Pandit Gananath Jha Rachanavali, edited by Prof. Yashodanath Jha

पुस्तक जे पढल

पण्डित गणनाथ झा रचनावली 

पुस्तकक नाम- पण्डित गणनाथ झा रचनावली सम्पादक- प्रो. यशोदानाथ झा  प्रकाशक- श्री यशोदानाथ झा, आनन्द कुटीर, पाहीटोल, पो. सरिसब-पाही, मधुबनी-847424 (बिहार)। प्रकाशन वर्ष- 2017 ई., प्राप्तिस्थान- उपरिवत्। मूल्य– 200.00. मुद्रक- एकेडमी प्रेस, 602, दारागंज, इलाहाबाद। पृष्ठ संख्या– 278।. सजिल्द।

कवि परिचय- मिथिलाक वर्तमान मधुबनी जिलाक अन्तर्गत सरिसब-पाही गाममे पलिवार महिसी मूलक श्रोत्रियवंशक पं. धरानाथझा कें पाँच गोट पुत्ररत्न भलथिन्ह (1) विन्ध्यनाथ झा (2) गणनाथ झा (3) डा. सर गंगानाथ झा (4) विजयनाथ झा (5) वैद्यनाथ झा। एहिमे गणनाथ झाक जन्म 1870 ई.मे भेल रहय। विस्तृत परिचय एहि ग्रन्थमे देल गेल अछि।

  • विवेच्य ग्रन्थमे म.म. डा. सर गंगानाथ झा द्वारा संकलित आ प्रकाशित गणनाथ-पदावली तथा विन्ध्यनाथ पदावली कें हुनक भूमिकाक संग अविकल रूपसँ संकलित कएल गेल अछि। एक पहिल प्रकाशन 1345 साल अर्थात् 1937 ई.मे भेल छल।
  • एकर अतिरिक्त गंगानाथ झा केन्द्रीय विद्यापीठ, इलाहाबाद मे पं. गणनाथ झाक किछु रचनाक मिथिलाक्षरमे हुनकहि हाथक लिखल पाण्डुलिपि सुरक्षित अछि। वर्तमान प्रकाशक डा. यशोदानाथ झा द्वारा संपादित ओहो रचना एतए संकलित कएल गेल अछि। संगहि वर्तमान प्रकाशक कें पं. गणनाथ झाक रचनाक खर्रा लेख अर्थात् रफ कापी प्रो. (डा.) विद्यानाथ मिश्रक सौजन्यसँ प्राप्त भेलनि, जे अत्यन्त जीर्ण भए गेल छल। ओहिमेसँ किछुए कविता उतारल जा सकल। ओकरो संपादित रूप एतए संकलित अछि।
  • संगहिं पं. गणनाथ झा द्वारा 1912 ई. मे मैथिली भाषामे अनूदित ऋग्वेद-संहिताक आरम्भिक भाग डा. यशादानाथ झाक संपादन मे जिज्ञासा पत्रिका, तन्त्रवती गीता भन, मैथिली शोध एकांश, राँटी, मधुबनी, अंक 1, जनवरी-जून-1995 .मे प्रकाशित भेल छल ओकरो संकलन एतए कएल गेल अछि।
  • एहिना पं. गणनाथ झाक श्यामा-रूपक एवं महाभारतक आदिपर्वक अनुवाद प्रथम बेर एतए संपादित आ प्रकाशित कएल गेल अछि। एकर अतिरिक्त किछु संबद्ध पत्र आ आलेख सेहो एतए संकलित अछि जे मिथिलाक तन्त्रसाधनाक वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश दैत अछि।

ई पुस्तक पं. गणनाथ झा तथा पं. विन्ध्यनाथ झाक प्रकाशित आ अप्रकाशित रचनासभक पूर्ण आ प्रामाणिक संस्करण थीक जकर श्रेय डा. यशोदानाथ झाकें छनि। आदिमे “स्थितधी गणनाथ” शीर्षकसँ एक डा. यशोदानाथ झाक विस्तृत आलेख अछि जाहिमे दूनू लेखकक व्यक्तित्व आ कृतित्व पर गम्भीर व्याख्यान अछि। एकर भाषाक लालित्य आ गाम्भीर्य आकर्षक अछि। हिन्दी मे हजारीप्रसाद द्विवेदीक शैली एतए मैथिलीमे हमरालोकनिकें भेटैत अछि।

एहिमे संकलित रचना सभक सूची एना अछि-

पण्डित गणनाथ झा

  • पदावली भाग
    • मैथिली पद- कुल 32 गीत जाहिमे देवीपद, समदाउनि, चैत, समदाउनि विजयदशमीक, भगवतीक, काशीमे श्रीताराक धातुविग्रह प्रतिमा अयलापर, श्रीक शयनक, वेरू पहर उठएबाक, सोहर, देशी, कलशस्थापन दिनुक, समदाउनि, लगनी, आसावरी सिन्दूरा गीतक संकलन अछि।
    • मैथिली तथा हिन्दी- एहि अंशमे देव देवी पद, होरी, रसिया, पहाडी आदि रागक गीत संकलित अछि, जाहिमे श्रीराम, शिव, देवी आदिक विनती संकलित अछि।
    • मैथिली शृंगार गीत- एहिमे लगनी एवं तिरहुत रागमे 13 गोट गीत अछि।
    • हिन्दी- एहिमे भगवती एवं श्रीकृष्णक कुल 40 गीतक संकलन अछि जकर अंतिम गीतमे कवि अपन माता-पिताक नामोल्लेख करैत छथि।
    • गणनाथ झाक खर्रा कापीसँ उतार गेल 3 पद, जाहिमे तेसर खण्डित अछि।
  • महाभारत आदिपर्वक मैथिली गद्यानुवाद- 1907 ई. मे कएल गेल छल। एहिमे 20म शतीक आदिमे मैथिलीगद्यक स्वरूप स्पष्ट होइत अछि।
  • ऋग्वेद-संहिताक मिथिलाभाषामध्य अनुवाद- 1912 ई.सँ आरम्भ भएल छल। एहिमे प्रथम मण्डलक 22 सूक्त धरि गद्यानुवाद अछि। एहिमे 20म शतीक आदिमे मैथिलीगद्यक स्वरूप स्पष्ट होइत अछि।
  • श्यामारूपक (ईहामृग)
  • शिवपार्वती नाटिका- एकर प्रथम प्रकाशन श्रीमती आद्याझाक संपादनमे हिन्दी प्रचार पुस्तकालय वाराणसीसँ 1959 ई.मे भेल छल।
  • डा. सर गंगानाथ झा प्रसन्नराघव नाटकक भावबोधिनी व्याख्या लिखने छथि, जाहिमे वैयाकरणप्रवर श्रीयदुनन्दन शर्मा टीकाकारक वंश परिचय संस्कृत 36 टा श्लोकमे लिखने छथि। ई अश मूल रूपमे एतए संकलित कएल गेल अछि।

