पिछले 5 पृष्ठों से हम संस्कृत भाषा सीखने के लिए पाठमाला दे रहे हैं। इसके अन्तर्गत सबसे पहले शब्दरूपों को कंठस्थ करने का पाठ आरम्भ किया है। अभीतक हमने शब्दों के रूपों को कण्ठस्थ करने की अनुशंसा की है।

इतने शब्दों के रूप कण्ठस्थ कर लेने के बाद अब संस्कृत वाक्य प्रयोग में सबसे पहले विशेष्य-विशेषण भाव को समझ लेना आगे के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

हिन्दी का एक वाक्यखण्ड लें– “लाल रंग के फूल से देवी की पूजा।” यहाँ हिन्दी की वाक्य-योजना के अनुसार ‘के’ परसर्ग का प्रयोग है जो संबन्ध कारक का सूचक है। इसका अनुवाद करने में लोगों को भ्रम होता है। लोग सीधे तौर पर कह देते है- रक्तवर्णस्य पुष्पेण देव्याः पूजनम्। किन्तु संस्कृत में इसका अनुवाद होना चाहिए- रक्तवर्णेन पुष्पेण देव्याः पूजनम्। क्योंकि रक्तवर्ण पुष्प की विशेषता बतलाने के कारण विशेषण है।

दूसरी ओर संस्कृत की यह पंक्ति देखें-

मन्दिराणि विचित्राणि शोभनानि शुभानि च।

दृश्यन्ते पुलिने नद्याः विमले रमणे तटे॥

इस श्लोक में चार प्रथम शब्द नपुंसक लिंग, प्रथमा विभक्ति तथा बहुवचन में है। ‘दृश्यन्ते’ क्रियापद है तथा इसके बाद ‘पुलिने’- सप्तमी एकवचन, ‘नद्याः’ – षष्ठी एकवचन तथा इसके बाद सभी सप्तमी एकवचन हैं। यहाँ अर्थ लगाने में अन्वय की आवश्यकता पड़ती है।

इन दोनों स्थितियों के लिए हमें विशेष्य-विशेषण को समझना पडेगा। अत: इस पाठ में हम इसी विषय पर विवेचन करेंगे।

विशेष्य एवं विशेषण क्या हैं?

विशेषता विशेषण कहलाती है और जिसकी विशेषता कही जाये उसे विशेष्य कहते हैं। जैसे- ‘लाल फूल’ शब्द में ‘फूल’ विशेष्य है और ‘लाल’ विशेषण। संस्कृत में भी ‘रक्तं पुष्पं’ में यही स्थिति है।

संस्कृत में नियम है कि विशेष्य के अनुसार विशेषण के भी लिंग, विभक्ति एवं वचन होते हैं। फलत: जहाँ हमें एक ही विभक्ति, लिंग एवं वचन के एक से अधिक शब्द मिलें तो हमें देखना चाहिए कि ये सभी शब्द अलग-अलग हैं या परस्पर विशेष्य एवं विशेषण हैं।

अलग-अलग शब्दों के उदाहरण इस प्रकार हैं- तोमरैः भिन्दिपालैः च शक्तिभिः मुसलैः तथा। यहाँ विशेष्य-विशेषण न होकर सभी विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र के नाम हैं, जिनसे देवी ने युद्ध किया। किन्तु अनेक स्थलों पर ये विशेष्य-विशेषण भी होंगे, जैसा कि ऊपर के उदाहरण में है।

जहाँ विशेष्य-विशेषण हैं, वहाँ देखना होगा कि इनमें कौन शब्द विशेष्य है, जिसके विशेषण के रूप में अन्य शब्दों का प्रयोग किया गया है। जैसे ऊपर के संस्कृत उदाहरण में मन्दिर विशेष्य है तथा विचित्र, शोभन एवं शुभ ये तीनों विशेषण हैं।

प्राचीन काल की व्याख्या-शैली के अनुसार ऊपर के श्लोक की व्याख्या हम इस प्रकार हिन्दी भाषा में करेंगे-

“अनेक मन्दिर नदी के तट पर देखे जाते हैं। मन्दिर कैसे हैं? विचित्र हैं अर्थात् विभिन्न प्रकार के चित्रों से भरे-पड़े हैं और शोभन हैं- शोभा प्रदान करनेवाले हैं और शुभ हैं- पापों को नाश करने में समर्थ हैं। तट कैसा है? वह पुलिन है अर्थात नदी का जल जहाँ तक पहँचता है, वह भाग है। नदी के जल से सिंचित भू-भाग को पुलिन कहते हैं। वह विमल है, अर्थात् निर्मल है और रमण है- रमणीय है रमण करने योग्य है। किसका तट है? नदी का तट है।”

