‘रुद्रयामलसारोद्धार’ नामक एक ग्रन्थ में मिथिला की तीर्थयात्रा का वर्णन हुआ है। यह अंश अधूरा है तथा इसके आंतरिक विवेचन से यह 13वीं शती से 18 शती के बीच मिथिला में किसी ने लिखकर इसे रुद्रयामलसोरद्धार के नाम से प्रचारित किया है। इसमें कुछ स्थलों के प्राचीन नाम हैं, जिन्हें आधुनिक स्थानों से मिलाने पर सभी विवरण वास्तविक प्रतीत होते हैं। दिशानिर्देश के साथ मन्दिरों, तीर्थ तथा गाँवों का विवरण यहाँ मिलता है।

विषयवस्तु

लेखन काल का विवेचन

अंश की प्रामाणिकता

एक अन्य अंश की पाण्डुलिपि

मूल पाठ एवं अनुवाद

  1. मिथिला की सीमा
  2. मिथिला की महिमा
  3. मिथिला की नदियाँ एवं उनके तीर्थों में स्नान की तिथियाँ
  4. लोहिनी पीठ, लोहना ग्राम
  5. गौरीशंकर, जमुथरि
  6. छिन्नमस्ता, उजान एवं वनदुर्गा, खड़रख
  7. सरिसब- सिद्धेश्वर शिव, सिद्धेश्वरी, गुरु हलेश्वर
  8. लोहिनीस्थल, लोहना की प्राथमिकता एवं मन्त्रविधि
  9. सरिसब से उत्तर- विष्णुपुर एवं यज्ञपुर, तारा मन्दिर
  10. यज्ञपुर से उत्तर- रविग्राम का सूर्यमन्दिर
  11. रविग्राम से उत्तर- कोकिलाक्षी, कोइलख
  12. कोइलख से पश्चिम- मङ्गला मठ तथा मङ्गलवन- मङरौनी
  13. मङरौनी से पश्चिम- मधूकवन, मधुबनी, कपिलेश्वर स्थान
  14. कपिलेश्वर से पश्चिम- पाण्डुपल्ली- भोजपड़ौल
  15. दूसरा पाण्डुपल्ली- पण्डौल
  16. पाण्डुपल्ली के पास शक्रपुरी- सकरी
  17. सकरी से पश्चिम- वृद्धिग्राम- बढ़ियाम
  18. वृद्धिग्राम के पश्चिम जीववत्सा नदी- जीबछ
  19. जीववत्सा के पश्चिम दर्भाङ्ग- दरभंगा
  20. दर्भाङ्ग से उत्तर- योगिवन, अहल्यापुरी- अहियारी, अहल्या की कथा
  21. गौतमाश्रम एवं विश्वामित्राश्रम
  22. विभाण्डक आश्रम, याज्ञवल्क्य आश्रम
  23. दरभङ्गा से पश्चिम गोक्षुर तीर्थ- गायघाट, बेनीबाद
  24. गोक्षुर तीर्थ से पश्चिम चण्डिकास्थान
  25. चण्डिकास्थान से पश्चिम सीताकुण्ड
  26. देविका के तट पर ससुराल जाती सीता का द्वितीय रात्रि-विश्राम
  27. जेविका तट से पश्चिम महाकोट- केसरिया का बेनस्तूप
  28. बेन प्रासाद से पश्चिम चम्पारण्य में शिव
  29. चम्पारण्य से पूर्व सीमाराम का चण्डिकास्थान, नान्य का दुर्ग- सिमरौनगढ़
  30. सिरौनगढ से उत्तर त्रिवेणी संगम
  31. लोहिनी के पूर्व सरपत के जंगल में अनेक मन्दिर- विदेश्वर स्थान
  32. नरकट के जंगल से ईशान कोण में अलर्क की राजधानी- अंधराठाढी
  33. अलर्क की राजधानी से एक योजन दक्षिण में मल्लदेव की राजधानी- भाठ भगवानपुर
  34. नल्लदेव की राजधानी से दक्षिण में महिषी का तारापीठ
  35. महिषी के पास कर्णह्रद- कन्दाहा का सूर्य मन्दिर
  36. कर्णह्रद से उत्तर विराट की नगरी- विराटनगर
  37. शृंगेश्वर महादेव- सिंहेश्वर स्थान
  38. सिंहेश्वर से पश्चिम लौटने पर कुशेश्वर स्थान एवं तिलकेश्वर तथा उसी रास्ते पाण्डुग्राम लौटना
  39. तिलकेश्वर से पाण्डुग्राम के बीच नदियाँ
  40. कालिदास का जन्मस्थल- उच्चैठ आदि स्थल

