भारत में प्रिंटिग आरम्भ होने से पहले पुस्तकें किस प्रकार लिखी जाती थी और उन्हें लिखने वालों को क्या आमदनी होती थी इसकी जानकारी के लिए निम्नलिखित उद्धरण बहुत महत्त्वपूर्ण है। मिथिला और बंगाल में करण कायस्थ व्यावसायिक लिपिकार होते थे, जो आदेश पाने पर किसी भीपुस्तक की प्रतिलिपि बनाते थे। इसके लिए उन्हें पारिश्रमिक मिलता था। यह उनके गुजारे के लिए सम्मानजनक आमदनी थी।

बहुत लोग उन दिनों अपने आदरणीय गुरु, पुरोहित, आचार्य आदि से उऩके हस्तलेख में स्तोत्र आदि की पाण्डुलिपि तैयार कराते थे तथा उसे अपने सिरहाने में रखा करते थे। मान्यता थी कि ऐसे श्रेष्ठ व्यक्ति के हाथ से लिखे गये स्तोत्र की प्रति हमारे सिरहाने में रहने से हर तरह की रक्षा होगी तथा उन्नति होगी। इसके लिए वे जो दक्षिणा देते थे उसमें ग्रन्थ के आकार का कोई महत्त्व नहीं होता था, बल्कि उस गुरु या आचार्य के प्रति श्रद्धा-भक्ति महत्त्वपूर्ण होती थी। आज भी कहीं-कहीं बड़े-बड़े घरों में प्रचलन में है।

लेकिन व्यावसायिक तौर पर जो पुस्तकें लिखी जाती थी, उऩमें 1000 श्लोक लिखने 1 रुपया यानी 12 आने दिये जाते थे। उऩ दिनों 12 आना का एक रुपया होता था। अब यह स्वाभाविक प्रश्न है कि उन दिनों 1 रुपये की कीमत क्या थी? हमें तिरहुत से एक दस्तावेज मिला है, जिसमें कहा गया है कि 1789 ई.में एक रुपया में 3 से 4 मन पक्की चावल मिलता था। इससे आप 1 रुपये में क्रयशक्ति का अनुमान लगा सकते हैं।

In Tirhoot it is rice and is now at three and four maunds per rupee pucka weight the relief this would be to them is apparent they would receive credit for the quantity in their rents agreeable to the bazar price and….. (SUMMARY REMARKS ON THE RESOURCES OF THE EAST INDIES…...पृ. 129)

यह उद्धरण उन दिनों ग्रन्थ-लेखन के व्यावसायिक रूप को सिद्ध करता है। आज हम किसी कम्प्यूटर टाइपिस्ट को 1000 श्लोक टाइप करने के लिए मुस्किल से 2000 रुपया देते हैं।

मूल उद्धरण

Some persons place their books on two beams which almost touch each other the ends of which are fastened in the opposite wall.

The expence of books is considerable besides the paper the natives pay for copying one roopee or twelve anas for every 32,000 : letters according to this the price of the Mŭhabharatŭ will be sixty roopees of the Ramayūnů twenty four of the Shrēē Bhagůvětů eighteen and of other books according to their size.

The paper upon which books are written called töölatů is coloured with a preparation composed of yellow orpiment and the expressed juice of tamarind seeds to preserve it from insects.The price varies from three to six quires for a roopee.

The Hindoo books are generally in single leaves with a flat board at the top and another at the bottom tied with cords or covered with a cloth. They are about six inches broad and a foot and a half long. The copying of works is attended with the creation and perpetuation of endless mistakes so that a copy can never be depended upon until it has been subjected to a rigid examination.

हिंदी अनुवाद

कई लोग अपनी पुस्तकों को दो बीमों के बीच में रखते हैं जो एक दूसरे को स्पर्श करती हैं. इनका एक सिरा विपरीत दिशा वाली दीवाल से जुड़ा रहता है।

पुस्तकों की लागत काफी ज्यादा है. कागज़ के अलावा स्थानीय लोग प्रतिलिपि बनाने के लिए भुगतान करते हैं। प्रत्येक 32000 अक्षरों के लिए एक रुपया यानी बारह आना. इस दर से महाभारत की कीमत साठ रुपये। रामायण की कीमत चौबीस रुपये, श्रीमदभागवत की अठारह और अन्य पुस्तकों के आकार के हिसाब से कीमत चुकानी पड़ती है।

जिस कागज़ से पुस्तकों की प्रति लिपियाँ तैयार की जाती हैं उन्हें तुलात कहा जाता है. कीटाणुओं से बचाव के लिए इनमें एक ख़ास रंग का उपयोग किया जाता है जो पीले रसायन और इमली के रस से तैयार किया जाता है. इसकी कीमत एक रुपये का छह क्वायर है।

हिन्दुओं की किताबें एक ही सिरे वाले पैन की होती हैं. इसमें एक गत्ता ऊपर और नीचे होता है जो तार से बंधे होते हैं या कपडे से ढके होते हैं. ये छह इंच चौड़े और डेढ़ फ़ीट लम्बे होते हैं. प्रतिलिपियों के लेखन में गलतियों की भरमार होती हैं. इसलिए बिना गहन परीक्षा के इन पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता है. करीब एक हजार में दो सौ पढ़ सकते हैं. हालांकि पूरे बंगाल में स्कूल हैं जहां बच्चों को पढ़ने, लिखने और हिसाब किताब की शिक्षा दी जाती है।

विवेचन

32 अक्षरों का एक अनुष्टुप् छन्द होता है। अतः 32 अक्षरों के समूह को एक श्लोक माना लिया जाता है। इस प्रकार 32 हजार अक्षरों को 1000 श्लोक माना गया है। इसी के दर से पुस्तक की कीमत निर्धारित होती थी।

बंगाल में जिस रुई के कागज पर लिखा जाता था उसे तुलात यानी तूल-पत्र यानी रूई से निर्मित कागज कहा जाता था। वैसे तालपत्र पर भी इन दिनों लिखने का प्रचलन था। लेकिन यह 1800 ई. के आसपास बहुत कम हो गया था। 1750ई. से पूर्व तालपत्र पर अधिक लिखे जाते थे।

स्रोत- पुस्तक का नाम तथा प्रकाशक

A View Of The History Literature And Mythology Of The Hindoos Including A Minute Description Of Their Manners And Customs And Translations From Their Principal Works In Four Volumes Vol. Iv By William Ward. The Third Edition Carefully Abridged And Greatly Improved, London, Printed For Black Kingsbury Parbury And Allen Booksellers To The Hon East India Company Leadenhall Street, 1820, Pp. 503-504

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