वाजसनेयी शाखा में संध्यावंदन की विधि
जल हाथ में लेकर – ॐ तत्सत् ॐ तत्सत् ॐ तत्सत्।
पूर्वोत्तर कोण की ओर मुँह कर आचमन कर शिखा बाँधकर फिर दो बार आचमन कर वाम भाग में कुश रखें और दाहिने हाथ में तेकुशा लेकर –
अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुप् छन्दो भाववृतोदेवताश्वमेधावभृथे विनियोगः।।
ॐ ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥१॥
Continue Reading
क्या है कुलधर्म? क्या यूरोपीयनों ने इसी को टार्गेट कर भारत को गुलाम बनाया था
हम इतिहास को उलट कर देखें तो पता चलेगा कि यूरोपीयन प्रभाव के कारण सबसे पहले तथा सबसे अधिक प्रभावित हमारे पारम्परिक उत्पादक वर्ग हुए,Continue Reading
मन्दिरों में दलित पुजारियों की नियुक्ति पर एक बहस
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत की परम्परा में मन्दिरों में पूजा करने के विशेष नियम हैं, विशेष मन्त्र हैं। मन्त्रों की अपनी-अपनी अलग-अलग परम्परा है। दक्षिण भारत के वैष्णव मन्दिरों में वैखानस आगम से पूजा होती है। Continue Reading
मिथिला के ऐतिहासिक व्यक्ति धूर्तराज गोनू झा के नाम को बिगाड़ने का दुष्प्रयास
इतिहासकारों का मानना है कि वे कर्महे मूल के बीजी पुरुष वंशधर के तीन पुत्रों में एक थे। पंजी में उनके नाम के साथ धूर्तराज शब्द लगा हुआ है- करमहे सोनकरियाम मूल मे बीजी मम बंशधर, ऐजन सुतो मम हरिब्रह्म, म.म. हरिकेश, म.म. धूर्तराज गोनू। Continue Reading
मिथिलाक लोक-परम्परामे सिरहड़-सलामी
ई मुख्य रूपसँ कलश थीक, तें एकर मूल शब्द अछि “श्रीघट”। एही श्रीघट सँ सिरघड़ आ सिरघड़ सँ सिरहड़ भेल। श्रीघटक अर्थ भेल शोभा-घट अथवा मंगल-घट। ई शुभकारक घट थीक। ओ विशिष्ट व्यक्ति जनिका लेल ई मांगलिक कार्यक्रम होइत अछि ओ अपना हाथें ओहि कलश पर किछु रुपया चढ़बैत छथि ओएह भेल “सिरहड़ सलामी” माने मंगल-घट पर द्रव्य चढ़ाएब आ ओकरा प्रणाम करब सिरहड़–सलामी शब्दक अर्थ भेल।Continue Reading
विपरीत परिस्थिति में श्राद्ध की शास्त्र-सम्मत विधि
यह सनातन धर्म की विशेषता है कि इसमें सभी विपरीय परिस्थितियों को देखकर विधान किये गये हैं। यहाँ विष्णु-पुराण से उन दस श्लोकों को उद्धृत किया जाता है, जिनमें यह उल्लेख है कि श्राद्ध किन किन रूपों में किया जा सकता है। यहाँ श्राद्ध के सात विकल्पों का उल्लेख हुआ है।Continue Reading
मनबोधकवि कृत कृष्णजन्म (प्रबन्धकाव्य), डा. शशिनाथ झा द्वारा सम्पादित
पाठोद्धार के लिए अर्थसंगति, छन्द का अनुरोध, तुकबन्दी की समता, त्रुटिपूर्त्ति, मिथिलाक्षर से देवनागरी में लिप्यन्तरण के दौरान स्वाभाविक भ्रम आदि का विवचेन करते हुए पाण्डुलिपि-शास्त्र एवं भाषा के मर्मज्ञ विद्वान् डा. शशिनाथ झा ने यहाँ संगति बैठाते हुए अनेक पाठ-संशोधन कर इस मैथिली प्रबन्ध काव्य को पूर्णता प्रदान की है।Continue Reading
विद्यापति कृत कीर्त्तिलता, डा. शशिनाथ झा द्वारा सम्पादित
प्रस्तुत संस्करण में कीर्त्तिलता के मूल हस्तलेख (काठमाण्डू में स्थित) की फोटो प्रति एवं प्रतिलिपि का उपयोग किया गया है, प्राचीन एवं नवीन मैथिली भाषा को दृष्टि में रख कर इसका निरीक्षण किया गया है, मैथिली लिपि से प्रतिलिपि करने में जो स्वाभाविक रूप से भूल होती है, उसका ध्यान रख कर अर्थ संगति के अनुसार पाठ संशोधन किया गया है, पूर्व संस्करणों के पाठभेद से पाठ निर्धारण में सहायता ली गयी है और संस्कृतच्छाया एवं हिन्दी मैथिली व्याख्या प्रस्तुत की गयी है।Continue Reading
विद्यापति कृत कीर्तिगाथा एवं कीर्तिपताका, डा. शशिनाथ झा द्वारा सम्पादित
विद्यापतिकृत कीर्तिपताका का एकमात्र हस्तलेख मिथिलाक्षर में लिखित तालपत्र नेपाल राजकीय हस्तलेखागार, काठमाण्डू में है। इसमें ग्रन्थ पूर्ण नहीं है। परीक्षण करने पर इस हस्तलेख में छोटे-छोटे तीन स्वतन्त्र ग्रन्थ सिद्ध हुए हैं-Continue Reading
अपभ्रंशकाव्य में सौन्दर्य वर्णन -डॉ. शशिनाथ झा
लेखक- डॉ. शशिनाथ झा- विस्तृत परिचय सम्मति आदरणीय झा जी, नमस्कार । आपका आलेख ‘अपभ्रंशकाव्य में सौन्दर्यवर्णन’ मिला। मैं उसे पूरा पढ़ गया। अतिप्रसन्नता हुई। आप-जैसे विद्वान् से जो अपेक्षा थी उससे अधिक ही आपका आलेख प्रीतिकर हुआ। हार्दिक साधुवाद। आपके आलेख की एक बड़ी विशेषता है कि उसमें आपनेContinue Reading









