भारतीय इतिहास के साथ छेडछाड की घटना आम बात है। इतिहासकार की आलोचनात्मक दृष्टि में अन्तर तो हो सकते हैं, क्योंकि सभी व्यक्ति को अपने-अपने ढंग से सोचने का अधिकार है। किन्तु भयंकर स्थिति तब सामने आती है, जब हम मूल स्रोत के साथ छेड़छाड़ की घटना से परिचित होते हैं।

आइये हम बात करें जहाँगीर की डायरी की। जहाँगीर ने “तुजुक ए जहाँगीरी” नामक पुस्तक लिखी थी। यह उसकी अपनी डायरी है। इसका पूरा अंग्रेजी अनुवाद दो बार हुआ। पहली बार मेजर डैविड प्राइस ने फारसी की पाण्डुलिपि से इसका अनुवाद किया।

दूसरी बार एलेक्जांडर रॉगर्स ने The Tuzuk-i-Jahangiri or Memoirs Of Jahagir के नाम से किया।

इनमें से डैविड प्राइस बम्बई सेना में मेजर थे. साथ ही वे निम्नलिखित संस्थाओं के सदस्य भी थे-

  • सदस्य- रॉयल एसियाटिक सोसायटी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एण्ड आयरलैंड,
  • सदस्य- प्राच्य अनुवाद समिति (ओरियंटल ट्रांसलेशन कमिटी)
  • सदस्य- रॉयल सोसायटी ऑफ लिटरेचर

ऐसे व्यक्ति ने तुजुक ए जहाँगीरी का अनुवाद फारसी के स्रोत के आधार पर किया तथा उसे Memoirs Of The Emperor Jahangueir के नाम से 1829 ई. प्रकाशित कराया। इसका प्रकाशन ओरियंटल ट्रांसलेशन कमिटी के द्वारा कराया गया। डेविड प्राइस ने जिस संस्करण से अनुवाद किया था, वह 1040 हिजरी की लिखी हुई थी।

मिस्टर मार्ले ने इसी आधार पर डेविड प्राइस वाली प्रति को प्रामाणिक माना है। उऩका मन्तव्य है कि इतनी शीघ्र प्रतिलिपि करते हुए कोई व्यक्ति अपने मन से प्रक्षिप्त अंश को जोड़कर लोगों को धोखा नहीं दे सकता है।

जहाँगीरनामा के हिंन्दी अनुवादक व्रजरत्नदास ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित जहाँगीर का आत्मचरित पुस्तक की भूमिका पृष्ठ संख्या 7 पर इन तथ्यों का स्पष्टीकरण दिया है।

इस में एक अंश है जो काशी के विश्वनाथ मन्दिर के निर्माण से सम्बन्धित है। जब मानसिंह के द्वारा इसका निर्माण कराया जा रहा था तो शाही खजाना से 36 लाख असर्फियाँ इसमें लगाने की बात थी। बनारस के इस विश्वनाथ मन्दिर के बारे ने किंवदन्ती थी कि यदि काशी में कोई व्यक्ति भगवान् शिव का उपासक है तो मृत्यु के बाद उसका शव इस मन्दिर में रखा जाता था और वह व्यक्ति जीवित हो जाता था।

जहाँगीर ने इसकी सच्चाई का पता लगाया तो यह झूठा साबित हुआ। इस पर जहाँगीर लिखता है कि बनारस में इस्लाम पर रोक लगा दी गयी थी। इसलिए उसने इसी विश्वनाथ मन्दिर मन्दिर को तोड़कर भव्य मस्जिद बनाने की सोची। यहाँ शब्दों से लगता है कि मन्दिर के बनाने में जहाँगीर ने रोक भी लगा दी थी, लेकिन अकबर के आदेश से वह कार्य फिर चालू हो गया था।

एक दिन जहाँगीर ने अपने पिता से पूछ ही लिया कि वे इस मन्दिर के निर्माण में रोक लगाने से क्यों मना कर चुके हैं। इस पर अकबर ने जो जबाब दिया वह उसकी धार्मिक मान्यताओं को स्पष्ट करता है।

इस पूरे अंश को बेबरिज के अनुवाद में विलोपित कर दिया गया और कहा गया कि ये प्रक्षिप्त अंश हैं।

दरअसल, 1858 ई. के बाद यूरोपीयन इतिहासकार कभी भी हिन्दू-मुस्लिम के बीच सद्भावना नहीं चाहते थे। वे “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाते रहे। इसलिए विश्वनाथ मन्दिर के सम्बन्ध में अकबर के इस भाषण को उन्होंने छुपा दिया।

मूल उद्धरण एवं उसका हिंदी अनुवाद

“I am here led to relate that at the city of Banaras a temple had been erected by Rajah Maun Sing, which cost him the sum of nearly thirty-six laks of fine  methkaly ashrefies. The principal idol in this temple had on its head a tiara or cap, enriched with jewels to the amount of three laks of ashrefies.

“मैं यहां बता रहा हूं कि बनारस शहर में राजा मान सिंह के द्वारा एक मंदिर बनाया गया था। इसे बनाने में उन्हें उच्च कोटि के लगभग छत्तीस लाख मेथकली असर्फियों (सोने के सिक्के) का खर्चा हुआ । इस मंदिर की मुख्य मूर्ति के सिर पर एक मुकुट या टोपी थी, जो तीन लाख असर्फियों की मात्रा के गहनों से समृद्ध थी।

He had placed in this temple moreover, as the associates and ministering servants of the principal idol, four other images of solid gold, each crowned with a tiara, in the like manner enriched with precious stones.