विन्ध्यनाथ झा

  • हिनक कुल 17 पद संकलित अछि।

ई सन्दर्भ-पुस्तक थीक, जे संकलनीय आ पठनीय अछि।

पुस्तक-प्राप्तिक लेल प्रो.. यशोदानाथ झासँ सम्पर्क कए जा सकैत अछि।

Koilakh, written by Hitnath Jha

पुस्तक जे पढल

कोइलख

पुस्तकक नाम- कोइलख। लेखक-सम्पादक- श्री हितनाथ झा। प्रकाशक-प्रियदर्शी प्रकाशन, 217, पाटलीपुत्र कॉलोनी, पटना- 800013. प्रकाशन वर्ष- 2017 ई., प्राप्तिस्थान- (1) श्री हितनाथ झा, जयप्रभा नगर, मारखम कालेज के निकट, बड़कागाँव रोड, हजारीबाग- 825301. मो. 9430743070, ईमेल- hitnathjha@gmail.com (2) प्रो. भीमनाथ झा, छपकी पड़री, (पंचायत भवन से दक्षिण), लक्ष्मीसागर, दरभंगा-846009 (3) जानकी पुस्तक केन्द्र- गोशाला चौक, मधुबनी-847211. मूल्य– 400.00. मुद्रक प्रिंटवेल, टावर, दरभंगा। पृष्ठ संख्या- 210. सजिल्द।


विवेच्य पुस्तक कोइलख गामक सारस्वत परम्पराक इतिहास थीक। एहिमे 39 दिवंगत एवं 6 जीवित व्यक्तिक परिचयक संग हुनक कृतिक सूचना संक्षेपमे देल गेल अछि। आरम्भमे कोइलखक प्रसंग आचार्य सुरेन्द्र झा सुमन एवं प्रो. भीमनाथ झा उद्गार देल गेल अछि। कोइलख मे अवस्थित 7 टा संस्थाक परिचयक संग एक शिवमन्दिर वनखण्डीनाथ महादेव मन्दिरक पुरातात्त्विक महत्त्व पर एक आमन्त्रित आलेख अछि। परिशिष्ट भागमे आचार्य सुरेन्द्र झा सुमन, मोहन भारद्वाज, पं. बलदेव मिश्र ज्यौतिषी, प्रो. भीमनाथ झा, प्रो. विद्य़ापति ठाकुर एवं डा. दमन कुमार झाक एक एक आलेख अछि।

हमरा जनैत पुस्तक कें देखबाक दूटा दृष्टि होइत छैक- पहिल जे, जे अछि , से केहन अछि? जे नै छैक तकर चर्चे कोन? लिखबाक लेल तँ बहुत किछु छैक! एखनि एतबे सँ सन्तोष।

मुदा दोसर दृष्टि होइत छैक जे आर की की रहबाक चाही।

स्पष्ट अछि जे पहिल दृष्टि टकसाली समीक्षा थिक, जतए ममत्व नै रहै छैक, दोसरक बेटाक गुण-दोषक विवेचन जकाँ। मुदा दोसर प्रकारक दृष्टि अपन वस्तुकें देखबाक दिशा थीक। 

पहिल प्रकारक दृष्टिमे पुस्तक बड नीक अछि। एहू दृष्टिमे हम कने उमापतिक परिचय पर रुकब। एकटा शुद्धिनिर्णयकार पगौलीमूलक धर्मशास्त्री उमापति छलाह। एकरा फरिछाएब आवश्यक। कारण जे राघवसिंहक कालमे जे उमापति छलाह हुनक लिखाओल एकटा व्यवस्थापत्र हमरा लग अछि। गोकुलनाथक गुरु धर्मशास्त्री उमापति रहथि। आ तखनि शुद्धिनिर्णय सेहो हुनके रचना भए सकैत अछि।

कोइलखक एकटा आर महामहोपाध्याय भैयन शर्मा भेटैत छथि। पद्मानन्दविनोद नाटकमे भराम ग्रामक वासी म.म. मधुसूदन मिश्र लिखैत छथि जे कोइलख गामक वासी भैय्यन झाक दौहित्रक पौत्र लीलानन्द सिंह रहथि आ हुनके दौहित्रक दौहित्र कवि म.म. मधुसूदन मिश्र रहथि।

पद्मानन्दविनोद नाटकम्, अंक- 5, पृ. 29

वस्तुतः बनैलीक राजा दुलार सिंहक एक विवाह कोइलखक सरिसब मूलक चतुर्भुज झाक पुत्र भैयन झाक कन्यासँ भेल छल, जनिक पुत्र रहथि राजा सर्वानन्द सिंह आ महाराज वेदानन्द सिंह। हुनका महामहोपाध्याय कहल गेल अछि। ओहि भैयन झाक अन्वेषण होएबाक चाही। हुनक रचना सेहो हुनक वंशज लोकनिक घरमे भेटि सकैत अछि।

एखनि हम आशा करैत करैत छी जे एतबा तँ संकलित भए गेल आरो काज होइत रहत।

दोसर दृष्टिसँ देखला पर किछु निराशा हाथ लगैत अछि। पुस्तकक शीर्षक थीक- कोइलख। मात्र सारस्वत इतिहास कोनो गामक सम्पूर्णताक द्योतक नै भए सकैत अछि। एक पृष्ठ पर साख्यिकीय सूचना दए देलासँ लेखक कर्तव्य समाप्त नै भए जाइत अछि। जँ पुस्तकक शीर्षक मे सारस्वत इतिहासक संकेत कए देल गेल रहैत तँ उचित होइत। मुदा एतए गामक इतिहास संकेतित अछि। गामक इतिहास-लेखन मे गामक सभ जातिक लोकक विवरण होएबाक चाही। कतेक हलुआइ, कतेक राजमिस्त्री, कतेक गवैया आर आर गुनी लोकनि, अपन अपन काजमे विशिष्ट लोक सभ जातिमे भेटि जेताह। सभटाक सर्वेक्षणक अपेक्षा छैक। कोन कोन मूलक ब्राह्मण एतए रहैत छथि हुनक सामाजिक आ ऐतिहासिक आ पुरातात्त्विक परिप्रेक्ष्यमे कोइलखकें देखल जएबाक चाही। गाममे कोन कोन पूज्य थान सभ अछि, गाममे कोन कोन नामसँ डीह अछि, सभटाक सर्वेक्षण अपेक्षित छैक। कोइलखक बाधमे सेहो कतेको डीह होएत। कमलाक एकटा धाराक कछेरमे बसल गाम, जतए सँ पालकालक अवशेष सभ भेटैत अछि, ओहि डीह सभक नाम संकलित रहितैक।