इस व्याख्या शैली को ध्यान से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि विशेष्य और विशेषण का भाव किस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है।

अब हिन्दी के कुछ शब्दों का संस्कृत में अनुवाद देखें:

1. बहुत विस्तृत घने जंगल में- अतिविस्तृते गहने वने

2. विशाल वृक्ष से गिरे हुए ढेर सारे पत्ते- विशालात् वृक्षात् पतितानि बहूनि पत्राणि

3. सुन्दर तथा मँहगे पत्थरों से बना हुआ विशाल तथा ऊँचा मन्दिर- शोभनैः महार्घैः प्रस्तरैः निर्मितं विशालम् उत्तुङ्गं मन्दिरम्।

4. बड़ी-बड़ी आकर्षक कमल के समान आँखों से – विशालाभ्याम् आकर्षकाभ्यां कमलसदृशाभ्यां नेत्राभ्याम्।

यहाँ हमें स्मरण रखना होगा कि विशेष्य के अनुसार विशेषण के लिंग बदलेंगे। विशेषण के प्रयोग तीनों लिंगों में सभी विभक्तियों और वचनों में हो सकते हैं। जैसे निम्न उदाहरण से इसे समझा जा सकता है

सुन्दर वस्त्र- शोभनं वस्त्रम्।

सुन्दर पर्वत- शोभनः पर्वतः।

सुन्दर स्त्री- शोभना स्त्री।

किसी शब्द का स्त्रीलिंग में रूप क्या होगा यह जानने के लिए हमें संस्कृत के स्त्रीप्रत्ययों को देखना होगा। सामान्यत: अकारान्त शब्द से स्त्रीलिंग में आकार लग जाता है- जैसे शोभन: – शोभना, विशाल:-विशाला, कथित:- कथिता, उक्त:-उक्ता, गत:- गता आदि। विशेष जानकारी के लिए स्त्री-प्रत्ययों का अध्ययन अपेक्षित होगा।

इसी प्रकार, अन्य उदाहरण भी प्रबुद्ध पाठक अपने से चिन्तन करेंगे।

यहाँ संस्कृत से हिन्दी अनुवाद के लिए कुछ श्लोक यहाँ दिये जा रहे हैं। चूँकि अभीतक सन्धि के सम्बन्ध में कोई विमर्श नहीं किया गया है, अत: यहाँ विशेष्य-विशेषण के जानने के क्रम में श्लोक सन्धि-विच्छेद कर दिये जा रहे हैं:

व्याघ्रचर्मधरं शातं मुनिं नियतमानसम्।

व्याघ्रबुद्ध्या जघान-आशु शरेण-आनतपर्वणा।।15।।

अतिवेगेन विप्रेद्रा:- तत्-पत्नी च ससायकः ।

निजघान पतिप्राणां निविष्टां पत्यु:-अन्तिके।।16।।

विलोक्य मातापितरौ तत्पत्रे निहतौ वने।

रुरोद भृशदुःखार्तो विललाप च कातरः ।।17।।

युवां निरागसौ-अद्य केन पापेन सायकैः ।

निहतौ वै तपोनिष्ठौ मत्प्राणौ मत-गरू वने।।21||

एवं तयोः सुतो विप्रा मुक्तकण्ठं रुरोद वै।

अथ प्रलपितं श्रुत्वा शंकरो विपिने चरन्।।22।।

मलभाण्डे नवद्वारे पूय-असृक्-शोणित-आलये।।33।।

देहे- अस्मिन्-बुद्बुद-आकारे कृमि-यूथ-समाकुले।

काम-क्रोध-भय-द्रोह-मोह-मात्सर्य-कारिणि।।34।।

परदार- परक्षेत्र- परद्रव्य-एकलोलुपे।

हिंसा-असूया- अशुचिव्याप्ते विष्ठा-मूत्र- एकभाजने।।35।।

य: कुर्यात्- शोभनधियं स मूढः स च दुर्मतिः ।

बहुच्छिद्र-घट-आकारे देहे-अस्मिन्-अशुचौ सदा।।36।।

वायो:-अवस्थिति: किं स्यात्-प्राणाख्यस्य चिरं द्विज।

अतः मा कुरु शोकं त्वं जननीं पितरं प्रति।।37।।

स्कन्दपुराणम्, खण्ड: 3 (ब्रह्मखण्ड:), सेतुखण्डः, अध्याय: 48

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