पाण्डुलिपि की प्राप्ति

सन् 2013 ई. की बात है। समस्तीपुर जिला में कल्याणपुर से पूसा की ओर जानेवाली सडक पर लगभग 3 कि.मी. पर लदौरा गाँव है, जहाँ राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान से सम्बद्ध एक संस्कृत महाविद्यालय है। उस महाविद्यालय पर जाने के क्रम में मुख्यमार्ग से ग्रामीण मार्ग पर चलते हुए सडक के किनारे मैंने एक छोटा-सा बस्ता फेंका हुआ पाया। पुराना कपडा फाड़कर कागज के इस बंडल को बिखेर दिया गया था। अगल-बगल कुछ पन्ने बिखरे हुए थे। दूर से ही देखने पर मुझे वे पुराने लगे तथा एक मिथिलाक्षर की पाण्डुलिपि भी मुझे मिली। इसका सम्पादित रूप मैथिली साहित्य संस्थान की शोध पत्रिका मिथिला भारती के नवांक 1 (2014ई.) में प्रकाशित हुआ। इसी के साथ डिमाई आकार की कापी के कुछ पन्ने मिले, जो लगभग 50 वर्ष पुराने लग रहे थे। इसके 8 पन्ने मुझे मिले। आरम्भ उपलब्ध है, किन्तु अन्त खण्डित है। इस कापी पर देवनागरी लिपि में स्पष्ट अक्षरों में यह अंश मुझे मिला। अवलोकन करने पर स्पष्ट हुआ कि किसी विद्वान् ने प्रकाशन करने के लिए मिथिलाक्षर की पाण्डुलिपि से इस अंश की प्रेस कापी तैयार की है। क्योंकि अनेक स्थलों पर देवनागरी के बीच में मिथिलाक्षर में भी कुछ शब्द लिखे हुए हैं। प्रतिलिपि करनेवाले को जहाँ मिथिलाक्षर की मूल पाण्डुलिपि पढने में असुविधा हुई, वहाँ मूल के अनुरूप उन्होंने आकृति बना दी है, ताकि सम्पादक उससे पाठोद्धार कर संशोधन कर देंगे। ऐसे स्थलों में से कुछ शब्द चिह्नित कर उसका सही पाठ बायीं ओर लिखा हुआ भी मिला है। सारी परिस्थियाँ स्पष्ट करतीं हैं कि यह मिथिलाक्षर की पाण्डुलिपि से प्रतिलिपि की गयी प्रति है, जिसका उपयोग प्रकाशन के लिए किया जाना था। मैंने बिहार रिसर्च सोसायटी की शोध पत्रिका में प्रकाशित लेखों को देखा तो यह अंश मुझे प्रकाशित नहीं मिला। जहाँ तक मेरी जानकारी है, इसका प्रकाशन नहीं हुआ है। प्रतीत होता है कि पाण्डुलिपि की प्रतिलिपि तो की गयी, किन्तु उसका उपयोग नहीं हो सका।

एक अन्य अंश की पाण्डुलिपि

‘मिथिला भारती’ में उपर्युक्त प्रकाशित अंश के साथ इसका अभिन्न संबन्ध है। दोनों एक ही ग्रन्थ के अंश हैं। इस अंश में भी सुधामा एवं उनके गुरु का संवाद है। पूर्व प्रकाशित अंश में सुधामा को पाण्डव ग्राम का निवासी बतलाया गया है। इस अंश में भी श्लोक संख्या 125 में सुधामा के द्वारा पाण्डुग्राम लौटने की बात कही गयी है। अतः हम मान सकते हैं कि प्रकाशित अंश जो ‘रुद्रयामलसारोद्धार’ की ‘तीर्थयात्राविधि’ है, जिसमें मिथिला से बाहर के तीर्थों का वर्णन हुआ है तथा देवघर यात्रा वर्णन के क्रम में खण्डित है, उसी का यह नया अध्याय है, जिसमें गुरु अपने शिष्य सुधामा को मिथिला के तीर्थों की यात्रा करने के लिए उपदेश करते हैं। इस अंश में केन्द्र के रूप में लोहिनी पीठ का वर्णन है, जहाँ से दिशा निर्देश किये गये हैं। लोहिनी पीठ को अमरावती नगरी के पास बताया गया है तथा उसे व्यापारिक केन्द्र के रूप में भी समृद्ध माना गया है। वर्तमान सरिसब ग्राम में एक नदी का अवशेष वर्तमान में भी है। हो सकता है कि उसी नदी का नाम अमरावती रहा हो और नदी के कारण सर्षप (सरिसब) को अमरावती नगरी में स्थित कहा  गया हो।