जें कि एकर नामकरण सोझे “कोइलख” कएल गेल अछि तें एतेक रास अपेक्षा अछि, अव्याप्ति दोष आबि जाइत अछि।

अस्तु, जे अछि से नीक अछि। मानि लिय जे ई कोइलखक सारस्वत इतिहास थीक। तखनि पुस्तक देखि मोन आह्लादित भए जाइत अछि। एकर पठनीयता छैक। सुन्दर छपाइ आकर्षक अछि।

Jitiya festival in Mithila

मैथिल साम्प्रदायिक जितिया व्रत कथा

भवनाथ झा

संस्कृत मे कथा>>

मिथिलाक पारम्परिक जितिया व्रतकथा

(आधार ग्रन्थ- रुद्रधर कृत वर्षकृत्य, मीमांसकशिरोमणि जगद्धरशर्मपरिवर्द्धित एवं डा. पण्डित शशिनाथ झा द्वारा सम्पादित, उर्वशी प्रकाशन, पटना, 1998 ई.)

जितिया पाबनि वास्तवमे जीवितपुत्रिका अथवा जीवपुत्रिका व्रत थीक। एकरे जिउतिया आ जितिया कहल जाइत अछि। आश्विन मासक कृष्ण पक्षक अष्टमी तिथि कें ई व्रत होइत अछि। कहल गेल अछि जे जे नारी ई व्रत कए शालिवाहन राजाक पुत्र जीमूतवाहनक पूजा करैत छथि, हुनक सौभाग्य अटल रहैत छनि आ सन्तानक उन्नति होइत छनि। जाहि दिन सन्ध्याकालमे अष्टमी तिथि रहए ताहि दिन व्रत करबाक चाही। जँ सप्तमीक उदय हो आ तकर बाद अष्टमी तिथि पड़ि जाए तँ ओही दिन व्रत होएत अगिला दिन नहिं। जँ दूनू दिन मे सँ कोनो दिन अष्टमी सन्ध्याकाल नहिं रहए तँ दोसर दिन ई व्रत करी। एहि व्रतमे अष्टमी तिथिमे भोजन कएने दोष कहल गेल अछि।

व्रत आरम्भ करबासँ पहिने ओठगन करबाक थीक। मिथिलामे सौभाग्यसूचक पदार्थ सभक भोजन अर्थात् माँछ, मडुआ आदि सप्तमी तिथि कें खेबाक परम्परा अछि। जे माँछ नै खाइत छथि ओ नोनी सागक व्यवहार करैत छथि। कथाक अनुसार महिलालोकनिक बीच बेन परसब सेहो एकर एकटा अभिन्न अंग थीक। अंकुरीसँ पारणा करबाक चर्चा कथामे अछि।

मिथिलामे जितिया व्रतक कथा गौरीप्रस्तार नामक ग्रन्थ सँ उद्धृत मानल गेल अछि। मीमांसकशिरोमणि जगद्धर झा द्वारा सम्पादित वर्षकृत्यमे संस्कृतमे ई कथा देल गेल अछि।  जीमूतवाहनक व्रतक कथाक नाम पर मैथिलसँ भिन्न सम्प्रदायमे सेहो दोसर कथा देल गेल अछि, जे हिन्दीमे किताब बनल भेटैत अछि। ओहिमे राजा जीमूतवाहन द्वारा शंखचूड नामक साँपकें गरुडक आहार बनबासँ बचेबाक कथा अछि जे संस्कृतक विख्यात नागानन्द नामक नाटकमे अछि। ओ कथा मिथिलामे प्रचलित नै अछि।

मुदा मैथिलमे दोसर कथा अछि। मिथिलाक लोककें अपन परम्पराक पालन करब ओतबे  आवश्यक अछि, जतेक आवश्यक कि पाबनि करब। परम्पराकें छोडब सेहो एकटा पाप थीक। पद्धति सभमे जे कथा संस्कृतमे देल अछि से बुझाइत अछि जे मौखिक कथाकें सूनि केओ पण्डित ओकरा संस्कृतमे अनुवाद कए देने छथि। संस्कृत कथा पढब जँ सम्भव नहिं हो तँ मैथिलीमे कथा सुनी आ सुनाबी। तें एतए हि संस्कृत कथाक मैथिली अनुवाद देल जा रहल अछि।

मैथिलीमे कथा

कैलासक रमनगर चोटी पर गौरी महादेवसँ पुछलखिन जे हम  सुनए चाहैत छी से की अहाँ कहि सकैत छी? पार्वती कहलथिन- कोन व्रत कोन तपस्या अथवा कोन पूजा केलासँ स्त्रीगण भाग-सोहागवाली बनल रहैत छथि आ हुनक धियापुता जीबैत छनि?

महादेव कहलथिन- आसिन मासक अन्हरियाक जे अष्टमी तिथि होइत अछि, ओहि दिन स्त्रीगण खुशीसँ धियापुताक लेल शालिवाहन राजाक पुत्र जीमूतवाहनक पूजा करैत छथि। एहिमे कुशक जीमूतवाहन देवताक आकृति बनाकए पानि भरल वर्तनमे स्थापित करबाक चाही। आँगनमे लाल-पीयर रंगक संठी सँ एकटा घर बनाबी, ओहिमे लाल-पीयर रंगक झंडी लगा दियै आ चानन, धूप आदि सुगन्धित वस्तुसँ ओतए नीपि दियै। तकर बाद ओतए एकटा पोखरि बनावी। ओतहि पानिक कातमे पाकड़िक ठाढ़ि लगा दियै। ओतए एकटा चिलहोरि आ एकटा गिदरनी माँटि आ गोबरसँ बनाबी। दुनूक माथ पर सिन्दूर लगा दियै। बाँसक पातसँ पूजा करी तँ वंश बढए। ब्राह्मणक रूपमे देवता जीमूतवाहन पूजा पंचोपचार सँ करी। हुनक पूजा कए ई कथा जे सुनैत छथि आ उपास करैत छथि हुनकर सभ मनोरथ पूरा होइत छनि।

