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हमरालोकनि मिथिलाक छी। जतेक व्रतकथा अछि, पूजा-पद्धति अछि, पूजा-पद्धतिमे प्रयुक्त पौराणिक मन्त्र अछि तकर मैथिली पद्यानुवाद करू। सार्वजनीन पद्धति बनाउ। समाजक सभ लोककेँ उपासनासँ जोड़बाक लेल अहाँक क्रान्तिकारी डेग होएत।

मैथिलीमे पूजापद्धति

भारतमे प्राचीन कालमे देव-पूजाक नाम पर यज्ञ होइत छल। अग्निकेँ हविष्य सामग्री अर्पित कए  हुनकासँ प्रार्थना कएल जाइत जे अहाँ अमुक अमुक देवताकेँ ई पहुँचाए दियौन। एकर सभटा वैदिक मन्त्र छल। यजुर्वेद समग्र रूपसँ एही यज्ञक लेल सम्पादित कएल गेल।

बादमे जखनि जनसंख्या बढ़ल, विभिन्न प्रकारक काज आएल तँ सभ केओ वेदाध्ययन नहि कए आन-आन काजमे लागि गेलाह। वेदमन्त्र हुनका सभसँ दूर होइत गेल। केओ समाजक उपयोगक लेल कपड़ा बिनलनि तँ केओ माँटि बर्तन बनाबए लगलाह।

एहन स्थिति मे हुनकालोकनिकेँ देवताक उपासनासँ जुड़ल रखबाक लेल आगम पद्धति विकसित कएल गेल। ओहिमे पौराणिक मन्त्र छल जकरा उच्चारण लेल कोनो विधिवत् प्रशिक्षणक आवश्यकता नै छलै। पुराणक लौकिक संस्कृत भाषा जन-प्रचलित छल। ओही भाषामे मन्त्र लिखल गेल आ समाजक सभ केओ देवोपासनासँ जुड़ल रहलाह। एकरा ओ सभ केओ अपनौलनि जे वेदक विधिवत् अध्ययन नै कएने छलाह।

एहीमे किछु गोटे बीजमन्त्रक सेहो उपयोग कएलनि, आ ओहो उपासनासँ जुड़ल रहलाह।

जखनि संस्कृत भाषा सेहो जनताक लेल दुर्बोध भए गेल आ क्षेत्रीय भाषा सभ अस्तित्वमे आबए लागल तखनि गोरखनाथ शिवोपासनाक लेल शाबरमन्त्रक प्रवर्तक भेलाह आ एक बेर फेरसँ समाजक सभ लोक कें उपासना आ अध्यात्मसँ जोड़बाक अभियानमे सफल भेलाह।

एही जनोन्मुखी परम्पराकेँ रामानन्द, रविदास, तुलसीदास, कबीर आदि सन्त लोकनि अपनौलनि। एहि कालमे उपासना सम्बन्धी ग्रन्थसभक लोकभाषामे अनुवाद भेल। गोस्वामी तुलसीदासक रामचरितमानस समाजकेँ जोड़ि कए रखबामे अतुलनीय योगदान कएलक।

अनंत व्रत कथाक लोकभाषामे अनुवाद मेघराज प्रधान 1660ई. में कएलनि जे निश्चित रूपसँ संस्कृत नहि जननिहारकेँ उपासनासँ जोड़बाक क्रान्तिकारी प्रयास छल।

आइयो एहने प्रयासक आवश्यकता अछि।

हमरालोकनि मिथिलाक छी। जतेक व्रतकथा अछि, पूजा-पद्धति अछि, पूजापद्धतिमे प्रयुक्त पौराणिक मन्त्र अछि तकर मैथिली पद्यानुवाद करू। ई समाजक सभ लोककेँ उपासनासँ जोड़बाक लेल अहाँक क्रान्तिकारी डेग होएत।

मेघराज कृत ‘अनंत व्रतकथा’क किछु नमूना-

चौपाई

गुर गनपत कै वंदौ पाई। सरस्वती देवी सिर नाई।।

ध्यान भवानी कौ उर धरौ। कथा अनंत देव की करौ।।

जब पंडौ वनवासहिं गऐ। तहा दुषित तबही तैं भऐ।

जहां कृष्ण कौ सुमिरन कीयौ। ताही छिन प्रभु दरसन दियौ।।

युधिष्ठिर उवाच।

हम सब भैयन सहित दुखारे। दुख समुद्र माझ महि डारै।

का विधि तिन तै छूटन होई। हमकौ कृष्ण बतावौं7 सोई।।

श्री भगवानुवाच।  

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