दिनांक 21 अगस्त, 2021 को किलकारी बिहार बालभवन में एक समारोह आयोजित हुआ था। इसमें गोनू झा पर पुस्तक तथा डायरी लेखन कला का विमोचन हुआ।

इस समारोह में पुस्तक का विमोचन कर रही पद्मश्री उषाकिरण खान ने अपना वक्तव्य दिया कि गोनू झा 15वीं शती में मिथिला में एक बुद्धिमान कवि हुए जिनका नाम गुणानन्द झा था।

उनके इस वक्तव्य में दो अशुद्धियाँ हैं-

गोनू झा 15वीं शती के हैं- वास्तविकता है कि गोनू झा 14वीं शती में सिद्ध होते हैं। खैर, इस विषय पर उनका अपना मत हो सकता है। 14 वीं के हो अथवा 15वीं के, इससे यहाँ बहुत फर्क नहीं पड़ता है।

अपने वक्तव्य में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डा. उषा किरण खान ने उनका नाम गुणानन्द झा कह दिया। यह एक विवादास्पद मुद्दा बन गया है। नाम बदलने की आवश्यकता क्या थी? क्या मिथिला के इतिहास के साथ कोई नया नया षड्यंत्र आरम्भ हुआ है? ऐतिहासिक व्यक्ति को मिथिकीय व्यक्ति बनाने का यह काम सही नहीं कहा जा सकता है।

मिथिला में खुद्दी झा, होराय झा, लुट्टी झा, झारखंडी झा, बचनू झा, ठीठर झा आदि अनेक नाम मैथिली के ग्राम्य शब्दों में है। इसी प्रकार गोनू झा भी एक खास नाम है जो अति प्रचलित है। उस व्यक्तित्व को लोग गोनू झा के ही नाम से ही जानते हैं।

इतिहासकारों का मानना है कि वे कर्महे मूल के बीजी पुरुष वंशधर के तीन पुत्रों में एक थे। पंजी में उनके नाम के साथ धूर्तराज शब्द लगा हुआ है- “करमहे सोनकरियाम मूल मे बीजी मम बंशधर, ऐजन सुतो मम हरिब्रह्म, म.म. हरिकेश, म.म. धूर्तराज गोनू।”

महामहोपाध्याय परमेश्वर झा ने भी मिथिलातत्त्वविमर्श नामक अपनी इतिहास पुस्तक में पृ. 151 पर लिखा है- “सोनकरियाम कर्महासं बीजी वंशधर: ए सुता महामहो० हरिब्रम्ह महो० हरिकेश महोधूर्तराज गोनूका: संकराढी सं० चन्देयी दौहित्रा: ।”

ये धूर्तराज गोनू तीब्र बुद्धिवाले थे और जो कोई व्यक्ति इनके साथ कोई उपद्रव करता था तो अपनी बुद्धि से उसे हास्यास्पद बनाकर बदला लेते थे। गोनू झा के जितने खिस्से प्रचलित हैं उसकी जड़ में ये ही धूर्तराज गोनू हैं, जो ऐतिहासिक व्यक्ति हैं।

ऐसे ऐतिहासिक व्यक्ति का गुणानन्द झा नाम कही नहीं मिनता है, यह डा. खान के अपने मन की उपज है।

जब इस विषय पर फेसबुक पर संवाद चला तो डा. उषा किरण खान ने गोनू को ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं माना। उन्होंने व्यङ्ग्य भरे स्वर में लिखा- “खाता ने बही पंडी जी जो कहें सो सही। किंवदंती लीजेंड पर हक सिर्फ पंडी जी का है। जय हो।”

लेकिन जब उन्हें पंजी प्रबन्ध की पुस्तक से पन्ना दिखाया गया तो उन्होने स्पष्ट शब्दों में गोनू झा को ऐतिहासिक व्यक्तित्व मानने से ही इन्कार कर दिया- “Bhavanath Jha फिक्शन पर शास्त्रक कब्जा नै करू। रसभंग हैत। इतिहास नै छै।”

आगे बातचीत बढ़ने पर उन्होंने गोनू झा के खिस्से को कहानी मानना आरम्भ कर दिया। वह तो ठीक है, कहानियाँ तो बीच में भी बनती हैं, जब गीत लिखकर विद्यापति के नान पर प्रचारित हो सकते हैं तो कहानियाँ अवश्य गोनू झा के नाम पर प्रचलित हो सकती है।

लेकिन गोनू झा का नाम बदलकर गुणानन्द झा करना एक गैर-जिम्मेदाराना हरकत है। इससे मिथिला का इतिहास प्रभावित होगा।

अतः उनके द्वारा गोनू झा के नये नामकरण का मैं विरोध करता हूँ। साथ ही, प्रतिष्ठित लेखिका से निवेदन करता हूँ कि स्वयं कभी अपनी बात का खण्डन कर लोगों में भ्रान्ति फैलने से रोक लें।

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