इसके अलावा, उसने इस मंदिर में मुख्य मूर्ति के परिजनों और परिकरों के रूप में, ठोस सोने की चार अन्य मूर्तियों की स्थापना करायी थी, जिनमें से प्रत्येक के सिर पर एक मुकुट पहनाया गया था, जो कीमती रत्नों से समृद्ध थे

It was the belief of these Jehennemites that a dead Hindu provided when alive he had been a worshipper, when laid before this idol would be restored to life. As I could not possibly give credit to such a pretence, I employed a confidential person to ascertain the truth; and, as I justly supposed, the whole was detected to be an impudent imposture.

यह इन मूर्तिपूजक हिन्दुओं की मान्यता थी कि हिंदू, जब वह जीवित था, तब यदि उसने उपासना की थी, तो मरणोपरान्त इस मूर्ति के सामने रखे जाने पर वह फिर से जीवित हो उठेगा। चूंकि मैं इस तरह के ढोंग को प्रश्रय नहीं दे सकता था, इसलिए मैंने सच्चाई का पता लगाने के लिए एक गोपनीय व्यक्ति को नियुक्त किया। और, जैसा कि मैंने उचित रूप से माना था, यह पूरा का पूरा एक ढोंग पाया गया।

Of this discovery I availed myself, and I made it my plea for throwing down the temple which was the scene of this imposture; and on the spot, with the very same materials, I erected the great mosque, because the very name of Isslam was proscribed at Banaras, and with God’s blessing it is my design, if I live, to fill it full with true believers.

इस तहकीकात का मैंने स्वयं लाभ उठाया। मैंने इस मंदिर को गिराने की माँग रखी। क्योंकि इसमें धोखे का दृश्य था। उसी सामग्री के साथ, मैंने एक बड़े मस्जिद का निर्माण करना चाहा, क्योंकि बनारस में इस्लाम के नाम पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। अल्लाह कसम, यह मेरा इरादा है, अगर मैं रहता हूं, तो बनारस को सच्चे विश्वासियों से भर दूं।

On this subject I must however acknowledge, that having on one occasion asked my father the reason why he had forbidden any one to prevent or interfere with the building of these haunts of idolatry, his reply was in the following terms:

इस विषय पर मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि एक अवसर पर मेंने पिता ने यह पूछा कि उन्होंने मूर्तिपूजा के इन स्थलों के निर्माण को रोकने या हस्तक्षेप करने के लिए किसी को क्यों मना किया था। उनका उत्तर निम्नलिखित शब्दों में था:

जहाँगीर के पूछने पर अकबर का उत्तर

“My dear child, said he, “I find myself a puissant monarch, the shadow of God upon earth. I have seen that he bestows the blessings of his gracious providence upon all his creatures without distinction.

“उऩ्होंने कहा- “मेरे प्यारे बच्चे, मैं खुद को एक शक्तिशाली सम्राट्, के रूप में पृथ्वी पर भगवान की छाया पाता हूं। मैंने देखा है कि वह बिना किसी भेदभाव के अपने सभी प्राणियों पर अपनी कृपा दृष्टि का आशीर्वाद देता है।

Ill should I discharge the duties of my exalted station, were I to withhold my compassion and indulgence from any of those entrusted to my charge.

यदि मैं अपने ऊँचे पद के कर्तव्यों का निर्वहन करूँ, तो क्या मैं अपनी करुणा और भोग को उन लोगों में से किसी से दूर रखूँ, जिन्हें मेरे प्रभार में सौंपा गया है।

With all of the human race, with all of God’s creatures, I am at peace: why then should I permit myself, under any consideration, to be the cause of molestation or aggression to any one?

सारी मानवजाति के साथ, परमेश्वर के सभी प्राणियों के साथ, मैं शांति में हूं: फिर मैं किसी भी विचार के तहत, किसी के साथ छेड़छाड़ या आक्रामकता का कारण खुद क्यों बन जाऊँ?

Besides, are not five parts in six of mankind either Hindus or aliens to the faith; and were I to be governed by motives of the kind suggested in your inquiry, what alternative can I have but to put them all to death!.

इसके अलावा, मानव जाति के छह में पांच भाग या तो हिंदू या मूर्तिपूजक हैं जो विदेशी नहीं हैं। अगर मैं आपकी बात में सुझाए गए उद्देश्यों से शासित होता, तो मेरे पास उन सभी को मौत के घाट उतारने के अलावा और क्या विकल्प हो सकता था!

I have thought it therefore my wisest plan to let these men alone. Neither is it to be forgotten, that the class of whom we are speaking, in common with the other inhabitants of Agrah, are usefully engaged, either in the pursuits of science or the arts, or of improvements for the benefit of mankind, and have in numerous instances arrived at the highest distinctions in the state, there being, indeed, to be found in this city men of every description, and of every religion on the face of the earth.”

मैंने सोचा है कि इसलिए इन लोगों को अपने आप पर छोड़ना मेरी सबसे बुद्धिमान योजना है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस वर्ग की हम बात कर रहे हैं, आम तौर पर आगरा के अन्य निवासियों के साथ, विज्ञान या कला की खोज में, या मानव जाति के लाभ के लिए, सुधार के लिए उपयोगी होते हुए लगे हुए हैं, और कई उदाहरणों में वे राज्य में उच्चतम पदों पर भी पहुंचे हुए हैं। वास्तव में, इस शहर में हर तरह के पुरुष और हर धर्म के लोग पाए जा सकते हैं, जो इस धरती के चेहरे हैं।।

(Memoirs of the Emperor Jahangueir, pp. 14-15)

Details of the book

MEMOIRS OF THE EMPEROR JAHANGUEIR,WRITTEN BY HIMSELF; AND TRANSLATED FROM A PERSIAN MANUSCRIPT, BY MAJOR DAVID PRICE,

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