरों को निचले भाग में वक्ररेखा है वहीं कुटिल परिवार में न्यूनकोणिक है। गुरुमुखी, गुजराती तथा सिंधी, कैथी लिपियाँ देवनागरी परिवार की प्रमुख लिपियाँ हैं। इसी परिवार की लिपि नन्दिनागरी मध्य तथा दक्षिण भारत में लिखी जाती थी। जैन-ग्रंथों के लेखन के लिए नागरी का एक पारम्परिक स्वरूप प्रचलित है, जिसे जैन नागरी कहते हैं।
कुटिल परिवार के अंतर्गत पूर्वोत्तर भारतीय लिपियाँ मैथिली, बंगला, असमिया तथा नेवारी है। नेवारी पर देवनागरी का भी प्रभाव है। दक्षिण भारतीय लिपियों में तमिल, तेलुगु तथा मलयालम प्रमुख हैं, किन्तु संस्कृत भाषा के लेखन के लिए ग्रन्थ लिपि का प्रचलन सबसे अधिक है। ग्रन्थ लिपि से प्रभावित सिंहली लिपि भी श्रीलंका सहित दक्षिण भारत की प्रमुख लिपि है। इन सभी लिपियों में देवनागरी का प्रचार-प्रसार सबसे अधिक हुआ जिसके कारण मोड़ी, महाजनी, कैथी आदि अनेक क्षेत्रीय लिपियाँ प्रचलन से हट गयी हैं। पाण्डुलिपि अध्ययन हेतु इनका ज्ञान आवश्यक है।
पाण्डुलिपियों के संरक्षण एवं उनसे ग्रन्थ संपादन की दिशा में कार्य करने हेतु राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की स्थापना 2004ई. में हुई थी। यह संस्था अपनी दिशा में कार्य कर रही है लेकिन व्यक्तिगत संकलन में छिपी हुई पाण्डुलिपियों के अन्वेषण तथा अग्रतर शोध के लिए वर्तमान युवा पीढ़ी को जागरूक होना चाहिए, ताकि हम अपने देश के प्राचीन ज्ञान को विश्व भर फैला सकें।
क्रमशः जारी….