एहि विशाल धरती पर दक्षिण दिशामे, समुद्रक कतबाहि वला प्रान्तमे, नर्मदा नदीक कछेरमे कनकावती नामक नगरी छल। ओतए मलयकेतु नामक राजा छलाह। हुनका लग मारते रास हाथी, घोड़ा आ पैदल सेना रहनि आ ओ सभटा राजाकें जीति नेने रहथि। नदीक पछबारि कछेरमे बाहूटार नामक एकटा मरुभूमि छल, जतए एकटा खूब पैघ पाकड़िक धोधड़िवला गाछ अछि। ओहि धोधड़िमे एकटा गिदरनी रहै छल। ओही गाछक डारि पर कतोक दिनसँ एकटा चिलहोरि रहैत रहए। चिलहोरि आ गिदरनी दूनूक बीच दिन पर दिन अधिक सिनेह आ दोस्ती भए गेलैक।

ओतहि कोनो बेर आसिनक अन्हरियाक अष्टमी दिन ओहि नगरक रहनिहारि ऊँच-नीच आ मध्यम प्रकारक स्त्रीगण जीमूतवाहनक पूजा केलनि आ कथा सुनलि। इहो दूनू कथा सूनि पूजा कए अपन अपन जगह पर आबि रहए लागल।

एही दिन साँझमे ओहि नगरक रहनिहार दन्तासेठक बेटा परलोक चल गेलैक। ओही ठाम नर्मदा नदीक कछेर मे ओकर लहास के चिता चढाए आगि दए, दर-दियाद अपन घर घुरि गेल। एकर बाद रातिमे घुप्प अन्हार पसरल। घनघोर मेघ लागि गेलैक। ओकर गर्जनक संगे सभ दिशा बिजुलोकाक चमकसँ काँपय लागल। एहेन समयमे गिदरनी भूखसँ आकुल भए गेल। ओकरा बेर बेर मुर्दाक मांसक लोभ भए रहल छलैक। ओ लग आबि कए चिलहोरि कें टोकारा देलक- “मित्र! सिनेह! चिलहोरि! जागल छी?” तुरते चिलहोरि खुशीसँ उतारा देलकै- “हँ, सखी! जागल छी।” एना बेर बेर गिदरनी ओकरा पुछैत रहलै। ओहो एहिना उतारा दैत गेलै। तखनि चिलहोरि मोने मोन सोचलक- “ई गिदरनी किए बेर बेर हमरा टोकै-ए। एकर की चालि छयै से बुझबाक चाही।” ई सोचि ओ सुतल रहबाक भगल कए चुपचाप बैसि गेल। तकर बाद फेर जखनि लोभाएल गिदरनी चिल्होरि कें टोकलकै तँ ई कोनो उतारा नहिं देलक। गिदरनी एहिसँ गाढ़ निंद बूझिकए धोधरिसँ निकलि गेल। ओ नदीक कात गेल आ मुँहमे पानि भरि लए जाए अछियाक आगिकें मिझाए, मुरदाक मासु भरि मोन खाए, ओकर टुकडी-टुकडी सेहो कए, आनि कए धोधरिमे राखि लेलक। ई सभटा समाचार ठाढ़िक फुनगी पर बैसल चिलहोरि देखि लेलक। तखनि परात भेल पर गिदरनी चिलहोरि कें कहलकै- “प्रिये, चिलहोरि, पारणाक चर्चा किए नै करै छी?” तकर बाद चिलहोरि रतुका सभ बात सोचि अनमाएले कहलकै- “प्रिय, अहाँ पारणा करू। हमहूँ जनीजाति जे देने छथि ओहिसँ पारणा करै छी।” तखनि गिदरनी रातिमे जे धोधरिमे मासु रखने छल, ओहिसँ पारणा केलक। तकर बाद चिलहोरि सेहो नगरक जनीजाति द्वारा देल गेल केराओक अंकुरी आदि खाएवला वस्तु सभसँ पारणा केलक।

तकर बाद समय बितला पर भाग्यसँ प्रयाग तीर्थमे दूनूक मृत्यु एके दिन भेलैक। मरबाक काल गिदरनी कहलक- “हम अगिला जनममे महाराज मलयकेतुक पटरानी होई”- ई कामना कए ओ परलोक गेल। चिलहोरि सेहो कामना केलक जे हम महामहत्तक बुद्धिसेनक पत्नी होइ आ हमरा पछिला जन्मक बात मोन रहए, ई कामना कए ओहो परलोक गेल। तकर बाद एहि व्रत महिमासँ आ तीर्थमे मृत्यु भेलासँ दूनूक जन्म एके संगे ओहि नगरक वेदपाठी भास्कर नामक भिखारि ब्राह्मणक घरमे भेल। तकर बाद दिन-दिन बढ़ैत ओहि दूनू कन्याकें देखि कए जेठकी शीला बुद्धिसेन नामक महामहत्तक संग बियाहि देल गेल। छोटकी कर्पूरावती मलयकेतु नामक राजासँ बियाहलि गेलीह।

तखनि समय पर शीलवतीक पयर भारी भेलनि आ बच्चा भेलनि। एहि प्रकारें ओ सात बेटावाली भेलीह। एम्हर रानी कर्पूरावती कें सातो टा मरि गेलनि, तँ दिन-दिन खिन होइत हुनका किछु नै सोहाइत छलनि। तखनि एक दिन रानी हुनकर सातो टा बेटाकें हुजूरी करै लेऽ आएल देखि मोन मोन खूब जरि कए जितियाक पूजा दिन खटुआसि पड़ि रहलीह।

राजा सेहो महारानीकें नै देखि कए पुछलनि- “महारानी! कतए गेलहुँ?” तखनि हुनकर सखी लीलावती कहलनि- “एहि अन्नरक घरमे खटुआसि सूतल छथि।” राजा जाकए पुछलखिन- “प्रिय, कर्पूरावती, खटुआसि कए किएक पडल छी?”

