छान्दोग्य उपनिषद् का प्रारम्भ एक शान्तिपाठ से होता है, जिसमें ऋषि की प्रार्थना है कि सब कुछ उपनिषत्-प्रतिपाद्य ब्रह्म ही है, मैं ब्रह्म को नहीं भूलूँ, ब्रह्म भी मुझे न भूलें, अविस्मृति बनी रहे, उस आत्मा में तल्लीन रहता  हुआ मुझ में उपनिषत्-प्रतिपाद्य धर्म सदैव वर्तमान रहे।

यह उपनिषत् प्रतिपाद्य धर्म ही वेदान्त धर्म है, जिसे विवेकानन्द नेअपने व्याख्यान में कतिपय जगह कहा है कि यही हिन्दू धर्म है।

उपनिषद् वेद का भाग है। अतः वैदिक धर्म ही हिन्दू धर्म  हुआ।

मनु का कथन है– धर्मजिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः धर्म के जिज्ञासुओं के लिए श्रुति ही उत्तम प्रमाण है।

मनु ने पुनः कहा है–  वेदोऽखिलो धर्ममूलम्– वेद धर्म का मूल है।

गौतम धर्मसूत्र में भी यहीं कहा गया है। (गौतम धर्मसूत्र….)

तैत्तिरीय आरण्यक के महानारायणोपनिषत् में कहा गया है कि धर्म पाप को क्षय करता है- धर्मेण पापमपनुदति।

तैत्तिरीय श्रुति हमें आदेश एवं उपदेश देती है कि धर्म पथ पर चलो- धर्मं चर।

वसिष्ठ धर्मसूत्र भी कहता है कि धर्मं चर माधर्मम्।

धर्म पथ पर चल, अधर्म पर नहीं। अतः हमें जानना चाहिए कि वेद या वेदान्त प्रतिपाद्य धर्म क्या है?

इसी विषय पर पढ़ें श्री राधा किशोर झा का विस्तृत आलेख। उन्होंने सिद्ध किया है कि जिस प्रकार अधिनियम (Act) के क्रियान्वयन के लिए नियम (Rule) बनाये जाते हैं, अगर कोई नियम अधिनियम के प्रतिकूल होता है तो वह न्यायालय के द्वारा अमान्य कर दिया जाता है, उसी प्रकार श्रुति के परिप्रेक्ष्य में स्मृति द्वारा नियम बनाये गये ताकि श्रुति के मूल भावों को सही सही क्रियान्वयन होसके। अगर स्मृति के नियम श्रुति के प्रतिकूल हो तो वह नियम मान्य नहीं है। धर्म के  मूलभूत सिद्धान्तों को जीवन के प्रथम चरण में अवगत कराने के उद्देश्य से ब्रह्मचर्याश्रम, उसके सम्यक् क्रियान्वयन हेतु गृहस्थाश्रम तथा मोक्ष (निःश्रेयस्) की सिद्धि हेतु वानप्रस्थाश्रम एवं संन्यास आश्रम की स्थापना धर्मसूत्रों में की गयी, जिसे बाद में स्मृतियों में उसे पल्लवित पुष्पित किया गया।

संक्षेप में यही वेदान्त धर्म है, इसे ही विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म कहा है।



लेखक

श्री राधा किशोर झा*

*विशेष सचिव, भारतीय प्रशासनिक सेवा, (अ.प्रा.) क्वांटम डीएनआर. एपार्टमेंट, फ्लैट सं. 305,  70 फीट बाइपास, विष्णुपुर, पकरी 35 फीट, बिहार डिजिटल वर्ल्ड के पास, द्वारकापुरी, पटना-800002

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