एखनि हम मैथिलीक विभिन्न विद्वान् आ सामान्य जन दुहूक लिखल लगभग 40 टा आलेख कें एक पुस्तक में संकलित कए ओकर सम्पादन कए रहल छी। एहि क्रममे हमरा परसर्गक रूपमे ‘के’ एवं ‘से’क प्रयोग मे एतेक विविधता आ भ्रान्ति भेटल जे ओहि पर लिखब आवश्यक बुझाइत अछि।

ई दुहू हिन्दीक परसर्ग थीक जकर व्यवहार मैथिलीमे भए रहल अछि। मैथिलीमे एकर प्रयोग परसर्गक रूपमे कखनहुँ नहि होइत अछि। मैथिलीमे एकर शुद्ध व्यवहार निम्नलिखत वाक्यमे देखल जा सकैत अछि

  1. एहाँ जे कहब से हम करब-
  2. जे लोरिक भात खाएत से लोरिक बरियात जाएत

एकरे रूप थीक- सैह, सेहो, तहिना आदि। ई अवधारणार्थक थीक आ संस्कृतक सः (तत्) शब्दक अर्थ प्रतिपादित करैत अछि। जेना संस्कृतमे यत् आ तत् एहि दुहूक नित्य सम्बन्ध रहैत अछि तहिना जे आ से एहि दुहूक नित्य सम्बन्ध रहैत अछि। ई एकर शुद्ध प्रयोग थीक।

परसर्गक रूपमे एकर अशुद्ध प्रयोग निम्नलिखित रूपमे लेखकलोकनि करैत छथि-

  1. आइ से हम तमाकू नै खाएब।
  2. हाथ से लिखल चिठी पठाउ।

एतए पहिल वाक्यमे ‘से’ अपादान कारकक अर्थमे आएल अछि। हिन्दीमे सेहो अपादान मे ‘से’ परसर्ग लगैत छैक। ओही अर्थमे ई मैथिलीमे मिझर भए गेल अछि। मैथिलीमे अपादान कारकक लेल ‘सँ’ परसर्ग अबैत अछि। तें शुद्ध प्रयोग थीक- आइसँ हम तमाकू नहि खाएब।

दोसर उदाहरणमे ‘से’ करण कारक अर्थात् साधनक अर्थमे आएल अछि। हिन्दीमे ‘हाथ से’ लिखल जाएत ओकरे अनुकरण पर ओही अर्थमे ई मैथिलीमे आबि गेल अछि। शुद्ध प्रयोग होएत- हाथसँ लिखल चिठी पठाउ

के परसर्गक प्रयोग मैथिलीमे बहुत भए रहल अछि मुदा मात्र एक अर्थमे ओकर प्रयोग सर्वनामक रूपमे शुद्ध अछि-

  1. ओतए के ठाढ़ अछि?

एहि ठाम ‘के’ प्रश्नवाचक सर्वनाम थीक। एकर विभिन्न रूप अछि- केना, कतए, कोन, किएक। संस्कृतक ‘कः’ शब्द के सर्वनामक अर्थ दैत अछि।

मैथिलीमे एकर अशुद्ध प्रयोग निम्नलिखित रूपमे देखल जाइत अछि-

  • राम के नाम लिय- सम्बन्ध कारकक अर्थमे। एतए हिन्दीक अनुकरणमे सम्बन्ध कारकक अर्थमे के परसर्ग लागल अछि। शुद्ध प्रयोग होएत रामक नाम लिय।
  • राति के नहि बहराउ– अधिकरणक अर्थमे। एतए राति अधिकरण थीक तें एतए शुद्ध प्रयोग होएत रातिमे नहि बहराउ
  • फल के धो लिय- कर्मक अर्थमे। एतए कर्मक अर्थमे मैथिलीमे शुद्ध प्रयोग होएत- फलकेँ धो लिय़।
  • रवि के तेल नहि लगाबी– अधिकरणक अर्थमे। एतहु शुद्ध प्रयोग होएत रविकेँ तेल नहि लगाबी
  • पढ़ि के लिखू– क्रियाक समाप्तिक अर्थमे। एक क्रियाक समाप्तिक बाद जखनि दोसर क्रिया आरम्भ होइत अछि तखनि संस्कृतमे ‘क्त्वा’ प्रत्यय लगैत अछि। जेना सः पठित्वा लिखति। एही अर्थमे एतहु शुद्ध प्रयोग होएत- पढ़ि कए लिखू। एहिठाम मैथिलीमे दू प्रकारक प्रयोग अछि- कए-कय, भए-भय, कएल-कयल।

कएल-कयल एहि दुहू प्रयोगक स्थान पर ‘कैल’ शब्द प्रयोग सेहो भ्रान्ति थीक जे उच्चारणमूलक भ्रान्ति कहाओत। कैल शब्द विशेषण थीक जे विशेष रंगक अर्थ मे व्यवहार होइत अछि- कैल गाय, कैल बरद आदि।

4 टिप्पणियाँ

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