पिछले पाठ में हमलोगों ने संस्कृत वाक्यों में विशेष्य-विशेषण भाव सम्बन्ध को देखा। अब अर्थ समझने में सबसे पहले हमें कारक एवं विभक्ति का ज्ञान होना आवश्यक है।

प्रत्येक वाक्य में क्रियापद का होना अनिवार्य है। वाक्य में क्रियापद के साथ सभी नाम-पदों का अलग अलग संबन्ध बना रहता है।

अब यहाँ कुछ प्रश्नों को देखें–

  1. कार्य किसने किया
  2. इस कार्य से क्या फल मिला।
  3. इस कार्य में किस साधन का उपयोग किया गया।
  4. कार्य किसके लिए किया गया।
  5. कार्य क्यों किया गया अथवा अलग होने की क्रिया।
  6. कार्य किस जगह किया गया

इन छह प्रश्नों के उत्तर हमें कारक के द्वारा मिल जाते हैं।

जैसे, “स: लेखन्या लिखति”– इस वाक्य में लेखनी यानी कलम साधन है, और लिखति क्रिया है।

“स: विद्यालयं गच्छति” इस वाक्य में विद्यालय जाने का कार्य करनेवाला ‘स:’ है और इस कार्य करने से उसे यह फल मिला कि वह विद्यालय पहुँच गया।

इस प्रकार इन्हीं छह प्रश्नों के उत्तर हमें कारक के द्वारा मिलते हैं।

संस्कृत में कारक छह होते हैं

संस्कृत में क्रिया के साथ जिसका सीधा संबन्ध हो उसे कारक कहते हैं (क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्।)

कर्ता कर्म च करणं च सम्प्रदानं तथैव च।

अपादानाधिकरणमित्याहुः कारकाणि षट्॥

  1. कर्ता– क्रिया के संपादक को कर्ता कहते हैं। (पा. सू.– स्वतन्त्र: कर्ता)
  2. कर्म– क्रिया के द्वारा सबसे अभीष्ट फल को कर्म कहते हैं। (पा. सू.– कर्तुरीप्सिततम कर्म)
  3. करण– क्रिया में सबसे अधिक सहायक साधन को करण कहते हैं। (पा. सू.– साधकतमं करणम्)
  4. सम्प्रदान– कर्म के द्वारा जो सबसे बड़ा उद्देश्य होता है, उसे सम्प्रदान कहते हैं। (पा. सू.– कर्मणा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम्)
  5. अपादान– जहाँ अलग होने का अर्थ हो, वहाँ जो स्थिर रहे, उसे अपादान कहते हैं। (पा.सू.– धुवमपायेऽपादानम्)
  6. अधिकरण– क्रिया के आधार को अधिकरण कहते हैं। अर्थात् जिस स्थान पर क्रिया सम्पन्न हुई है (पा. सू.– आधारोऽधिकरणम्)

इन्हीं कारकों के अर्थ को प्रकट करने के लिए संस्कृत में विभक्तियाँ लगायी जाती है। जो हम पिछले पाठ में देख चुके हैं। किन्तु उनके विशेष महत्त्व है इसलिए यहाँ फिर दुहराये जा रहे है:

इसके साथ ही निम्नलिखित तालिका को हमेशा ध्यान में रखें

  1. प्रथमा– 1. बालक ने 2. दो बालकों ने 3. अधिक बालकों ने
  2. द्वितीया– 4. बालक को 5. दो बालकों को 6. अधिक बालकों को
  3. तृतीया–. 7. बालक से 8. दो बालकों से 9. अधिक बालकों से
  4. चतुर्थी– 10. एक बालक के लिए 11. दो बालकों के लिए 12. अधिक बालकों के लिए
  5. पञ्चमी– 13. एक बालक से 14. दो बालकों से 15.अधिक बालकों से
  6. षष्ठी– 16. एक बालक का 17.दो बालकों का 18. अधिक बालकों का
  7. सप्तमी– 19 एक बालक में 20. दो बालकों में 21. अधिक बालकों में
  8. संबोधन– 22. हे एक बालक! 23. हे दो बालकों 24. हे अधिक बालकों