ओ कहलनि- “नीक लगै-ए, तें।”

तखनि राजा कहलनि- “प्रिये, उठू।”

ओ कहलनि- “जँ हमर मोनक चाहल करब, तखनि तँ हम उठब, नै तँ, नै।”

तखनि राजा फेर कहलनि- “सभटा करब।”

फेर ओ कहलनि- “जँ से अछि तँ सप्पत खाउ।”

तखनि हुनक कहला पर राजा तीन बेर सप्पत खएलनि। तखनि कर्पूरावती बिछाओल परसँ झटकि कए ऊठि कहलनि- “हमर बहिन शीलावती के सातो टा बेटा के मूड़ी काटि हमरा दियऽ।”

तखनि राजा घरती छूबि कान छूलनि- “गै पपियाही, एना किए बजै छें।”

एहिना बेर बेर उतारा भेटला पर राजा मानि गेलाह- “काल्हि एकरा सभक मूडी काटि अहाँकें दए देल जाएत।” हुनक वचनकें अटल बूझि ओ जितियाक पूजा केलनि।

तखनि अगिला दिन राजा अपन सप्पतक रक्षा लेल हुजूरी करै लेऽ आएल महामहत्तकक सातो टा बेटाक मूडी, दुआरि पर कटबाक जे चक्का वला मशीन लागल रहै, ओहिसँ काटि कए कर्पूरावतीकें दए देलनि। ओ देखि हिनका खूब खुशी भेल। ओहि मूडीकें पखारि, सातटा डालामे कए, सातटा कपडाक टुकड़ासँ झाँपि, पारणाक दिन शीलवतीकें बेन दए पठा देलनि। शीलवती सातोटा पुतोहुकें दए देलनि आ कहलनि जे अपन-अपन स्वामी जखनि आबथि, तखनि हुनका खाए लेऽ देबनि।

एही समयमे ई सभटा समाचार बूझि जीमूतवाहन राजाक हुजूरी कए स्नान करबाक लेल अपन आवास जा रहल छलाह कि कटही गाड़ी सहायतासँ गढ़खईमे फेंकल सातोटा घड़ देखि सोचलनि- ʻएकरा सभक माय शीलवती तँ हमर व्रत कएने अछि।ʼ ई मनमे विचारि माँटिसँ सात टा मूड़ी बनाए, सातो टा घड़मे जोड़ि, ओकरा पर अमृत छीटि देलनि ओ बजलाह जे कर्पूरावती जे सातो टा मूड़ी सातटा डालामे साँठि शीलवतीकें पठओने अछि, ओ सातटा ताड़क फल भए जाए। ई कहि ओ अपन घर गेलाह।

एकर बाद हुनक कृपासँ ओ सब जीबि, झट दए ऊठि, भरल-पूरल आ चरगर देह नेने, अपन-अपन घोड़ा पर चढि अपन-अपन घर दिस बिदा भेलाह। ओतए पहुँचला पर स्नान आदि कए बैसलाह। हुनकासभक अपन-अपन पत्नी राजाक घरसँ आएल आ सासु द्वारा पठाओल डालामे राखल वस्तुजात अपन-अपन स्वामीकें देलनि। तकर बाद हुनके कृपासँ ओ मूडी सातटा ताड़क फल बनि गेल, जकरा ओ सभ सातो भाइ सातो फल खएलनि।

तखनि रानी सहो ʻमहामहत्तकक घरमे सात टा पुत्रक हत्याक सोगसँ कन्नारोहट होएतʼ से अकानैत ठाढ़ रहलीह। जखनि ओ कानब नै सुनलनि तखनि ओ बुझबाक इच्छासँ जल्दी खबासिन पठाओल गेल। खबासिन ओतए जाए हँसू-खुसी सभटा आश्रमक समाचार बूझि अपन मलिकाइनि कें कहि देलक। ई बूझि ओ चुप भए गेली।

तखनि भोर भेलापर फेर शीलवतीक सातोटा बेटा हुजूरी करबा लेऽ अएलाह। हुनका सभकें देखि दुःख भरल मोनसँ महारानी राजाकें पुछलनि- “हे राजा! मलयकेतु! काल्हि शीलवतीक बेटासभक मूडी नै दए कए की चोर-डाकू सभक सात टा मूडी काटि हमरा देने रही?”

राजा कहलनि- “प्रिये! काल्हि तँ अहींक सोझाँमे चक्का लागल मशीन वला कट्टासँ ओकरहि सभक मूड़ी काटि अहाँकें देलहुँ। तैयो एना किए बजैछी? हमहूँ तँ ओकरा सभकें देखि चकित छी।” फेर ओ विचारि कहलनि- “तखनि ओ सभ फेर केना हुजूरी करै लेऽ आएल अछि! राजा विचारि बजलाह- “प्रिये सुनू, अहाँक बहिन पूर्वजन्ममे कोनो नीक व्रत केने छलीह, तकरे कृपासँ हुनक सातोटा बेटा जीवित छनि। अहाँ ओ व्रत नै कएने रही, तें अहाँक बेटासभ मरि गेल आ एतेक दुखी छी।” ई सूनि कए ओ चुप भए गेलीह। ई सभटा समाचार महामहत्तक द्वारा शीलवती बुझलनि।

तकर बाद अगिला साल व्रतक दिन कर्पूरावती शीलवतीक नाम लए खबासिनी पठओलनि- “आइ एके ठाम पूजा करितहुँ आ कथा सुनितहुँ।” शीलवती कहलनि- “ओ राजा मलयकेतुक महारानी छथि हुनका संगे एकठाम कथा सुननाइ संभव नै अछि।” ई उतारा बुझि कए खबासिन आबि रानी कें कहलकनि।

ई सूनि ओ कहलनि- “सात बेटें गौरवाहि छथि।”

तखनि महारानी ओहि दिन चुप्पे रहलीह। तकर बाद भोरमे फेर कर्पूरावती पारणा करबाक लेल समय बूझि शीलवतीके घर खबासिनी पठौलनि। शीलवती फेर ओएह उत्तर देलनि। ओ महारानी क्रोध सँ भरि, रानी होएबाक घमण्डसँ आन्हर भए कहार-सबारी पर चढ़ि पारणा करबाक लेल अनेक तरहक भार-दौर लए शीलवतीक घर बिदा भेलीह। ओतए पहुँचलीह तँ शीलावती हुनका पानि देलनि आ आसन लगाए हुनक पैर धो कए भरि पाँज पकडि बैसा कए कहलनि- “बहिन, कुशल छी ने, एतए किएक एलहुँ?”

कर्पूरावती कहलनि- “बहिन, अहींक संगे पारणा करै ले हम आएल छी।”

शीलवती कहलनि- “बहिन, अहाँक संगे हमरा पारणा नै करबाक चाही।”

फेर महारानी कहलनि- “बहिन, जल्दी उठू, पारणाक बेर बीतल जाइ-ए।”

तकर बाद शीलवती फेर कहलनि- “हे महारानी, अहाँ राजक भोग करू आ जिद्द छोड़ू।”

तखनि फेर महारानी दुर्भाग्यसँ जकड़ल जकाँ बजलीह- “आइ तँ अवस्से हम अहाँक संगे पारणा करब।”

शीलवती हुनकर ई अबधारल गप्पकें सूनि पारणाक लेल बहुत रास सामग्री ओरिआ कए कहलनि- “जँ अवस्से हमरा संग पारणा करबाक अछि तँ नर्मदा नदीक कछेर चलू।” ई कहि कर्पूरावती आ शीलवती दूनू नर्मदाक कछेर दिस बिदा भेलीह।

ओहिठाम पहुँचि शीलवती कर्पूरावतीकें भरि पाँज पकडि आदर कए कहलनि- “बहिन, कर्पूरावती, एखनि ई जिद्द छोडू, राज्यक भोग करू।” तखनि कर्पूरावती कहलनि- “बहिन, ई कखनहुँ संभव नै अछि।”

तखनि शीलवती स्नान कए लोक आ धर्मकें सोझाँ कए कहलनि- “यै कर्पूरावती, पूर्वजन्मक गप्प की मोन नै अछि?”