लेखन काल का विवेचन

इस अंश के लेखन की पूर्व सीमा के लिए हमें एक स्पष्ट संकेत प्राप्त होता है। सर्षप ग्राम में शाण्डिल्य गोत्र के गुरु हलेश्वर का नाम इसमें आया है और श्लोक सं. 45 में उनके द्वारा सिद्धेश्वर महादेव तथा सिद्धेश्वरी देवी की स्थापना का उल्लेख भी है। पंजी में भी शाण्डिल्य गोत्र के हलेश्वर का नाम सोदरपुरिये सरिसब मूल में मिलता है। इनके अनुज सुरेश्वर से पाँचवीं पीठी पर म.म. शंकर हैं। इनका क्रम इस प्रकार है। 1. सुरेश्वर, 2. विश्वनाथ, 3. रविनाथ, 4. भवनाथ प्रसिद्ध अयाची, 5. म.म. शंकर। (पंजी प्रबन्ध, डा. योगनाथ झा, प्रथम खण्ड, अंकित प्रकाशन दरभंगा, 2010, पृ. 27)

इस प्रकार म.म. हलेश्वर का समय अनुमानतः 13वीं शती का उत्तरार्द्ध माना जा सकता है। इनका उल्लेख होने के कारण इस अंश की रचना की पूर्वसीमा 13वीं शती है। उत्तरसीमा के लिए ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं है, किन्तु मधुबनी को मधूक वन कहना तथा वर्तमान विदेश्वर स्थान के आसपास सरपत के जंगल- नड्वल आदि के उल्लेख से स्पष्ट है कि वर्तमान मठ जो 1730 ई. में लोहना ग्राम के बलभद्र झा द्वारा बनवाया गया, उससे पूर्व इस अंश की रचना हो चुकी थी। वर्तमान में लोहना गाँव में बौद्ध साधना स्थल के रूप में जिस लोहिनी पीठ का उल्लेख मिलता है, वहाँ अब कुछ नहीं है, केवल एक टीला बचा हुआ है। अतः इस अंश की रचना 13वीं से लेकर 18वीं शती के मध्य हुई होगी। इससे अधिक कहना ऐतिहासिक दृष्टि से सम्भव नहीं है।

अंश की प्रामाणिकता

19वीं शती के अन्त में सर्वसीमा ग्राम के पं. कृष्ण ठाकुर ने बृहद्-विष्णुपुराण, रुद्रयामलसारोद्धार,, तीर्थचिन्तामणि आदि ग्रन्थों के आधार पर ‘मिथिलातीर्थप्रकाश’ नामक ग्रन्थ का लेखन किया। इसका प्रकाशन राजप्रेस दरभंगा से 1887 ई. में हुआ था। इस ग्रन्थ में  मिथिला के 40 तीर्थों और देवालयों का विस्तृत विवेचन हुआ है। साथ ही उन स्थलों के धार्मिक कृत्यों का भी विवेचन विभिन्न पुराणों के वचनों के आधार पर किया गया है। इस ग्रन्थ में रुद्रयामल सारोद्धार से जो वचन उद्धृत किये गये हैं, वे इस अंश में उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए, मिथिला प्रशंसा सम्बन्धी निम्नलिखित श्लोक मिथिलातीर्थ प्रकाश में आरम्भ में ही उद्धृत हैः

यामलसारोद्धारे

मायापुर्यादिकाः प्रोक्ताः सामान्येन विमुक्तिदाः।

येषां  तु मिथिला भाव विष्णुसायुज्यकारिणी।।

वैदेही   तु  स्वयं यस्मात् स्वकृतग्रन्थिमोचनी।

आश्रितानामतस्तेषां     भवेत्सायुज्यमेव   हि।।

ये वचन प्रस्तुत अंश में 71वें एवं 18वें श्लोक के रूप में हैं। इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि पं. कृष्ण ठाकुर द्वारा ग्रन्थ-लेखन के समय यह अंश उनके पास उपलब्ध था। अतः इस अंश की प्रामाणिकता प्रतीत होती है।

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1 टिप्पणी

  1. चंडिका के पश्चिम सीता सरोवर अभी अज्ञात है। इस सरोवर से पश्चिम पहला रात्रि विश्राम स्थल चकिया मेहसी लगता है जहाँ सीताकुण्ड है। जनकपुर से अयोध्या के 180 मील मे जनकपुर चंडिका चकिया 50 मील, चकिया केसरिया सिवान।हथुआ 55 मील है।इन दोनों स्थान पर सीता राम का पहला दो रात्रि विश्राम लगता है।

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