मगध में सूर्यपूजा की विशेषता। मगध में सूर्य-पूजा का प्राचीन इतिहास।

द्वापर युग के अंत में राजा धृष्टकेतु के काल में आरम्भ हुई थी मगध क्षेत्र में सूर्य-पूजा।

द्वापर युग में जब श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हुआ। उन्हें नारद ने उन्हें भगवान् सूर्य की मूर्ति की आराधना करने का उपदेश किया।

इससे पहले सूर्य की मूर्तिपूजा नहीं होती थी; अतः उनका विधि-विधान जानने वाला कोई नहीं नहीं था।

तब ऋषि वसिष्ठ के कहने पर साम्ब शाकद्वीप गये। वहाँ से सूर्य की मूर्तिपूजा का विधान जानने वाले ब्राह्मणों को गरुड़ पर बैठाकर द्वारका ले आये। भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं उनकी आवभगत की। वे सभी ब्राह्मण चन्द्रभागा नदी के तट पर गये और वहाँ सूर्य का आवाहन कर उनकी भव्य मूर्ति बनायी। साम्ब के रोग के नाश के लिए उन्होंने अनुष्ठान किया; जिससे साम्ब स्वस्थ हो गये।

शाकद्वीप से जो 18 ब्राह्मण लाये गये थे; उनके नाम साम्बपुराण में मिलते हैं- मिहिरांशु, शुभांशु, सुधर्मा, सुमति, वसु, श्रुतकीर्ति, श्रुतायु, भरद्वाज, पराशर, कौण्डिन्य, कश्यप, गर्ग, भृगु, भव्यमति, नल, सूर्यदत्त, अर्कदत्त, और कौशिक।

जब सारे कार्य सम्पन्न हो गये तब सबने श्रीकृष्ण से कहा कि अब हमें अपने द्वीप पर लौटने की व्यवस्था कर दीजिए।

श्रीकृष्ण ने कहा कि जब तक मैं पृथ्वी पर हूँ; तब तक आपलोग भी यहीं रहकर भगवान् सूर्य की आराधना करें। मैं जब स्वर्ग लौट जाऊँगा; तब आपलोगों को भी अपने स्थान पर पहुँचा दिया जायेगा।

वे सभी विप्रगण श्रीकृष्ण की माया में कुछ देर रहे। थोड़ी ही देर के बाद भगवान् ने गरुड़ को बुलाकर उसे आज्ञा  दी कि इन ब्राह्मणों को अपने स्थान पर छोड़ आओ।

गरुड़ को आदेश देकर भगवान् भी चले गये।

गरुड़ ने इन ब्राह्मणों से कहा कि में आदेश का पालन तो करूँगा पर मेरी एक शर्त है। यदि आप लोग बीच में कहीं पर उतारने के लिए कहेंगे तो मैं फिर वहीं पर आपलोगों को छोड़ दूँगा।

ब्राह्मणों ने शर्त मान ली और गरुड़ पर चढकर शाकद्वीप की ओर निकल पड़े।

रास्ते में उन्होंने देखा कि लोगों की भीड़ रोती-बिलखती जा रही है। पूछने पर गरुड़ ने बतलाया कि यह धृष्टकेतु नामक प्रसिद्ध राजा का देश है। यह राजा बहुत लोकप्रिय है। किन्तु कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो जाने के कारण वह ग्लानि से आत्मदाह करने जा रहा है। जनता उसे रोकने के लिए रोती-बिलखती जा रही है।

-क्या इस देश में भगवान् सूर्य की उपासना करने वाले नहीं हैं?

 नहीं। यदि होते तो आपको इतनी दूर से बुलाया क्यों जाता! आप जब आ गये हैं तो इन्हें भी स्वस्थ करने का उपाय कर दें, आपका यश फैलेगा।

इन ब्राह्मणों को दया आ गयी। ये गरुड़ के द्वारा दी गयी शर्त के बाद भी राजा को स्वस्थ करने के लिए बेचैन हो गये। उन्होंने गरुड़ से कहा- हमें यहीं उतार दें।

राजा ने अपने समक्ष गरुड़ को उतरते देखा तो उसे साक्षात् विष्णु का वाहन मानकर भाव-विभोर हो गये। गरुड़ ने राजा से कहा कि आप आत्महत्या न करें। आपकी जनता आपको हर प्रकार से चाहती है तो आप उन्हें छोड़कर न जायें। आप अपने रोग को दूर करने के लिए इन ब्राह्मणों का चरणोदक पीयें। आपका रोग दूर हो जायेगा।

राजा ने गरुड़ का आदेश माना और भगवान् सूर्य के उपासकों का चरणोदक पूने से राजा स्वस्थ हो गये। जनता की खुशी का तो ठिकाना न रहा।

लेकिन तब तक अपनी शर्त के अनुसार गरुड़ जा चुका था। ये 18 ब्राह्मण वहीं रह गये। राजा ने भी उऩकी पूरी आव-भगत की और गंगा के तट पर उन्हें एक-एक गाँव दिया। वे मगध में रहकर भगवान् सूर्य की मूर्तिपूजा का प्रचार करने लगे।

ये 18 ब्राह्मण मगध क्षेत्र में शाकद्वीपी, मग या भोजक ब्राह्मण कहलाते हैं।

इस प्रकार, द्वापर युग में ही चन्द्रभागा नदीं के तट के बाद जिस दूसरे स्थान पर सूर्य की मूर्तिपूजा आरम्भ हुई वह मगध का क्षेत्र है।

यहाँ हम भगवान् सूर्य के बहुत सारे मन्दिर पाते हैं। छठ में भी इस क्षेत्र के लगभग सभी लोग पूर्ण आस्था तथा विश्वास से भाग लेते हैं।

विस्तार के लिए पढ़ें ‘धर्मायण’ अंक संख्या 83 पृ. 11 से 21 तक

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