भारत में जातिवाद इस प्रकार जहर घोल चुका है। एक महिला ने काशी में जाकर 18वीं शती में स्कूल खोलकर महिलाओं और खासकर विधवाओं को पढ़ाने-लिखाने का कार्य आरम्भ किया। पर, इतिहास से उसका नाम मिटा दिया गया। बंगाली विधवा थी, जो अपने पति तथा पिता की मृत्यु हो जाने पर काशी गयी। पिता ने उसे संस्कृत काव्यशास्त्र और व्याकरण  की शिक्षा दी थी। काशी जाने पर वहाँ उन्होंने खुद न्याय और अन्य शास्त्रों का ज्ञान पाया।

सबसे खास बात है कि किसी पण्डित ने ही उसे पढ़ाया होगा!

 उसने पढ़-लिखकर अपने जैसी विधवा महिलाओं को पढ़ाने के लिए स्कृल खोला तथा उसे पढ़ाने लगी।

वह थी हूती विद्यालंकार। अंग्रेजी नामकरण है यह। मुझे लगता है कि उसका नाम आहुति विद्यालंकार रहा होगा।

सोचने वाली बात है। आज इतिहासकार लिखते हैं- सावित्रीबाई फूले पहली महिला शिक्षिका थी। आहुति विद्यालंकार भुला दी गयी।

क्या अब इतिहास में भी आरक्षण हो गया?

मूल उद्धरण तथा इसका हिन्दी अनुवाद पढे।

मूल उद्धरण

A few years ago there lived at Benares a female philosopher named Hūtee Vidyalůnkarů. She was born in Bengal her father and her husband were koolēēnŭ bramhŭns It is not the practice of these bramhŭns when they marry in their own order to remove these wives to their own houses but they remain with their parents.

This was the case with Hŭtee which induced her father being a learned man to instruct her in the Sủngskrită grammar and the kavyŭ shastrūs. However ridiculous the notion may be that if a woman pursue learning she will become a widow the husband of Hŭtee actually left her a widow.

Her father also died and she therefore fell into great distress. In these circumstances like many others who become disgusted with the world she went to reside at Benares. Here she pursued learning afresh and after acquiring some knowledge of the law books and other shastrůs she began to instruct others and obtained a number of pupils so that she was universally known by the name of Hūteem Vidyalūnkarů viz ornamented with learning.

बंगाल में अन्य शिक्षित महिलाएँ

The wife of Jŭshomũntů Rayů a bramhŭn of Năshee Poorů is said to understand Bengalee accounts and the wives of the late raja Nuvù Krishnů of Calcutta are famed for being able to read At Vashủvariya resides a widowed female a considerable land owner who possesses a good knowledge of the Bengalee and of accounts and is honoured with the name of ranēē or queen Many female mendicants among the voiraginēēs and súnyasinēēs have some knowledge of Sủngskritů and a still greater number are conversant with the popular poems in the dialects of the country From hence an idea may be formed of the state of female learning in Bengal

स्रोत- पुस्तक का नाम तथा प्रकाशक

A View Of The History Literature And Mythology Of The Hindoos Including A Minute Description Of Their Manners And Customs And Translations From Their Principal Works In Four Volumes Vol. Iv By William Ward. The Third Edition Carefully Abridged And Greatly Improved, London, Printed For Black Kingsbury Parbury And Allen Booksellers To The Hon East India Company Leadenhall Street, 1820, Pp. 503-504

हिन्दी अनुवाद

कई वर्ष पहले बनारस में हती विद्यालंकार नामक महिला दार्शनिक रहती थीं. इनका जन्म बंगाल में हुआ था. इनके पिता और पति दोनों ही कुलीन ब्राह्मण थे. वहाँ की परम्परा के अनुसार जब ये ब्राह्मण अपनी बिरादरी में विवाह करते हैं तो वे अपने घर में नहीं बसकर ससुराल में ही बस जाते हैं. 

हती के साथ भी ऐसा ही हुआ. इसलिए हती के विद्वान् पिता ने उन्हें सस्कृत व्याकरण और काव्य शास्त्र की शिक्षा दी. चाहे यह विश्वास कितना भी विचित्र लगे कि शिक्षा हासिल करने वाली महिला विधवा हो जाती है, हती के पति उसे विधवा बनाकर इस दुनिया से चले गए.

इसकी कुछ दिनों बाद ही उसके पिता भी इस दुनिया से चल बसे. इसके बाद हती के लिए संकट का पहाड़ टूट पड़ा. ऐसी परिस्थितियों में हालात के मारे लोगों की तरह हती बनारस जाकर रहने लगी. वहाँ उन्होंने फिर से विद्या अध्ययन शुरू किया। कुछ समय तक कानून और शास्त्र ज्ञान हासिल करने के बाद वह दूसरों को शिक्षा देने लगी. इस तरह उनके कई विद्यार्थी हो गए. वे हती विद्यालंकार अर्थात् विद्या से सुसज्जित के नाम से विख्यात हुईं। 

नशीपुर के ब्राह्मण जशोमंत राय की पत्नी बांग्ला में हिसाब किताब रखना जानती थी. दिवंगत राजा नवकृष्ण कलकत्तावासी की पत्नियां पढ़ना जानती थीं. बसवरिया में एक संपन्न भूस्वामी बांग्ला और  की अच्छी जानकार थीं. उन्हें रानी की उपाधि मिली हुई थी. वैरागिनियों और सन्यासियों में संस्कृत का सामान्य ज्ञान था. इनमें ज्यादातर स्थानीय बोलियों में रचित लोकप्रिय कविताओं से परिचित थीं. इससे बंगाल में नारी की शिक्षा की एक अवधारणा बनती है. 

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