यहाँ हमने देखा कि विभक्तियाँ तो सात हैं किन्तु कारक छह ही हैं। षष्ठी विभक्ति अतिरिक्त है। चूँकि सम्बन्ध में शब्दों का क्रिया के साथ सम्बन्ध नहीं रहता है, इसलिए सम्बन्ध को कारक नहीं माना गया है।

अलबत्ता, हिन्दी व्याकरण लिखनेवालों ने सम्बन्ध को भी एक कारक का दर्जा दे दिया है। लेकिन संस्कृत में सम्बन्ध कारक नहीं है।

एक उदाहरण के द्वारा हम इसे समझें– “दशरथस्य पुत्र: राम: रावणं हतवान्”। यहाँ रावण को मारने में दशरथ का कोई सम्बन्ध नहीं है, अपितु राम का सम्बन्ध है और दशरथ का सम्बन्ध राम के साथ है। अत: सीधा सम्बन्ध नहीं होने के कारण सम्बन्ध को कारक नहीं माना गया है।

अब हमलोग इस श्लोक को देखें। इस प्रकार के श्लोक शायद बच्चों को विभक्ति का ज्ञान कराने के लिए प्राचीन काल में लिखे गये थे। इन्हें कंठस्थ कर लें।

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे

रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः

रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽसम्यह

रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मामुद्धर॥

श्रीराम की स्तुति में रचित इस श्लोक में सभी विभक्तियों का प्रयोग है–

1. रामो राज्यमणिः सदा विजयते– रामः– श्रीराम, राजमणिः– राजाओं के सिरमौर, सदा हमेशा, विजयते जय प्राप्त करते हैं। यहाँ राम कर्ता के रूप में हैं अत: प्रथमा विभक्ति लगी हुई है।

2. रामं रमेशं भजे– राम– श्रीराम को, रमेश– लक्ष्मी के पति को, भजे– भजन करें।

3. रामेणाभिहता निशाचरचमू– रामेण– श्रीराम के द्वारा, निशाचरचमू– राक्षसों की सेना, अभिहता– पराजित की गयी। यहाँ कर्मवाच्य होने के कारण कर्ता से तृतीया विभरि हुई है।

4. रामाय तस्मै नमः। यहाँ ‘नम:’ के योग में चतुर्थी विभक्ति हुई है। इसके अतिरिक्त स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलं और वषट् शब्द के रहने पर भी चतुर्थी विभक्ति हो जाती है।

5. रामान्नास्ति परायणं परतरं– रामात्– राम से, परतरं– बडा, परायणं– दूसरे में निवास करनेवाले

6. रामस्य दासोऽस्म्यहम्– अहं– मैं, रामस्य– श्रीराम का दास: – दास, अस्मि–हूँ।

7. रामे चित्तलयः सदा भवतु मे– रामे– श्रीराम में, मे (मम) मेरा, चित्तलय: – मन का विलीन होना, सदा– हमेशा, भवतु– होवे।

8. हे राम मामुद्धर– हे राम– हे श्रीराम, मां– मुझे (मुझको), उद्धर– उबारें।

इस प्रकार, हमें संस्कृत के पौराणिक श्लोकों का अर्थ लगाने का प्रयास करना चाहिए। संस्कृत सीखने वालों के लिए सबसे उत्तम उपाय है कि वे वाल्मीकीय–रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रन्थ को विना अनुवाद की सहायता लिए पढ़ें। उन्हें ऐसी पुस्तक का क्रय करना चाहिए; जिसमें अनुवाद न हो, केवल मूल पाठ रहे। इस प्रकार जब बार–बार मूलग्रन्थ पढ़ेंगे, तो धीरे धीरे अर्थ भी सीखते जायेंगे। इन ग्रन्थों की भाषा अत्यन्त सुबोध है।

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