ओ कहलनि- “नै किछु मोन नै अछि।”

तखनि शीलवती कहलनि- “ई नर्मदा नदी छी। ई बाहूटार नामक मरुभूमि छी। ई अजोध पाकड़िक गाछ छी। एतहि अहाँ पूर्वजन्ममे गिदरनी रही आ हम चिलहोरि रही। एहि पाकड़िक धोधरिमे अहाँ रहैत रही आ एकर फुनगी पर हमर जगह रहए। ओहि समय एहि नगरमे रहनिहारि महिलालोकनि जीमूतवाहनक पूजा केलनि आ कथा सुनलनि। हमहूँ-अहाँ ओकर लग जाए जीमूतवाहनक पूजा कए, कथा सुनि, अपन-अपन जगह पर रहलहुँ। एही बीच ओहि दिन साँझमे एहि नगरक रहनिहार दन्ता सेठक बेटा परलोक चल गेल। ओकरा अपन सर-समन्धिक नगरसँ श्मशान आनि, चिता बनाए, जराकए अपन घर दिस चलि देलक। तखनि रातिमे, अहाँ जखनि धोधरिमे रही, तखनि हमारा टोकलहुँ- “प्रिये, चिलहोरि, जागल छी की!” तखनि दू बेर हम, ʻजागल छीʼ से कहलहु। तकर बाद अहाँक चालि बुझबाक लेल निन्नक भगल कए चुपचाप बैसि गेलहुँ। अहाँ सेहो हमर गाढ़ निन्न बूझि धोधरिवला जगहसँ निकलि, नर्मदाक कछेर जाए, मुँहमे जल लए, आनि कए, चिताक आगि मिझाए, भरि इच्छा मुर्दाक मासु खाए, धोधरिमे सेहो मुर्दाक मासु रखलहुँ। ई सभ टा समाचार हम बुझि गेलहुँ।  अगला दिन भोरमे पारणा लेऽ अहाँ हमरा कहलहुँ- ʻप्रिये पारणा नै करब?ʼ हमरा तँ अहाँक रतुका सभटा चालि बुझल छल, तें अनमनाएले हम कहलहुँ- “हे सखी अहाँ पारणा करू”। हमहूँ महिलालोकनि द्वारा देल गेल अँकुरी, त्रिपोष आदिसँ पारणा केलहुँ। से एम्हर आउ”

ई कहि हुनका हाथ धए धोधरिमे राखल मुर्दाक मासुक हड्डीक टुकडा कर्पूरावतीकें देखाए देलनि।

– “एहि व्रत टुटबाक दुआरे अहाँक बेटा मरि गेल आ दुखी छी। आ हम व्रतक पालन केने रही तें हमर बेटासभ जीवित अछि, हम सुखी छी आ हमरा स्वामीक वियोग सेहो नै अछि।”

एहि तरहें जाबत शीलवती पूर्वजन्मक वृत्तान्त कहैत रहथि कि ताबत कर्पूरावती अपन पूर्वजन्मक गप्प बूझि सोग-संतापकें त्यागि नर्मदाक कछेरमे परलोक चल गेलीह। शीलवती सेहो स्नान कए खुशीसँ धुथहूसभके मंगल धुनि सुनैत अपन घर घुरलीह। राजा मलयकेतु हुनक श्राद्ध आदि कए राजकाजमे लागि गेलाह। तकर बाद राजा बहुत रास हाथी, घोडा आदि सामग्री बेटीकें दए अपन बेटी वसन्तमञ्जुराजक संग बियाहलनि।

एखनहुँ धरती पर जे महिलासभ श्रीजीमूतवाहनक पूजा कए, कथा सूनि, उपवास कए, ब्राह्मणकें संतुष्ट कए पारणा करैत छथि, हुनकर बेटा जीवैत छनि आ ओ संतानवाली बनल रहैत छथि, हुनकर सभ मनोरथ पूरा होइत छनि से निश्चय जानू।

एहि प्रकारें गौरीप्रस्तार नामक ग्रन्थमे भगवान् शंकर द्वारा कहल गेल जीमूतवाहनक कथा सम्पन्न भेल।

History of Chikna village by Arjun Jha ‘Nirala’

पोथी जे पढ़ल 

“चिकना गामक इतिहास ओ वंशावली”,  लेखक  श्री अर्जुन झा ‘निराला’

वयोवृद्ध लेखक श्री निरालाजी जनसंसाधन विभाग, बिहार सरकारमे विभिन्न पद पर कार्य करैत प्रभारी राजस्व उप-समाहर्ता पद सँ 1994 ई. मे निवृत्त भेलाह। चिकना वासी रहबाक कारणें अपन गामसँ पूर्ण परिचिति हिनक एहि लेखनक प्रामाणिकता स्पष्ट करैत अछि। लेखक सूचना दैत छथि जे ओ आरम्भमे “सुप्रभात” नामक हस्तलिखित मासिक पत्रिकामे कविता आ कथा सेहो लिखैत रहथि। ई राजनीतिसँ सेहो जुडल रहलाह आ स्व. ललित नारायण मिश्रक राजनीतिक-यात्रामे सहायक भेल रहथिन। चिकना गाममे गठित “विश्वभारती वाग्वर्द्धिनी सभा”क संचालनमे सेहो हिनक स्मरणीय योगदान रहल अछि।

आलोच्य पुस्तक दू भागमे अछि। पहिल भागमे लेखक अपन वंशावली, पारिवारिक सम्बन्ध लिखलाक उपरान्त चिकना गामक इतिहास आ वर्तमान स्थितिक विवरण देने छथि। एहि क्रममे ओ चिकना गामक मन्दिर, अन्य पूजनीय-स्थल आदिक परिचय देने छथि। लेखक अपन युवावस्थामे 21 मार्च 1949 ई. कें गाममे जाहि “विश्वभारती वाग्वर्द्धिनी सभा”क स्थापना कएने रहथि, ओकर इतिहास आ उपलब्धि पर सेहो विवरण देल गेल अछि।

