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बहुतो गोटे कें ई भ्रम छनि जे सिरहड़ सलामीक चलनि मुश्लिम समाजक प्रभाव थीक। एतए भ्रम होएबाक कारण अछि जे सलाम शब्दसँ सलामीक अर्थ तँ स्पष्ट रूपसँ लागि जाइत छनि मुदा सिरहड़ शब्दक मूल अर्थ लगबामे असुविधा होइत छनि।

एतए सिरहड़ शब्दक अर्थ ओकर व्यवहार आ मूल सनातनी परम्पराक संग सम्बन्ध स्थापित कएल गेल अछि। विशेष अवसर पर भगवतीक आगाँ जल भरल घैल आ ओहिमे कलश लए केओ महिला वा कोनो खबासिन ठाढ होइत अछि। आ भगवतीक प्रणामक विधि सम्पन्न भेला पर ओहि घैल (कलश)क जल आमक पल्लवसँ निकालि सभ पर छीटल जाइत अछि। घरक कोनो सुआसिन जखनि अपन धियापुताकें लए पहिल बेर नैहर अबैत छथि, अथवा बेटाक उपनयन कराए पहिल बेर नैहर अबैत छथि अथवा वर विवाह कए अपन घर घुरैत छथि, एहन विशिष्ट अवसर पर ई सिरहड़ रहैत अछि।

वर्तनी

एतए जें कि एहि शब्दक मूलमे घट अछि तें ट ध्वनिक स्थानमे ड़ लिखब उचित थीक। तें सिरहड़ ई उचित वर्तनी थीक। बहुतो गोटे एहिमे सिरहर शब्दक प्रयोग करैत छथि से मूल अर्थक विपरीत अछि।

व्युत्पत्ति/निर्वचन

ई मुख्य रूपसँ कलश थीक, तें एकर मूल शब्द अछि “श्रीघट”। एही श्रीघट सँ सिरघड़ आ सिरघड़ सँ सिरहड़ भेल। श्रीघटक अर्थ भेल शोभा-घट अथवा मंगल-घट। ई शुभकारक घट थीक। ओ विशिष्ट व्यक्ति जनिका लेल ई मांगलिक कार्यक्रम होइत अछि ओ अपना हाथें ओहि कलश पर किछु रुपया चढ़बैत छथि ओएह भेल “सिरहड़ सलामी” माने मंगल-घट पर द्रव्य चढ़ाएब आ ओकरा प्रणाम करब सिरहड़–सलामी शब्दक अर्थ भेल।

सिरहड़ आ लगहड़मे अंतर

बहुतो गोटे कें सिरहड़ आ लगहड़ मे अंतर स्पष्ट नहि होइत छनि। दूनूमे ई अंतर अछि जे लगहड़ केवल नव कनियाँक नाग लग रखबाक लेल बेटाक विवाहमे भरल जाइत छै, मुदा सिरहड़ कोनो विशेष अवसर पर गोसाउनिकें प्रणाम करबाक लेल जेबाक काल राखल जाइत छैक। सिरहड़ खबासनी सेहो भरि सकैत अछि। नै उपलब्ध हो तँ कोनो आनो महिला राखि सकैत छथि। सिरहड़क एक गीत अछि- “खबासनी सिरहर नेने ठाढ़….”

मिथिलामे नागपंचमीक आ मधुश्रावणी के विधान

किछु आरो एहने शब्द

एहने किछु आरो शब्द मिथिलाक परम्परामे प्रचलित अछि-

पुरहड़-

(पूर्णघट)- एहिमे चाउर भरल घैल पर सुपारी राखि पूर्णघटक स्थापना होइत छैक। वर्तमानमे घैलमे थोड़बो अरबा चाउर राखि ओकरा सरबासँ छाँपि एकर स्थापना कएल जाइल अछि। इहो एक प्रकारक मंगल घट थीक।

हथहड़-

मिथिला क्षेत्रसँ भेटल प्राचीन घैल।

(हस्तघट< हत्थहड़) हाथसँ पकड़बा लेल घैल। विशिष्ट अतिथिक पयर धोबाक लेल एकर व्यवहार होइत अछि। पहिने ई माँटिक सेहो बनैत छल, मुदा आब ई काँसाक बनैत अछि। एकरे दोसर नाम सोवरना थीक। सोनासँ बनल घैल सोवरना भेल, जे नामक उदात्तताक लेल कहल गेल अछि। एहिमे टोंटी लागल रहैत छैक।

बहुतो गोटे भ्रमसँ एकरहु इस्लामी संस्कृतिक बदनाक नकल मानैत छथि। मुदा एकर व्यवहार नालंदा विश्वविद्यालय में सेहो होइत छल। एकर वर्णन इत्सिंग अपन वृत्तान्त मे कएने छथि। संगहि माँटिसँ बनल आ एहने टोंटी लागल घैलक अवशेष पुरावशेषक रूपमे सेहो भेटल छैक तें एकरा सेहो विशुद्ध भारतीय परम्पराक वासन मानबाक चाही।

छुतहड़-

(सूतक-घट अथवा शूद्र-घट) एकर व्यवहार आँगन लिपबाक लेल अथवा पानि पटएबामे कएल जाइत अछि। एकर जल पीबाक लेल नहि होइत अछि।

लगहर

(नगहर- नागघट)- वर जखनि विवाह अथवा द्विरागमन कए पत्नीक संग अपन घर घुरैत छथि, तखनि वरक बहिनक द्वारा एक घैलमे पोखरिसँ जल भरि कनियाँक नाग (पीयर कपड़ा सँ घेरल एकटा विशेष स्थान- कनियाँक लेल बनल संरक्षित स्थान)क लग ओ भरल घैल राखल जाइत अछि।

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