मैथिली 1804 ई.मे बंगाल प्रेसिडेंसीक दोसर भाषा मानल जाइत छल
मैथिली भाषाक सन्दर्भमे जँ देखल जाए तँ ग्रियर्सनसँ बहुत पहिने 1804 ई.मे जेम्स रोमर अपन आलेखमे एकरा महत्त्वपूर्ण स्थान देने छथिContinue Reading
मिथिला आ मैथिलीक लेल सतत प्रयासरत
मैथिली भाषाक सन्दर्भमे जँ देखल जाए तँ ग्रियर्सनसँ बहुत पहिने 1804 ई.मे जेम्स रोमर अपन आलेखमे एकरा महत्त्वपूर्ण स्थान देने छथिContinue Reading
23 मई 1900 ई. कें दरभंगा महाराज रमेश्वर सिंह के केसर-ए-हिन्दक उपाधि भेटल रहए। ओहि दन ई उपाधि पओनिहार 30 व्यक्तिक सूची देल जा रहल अछि-Continue Reading
मिथिला आ मैथिलीक लेल आइ भलें संघर्ष करबाक स्थिति आबि गेल हो, हिन्दी एकरा उदरस्थ करबाक लेल हाथ-पएर मारि रहल हो, अंगिका, बज्जिका, भोजपुरी ई सभ भिनाउज करबाक लेल उताहुल हो, मुदा इतिहास इएह कहैत अछि जे 1822 ई.मे विदेशी विद्वान सभ मिथिला कें एकटा राष्ट्र आ मैथिली भाषा कें भारतक दस भाषामे सँ एक भाषा मानने छथि।Continue Reading
कलियुगमे नाम-संकीर्तन महत्त्वपूर्ण अछि। एतय सरस्वतीक सहस्रनाम पाठ करबाक लेल देल जा रहल अछि।Continue Reading
मिथिलामे शकारादि- शारदा-शतनामस्तोत्रक परम्परा रहलैक अछि। पाण्डुलिपि अन्वेषणक क्रममे एहि पंक्तिक लेखक कें एकर अनेक प्रति विभिन्न ठामसँ भेटल छनि । हमरा गाम हटाढ रुपौलीमे हमर उपरक पीढीक कमसँ कम दू व्यक्ति छलाह जे प्रतिदिन स्नान कएलाक बाद एकर पाठ करैत रहथि।Continue Reading
दरभंगा राज आ ओकर मधुबनी शाखाक द्वारा उत्सव सेहो तखनहिं मानल जाइत छल जखनि कि कोनो जनहित कार्य कएल जाए। यूरोपक रानीक जुबली मनाओल गेल तँ 14,000 रुपयाक चन्दा देनिहार राज परिवारक सदस्य सभ रहथि आ ओहिसँ कम्बल, अन्न आ खपड़ा बाँटल गेलैक। पोखरि खुनाओल गेल।Continue Reading
सरस्वती वाणी की देवी के रूप में वैदिक साहित्य में भी वर्णित हैं और वहाँ उनकी उपासना करने का विधान किया गया हैContinue Reading
सरस्वतीरहस्योपनिषत् तन्त्रात्मक उपनिषद् थीक। एकर ऋषि आश्वलायन छथि जे मानैत छथि जे वेदमे 10 टा मन्त्रमे देवी सरस्वतीक स्तुति कएल गेल अछि। एहि दसो मन्त्रक विनियोग, ध्यान आ बीज मन्त्रक निर्देश एहि सरस्वतीरहस्योपनिषत् मे कएल गेल अछि।Continue Reading
अस्मिन्निबन्धे स्थालीपुलाकन्यायेन भवनाथझाकृतस्य बुद्धचरित-समुद्धारस्य वैशिष्ट्यानि प्रदर्शितानि सन्ति। वस्तुतो वर्तमानकालस्य समुत्कृष्टकार्येषु कार्यस्यास्य शिखरत्वं निश्चप्रचं घोषयितुं शक्यते यन्न केनापि प्रयतितचरमस्ति। महाकाव्यस्योपरि विशेषेण समुद्धृतभागस्योपरि महाप्रबन्धः कुन्तकोपदिष्टपद्धत्या श्लोके श्लोके वक्रताविचारणासहितोऽपेक्षितो वर्तते, येन कवेः श्रमः काव्यकौशलं च वैज्ञानिकेन विधिना विदुषां पुरस्तात् स्फुटीभवेतामिति शम्।Continue Reading
पारदर्शिता के नाम पर जब मीडिया अपराध समाचार को प्रमुखता देने लगी है, तो चिन्ता तो अवश्य होती है कि भला सकारात्मक समाचार के लिए कैसा स्थान हम भविष्य में दे पायेंगे!Continue Reading