हिनका द्वारा देल गेल सूचना सभ मिथिलाक इतिहास पर अग्रेतर शोधक लेल महत्त्वपूर्ण अछि। जेना ई लिखैत छथि जे एहि गाममे देवनाथ ठाकुरक मन्दिर अछि, जतए ग्रामीणलोकनि विशेष करतेबताक अवसर पर बलिप्रदान सेहो करैत छथि। की ई म.म. गोविन्द ठाकुरक पुत्र प्रसिद्ध तान्त्रिक देवनाथ ठाकुरक द्वारा स्थापित मन्दिर थीक? ई रेलवेक उत्तर जाहि प्राचीन समाधि आ ओकर निकटवर्ती डिहवारक स्थानक चर्चा करैत छथि, ओ सभ पुरातात्त्विक अनुसंधानक अपेक्षा रखैत अछि।

हिनका गाममे गामक पुस्तकालय, ग्राम-पंचायत, पश्चिम कोशी तटबन्ध निर्माणमे गामक योगदान आदि विषय पर प्रामाणिक विवरण देने छथि। अपन गामक महत्त्वपूर्ण व्यक्तिक संक्षिप्त परिचय पर एक पृथक् अध्याय छनि।

ई भाग एक प्रकारक ग्राम-टिप्पणी थीक, जे एक गामक सामाजिक इतिहास आ भूगोलक प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करैत अछि।

पुस्तकक दोसर भागक पहिल आलेख “मिथिलामे पंजी-व्यवस्था एवं कर्णाट राजवंश” पंजीक इतिहास पर सामग्री दैत अछि। एकर बाद ग्रामीणक परिचय पातक क्रममे एहि गाम मे 16 मूलक ब्राह्मणक निवास, सभक आवास संख्या आ जनसंख्या सेहो तालिकामे प्रस्तुत कएल गेल अछि। किछु मूलक वंशावली सेहो अछि।

पुस्कक विशेषता अछि जे एहि गामक अन्य जाति- जेना वढई, हजाम, हलुआई, धोबी, धानुक, माली, यादव, तेली ताँती, दुसाध, मुसहर, चमार, मुसलमान- एतेक जातिक 5-6 पीढीक वंशावली सेहो देने छथि जे लेखक सूक्ष्म अनुसंधानक परिणाम थीक आ भावी सामाजिक अनुसंधानक दिशा-निर्देशक सेहो थीक।

अन्तमे लेखक अपन अनुभव आ शास्त्रक बल पर बहुत रास सामाजिक कुरीति पर प्रहार कए मार्गदर्शन कएने छथि। पुस्तकक अन्तमे ललित नारायण मिश्र एवं राघवाचार्यक लिखल किछु पत्र सेहो संकलित अछि।

पुस्तकक भूमिकामे पंजीकार जयानन्द मिश्रक द्वारा देल गेल सूचना सभ महत्त्वपूर्ण अछि। ओ वर्तमानमे गामक सामाजिक इतिहास विषय पर लिखल गेल अथवा लिखल जा रहल पुस्तक सभक विषयमे सेहो सूचना देने छथि-

श्री विद्यानन्द झा- मौआही गामक इतिहास ओ वंशावली

श्री हर्षनाथ ठाकुर- हमर गाँ जनार्दनपुर

श्री मनोज कुमार झा- बेला-दौडा

प्रो. विनोद कुमार ठाकुर- कैथिनियाँ

श्री देवेन्द्र नारायण झा- उमरी

श्री जयानन्द मिश्र- ननौर

ध्यातव्य जे डा. विनयानन्द झाक लिखल मँगरौनीक इतिहास आ पं. गोविन्द झाक सात रेखा सात रंग एही कोटिक रचना थिक।

    ई लेखन-प्रवृत्ति सुखद अछि। विशेष रूपसँ, जखनि कि, ई सभ पोथी मैथिलीमे लिखा रहल अछि। विभिन्न गामक इतिहासक अवलोकन केलाक बाद ओकर बीच पारस्परिक सम्बन्ध पर अनुसंधान भविष्यमे इतिहास-लेखनक दिशामे बड महत्त्वपूर्ण काज होएत।

कुल मिला कए आलोच्य पुस्तक पठनीय अछि। 2015 ई.मे प्रथम बेर प्रकाशित पुस्तकक प्रकाशक प्रो. (डा.) मनोज कुमार झा छथि। मूल्य 101 रुपया देल गेल छैक तथा पुस्तक प्राप्तिक पता देल अछि-

प्रो. (डा.) मनोज कुमार झा

रानी सुदिना सदन,

ग्राम- चिकना,

जिला मधुबनी,

बिहार।

Lalgachi by Amalendu Shekhar Pathak

Book review 

मैथिलीमे साहित्य अकादमीक बालसाहित्यक पुरस्कारक लेल चयनित उपन्यासक मादे पढलाक बाद एकटा पाठकक रूपमे पहिल प्रतिक्रिया। -भवनाथ झा (दिनांक 21 जुलाई, 2017)

 

 

 

श्री अमलेन्दुशेखर पाठकजीक लालगाछी उपन्यास भेटल। ओकरा पढलाक बाद नीक लागल। किशोर अमोल एकर चरितनायक थिकाह जे गर्मीक छुट्टी बितएबाक लेल अपन गाम आएल छथि। हुनका संग किशोर-मित्र सभ सेहो छथिन्ह। ई सभ मीलि कए अपन गाममे अन्तरराष्ट्रीय घुसपैठक पर्दाफास करैत छथि आ अपन गामकें उजरबासँ बचा लैत छथि। हिनक गाम भारतवर्षक प्रतीक थीक तँ लालगाछी मिथिलाक प्रतीक। लालगाछीक भूमिकें खरीदि ओहिठामसँ आतंकवादी गतिविधि चलएबाक अन्तरराष्ट्रीय मनसूबाके ओ किशोरदल मटियामेट कए दैत अछि तकरे खिस्सा थीक लालगाछी। 

