पटना में कई जगहों पर स्थायी दुर्गा-मन्दिर हैं, जहाँ सालों भर माँ की पूजा होती है। इन मंदिरों में स्थायी स्थापित मूर्तियाँ हैं औऱ विधान के साथ प्रतिदिन पूजा होती है। भक्तगण प्रत्येक दिन दर्शन का लाभ लेते हैं। सन्ध्याकाल प्रतिदिन आरती होती है, जिस समय काफी भीड़ रहती है।

लेकिन पता नहीं, इन मन्दिरों में दुर्गापूजा आरम्भ होते ही माता के आगे पर्दा डाल दिया जाता है, जिसे सप्तमी के दिन खोला जाता है।

इस तरह का कोई विधान शास्त्र में नहीं है। हमें यह पता करना चाहिए कि कौन ऐसे पुरोहित हैं, जो यह गलत काम कराते हैं। इन पुरोहितों को यह नहीं पता होता है कि दुर्गापूजा के आगे पट क्यों लगाया जाता है?

जहाँ पर पंडाल बनाकर, मिट्टी की मूर्ति बनाकर स्थापना की जाती है, वहाँ प्राण प्रतिष्ठा से पहले यानी पट खुलने से पहले मूर्ति का दर्शन नहीं होना चाहिए। इसलिए सप्तमी से पहले तक आगे में परदा लगा दिया जाता है।

लेकिन जहाँ माँ की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा कई वर्ष पहले हो चुकी हो, माँ की स्थापित मूर्ति हो, वहाँ सप्तमी के दिन प्राण-प्रतिष्ठा का कोई विधान ही नहीं है।

इसलिए स्थायी दुर्गा मन्दिरों में, जहाँ दुर्गा माँ की पूजा सालों भर होती हो, वहाँ दुर्गा-पूजा में पहली से छठी तक पट लगाने का विधान नहीं है।

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