गामक कातमे सुखाएल धारक पुलक तर देने मटिकोरा बनाए लालगाछीक तरमे बंकर बनाओल जा चुकल अछि, जाहिमे आतंकवादी सभ अपन अड्डा बना नेने अछि, अवैध सामानक आबाजाही आरम्भ भए गेल छैक। गामक धियापुत्ताक अपहरण कए एतए बंधुआ बनाए ओकरासँ अवैध धंधा कराओल जा रहल अछि। मादक पदार्थक तस्करी आरम्भ भए गेल छैक। एहि बंकरक एकटा मुँह लालगाछीमे एकटा गाछक धोधरिमे अछि, जाहि देने आतंकवादी सभ बाघ, चीता, भालू, भूत-परेत आदिक वेष धरि गामक लोक कें डरा रहल अछि, जाहिसँ गामक लोक लालगाछी आ ओकर चारूकातक जमीन बेचि लेथि आ ओहि भू-भागसँ आतंकवादी गतिविधि सेहो चलाओल जा सकए। एहि षड्यंत्रमे एकटा स्थानीय नेता सेहो संलिप्त छथि। 

लालगाछी आलोक कें बड़ प्रिय छैक, किएक तँ ओ ओकर बाबाक लगाओल थीक। एकटा गाछ तँ देवता जकाँ प्रणम्य सेहो भए गेल छैक। आलोककें अपन गामसँ सिनेह छैक। ओ ओकरा उजडय नहिं देमए चाहैत अछि। गामो दिव्य छैक, ओतए जातिक कोनो मोल नै, केवल परस्पर स्नेह प्रधान छै। भुल्ला पाडा बेटा जकाँ स्नेहपात्र अछि। आलोकक दलमे सभ जातिक लोक छै, सभमे परस्पर स्नेह छैक। एहि प्रतीकात्मक बाल उपन्यासमे मिथिलाक बाटें भारतकें विखण्डित करबाक अंतरराष्ट्रीय प्रयास कें विफल केनिहार आलोक अन्तमे प्रधानमन्त्री द्वारा सम्मानित होइत अछि।

उपन्यासक बीचमे समरकैंपक आयोजन आ विभिन्न पर्यटन स्थल पर घुमबाक कथा, मिथिलाक गौरब-गाथाक वर्णन उपन्यासक गतिकें अवरुद्ध करैत अछि। ओना एहि प्रकारक आनुषंगिक कथा उपन्यासक लेल कोनो अनुचित नै, मुदा एतेक छोट कलेवरमे ओ आनुषंगिक कथा आ वर्णन शिथिलता अनैत अछि। यद्यपि ओकर समावेशक प्रयोजन महान् अछि मुदा शिल्पक दृष्टिसँ ठूसल मसाला बुझाएल। संगहि, सभटा अंशक लेल शीर्षक देब कोनो आवश्यक नै छल। नव-नव शीर्षक पाठक कें पहिलुक अंशक स्मृतिसँ भटका दैत छैक जे औपन्यासिकताक बाधक तत्त्व थीक।

उपन्यासमे ठेंठ मैथिलीक शब्दसभक प्रयोग भेल अछि। बहुत रास नव-नव शब्द सेहो आएल अछि। बेगूसरायक वाक्य-योजनाकें मैथिलीक रूपमे समावेश करब बेसी नीक लागल। बेगूसरायक अतिरिक्त पूर्णिया आ हाजीपुरक खाँटी मैथिलीकें सेहो स्थान दितथि तँ आर नीक रहैत। मोटामोटी उपन्यास रुचिकर छैक। एकर उद्देश्य महान् अछि। ई किशोर पाठकक मनमे अपन मिथिला आ भारतक प्रति सम्मानक भाव एवं ओकरा लेल किछु करबाक उत्साह जगबैत अछि। लेखक कें धन्यवाद।

Maithili Literature

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[a collection of traditional songs in the praise of Goddess from Mithilã, along with Sankshipta Tantrãhnika, a practice book on daily rituals according to Tantras, previously collected and edited by Bãbu Laliteshvara Siîha.] Present Editor- Pt. Bhavanath Jha, 2017. continue reading>>


[ Rearranged version of Dhatupath by Dinabandhu Jha] verb roots in Maithili. continue reading>>


[From Sacred to Mundane] by Pt. Govinda Jha in Maithili language.






  • Navaranga A collection of one-act plays by Govind Jha,


पुस्तकक नाम- पण्डित गणनाथ झा रचनावली । सम्पादक- प्रो. यशोदानाथ झा । प्रकाशक- श्री यशोदानाथ झा, आनन्द कुटीर, पाहीटोल, पो. सरिसब-पाही, मधुबनी-847424 (बिहार)। प्रकाशन वर्ष- 2017 ई., प्राप्तिस्थान- उपरिवत्। मूल्य– 200.00. मुद्रक- एकेडमी प्रेस, 602, दारागंज, इलाहाबाद। पृष्ठ संख्या– 278।. सजिल्द। continue reading>>


  • Koilakh, written by Hitnath Jha  कोइलख पुस्तकक नाम- कोइलख। लेखक-सम्पादक- श्री हितनाथ झा।प्रकाशक-प्रियदर्शी प्रकाशन, 217, पाटलीपुत्र कॉलोनी, पटना- 800013.प्रकाशन वर्ष- 2017 ई., प्राप्तिस्थान- (1) श्री हितनाथ झा, जयप्रभा नगर, मारखम कालेज के निकट, बड़कागाँव रोड, हजारीबाग- 825301. मो. 9430743070, ईमेल- hitnathjha@gmail.com (2) प्रो. भीमनाथ झा, छपकी पड़री, (पंचायत भवन से दक्षिण), लक्ष्मीसागर, दरभंगा-846009 (3) जानकी पुस्तक केन्द्र- गोशाला चौक, मधुबनी-847211. मूल्य– 400.00. मुद्रक प्रिंटवेल, टावर, दरभंगा।पृष्ठ संख्या- 210. सजिल्द। continue reading>>

  • Lalgachi by Amalendu Shekhar Pathak 

    श्री अमलेन्दुशेखर पाठकजीक लालगाछी उपन्यास भेटल। ओकरा पढलाक बाद नीक लागल। किशोर अमोल एकर चरितनायक थिकाह जे गर्मीक छुट्टी बितएबाक लेल अपन गाम आएल छथि। हुनका संग किशोर-मित्र सभ सेहो छथिन्ह। ई सभ मीलि कए अपन गाममे अन्तरराष्ट्रीय घुसपैठक पर्दाफास करैत छथि आ अपन गामकें उजरबासँ बचा लैत छथि। हिनक गाम भारतवर्षक प्रतीक थीक तँ लालगाछी मिथिलाक प्रतीक। लालगाछीक भूमिकें खरीदि ओहिठामसँ आतंकवादी गतिविधि चलएबाक अन्तरराष्ट्रीय मनसूबाके ओ किशोरदल मटियामेट कए दैत अछि तकरे खिस्सा थीक लालगाछी। continue reading>>